कृषि समस्याएं — सूखा, जल संकट, मरुस्थलीकरण, छोटी जोत
परिचय और समस्याओं का परिदृश्य
राजस्थान की कृषि अर्थव्यवस्था का मेरुदंड है, किंतु यह राज्य कई गंभीर कृषि समस्याओं का सामना करता है जो उत्पादकता, किसान आय और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करते हैं। सूखा, जल संकट, मरुस्थलीकरण और छोटी जोत — ये चार मुख्य समस्याएं राजस्थान के 65% ग्रामीण जनसंख्या को सीधे प्रभावित करती हैं।
समस्याओं का अंतर्संबंध
ये समस्याएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। सूखा जल संकट को गहरा करता है, जो भूजल दोहन को बढ़ाता है। अत्यधिक दोहन से भूजल स्तर गिरता है और मरुस्थलीकरण तेजी से होता है। साथ ही, छोटी जोतें किसानों को आधुनिक सिंचाई तकनीकें अपनाने में असमर्थ बनाती हैं।

सूखा — कारण, प्रभाव और प्रबंधन
सूखा राजस्थान की सबसे गंभीर कृषि समस्या है। राजस्थान में प्रति वर्ष औसत वर्षा केवल 57.5 सेमी है, जबकि राष्ट्रीय औसत 117 सेमी है। यह अनिश्चितता और अपर्याप्तता सूखे की स्थिति पैदा करती है।
सूखे के कारण
- अनिश्चित मानसून: दक्षिण-पश्चिम मानसून की अनिश्चितता से वर्षा में 30-40% तक उतार-चढ़ाव होता है
- भौगोलिक स्थिति: थार मरुस्थल के निकटता के कारण पश्चिमी राजस्थान में वर्षा अत्यंत कम
- वनस्पति की कमी: वनों की कटाई से वर्षा को आकर्षित करने वाली नमी कम हुई
- जलवायु परिवर्तन: ग्लोबल वार्मिंग से सूखे की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ी है
सूखे के प्रभाव
| प्रभाव का क्षेत्र | विवरण | आंकड़े |
|---|---|---|
| कृषि उत्पादन | फसलों की विफलता, पैदावार में गिरावट | 50-70% तक नुकसान |
| पशुधन | चारे की कमी, पशुओं की मृत्यु | 2000-2012 में 10 लाख पशु मरे |
| भूजल | भूजल स्तर में तेजी से गिरावट | प्रति वर्ष 0.5-1 मीटर गिरावट |
| किसान आय | आय में भारी कमी, कर्ज में वृद्धि | 50-80% आय हानि |
| प्रवास | ग्रामीण जनसंख्या का शहरों की ओर पलायन | सूखे के वर्षों में 20-30% अधिक प्रवास |
सूखे का प्रबंधन
- MGNREGA: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना से सूखे के समय रोजगार प्रदान
- खाद्य सहायता: राशन वितरण और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करना
- पशु चारा: सूखे के समय पशुओं के लिए चारा आयात और वितरण
- ऋण माफी: किसानों के कृषि ऋण में छूट और नए ऋण की सुविधा
- जल संचयन: तालाब, कुंड, नहरें और बोरवेल रीचार्जिंग से जल संरक्षण
- सिंचाई विस्तार: IGNP, चंबल परियोजना, माही परियोजना से सिंचित क्षेत्र बढ़ाना
- सूखा-सहन फसलें: बाजरा, ग्वार, सरसों जैसी कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा
- वनीकरण: वृक्षारोपण से वर्षा को आकर्षित करना और मरुस्थलीकरण को रोकना
- मिट्टी संरक्षण: कंटूर बंडिंग, टेरेसिंग से मिट्टी की नमी बनाए रखना
जल संकट और भूजल समस्या
राजस्थान में जल संकट अत्यंत गंभीर है। राज्य में कुल जल संसाधन मात्र 92 अरब घन मीटर हैं, जबकि वर्तमान मांग 140 अरब घन मीटर से अधिक है। यह 48 अरब घन मीटर की कमी को दर्शाता है।
