नाथद्वारा शैली — श्रीनाथजी और पिछवाई चित्रण
नाथद्वारा शैली का परिचय
नाथद्वारा शैली राजस्थान की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक चित्रकला शैली है, जो मेवाड़ के नाथद्वारा नगर में विकसित हुई। यह शैली श्रीनाथजी (कृष्ण का एक रूप) की पूजा और पिछवाई चित्रण के लिए प्रसिद्ध है, जो राजस्थान सरकारी परीक्षा की कला एवं संस्कृति विभाग में महत्वपूर्ण विषय है।
नाथद्वारा का ऐतिहासिक महत्व
नाथद्वारा नगर मेवाड़ के उदयपुर जिले में स्थित है। यह स्थान श्रीनाथजी मंदिर के लिए विश्व प्रसिद्ध है, जहाँ 1672 ईस्वी में श्रीनाथजी की मूर्ति स्थापित की गई थी। यह मूर्ति मथुरा से लाई गई थी जब औरंगजेब के धार्मिक कठोरता के कारण इसे सुरक्षित स्थान पर रखना आवश्यक हो गया। इसी घटना के बाद नाथद्वारा एक महत्वपूर्ण धार्मिक और कलात्मक केंद्र बन गया।
इस शैली का विकास वल्लभ संप्रदाय के प्रभाव में हुआ। वल्लभाचार्य द्वारा स्थापित इस संप्रदाय में श्रीनाथजी की पूजा का विशेष महत्व है। नाथद्वारा में आने वाले भक्त और कलाकार यहाँ की कला परंपरा को समृद्ध करते रहे।

श्रीनाथजी और धार्मिक संदर्भ
श्रीनाथजी कृष्ण का एक विशेष रूप है जिसमें वे गोवर्धन पर्वत को धारण करते हुए दिखाई देते हैं। यह मूर्ति वल्लभ संप्रदाय में सर्वाधिक पूजनीय है और नाथद्वारा शैली की सभी कलाकृतियों का केंद्रीय विषय है।
श्रीनाथजी की कथा और महत्व
श्रीनाथजी की कथा भागवत पुराण से संबंधित है। कहा जाता है कि इंद्र के प्रकोप से गोकुल की रक्षा के लिए कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया था। यह घटना कृष्ण की दिव्य शक्ति और भक्तों की रक्षा का प्रतीक है।
नाथद्वारा में स्थापित श्रीनाथजी की मूर्ति को गिरिधर गोपाल भी कहा जाता है। इस मूर्ति की पूजा में अष्टकालीन सेवा (आठ समय की पूजा) का विधान है, जिसमें प्रत्येक समय पर विभिन्न कलात्मक प्रस्तुतियाँ की जाती हैं।
मथुरा से नाथद्वारा तक की यात्रा
श्रीनाथजी की मूर्ति मूलतः मथुरा के गोविंद देव मंदिर में स्थापित थी। जब औरंगजेब (1658–1707) के शासनकाल में मूर्तियों को तोड़ने का आदेश दिया गया, तब इस मूर्ति को गुप्त रूप से मथुरा से निकाला गया। 1672 ईस्वी में इसे नाथद्वारा में स्थापित किया गया, जहाँ यह आज भी पूजी जाती है।
पिछवाई चित्रण — तकनीक और विशेषताएं
पिछवाई शब्द संस्कृत के ‘पश्चा’ (पीछे) से बना है। पिछवाई मंदिर में मूर्ति के पीछे लगाई जाने वाली कपड़े की पृष्ठभूमि होती है, जिस पर कृष्ण की विभिन्न लीलाओं का चित्रण किया जाता है।
पिछवाई की तकनीकी विशेषताएं
पिछवाई चित्रण की तकनीक अत्यंत जटिल और विस्तृत है। इसमें सूती कपड़े पर प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। चित्रकार पहले कपड़े को तैयार करते हैं, फिर उस पर पेंसिल से रूपरेखा बनाते हैं, और अंत में रंगों को भरते हैं।
- कपड़े की तैयारी: सूती कपड़े को पहले धोया जाता है, फिर स्टार्च से तैयार किया जाता है ताकि वह कठोर हो जाए।
- आधार तैयारी: कपड़े पर चूने का आधार लगाया जाता है, जिससे रंग अच्छी तरह चिपकें।
- रूपरेखा: पेंसिल या कोयले से मुख्य आकृतियों की रूपरेखा बनाई जाती है।
- रंगों का अनुप्रयोग: प्राकृतिक रंगों को सावधानीपूर्वक भरा जाता है, सबसे पहले हल्के रंग, फिर गहरे रंग।
- विवरण और सजावट: सोने की पन्नी (वर्क) और मोतियों से अंतिम सजावट की जाती है।
- सुखाना: पूरी पिछवाई को धूप में सुखाया जाता है, जिससे रंग स्थायी हो जाएं।
पिछवाई के आकार और प्रकार
पिछवाई के आकार मंदिर की आवश्यकता के अनुसार निर्धारित होते हैं। आमतौर पर ये 8 फीट से 12 फीट तक लंबी और 6 फीट से 10 फीट तक चौड़ी होती हैं। कुछ विशेष अवसरों पर बहुत बड़ी पिछवाइयाँ भी बनाई जाती हैं।
| पिछवाई का प्रकार | विषय वस्तु | प्रयोग का समय |
|---|---|---|
| 1 बसंत पंचमी पिछवाई | श्रीनाथजी को पीले वस्त्रों में, फूलों से सजी हुई | बसंत ऋतु में |
| 2 होली पिछवाई | रंगों का खेल, गोपियों के साथ श्रीकृष्ण | होली के अवसर पर |
| 3 गोवर्धन पिछवाई | श्रीनाथजी गोवर्धन पर्वत को धारण करते हुए | दिवाली के बाद |
| 4 जन्माष्टमी पिछवाई | कृष्ण का जन्म दृश्य, माता यशोदा के साथ | जन्माष्टमी पर |
| 5 वर्षा ऋतु पिछवाई | बादलों, बिजली, और वर्षा के साथ श्रीकृष्ण | वर्षा ऋतु में |

