सवाई जय सिंह II — जयपुर स्थापना, विद्यापति एवं जंतर-मंतर
परिचय एवं जीवन परिचय
सवाई जय सिंह II (1688–1743) कछवाहा वंश के सबसे प्रतिभाशाली और प्रगतिशील राजा थे। उन्होंने मुगल साम्राज्य के पतन के दौर में आमेर रियासत को शक्तिशाली बनाया और जयपुर नगर की स्थापना कर एक नए युग का सूत्रपात किया। उनका शासन विज्ञान, कला, वास्तुकला और खगोल विज्ञान के प्रति समर्पण के लिए प्रसिद्ध है।
प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा
सवाई जय सिंह II का जन्म नवंबर 1688 को आमेर में हुआ था। उनके पिता बिशन सिंह थे। मात्र 11 वर्ष की आयु में (1699) उन्होंने आमेर की गद्दी संभाली। उनकी शिक्षा-दीक्षा उच्च कोटि की हुई और उन्हें संस्कृत, फारसी, गणित, खगोल विज्ञान और वास्तुकला का गहन ज्ञान प्राप्त हुआ।
मुगल बादशाह औरंगजेब के दरबार में उन्हें महत्वपूर्ण पद दिए गए। उन्होंने मालवा और गुजरात के सूबेदार के रूप में कार्य किया और अपनी कूटनीति एवं प्रशासनिक क्षमता से मुगल बादशाहों का विश्वास अर्जित किया।

जयपुर नगर की स्थापना (1727)
सवाई जय सिंह II की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि जयपुर नगर की स्थापना है। 18 नवंबर 1727 को उन्होंने इस नए नगर की नींव रखी। जयपुर का नाम उनके नाम “जय सिंह” पर रखा गया और यह नगर आधुनिक नगर नियोजन का एक उत्कृष्ट उदाहरण बन गया।
जयपुर स्थापना के कारण
- आमेर की सीमाएँ: आमेर नगर जनसंख्या वृद्धि के कारण संकीर्ण हो गया था और विस्तार के लिए स्थान नहीं रह गया था।
- जल संकट: आमेर में जल की कमी थी जबकि जयपुर का स्थान जल स्रोतों से समृद्ध था।
- व्यापार केंद्र: जयपुर का स्थान दिल्ली-आगरा मार्ग पर था, जो व्यापार के लिए अनुकूल था।
- सामरिक स्थिति: नया नगर सामरिक दृष्टि से अधिक सुरक्षित और महत्वपूर्ण था।
नगर नियोजन एवं डिजाइन
जयपुर का नगर नियोजन विद्याधर भट्टाचार्य (बंगाली वास्तुकार) द्वारा किया गया। यह नगर ग्रिड पैटर्न (Grid Plan) पर बनाया गया था, जो आधुनिक शहर नियोजन का एक अग्रदूत था। नगर को 9 वर्गों में विभाजित किया गया था, जो भारतीय वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों पर आधारित था।
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| स्थापना तिथि | 18 नवंबर 1727 |
| वास्तुकार | विद्याधर भट्टाचार्य |
| नियोजन पद्धति | ग्रिड पैटर्न (9 वर्ग) |
| मुख्य सड़कें | 111 फीट चौड़ी सड़कें |
| क्षेत्रफल | लगभग 14.93 वर्ग किमी |
| जनसंख्या (1727) | लगभग 50,000 |
जयपुर के मुख्य स्मारक
विद्यापति — राजकवि एवं विद्वान
विद्यापति (1666–1752) सवाई जय सिंह II के दरबार के सबसे प्रतिभाशाली कवि और विद्वान थे। वे संस्कृत साहित्य, काव्य, नाटक, खगोल विज्ञान और गणित के विशेषज्ञ थे। उनकी रचनाएँ राजस्थान के सांस्कृतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।
विद्यापति का जन्म 1666 में हुआ था। वे मूलतः मिथिला (बिहार) से थे, लेकिन बाद में सवाई जय सिंह II के दरबार में आ गए। उन्होंने जयपुर में अपनी सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ की। उनकी प्रमुख कृतियों में भूगोल कोश, राज निर्णय, धर्मसिंधु और गंगालहरी शामिल हैं।
विद्यापति की प्रमुख रचनाएँ
यह विद्यापति की सबसे प्रसिद्ध कृति है। इसमें भारत और विश्व के भूगोल का विस्तृत विवरण दिया गया है। यह संस्कृत में लिखी गई थी और इसमें भारतीय भूगोल के प्राचीन ज्ञान को संकलित किया गया है।
यह राजनीति और शासन पर एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें राजा के कर्तव्य, प्रशासन के सिद्धांत और न्याय व्यवस्था के बारे में विस्तार से बताया गया है।
यह धर्म और नैतिकता पर एक ग्रंथ है। इसमें हिंदू धर्म के विभिन्न पहलुओं, कर्मकांड और सामाजिक नियमों का विवरण दिया गया है।
यह एक काव्य रचना है जो गंगा नदी की महिमा का गुणगान करती है। इसमें संस्कृत काव्य की सुंदरता और लालित्य का प्रदर्शन होता है।

