कृषि की समस्याएं — जल अभाव, मरुस्थलीकरण, छोटी जोत, सिंचाई
परिचय — राजस्थान की कृषि संकट
राजस्थान की कृषि भारत में सबसे चुनौतीपूर्ण है क्योंकि यह राज्य अर्ध-शुष्क और शुष्क जलवायु में स्थित है। राजस्थान की कुल भूमि का 61% रेगिस्तान है, जहाँ वर्षा 500 मिमी से कम होती है। इस कारण कृषकों को जल अभाव, मरुस्थलीकरण, छोटी जोत और अपर्याप्त सिंचाई जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। राजस्थान में सिंचित क्षेत्र मात्र 35% है, जबकि भारत का औसत 45% है।
कृषि समस्याओं के मुख्य कारण
- भौगोलिक कारण: थार रेगिस्तान, कम वर्षा, उच्च तापमान, तेज हवाएं
- जलवायु कारण: अनियमित और अपर्याप्त वर्षा, सूखा की बारंबारता
- आर्थिक कारण: कम आय, सिंचाई सुविधा की कमी, महँगे बीज और खाद
- सामाजिक कारण: छोटी जोत, किसानों की कम शिक्षा, ऋण का बोझ

जल अभाव और सूखा समस्या
राजस्थान में जल अभाव कृषि की सबसे गंभीर समस्या है। राजस्थान की वार्षिक वर्षा 100 मिमी (जैसलमेर) से 900 मिमी (पूर्वी राजस्थान) तक है। पश्चिमी राजस्थान में सूखा हर 2-3 साल में आता है, जिससे फसलें नष्ट हो जाती हैं और किसान आत्महत्या तक करने के लिए विवश हो जाते हैं।
| क्षेत्र | वार्षिक वर्षा | सूखा की स्थिति | मुख्य फसलें |
|---|---|---|---|
| पश्चिमी राजस्थान (जैसलमेर, बाड़मेर) | 100–250 मिमी | गंभीर सूखा, हर साल | बाजरा, ग्वार |
| मध्य राजस्थान (जोधपुर, नागौर) | 250–500 मिमी | आवधिक सूखा, 2-3 साल में | बाजरा, सरसों, मूंगफली |
| पूर्वी राजस्थान (जयपुर, अलवर) | 500–900 मिमी | कम सूखा, कभी-कभी | गेहूं, चना, सोयाबीन |
| दक्षिणी राजस्थान (उदयपुर, चित्तौड़) | 600–800 मिमी | कम सूखा, अच्छी वर्षा | मक्का, सोयाबीन, दलहन |
जल अभाव के प्रभाव
- फसल की विफलता: बाजरा, सरसों, ग्वार की पैदावार 50-70% तक गिर जाती है
- पशुधन की मृत्यु: सूखे में हजारों पशु मर जाते हैं, किसानों की आय खत्म हो जाती है
- भूजल स्तर में गिरावट: कुएं सूख जाते हैं, बोरवेल 200-300 मीटर गहरे करने पड़ते हैं
- पलायन: किसान शहरों की ओर पलायन करते हैं, ग्रामीण जनसंख्या कम होती है
- कर्ज का बोझ: सूखे में किसान बैंक से कर्ज लेते हैं, जिसे चुका नहीं पाते
जल संरक्षण के उपाय
- वर्षा जल संचयन: तालाब, बावड़ी, कुंड बनाना
- ड्रिप सिंचाई: पानी की बचत 40-50% तक
- भूजल पुनर्भरण: बोरवेल में रिचार्जिंग, चेक डैम
- फसल चयन: सूखा-सहन करने वाली फसलें (बाजरा, ग्वार, सरसों)
मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण
मरुस्थलीकरण (Desertification) राजस्थान की दूसरी सबसे गंभीर समस्या है। राजस्थान में हर साल 1,000-2,000 हेक्टेयर भूमि रेगिस्तान में बदल रही है। थार रेगिस्तान उत्तर-पश्चिम की ओर 500 मीटर प्रति वर्ष की गति से बढ़ रहा है। इससे कृषि योग्य भूमि नष्ट हो रही है और मिट्टी की उर्वरता घट रही है।
तेज हवाएं ऊपरी मिट्टी को उड़ा ले जाती हैं। पश्चिमी राजस्थान में धूल भरी आँधियाँ आती हैं जो मिट्टी की परत को नष्ट करती हैं।
अनियमित वर्षा से अचानक बाढ़ आती है जो मिट्टी को बहा ले जाती है। दक्षिणी राजस्थान में गुलियों का निर्माण होता है।
पशुओं की अधिक संख्या से घास-पात नष्ट हो जाता है। ऊन उत्पादन में भेड़ों की संख्या बढ़ने से चारागाह खराब हो रहे हैं।
ईंधन और लकड़ी के लिए वनों की कटाई से मिट्टी का संरक्षण नष्ट हो रहा है। राजस्थान में वन क्षेत्र मात्र 9.5% है।
मरुस्थलीकरण के प्रभाव
- राजस्थान में 61% भूमि रेगिस्तान है
- हर साल 1,000-2,000 हेक्टेयर नई भूमि मरुस्थलीकृत हो रही है
- थार रेगिस्तान 500 मीटर/वर्ष की गति से बढ़ रहा है
- कृषि योग्य भूमि 2% प्रति दशक की दर से घट रही है
मरुस्थलीकरण से बचाव के उपाय
- वनरोपण: इंदिरा गाँधी नहर परियोजना के साथ वृक्षारोपण, खेजड़ी, नीम, बबूल लगाना
- चारागाह सुधार: घास के मैदानों को संरक्षित करना, चराई पर नियंत्रण
- मेड़बंदी: खेतों के किनारे पेड़ लगाना, हवा की गति को कम करना
- जल संचयन: तालाब, कुंड, चेक डैम से भूजल स्तर बढ़ाना
- कृषि पद्धति: समोच्च खेती (Contour farming), पट्टी फसल (Strip cropping)
- 1975 में शुरू: सतलज-व्यास नदियों से पानी लाया गया
- लंबाई: 649 किमी (मुख्य नहर) + 3,000 किमी (शाखाएं)
- सिंचित क्षेत्र: 8.5 लाख हेक्टेयर
- प्रभाव: हनुमानगढ़, गंगानगर, बीकानेर में कृषि क्रांति, मरुस्थलीकरण में कमी