भूजल दोहन की समस्या
राजस्थान में भूजल का दोहन अत्यंत तेजी से हो रहा है। 89% भूजल दोहन दर का अर्थ है कि जितना जल निकाला जा रहा है, उससे अधिक जल निकाला जा रहा है। यह भूजल स्तर में तेजी से गिरावट का कारण बनता है।
जल संकट के कारण
- अपर्याप्त वर्षा: राजस्थान में वार्षिक वर्षा 57.5 सेमी है, जो राष्ट्रीय औसत से आधी है
- अत्यधिक वाष्पीकरण: उच्च तापमान और कम आर्द्रता के कारण वाष्पीकरण दर 250 सेमी तक है
- सिंचाई का विस्तार: हरित क्रांति के बाद सिंचित क्षेत्र बढ़ा, जिससे जल मांग बढ़ी
- जनसंख्या वृद्धि: बढ़ती जनसंख्या के कारण पीने के पानी की मांग बढ़ी
- औद्योगीकरण: उद्योगों के विकास से जल की मांग में वृद्धि हुई
जल संकट के समाधान

मरुस्थलीकरण — विस्तार और नियंत्रण
मरुस्थलीकरण का अर्थ है — उपजाऊ भूमि का रेगिस्तान में परिणत होना। राजस्थान में 32% भूमि मरुस्थलीकृत है, जो 9.2 मिलियन हेक्टेयर के बराबर है। यह समस्या प्रतिवर्ष बढ़ रही है।
मरुस्थलीकरण के कारण
बढ़ता तापमान, कम वर्षा, और सूखे की आवृत्ति से भूमि की उर्वरता में कमी होती है।
वनों की अवैध कटाई से मिट्टी का कटाव बढ़ता है और भूमि की सुरक्षा कम होती है।
पशुओं की अत्यधिक संख्या से वनस्पति का अत्यधिक दोहन होता है, जिससे मिट्टी नंगी हो जाती है।
अत्यधिक भूजल दोहन से भूमि की नमी कम होती है, जिससे वनस्पति नष्ट हो जाती है।
मरुस्थलीकरण के प्रभाव
- कृषि उत्पादन में कमी: मरुस्थलीकृत भूमि पर कृषि संभव नहीं रहती, जिससे खाद्य सुरक्षा को खतरा होता है
- जैव विविधता का नुकसान: वनस्पति और जीव-जंतुओं की प्रजातियां विलुप्त हो जाती हैं
- जल चक्र में व्यवधान: वनस्पति की कमी से वर्षा कम होती है और सूखा बढ़ता है
- मिट्टी का कटाव: वनस्पति के बिना मिट्टी हवा और पानी से कट जाती है
- आर्थिक नुकसान: कृषि भूमि की हानि से किसानों की आय में कमी होती है
मरुस्थलीकरण की रोकथाम
- राजस्थान वन नीति 2010: वनों के विस्तार और संरक्षण पर जोर दिया गया
- सामाजिक वनीकरण: गांवों के आसपास वृक्षारोपण से स्थानीय समुदाय को लाभ मिलता है
- रेगिस्तान में वृक्षारोपण: खेजड़ी, बबूल, नीम जैसी सूखा-सहन प्रजातियों का रोपण
- वन संरक्षण: वनों की अवैध कटाई को रोकने के लिए कठोर कानून लागू किए गए
- कंटूर बंडिंग: ढलान वाली भूमि पर समोच्च रेखाओं के अनुसार मेड़ें बनाई जाती हैं
- टेरेसिंग: पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीदार खेत बनाए जाते हैं
- तालाब निर्माण: वर्षा के जल को संरक्षित करने के लिए तालाब खोदे जाते हैं
- मल्चिंग: मिट्टी की नमी बनाए रखने के लिए पुआल या पत्तियों से ढका जाता है
- चारागाह का विकास: सरकारी चारागाहों का विकास और प्रबंधन
- पशु संख्या नियंत्रण: पशुओं की संख्या को वहन क्षमता के अनुसार सीमित करना
- चारे का उत्पादन: कृत्रिम चारे का उत्पादन और वितरण
- पशु प्रजनन सुधार: अधिक दूध देने वाली और कम चारा खाने वाली नस्लों का विकास
छोटी जोत और खंडित भूमि
