तुंगा का युद्ध (1787)
जयपुर, मराठा और मारवाड़ का संघर्ष
परिचय और पृष्ठभूमि
तुंगा का युद्ध (1787) राजस्थान के इतिहास में 18वीं सदी का एक महत्वपूर्ण सैन्य संघर्ष था, जिसमें जयपुर के राजा प्रताप सिंह द्वितीय ने मराठा सेनाओं के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। यह युद्ध तुंगा गाँव (वर्तमान जयपुर जिले में) के पास लड़ा गया था और मराठा विस्तारवाद के विरुद्ध राजस्थानी शासकों के प्रतिरोध का प्रतीक था।
18वीं सदी के अंतिम दशकों में मराठा साम्राज्य अपनी शक्ति के शिखर पर था। मराठा सेनाएँ राजस्थान में चौथ (कर) और सरदेशमुखी (अतिरिक्त कर) वसूल करने के लिए नियमित आक्रमण करती थीं। जयपुर के राजा प्रताप सिंह द्वितीय ने इस मराठा दबाव का प्रतिरोध करने का निर्णय लिया, जिसके परिणामस्वरूप तुंगा का युद्ध हुआ।

युद्ध से पहले की परिस्थितियाँ
तुंगा के युद्ध से पहले जयपुर की राजनीतिक और सैन्य स्थिति जटिल थी। प्रताप सिंह द्वितीय (शासनकाल: 1778-1803) जयपुर के एक शक्तिशाली राजा थे, जिन्होंने राज्य को संगठित करने और मराठा दबाव का सामना करने के लिए सेना को मजबूत किया था।
मराठा आक्रमण की श्रृंखला
- 1735 में बणी-विराई का युद्ध — जयपुर ने पहली बार मराठा सेनाओं का सामना किया था
- 1740-1760 के दशक — नियमित मराठा छापे और चौथ वसूली
- 1770-1780 के दशक — मराठा दबाव में वृद्धि, जयपुर की आर्थिक कमजोरी
- 1787 से पहले — प्रताप सिंह द्वितीय द्वारा सेना का पुनर्गठन और प्रतिरोध की तैयारी
| वर्ष | घटना | प्रभाव |
|---|---|---|
| 1 1735 | बणी-विराई का युद्ध | जयपुर को पहली बार मराठा शक्ति का सामना |
| 2 1750-1770 | नियमित मराठा आक्रमण | जयपुर की आर्थिक दुर्बलता, राजस्व हानि |
| 3 1778 | प्रताप सिंह द्वितीय का राज्याभिषेक | नई नीति और सेना का पुनर्गठन |
| 4 1780-1786 | सैन्य तैयारी और गठबंधन | मराठा विरोधी गठबंधन का निर्माण |
मारवाड़ के राजा (जोधपुर) भी मराठा दबाव से परेशान थे। इसलिए जयपुर और मारवाड़ के बीच एक सैन्य गठबंधन बनाया गया। दोनों राजाओं ने मिलकर मराठा सेनाओं को चुनौती देने का निर्णय लिया।
तुंगा का युद्ध — घटनाक्रम
तुंगा का युद्ध 1787 में जयपुर के पास तुंगा गाँव में लड़ा गया था। यह एक महत्वपूर्ण सैन्य संघर्ष था जिसमें जयपुर और मारवाड़ की संयुक्त सेनाओं ने मराठा सेनाओं का सामना किया।
युद्ध के मुख्य पहलू
- सैन्य शक्ति: जयपुर की सेना में लगभग 15,000-20,000 सैनिक थे, जबकि मराठा सेना भी समान संख्या में थी
- तोपखाना: दोनों पक्षों के पास तोपें थीं, जिन्होंने युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
- घुड़सवार दल: राजपूत घुड़सवार दल मराठा घुड़सवारों से भिड़े
- रणनीति: जयपुर की सेना ने रक्षणात्मक रणनीति अपनाई, जबकि मराठा सेना आक्रामक थी
- पहली पंक्ति का संघर्ष: तुंगा के मैदान में दोनों सेनाओं की पहली पंक्तियों में भीषण संघर्ष हुआ
- तोपखाने का उपयोग: जयपुर की तोपें मराठा सेना को भारी नुकसान पहुँचाती हैं
