थार मरुस्थलीकरण — कारण, रोकथाम, इंदिरा गांधी नहर का प्रभाव
मरुस्थलीकरण — परिचय एवं परिभाषा
मरुस्थलीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें उपजाऊ भूमि धीरे-धीरे रेगिस्तान में परिवर्तित हो जाती है। थार मरुस्थल राजस्थान के लगभग 61% क्षेत्र को कवर करता है और यह मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया से तेजी से प्रभावित हो रहा है।
मरुस्थलीकरण की परिभाषा
मरुस्थलीकरण का अर्थ है शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में भूमि की उत्पादकता में कमी। यह प्राकृतिक और मानवजनित दोनों कारणों से होता है। थार मरुस्थल का विस्तार प्रतिवर्ष लगभग 1.5 किलोमीटर की दर से हो रहा है।
- प्राकृतिक कारण: कम वर्षा, उच्च तापमान, तेज हवाएं
- मानवजनित कारण: अत्यधिक चराई, वनों की कटाई, अनुचित कृषि पद्धति
- भूगोलिक विस्तार: बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, नागौर, पाली जिलों में सर्वाधिक

थार मरुस्थलीकरण के कारण
थार मरुस्थलीकरण के पीछे कई जटिल कारण हैं जो जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक पशुचारण और अनुचित भूमि उपयोग से संबंधित हैं। ये कारण एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं और समस्या को गंभीर बनाते हैं।
राजस्थान में वार्षिक वर्षा 25-50 सेमी है जो अत्यंत अनियमित है। ग्लोबल वार्मिंग से तापमान में वृद्धि और वर्षा में कमी हो रही है।
भेड़, बकरी और ऊंटों की अत्यधिक संख्या वनस्पति को नष्ट करती है। यह मिट्टी को कमजोर करता है और कटाव को बढ़ाता है।
खेजड़ी, रोहिड़ा और आक जैसी वनस्पति का अत्यधिक दोहन ईंधन और चारे के लिए किया जा रहा है।
कृषि और पेयजल के लिए भूजल स्तर में तेजी से गिरावट आ रही है, जिससे कुएं सूख रहे हैं।
फसल चक्र का पालन न करना, मोनोकल्चर और अत्यधिक रासायनिक खाद का उपयोग मिट्टी की उर्वरता को नष्ट करता है।
थार में तेज हवाएं बालुका स्तूपों को गतिशील रखती हैं, जो कृषि भूमि को ढक देते हैं।
कारणों का विस्तृत विश्लेषण
| कारण | विवरण | प्रभावित क्षेत्र |
|---|---|---|
| अनियमित वर्षा | 25-50 सेमी वार्षिक वर्षा, कभी-कभी सूखा | संपूर्ण थार क्षेत्र |
| पशु घनत्व | प्रति हेक्टेयर 2-3 पशु (अनुशंसित: 0.5) | बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर |
| वन क्षेत्र में कमी | 1950 में 9.5%, अब 4.5% से भी कम | पश्चिमी राजस्थान |
| भूजल स्तर | प्रति वर्ष 0.5-1 मीटर की गिरावट | सभी कृषि क्षेत्र |
| तापमान वृद्धि | पिछले 50 वर्षों में 0.8°C की वृद्धि | संपूर्ण राजस्थान |
मरुस्थलीकरण के प्रभाव एवं चुनौतियाँ
मरुस्थलीकरण राजस्थान की अर्थव्यवस्था, कृषि, जल संसाधन और समाज के लिए गंभीर खतरा बन गया है। इसके प्रभाव दीर्घकालीन और बहुआयामी हैं।
कृषि पर प्रभाव
- उत्पादकता में कमी: कृषि योग्य भूमि का 15-20% हर दशक में अनुपयोगी हो रहा है
- फसल विविधता में कमी: केवल बाजरा, मूंगफली और सरसों जैसी सूखा-सहन फसलें ही संभव हैं
- पशुपालन पर दबाव: चारे की कमी से पशु स्वास्थ्य गिरता है और दूध उत्पादन में कमी होती है
जल संसाधन पर संकट
पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव
- पलायन: ग्रामीण जनसंख्या शहरों की ओर पलायन कर रही है
- गरीबी: कृषि आय में कमी से गरीबी बढ़ रही है
- जैव विविधता का नुकसान: गोडावण, चिंकारा जैसी प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं
- मिट्टी की गुणवत्ता: मिट्टी में नमक और क्षार की मात्रा बढ़ रही है

इंदिरा गांधी नहर — निर्माण एवं महत्व
इंदिरा गांधी नहर (पूर्व नाम: राजस्थान नहर) थार मरुस्थल को हरा-भरा करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। यह भारत की सबसे लंबी नहरों में से एक है और राजस्थान की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इंदिरा गांधी नहर की विशेषताएं