छोटी जोत राजस्थान की कृषि की एक बड़ी समस्या है। राजस्थान में औसत जोत का आकार 1.5 हेक्टेयर है, जो राष्ट्रीय औसत 1.15 हेक्टेयर से अधिक है, लेकिन 70% किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि है। यह छोटी जोतें कृषि को अलाभकारी बनाती हैं।
छोटी जोत की समस्या
| समस्या | विवरण | प्रभाव |
|---|---|---|
| अर्थशास्त्र | छोटी जोत पर कृषि की लागत अधिक होती है | लाभ कम, किसान गरीब रहते हैं |
| यांत्रिकीकरण | ट्रैक्टर, हार्वेस्टर जैसी मशीनें छोटी जोत पर अलाभकारी हैं | किसान पारंपरिक तरीके अपनाते हैं, उत्पादकता कम रहती है |
| सिंचाई | छोटी जोत पर सिंचाई की सुविधा महंगी पड़ती है | किसान वर्षा पर निर्भर रहते हैं, सूखे में नुकसान होता है |
| ऋण | बैंक छोटी जोत के किसानों को ऋण देने में संकोच करते हैं | किसान साहूकारों से कर्ज लेते हैं, कर्ज में फंस जाते हैं |
| विपणन | छोटी जोत से कम उत्पादन होता है, विपणन मुश्किल होता है | किसान सही कीमत नहीं पाते, बिचौलियों को लाभ मिलता है |
भूमि विभाजन के कारण
- जनसंख्या वृद्धि: बढ़ती जनसंख्या के कारण भूमि का विभाजन होता है
- उत्तराधिकार कानून: भारतीय कानून में संपत्ति सभी पुत्रों को समान रूप से विभाजित होती है
- भूमि सुधार: जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के बाद भूमि का विभाजन हुआ
- शहरीकरण: शहरों के विस्तार से कृषि भूमि का अधिग्रहण होता है
छोटी जोत के समाधान
सरकारी योजनाएं
इस योजना के तहत सभी किसानों को प्रति वर्ष 6,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है। यह राशि तीन किस्तों में दी जाती है। यह योजना छोटे किसानों के लिए महत्वपूर्ण है।
इस योजना के तहत किसानों की फसल को प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा दी जाती है। फसल खराब होने पर किसानों को मुआवजा दिया जाता है। यह योजना छोटे किसानों के जोखिम को कम करती है।
राजस्थान सरकार ने छोटे किसानों के लिए विशेष योजनाएं बनाई हैं। इनमें — कृषि यंत्र अनुदान, बीज अनुदान, खाद अनुदान आदि शामिल हैं। ये योजनाएं किसानों की लागत को कम करती हैं।
परीक्षा प्रश्न और सारांश
🧠 स्मरणीय सूत्र
📊 त्वरित संशोधन तालिका
📚 इंटरैक्टिव प्रश्न
📝 पिछली परीक्षाओं के प्रश्न
कारण: (1) वनों की कटाई, (2) अत्यधिक चराई, (3) भूजल दोहन, (4) जलवायु परिवर्तन।
प्रभाव: (1) कृषि उत्पादन में कमी, (2) जैव विविधता का नुकसान, (3) जल चक्र में व्यवधान, (4) मिट्टी का कटाव।
रोकथाम के उपाय: (1) वनीकरण और वृक्षारोपण, (2) मिट्टी और जल संरक्षण (कंटूर बंडिंग, टेरेसिंग), (3) पशुचारण प्रबंधन, (4) वन संरक्षण कानूनों का कठोर प्रवर्तन।
समन्वित समाधान: (1) जल संचयन और संरक्षण: तालाब, कुंड, बोरवेल रीचार्जिंग से जल को संरक्षित करना। (2) सिंचाई विस्तार: IGNP, चंबल, माही परियोजनाओं से सिंचित क्षेत्र बढ़ाना। (3) वनीकरण: वृक्षारोपण से वर्षा को आकर्षित करना और मरुस्थलीकरण को रोकना। (4) कृषि सुधार: सहकारी खेती, गहन कृषि, पशुपालन से छोटी जोतों की समस्या का समाधान। (5) जलवायु-अनुकूल कृषि: सूखा-सहन फसलें (बाजरा, ग्वार, सरसों) को बढ़ावा देना।


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