छोटी जोत और विखंडन समस्या
छोटी जोत (Small Holdings) राजस्थान की कृषि की एक बड़ी समस्या है। राजस्थान में औसत जोत का आकार 4.5 हेक्टेयर है, जबकि भारत का औसत 1.2 हेक्टेयर है। लेकिन 85% किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि है। इससे कृषि अलाभकारी हो गई है और किसान कर्ज में डूब गए हैं।
छोटी जोत के कारण
- जनसंख्या वृद्धि: परिवार बड़े होने से जमीन का विभाजन होता है
- उत्तराधिकार कानून: सभी पुत्रों को समान हिस्सा मिलता है
- भूमि सुधार की असफलता: सहकारी खेती, सामूहिक खेती नहीं चल सकी
- शहरीकरण: शहरों के विस्तार से कृषि भूमि कम हो रही है
छोटी जोत के प्रभाव
- कम उत्पादन: छोटी जोत पर आधुनिक यंत्रों का उपयोग संभव नहीं
- अधिक लागत: बीज, खाद, सिंचाई की लागत अधिक होती है
- कम आय: उत्पादन कम होने से आय भी कम होती है
- कर्ज का बोझ: किसान महाजन से कर्ज लेते हैं, ब्याज अधिक होता है
- आत्महत्या: कर्ज चुका न पाने से किसान आत्महत्या करते हैं
समाधान के उपाय
- सहकारी खेती: किसानों को मिलकर खेती करने के लिए प्रोत्साहित करना
- सामूहिक बीज भंडार: किसान मिलकर बीज, खाद, यंत्र खरीदें
- कृषि यंत्रों की सुविधा: किसान क्लब, कस्टम हायरिंग सेंटर
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): किसानों को उचित मूल्य मिले
- कृषि ऋण में छूट: छोटे किसानों को कम ब्याज दर पर कर्ज
सिंचाई संकट और समाधान
राजस्थान में सिंचित क्षेत्र मात्र 35% है, जो भारत के औसत 45% से कम है। इसका मतलब है कि 65% कृषि भूमि वर्षा पर निर्भर है। अनियमित वर्षा के कारण फसलें नष्ट हो जाती हैं। सिंचाई के साधन सीमित हैं — कुएं, बोरवेल, नहरें सभी अपर्याप्त हैं। भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, जिससे सिंचाई और भी कठिन हो गई है।
| सिंचाई का साधन | सिंचित क्षेत्र (लाख हेक्टेयर) | प्रतिशत | समस्या |
|---|---|---|---|
| नहरें | 15.2 | 43% | पानी की कमी, रिसाव, अनियमित आपूर्ति |
| कुएं | 10.5 | 30% | भूजल स्तर गिरना, सूख जाना |
| बोरवेल | 8.8 | 25% | बिजली की कमी, 200-300 मीटर गहरे |
| तालाब/कुंड | 1.5 | 4% | सूखे में सूख जाते हैं |
सिंचाई की समस्याएं
- पानी की कमी: नदियों में पानी कम होने से नहरों में पानी नहीं आता
- रिसाव: पुरानी नहरों से 30-40% पानी रिसता है
- अनियमित आपूर्ति: गर्मी में पानी कम, सर्दी में ज्यादा
- जल-भराव: नहरों के पास जमीन खराब हो जाती है
- लवणीयता: नहर के पानी से जमीन खारी हो जाती है
- भूजल स्तर में गिरावट: हर साल 1-2 मीटर गिर रहा है
- बोरवेल की गहराई: 50 साल पहले 50 मीटर, अब 200-300 मीटर
- बिजली की कमी: बोरवेल चलाने के लिए बिजली चाहिए, जो महँगी है
- जल की गुणवत्ता: कहीं पानी खारा है, कहीं फ्लोराइड है
- अधिक दोहन: भूजल का दोहन पुनर्भरण से ज्यादा है
- बिजली की कमी: कृषि के लिए बिजली सीमित समय के लिए दी जाती है
- महँगी बिजली: किसानों को सब्सिडी दी जाती है, लेकिन फिर भी महँगी है
- बिजली चोरी: अनधिकृत कनेक्शन, मीटर न होना
- ट्रांसफॉर्मर की कमी: गाँवों में बिजली के लिए ट्रांसफॉर्मर नहीं हैं


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