कलात्मक विशेषताएं और रंग योजना
नाथद्वारा शैली की कलात्मक विशेषताएं इसे राजस्थान की अन्य शैलियों से अलग करती हैं। इस शैली में धार्मिक भावना और कलात्मक सौंदर्य का अद्भुत मिश्रण है।
रंग योजना और प्राकृतिक रंग
नाथद्वारा शैली में प्राकृतिक रंगों का विशेष महत्व है। ये रंग पौधों, खनिजों और जानवरों से प्राप्त किए जाते हैं। मुख्य रंग हैं:
कलात्मक विशेषताएं
नाथद्वारा शैली की मुख्य कलात्मक विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- श्रीनाथजी का केंद्रीय स्थान: प्रत्येक पिछवाई में श्रीनाथजी को सबसे प्रमुख स्थान दिया जाता है, जो चित्र के मध्य में होते हैं।
- विस्तृत पृष्ठभूमि: श्रीनाथजी के चारों ओर बागों, वृक्षों, पशु-पक्षियों और गोपियों का विस्तृत चित्रण किया जाता है।
- सोने की पन्नी का प्रयोग: गहनों, मुकुट और वस्त्रों को सुंदर बनाने के लिए सोने की पन्नी (वर्क) का उपयोग किया जाता है।
- मोतियों और रत्नों की सजावट: महत्वपूर्ण स्थानों पर मोतियों और कांच के टुकड़ों से सजावट की जाती है।
- बारीक विवरण: चेहरे, हाथ और पैरों का चित्रण अत्यंत बारीकी से किया जाता है।
- सांस्कृतिक प्रतीकों का समावेश: भारतीय संस्कृति के विभिन्न प्रतीकों जैसे कमल, मोर, गाय आदि का चित्रण किया जाता है।
चेहरे की विशेषताएं
नाथद्वारा शैली में मानव चेहरे की विशेषताएं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। बड़ी आँखें, पतली नाक और पूर्ण होंठ इस शैली की पहचान हैं। श्रीनाथजी के चेहरे को अत्यंत कोमल और भावपूर्ण दिखाया जाता है।
ऐतिहासिक विकास और प्रभाव
नाथद्वारा शैली का विकास 17वीं शताब्दी के अंत में हुआ और यह 18वीं और 19वीं शताब्दी में अपने चरम पर पहुँची। इस शैली ने राजस्थान की कला परंपरा को समृद्ध किया और आज भी यह जीवंत है।
ऐतिहासिक विकास का क्रम
अन्य शैलियों पर प्रभाव
नाथद्वारा शैली का प्रभाव राजस्थान की अन्य शैलियों पर भी पड़ा। विशेषकर मेवाड़ शैली और बूंदी-कोटा शैली में नाथद्वारा के तत्वों का समावेश देखा जा सकता है। कृष्ण भक्ति के विषयों का चित्रण अन्य शैलियों में भी बढ़ा।
आधुनिक चुनौतियाँ और संरक्षण
आधुनिक समय में नाथद्वारा शैली को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। मशीन से बने सस्ते चित्र और डिजिटल प्रिंटिंग ने परंपरागत कलाकारों को प्रभावित किया है। हालांकि, सरकार और विभिन्न संस्थाएं इस परंपरा को संरक्षित करने के लिए काम कर रही हैं।



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