राजेंद्र सिंह — जल पुरुष
राजेंद्र सिंह का परिचय और जीवन
राजेंद्र सिंह भारत के प्रसिद्ध जल पुरुष (Water Man of India) हैं, जिन्होंने राजस्थान के अलवर जिले में जल संरक्षण और जोहड़ पुनर्जीवन के माध्यम से सूखे क्षेत्रों को हरा-भरा बनाने का कार्य किया है। उनका कार्य Rajasthan Govt Exam Preparation में पर्यावरण संरक्षण के महत्वपूर्ण विषय के रूप में मान्यता प्राप्त है।
व्यक्तिगत पृष्ठभूमि
राजेंद्र सिंह का जन्म 1957 में मध्य प्रदेश के एक किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की और प्रारंभ में एक शिक्षक के रूप में कार्य किया। 1975 में वे अलवर जिले के गोपालपुरा गांव में आए और स्थानीय समुदाय के साथ जल संरक्षण के कार्य में जुट गए। उनके दृढ़ संकल्प और समर्पण ने उन्हें भारत के सबसे सम्मानित पर्यावरणविद् बना दिया।
अलवर क्षेत्र की स्थिति
अलवर जिला राजस्थान के पूर्वी भाग में स्थित है और अरावली पर्वत श्रृंखला के निकट है। यह क्षेत्र अर्ध-शुष्क जलवायु वाला है, जहां वार्षिक वर्षा केवल 400-600 मिमी होती है। 1970-80 के दशक में यह क्षेत्र भीषण सूखे का सामना कर रहा था, भूजल स्तर गहरा हो गया था, और कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आई थी।
तरुण भारत संघ की स्थापना और उद्देश्य
तरुण भारत संघ (Tarun Bharat Sangh) राजेंद्र सिंह द्वारा स्थापित एक गैर-सरकारी संगठन है, जो जल संरक्षण, वनरोपण और ग्रामीण विकास के कार्यों में निरत है। यह संगठन अलवर जिले में सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक बन गया है।
संगठन की संरचना और कार्य क्षेत्र
तरुण भारत संघ ने अलवर जिले के 1,000 से अधिक गांवों में कार्य किया है। संगठन की मुख्य रणनीति स्थानीय समुदाय की भागीदारी पर आधारित है। किसानों, महिलाओं और युवाओं को जल संरक्षण के कार्यों में सक्रिय रूप से शामिल किया जाता है। संगठन ने 10,000 से अधिक जोहड़ों का निर्माण और पुनर्जीवन किया है।
- जोहड़ निर्माण: परंपरागत जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण और मरम्मत
- वनरोपण: लाखों पेड़ों का रोपण, विशेषकर अरावली क्षेत्र में
- भूजल पुनर्भरण: वर्षा जल को भूमि में रिसाने की व्यवस्था
- पशुपालन सुधार: गाय, भेड़ और बकरियों की नस्ल सुधार
- महिला सशक्तिकरण: महिला समूहों का गठन और प्रशिक्षण
- शिक्षा कार्यक्रम: बच्चों और किसानों के लिए जल संरक्षण प्रशिक्षण
जोहड़ पुनर्जीवन आंदोलन (अलवर)
जोहड़ राजस्थान की पारंपरिक जल संरक्षण संरचना है। राजेंद्र सिंह ने अलवर में हजारों जोहड़ों को पुनर्जीवित किया, जिससे भूजल स्तर में नाटकीय वृद्धि हुई और कृषि उत्पादन में सुधार आया।
जोहड़ क्या है?