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| स्रोत | सतलज और व्यास नदियों का संगम (हरिके बैराज, पंजाब) |
| प्रमुख शाखाएं | मुख्य नहर, पूर्वी नहर, पश्चिमी नहर |
| सिंचित जिले | हनुमानगढ़, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, पाली, जोधपुर |
| वार्षिक जल आपूर्ति | 9.65 अरब घन मीटर (BCM) |
| निर्माण लागत | ₹1,000 करोड़ (1958 की कीमतों पर) |
इंदिरा गांधी नहर का सकारात्मक प्रभाव
- कृषि क्रांति: हनुमानगढ़ और बीकानेर में गेहूँ, कपास, गन्ने की खेती संभव हुई
- आबादी में वृद्धि: नहर क्षेत्र में जनसंख्या 2 गुना बढ़ी है
- आय में वृद्धि: किसानों की आय 3-4 गुना बढ़ी है
- औद्योगीकरण: चीनी मिलें, कपास मिलें, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयाँ स्थापित हुईं
- पर्यावरण सुधार: हरित क्षेत्र में वृद्धि, वर्षा में 50% तक वृद्धि
इंदिरा गांधी नहर के नकारात्मक प्रभाव
मरुस्थलीकरण को रोकने के उपाय
मरुस्थलीकरण को रोकने के लिए बहु-स्तरीय दृष्टिकोण की आवश्यकता है। सरकार, समुदाय और व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास आवश्यक हैं। राजस्थान सरकार ने कई योजनाएं चलाई हैं जिनमें वृक्षारोपण, जल संरक्षण और पशु प्रबंधन शामिल हैं।
सरकारी योजनाएं और कार्यक्रम
उद्देश्य: 2025 तक 20 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र बढ़ाना।
- खेजड़ी, रोहिड़ा, आक जैसी सूखा-सहन वनस्पति का रोपण
- सामुदायिक वनों का विकास
- वन संरक्षण और प्रबंधन में स्थानीय समुदाय की भागीदारी
मुख्य कार्यक्रम:
- खड़ीन निर्माण: परंपरागत जल संरक्षण संरचनाएं जो वर्षा जल को संरक्षित करती हैं
- नल-कूप योजना: सिंचाई के लिए भूजल का सुव्यवस्थित उपयोग
- तालाब निर्माण: सामुदायिक तालाब जो पशुओं और कृषि के लिए जल प्रदान करते हैं
- भूजल पुनर्भरण: कृत्रिम तरीकों से भूजल स्तर को बढ़ाना
उद्देश्य: पशु घनत्व को नियंत्रित करना और चारे की समस्या को हल करना।
- पशु प्रजनन कार्यक्रम — उच्च गुणवत्ता वाली नस्लें
- चारा उत्पादन योजना — बहु-उद्देश्यीय पेड़ों का रोपण
- पशु बीमा योजना — किसानों को सहायता
- चरागाह प्रबंधन — सामुदायिक चरागाहों का विकास
आधुनिक कृषि तकनीकें:
- ड्रिप सिंचाई — जल की बचत 40-50%
- जैव खाद का उपयोग — मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार
- फसल चक्र — मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखना
- बीज संरक्षण — स्थानीय बीजों को संरक्षित करना
सामुदायिक स्तर के उपाय
व्यक्तिगत स्तर के उपाय
- जल की बचत: घरेलू जल का सदुपयोग, वर्षा जल संचयन
- वृक्षारोपण: अपने घर और खेत में पेड़ लगाना
- जैविक खेती: रासायनिक खाद का कम उपयोग
- पशु प्रबंधन: अपनी क्षमता के अनुसार पशु पालन
- स्थानीय संगठनों को समर्थन: NGO और सामाजिक संगठनों के साथ काम करना
परीक्षा प्रश्न एवं सारांश
त्वरित संशोधन तालिका
सारांश
इंटरैक्टिव प्रश्न
पिछले वर्षों के परीक्षा प्रश्न
सरकारी स्तर: (1) राजस्थान वन मिशन — 2025 तक 20 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र बढ़ाना, (2) जल संरक्षण योजनाएं — खड़ीन निर्माण, नल-कूप योजना, तालाब निर्माण, (3) पशु प्रबंधन — पशु घनत्व नियंत्रण, चारा उत्पादन, (4) कृषि सुधार — ड्रिप सिंचाई, जैव खाद, फसल चक्र।
सामुदायिक स्तर: (1) सामूहिक वृक्षारोपण, (2) वर्षा जल संचयन, (3) सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम, (4) स्थानीय संगठनों के साथ काम।
व्यक्तिगत स्तर: (1) जल की बचत, (2) घर में पेड़ लगाना, (3) जैविक खेती, (4) सीमित पशु पालन।
सकारात्मक प्रभाव: कृषि क्रांति, आय में वृद्धि, औद्योगीकरण, पर्यावरण सुधार।
नकारात्मक प्रभाव: जलभराव, लवणीकरण, रखरखाव खर्च, जल-गहन फसलें।
निष्कर्ष: नहर के सकारात्मक प्रभाव को बनाए रखते हुए नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए बेहतर प्रबंधन, जल निकासी प्रणाली, और टिकाऊ कृषि पद्धतियों की आवश्यकता है।