जंतर-मंतर — खगोल वेधशाला
जंतर-मंतर सवाई जय सिंह II की सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि है। यह एक खगोल वेधशाला (Astronomical Observatory) है जहाँ खगोलीय पिंडों की गति और स्थिति का अवलोकन किया जाता था। 2010 में यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।
जंतर-मंतर का निर्माण
सवाई जय सिंह II ने 1728–1734 के बीच जयपुर में जंतर-मंतर का निर्माण करवाया। इसके अलावा उन्होंने दिल्ली, मथुरा, उज्जैन और वाराणसी में भी जंतर-मंतर बनवाए। जयपुर का जंतर-मंतर सबसे बड़ा और सबसे संरक्षित है।
जंतर-मंतर की मुख्य संरचनाएँ
| यंत्र का नाम | उद्देश्य | विशेषता |
|---|---|---|
| समरात यंत्र | सूर्य की गति का अवलोकन | सबसे बड़ा यंत्र, 27 मीटर ऊँचा |
| नाड़ीवलय यंत्र | समय का मापन | सटीक समय निर्धारण |
| राज यंत्र | खगोलीय निर्देशांक | तारों की स्थिति ज्ञात करना |
| दिशा यंत्र | दिशा निर्धारण | चुंबकीय दिशा का पता लगाना |
| क्रांति दर्शक यंत्र | सूर्य की क्रांति | ग्रीष्म और शीत संक्रांति |
जंतर-मंतर की वैज्ञानिक महत्ता
- खगोलीय ज्ञान: यह यंत्र अत्यंत सटीक खगोलीय गणनाएँ करने में सक्षम थे।
- गणितीय सिद्धांत: इन यंत्रों का डिजाइन उच्च गणितीय सिद्धांतों पर आधारित था।
- वास्तुकलात्मक उत्कृष्टता: ये यंत्र पत्थर और संगमरमर से बने थे और आज भी सटीक हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय मानदंड: इसे यूरोपीय वेधशालाओं के समान माना जाता है।
राजनीतिक उपलब्धियाँ एवं शासन
सवाई जय सिंह II केवल एक निर्माता और विद्वान नहीं थे, बल्कि एक कुशल राजनीतिज्ञ और सैन्य नेता भी थे। उन्होंने मुगल साम्राज्य के पतन के दौर में आमेर-जयपुर रियासत को शक्तिशाली बनाया और अपनी कूटनीति से विभिन्न शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखा।
मुगल दरबार में भूमिका
सवाई जय सिंह II ने मुगल बादशाहों औरंगजेब, बहादुर शाह I, जहांदार शाह और मुहम्मद शाह के दरबार में महत्वपूर्ण पद संभाले। उन्हें मालवा, गुजरात और आगरा के सूबेदार के रूप में नियुक्त किया गया। उनकी प्रशासनिक क्षमता और वफादारी के कारण वे मुगल बादशाहों के विश्वस्त सलाहकार बने रहे।
राजस्व प्रशासन एवं सुधार
- भू-राजस्व सुधार: सवाई जय सिंह II ने भू-राजस्व व्यवस्था में सुधार किए और किसानों के लिए उचित नीतियाँ बनाईं।
- व्यापार को बढ़ावा: उन्होंने व्यापार को प्रोत्साहित किया और जयपुर को एक व्यापारिक केंद्र बनाया।
- सैन्य संगठन: उन्होंने एक मजबूत सेना का गठन किया और सैन्य प्रशिक्षण में सुधार किए।
- न्याय व्यवस्था: उन्होंने एक निष्पक्ष न्याय व्यवस्था स्थापित की।
मराठों के साथ संबंध
मुगल साम्राज्य के पतन के साथ ही मराठा शक्ति का उदय हुआ। सवाई जय सिंह II ने मराठों के साथ एक संतुलित नीति अपनाई। उन्होंने कभी मराठों के साथ सीधा संघर्ष नहीं किया, बल्कि कूटनीति के माध्यम से अपनी रियासत की सुरक्षा बनाए रखी।
भू-राजस्व, न्याय और सैन्य प्रशासन में आधुनिक सुधार किए।
मुगल और मराठा दोनों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे।
जयपुर को एक आधुनिक, सुनियोजित और समृद्ध नगर बनाया।
खगोल विज्ञान, गणित और विज्ञान को प्रोत्साहित किया।

परीक्षा प्रश्न एवं सारांश
स्मरणीय तथ्य (Mnemonic)
त्वरित संशोधन (Quick Revision)
इंटरैक्टिव प्रश्न
पिछली परीक्षाओं के प्रश्न (PYQ)
निष्कर्ष
सवाई जय सिंह II राजस्थान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व हैं। उन्होंने न केवल एक नए नगर (जयपुर) की स्थापना की, बल्कि विज्ञान, कला और साहित्य को भी प्रोत्साहित किया। जंतर-मंतर उनकी वैज्ञानिक दृष्टि का प्रमाण है, जबकि विद्यापति जैसे महान विद्वानों को संरक्षण देकर उन्होंने सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा दिया। मुगल साम्राज्य के पतन के दौर में उन्होंने अपनी कूटनीति और प्रशासनिक क्षमता से आमेर-जयपुर को एक शक्तिशाली और समृद्ध राज्य बनाया। आज भी जयपुर उनकी विरासत का जीवंत प्रमाण है।


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