मराठा आक्रमण — राजस्थान में चौथ-सरदेशमुखी वसूली
चौथ-सरदेशमुखी का परिचय
चौथ और सरदेशमुखी मराठा साम्राज्य द्वारा विजित क्षेत्रों से वसूल किए जाने वाले दो प्रमुख कर थे, जो 18वीं सदी में राजस्थान की आर्थिक व्यवस्था को गहरे संकट में डाल गए। ये कर न केवल राजस्व का साधन थे, बल्कि मराठा सैन्य शक्ति और राजनीतिक प्रभुत्व का प्रतीक भी थे।
चौथ की परिभाषा और उद्देश्य
चौथ शब्द संस्कृत के ‘चतुर्थ’ (चौथा भाग) से बना है। यह कर मूलतः शिवाजी महाराज द्वारा दक्कन में प्रचलित किया गया था। इसका उद्देश्य किसी क्षेत्र पर मराठा सुरक्षा का दावा करना और उसके बदले में राजस्व का एक निश्चित हिस्सा प्राप्त करना था। यदि कोई राजा चौथ नहीं देता था, तो मराठा सेना उस क्षेत्र को लूटने और तबाह करने का अधिकार रखती थी।
सरदेशमुखी की परिभाषा
सरदेशमुखी का अर्थ है ‘प्रांत का मुखिया’। यह एक अतिरिक्त कर था जो मराठा सरदारों को उनकी सैन्य सेवाओं के लिए दिया जाता था। यह कर चौथ के अलावा लगाया जाता था और इसकी दर कुल राजस्व का 10% थी।

मराठा आक्रमण की पृष्ठभूमि
18वीं सदी के प्रारंभ में मुगल साम्राज्य का तेजी से पतन हो रहा था। इसी अवधि में मराठा शक्ति का उत्कर्ष हुआ और वे उत्तर भारत की ओर अपने विस्तार की नीति अपनाने लगे। राजस्थान इसी विस्तारवादी नीति का प्रमुख लक्ष्य बना।
मुगल पतन और मराठा विस्तार
औरंगजेब की मृत्यु (1707) के बाद मुगल साम्राज्य तेजी से कमजोर हो गया। इसी समय बाजीराव प्रथम (1720-1740) मराठा पेशवा बने और उन्होंने एक आक्रामक विस्तार नीति अपनाई। उनके नेतृत्व में मराठा सेनाएं उत्तर की ओर बढ़ने लगीं।
राजस्थान की कमजोर राजनीतिक स्थिति
18वीं सदी में राजस्थान की प्रमुख रियासतें — जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर, जैसलमेर — आपस में विभाजित थीं। न तो वे एकजुट थीं और न ही पर्याप्त सैन्य शक्ति रखती थीं। इस कारण वे मराठा आक्रमण का प्रतिरोध करने में असमर्थ थीं।
राजस्थान में चौथ वसूली का विस्तार
1730 के दशक से मराठा सेनाएं राजस्थान में नियमित रूप से चौथ वसूली के लिए आने लगीं। यह केवल एक बार की लूट नहीं थी, बल्कि एक व्यवस्थित और दोहराई जाने वाली प्रक्रिया थी जो दशकों तक चली।
चौथ वसूली की प्रक्रिया
मराठा सेनाएं राजस्थान में प्रवेश करती थीं और स्थानीय राजाओं को चौथ देने के लिए बाध्य करती थीं। यदि कोई राजा चौथ देने से इंकार करता था, तो मराठा सेना उस क्षेत्र को लूटती थी, खेतों को जलाती थी और पशुधन को ले जाती थी। इस प्रक्रिया को ‘चौथ की मांग’ कहा जाता था।
- मांग: मराठा सरदार राजा को एक निश्चित राशि की चौथ देने के लिए कहते थे
- वार्ता: राजा और मराठा सरदार के बीच बातचीत होती थी
- समझौता: यदि राजा सहमत हो जाता था, तो चौथ का भुगतान किया जाता था
- लूटपाट: यदि राजा इंकार करता था, तो सेना लूटपाट करती थी
प्रमुख मराठा सरदार और उनकी भूमिका
होल्कर और सिंधिया परिवार के मराठा सरदार राजस्थान में चौथ वसूली के मुख्य एजेंट थे। मल्हार राव होल्कर और उनके उत्तराधिकारी विशेषकर राजस्थान में सक्रिय थे। इसके अलावा पेशवा की सेनाएं भी नियमित रूप से चौथ वसूली के लिए राजस्थान में आती थीं।
चौथ वसूली की तीव्रता
1730 के दशक में चौथ वसूली अनियमित थी, लेकिन 1740 के दशक तक यह एक व्यवस्थित प्रणाली बन गई। 1750 के दशक तक राजस्थान की लगभग सभी प्रमुख रियासतें नियमित रूप से चौथ का भुगतान कर रही थीं।