जोहड़ एक छोटा तालाब या जल संचयन संरचना है, जो वर्षा के पानी को एकत्रित करता है। यह 2-4 मीटर गहरा होता है और 0.5 से 2 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला होता है। जोहड़ का पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसता है, जिससे भूजल स्तर बढ़ता है। अलवर में ये जोहड़ 200-300 साल पुराने थे, लेकिन समय के साथ उपेक्षित हो गए थे।
| विशेषता | जोहड़ | तालाब | बावड़ी |
|---|---|---|---|
| गहराई | 2-4 मीटर | 5-10 मीटर | 20-30 मीटर |
| क्षेत्र | 0.5-2 हेक्टेयर | 2-10 हेक्टेयर | कम क्षेत्र |
| निर्माण लागत | कम | मध्यम | अधिक |
| भूजल रिचार्ज | तेज | मध्यम | धीमा |
| रखरखाव | आसान | मध्यम | कठिन |
अलवर में जोहड़ पुनर्जीवन की प्रक्रिया
राजेंद्र सिंह ने 1985-1990 के दशक में अलवर में जोहड़ पुनर्जीवन का व्यापक अभियान शुरू किया। पहले गोपालपुरा गांव के 5 जोहड़ों को पुनर्जीवित किया गया। इसके बाद यह आंदोलन पूरे अलवर जिले में फैल गया। किसानों को प्रशिक्षित किया गया कि कैसे पुराने जोहड़ों को साफ करें, उनकी मरम्मत करें, और नए जोहड़ों का निर्माण करें।
परिणाम और प्रभाव
जोहड़ पुनर्जीवन के परिणाम अत्यंत सकारात्मक रहे। अलवर में भूजल स्तर 6-7 मीटर तक बढ़ गया। कुओं में पानी वापस आ गया। कृषि उत्पादन में 300% तक वृद्धि हुई। वनस्पति का विस्तार हुआ और वन्यजीवन लौट आया। किसानों की आय में उल्लेखनीय सुधार हुआ।
जोहड़ों में एकत्रित वर्षा जल धीरे-धीरे जमीन में रिसता है, जिससे भूजल स्तर बढ़ता है।
भूजल बढ़ने से सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होता है, जिससे कृषि उत्पादन बढ़ता है।
पानी की उपलब्धता से वनस्पति का विस्तार होता है और मरुस्थलीकरण रुकता है।
जोहड़ों का पानी पशुओं के लिए उपलब्ध होता है, जिससे पशुपालन में सुधार होता है।
जल संरक्षण की पारंपरिक विधियां
राजेंद्र सिंह ने राजस्थान की पारंपरिक जल संरक्षण विधियों को पुनः जीवंत किया। ये विधियां सदियों से राजस्थान में प्रचलित थीं, लेकिन आधुनिकता के दौर में भुला दी गई थीं।
राजस्थान की पारंपरिक जल संरक्षण संरचनाएं
पारंपरिक विधियों का वैज्ञानिक आधार
ये पारंपरिक संरचनाएं केवल धार्मिक या सांस्कृतिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित हैं। जोहड़ों का निर्माण इस तरह किया जाता है कि वर्षा जल तेजी से जमीन में रिसे। बावड़ियों का निर्माण भूजल स्तर के अनुसार किया जाता है। ये संरचनाएं स्थानीय भूगोल और जलवायु के अनुरूप डिजाइन की गई थीं।
प्रभाव, पुरस्कार और मान्यता
राजेंद्र सिंह के कार्य को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है। उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।
प्रमुख पुरस्कार और सम्मान
अलवर में परिवर्तन के आंकड़े
व्यापक प्रभाव और विरासत
राजेंद्र सिंह का कार्य केवल अलवर तक सीमित नहीं रहा। उनके मॉडल को महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में भी अपनाया गया है। उन्होंने दिखाया कि सरकारी सहायता के बिना भी समुदाय-आधारित पहल से बड़े परिवर्तन संभव हैं। उनका काम पर्यावरण आंदोलन के लिए प्रेरणा बन गया है।
- जल संरक्षण का प्रतीक: वे “जल पुरुष” के रूप में जाने जाते हैं और जल संरक्षण के लिए एक प्रेरणा हैं।
- सामाजिक परिवर्तन: उन्होंने दिखाया कि कैसे पर्यावरण संरक्षण सामाजिक और आर्थिक विकास से जुड़ा है।
- पारंपरिक ज्ञान का पुनरुद्धार: उन्होंने सदियों पुरानी पारंपरिक जल संरक्षण विधियों को पुनः जीवंत किया।
- ग्रामीण सशक्तिकरण: उन्होंने किसानों को स्वावलंबी बनाने में मदद की।
- अंतर्राष्ट्रीय मान्यता: उनका कार्य विश्व स्तर पर स्वीकृत है।


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