प्रभावित क्षेत्र और राजस्व नुकसान
चौथ-सरदेशमुखी की वसूली राजस्थान के सभी हिस्सों को प्रभावित करती थी, लेकिन कुछ क्षेत्र अधिक प्रभावित थे। मराठा सेनाओं के आने के रास्ते और उनके ठहरने के स्थान विशेषकर लूटपाट के शिकार बनते थे।
सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र
पूर्वी राजस्थान — विशेषकर जयपुर, अलवर और भरतपुर क्षेत्र — सबसे अधिक प्रभावित थे क्योंकि ये क्षेत्र मराठा सेनाओं के मुख्य मार्ग पर थे। मध्य राजस्थान — जोधपुर, बीकानेर — भी नियमित रूप से चौथ का भुगतान करते थे। दक्षिण राजस्थान — उदयपुर, डूंगरपुर — अपेक्षाकृत कम प्रभावित थे क्योंकि वे दूरस्थ थे।
| रियासत | अनुमानित वार्षिक चौथ | प्रभाव की तीव्रता | मुख्य कारण |
|---|---|---|---|
| जयपुर | ₹ 50,000-100,000 | अत्यधिक | मराठा मार्ग पर स्थित, समृद्ध क्षेत्र |
| जोधपुर | ₹ 40,000-80,000 | अत्यधिक | मराठा सेनाओं का नियमित लक्ष्य |
| अलवर | ₹ 30,000-60,000 | अत्यधिक | दिल्ली के रास्ते पर, छोटी रियासत |
| भरतपुर | ₹ 25,000-50,000 | मध्यम | नई रियासत, कम समृद्ध |
| उदयपुर | ₹ 20,000-40,000 | मध्यम | दूरस्थ, पहाड़ी क्षेत्र |
| बीकानेर | ₹ 15,000-30,000 | कम | रेगिस्तानी क्षेत्र, कम समृद्ध |
राजस्व पर प्रभाव
चौथ-सरदेशमुखी की वसूली से राजस्थान की रियासतों की आय में भारी कमी आई। जयपुर का वार्षिक राजस्व लगभग 25-30% तक कम हो गया। इसके अलावा, जब मराठा सेनाएं लूटपाट करती थीं, तो कृषि भूमि, पशुधन और व्यापारिक सामान का भी नुकसान होता था।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
चौथ की वसूली के कारण:
- कृषि का पतन: किसानों को अतिरिक्त कर देने पड़ते थे, जिससे कृषि उत्पादन में गिरावट आई
- व्यापार में मंदी: व्यापारियों को लूटपाट का भय रहता था, जिससे व्यापार प्रभावित हुआ
- जनसंख्या में कमी: कुछ क्षेत्रों से लोग पलायन करने लगे
- सैन्य खर्च में वृद्धि: रियासतों को अपनी सेना को मजबूत करने के लिए अधिक खर्च करना पड़ा
राजस्थान की रियासतों की प्रतिक्रिया
राजस्थान की रियासतों ने मराठा आक्रमण और चौथ वसूली के विरुद्ध विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं दीं। कुछ ने सैन्य प्रतिरोध किया, कुछ ने समझौता किया, और कुछ ने अन्य शक्तियों से सहायता मांगी।
सैन्य प्रतिरोध
जयपुर के राजा सवाई जय सिंह द्वितीय (1699-1743) ने मराठा आक्रमण के विरुद्ध सबसे सशक्त प्रतिरोध किया। उन्होंने अपनी सेना को मजबूत किया और कई बार मराठा सेनाओं को हराया। हालांकि, अंततः उन्हें भी चौथ का भुगतान करना पड़ा।
जयपुर के संस्थापक और सबसे प्रतिभाशाली राजा। वे गणितज्ञ, खगोलविद और सैन्य रणनीतिकार थे। उन्होंने मराठा आक्रमण के विरुद्ध कई सफल अभियान चलाए, लेकिन अंततः मराठा शक्ति के आगे झुकना पड़ा।
समझौता और आत्मसमर्पण
अधिकांश रियासतें मराठा शक्ति के आगे झुक गईं और नियमित रूप से चौथ का भुगतान करने लगीं। जोधपुर, बीकानेर, उदयपुर जैसी रियासतें अपनी सैन्य कमजोरी को स्वीकार करते हुए चौथ देने के लिए सहमत हो गईं।
- जयपुर: सैन्य प्रतिरोध के बाद समझौता (1740 के दशक में नियमित चौथ)
- जोधपुर: प्रारंभिक प्रतिरोध के बाद आत्मसमर्पण (1740 तक नियमित चौथ)
- उदयपुर: सीमित प्रतिरोध के बाद समझौता (1745 तक चौथ देने लगे)
- बीकानेर: न्यूनतम प्रतिरोध, जल्दी समझौता (1735 तक चौथ)
- अलवर: कमजोर रियासत, तुरंत समझौता (1730 के दशक में ही चौथ)
अन्य शक्तियों से सहायता मांगना
कुछ रियासतें मराठा आक्रमण से बचने के लिए अन्य शक्तियों से सहायता मांगने लगीं। दिल्ली के मुगल बादशाह और अंग्रेजी कंपनी को भी राजस्थान की रियासतों से सहायता के अनुरोध मिले, लेकिन वे प्रभावी सहायता प्रदान नहीं कर सके।
दीर्घकालीन परिणाम
चौथ-सरदेशमुखी की वसूली राजस्थान की रियासतों को आर्थिक रूप से कमजोर करती रही। 18वीं सदी के अंत तक, जब अंग्रेजी कंपनी भारत में मजबूत हो गई, तब राजस्थान की रियासतें अंग्रेजों के साथ संधि करने के लिए मजबूर हो गईं। इस प्रकार, मराठा आक्रमण ने अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजी शासन की स्थापना में भूमिका निभाई।



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