- घुड़सवार आक्रमण: मराठा घुड़सवार दल जयपुर की पैदल सेना पर आक्रमण करते हैं
- पीछे हटना: मराठा सेना को पीछे हटना पड़ता है, लेकिन वह पूरी तरह परास्त नहीं होती
- संधि की बातचीत: युद्ध के बाद दोनों पक्षों के बीच संधि की बातचीत होती है

युद्ध के परिणाम और प्रभाव
तुंगा के युद्ध के परिणाम राजस्थान के राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण थे। यह युद्ध मराठा विस्तारवाद के विरुद्ध राजपूत प्रतिरोध का एक महत्वपूर्ण उदाहरण था।
तुंगा के युद्ध में जयपुर की सेना ने अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन किया। यह युद्ध जयपुर की सैन्य शक्ति को साबित करता था।
युद्ध के बाद जयपुर को मराठा दबाव में कुछ कमी मिली। चौथ और सरदेशमुखी की वसूली में अस्थायी कमी आई।
जयपुर और मारवाड़ के बीच सैन्य गठबंधन ने राजपूत एकता का संदेश दिया। यह भविष्य के सहयोग का आधार बना।
यह युद्ध दर्शाता है कि मराठा शक्ति अब अपरिहार्य नहीं थी। राजपूत राजाएँ अब प्रतिरोध करने में सक्षम थे।
राजनीतिक परिणाम
- संधि की शर्तें: तुंगा के युद्ध के बाद जयपुर और मराठा सेनाओं के बीच एक संधि हुई
- चौथ में कमी: जयपुर को चौथ की दर में कुछ कमी मिली
- सैन्य स्वतंत्रता: जयपुर को अपनी सेना को बनाए रखने की अनुमति मिली
- भविष्य की तैयारी: यह युद्ध भविष्य के संघर्षों के लिए जयपुर को तैयार करता है
राजस्थान के इतिहास में महत्व
तुंगा का युद्ध राजस्थान के इतिहास में कई कारणों से महत्वपूर्ण है। यह युद्ध 18वीं सदी के अंत में राजपूत प्रतिरोध का एक प्रमुख उदाहरण है।
ऐतिहासिक महत्व
- मराठा विस्तारवाद का प्रतिरोध: तुंगा का युद्ध मराठा विस्तारवाद के विरुद्ध राजपूत प्रतिरोध का प्रतीक है
- राजपूत एकता: जयपुर और मारवाड़ के बीच सैन्य गठबंधन राजपूत एकता का उदाहरण है
- सैन्य संगठन: प्रताप सिंह द्वितीय द्वारा सेना का पुनर्गठन आधुनिक सैन्य संगठन का उदाहरण है
- राजनीतिक स्वतंत्रता: यह युद्ध राजपूत राजाओं की राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष को दर्शाता है
तुंगा का युद्ध और अन्य घटनाएँ
| घटना | वर्ष | संबंध |
|---|---|---|
| बणी-विराई का युद्ध | 1735 | पहला मराठा-जयपुर संघर्ष |
| तुंगा का युद्ध | 1787 | दूसरा प्रमुख संघर्ष, राजपूत प्रतिरोध |
| पानीपत की तीसरी लड़ाई | 1761 | मराठा शक्ति में कमी का संकेत |
| ब्रिटिश विजय | 1818 | मराठा शक्ति का अंत |
परीक्षा प्रश्न और सारांश
त्वरित संशोधन तालिका
इंटरैक्टिव प्रश्न
- आंशिक सफलता: जयपुर की सेना को आंशिक सफलता मिली। मराठा सेना को पीछे हटना पड़ा, लेकिन पूरी तरह परास्त नहीं हुई।
- आर्थिक राहत: युद्ध के बाद जयपुर को चौथ की दर में कुछ कमी मिली।
- राजनीतिक महत्व: यह युद्ध दर्शाता है कि राजपूत राजाएँ अब निष्क्रिय नहीं थे। वे अपनी स्वतंत्रता के लिए सक्रिय रूप से संघर्ष कर रहे थे।
- राजपूत एकता: जयपुर और मारवाड़ के बीच सैन्य गठबंधन राजपूत एकता का प्रतीक था।
- मराठा शक्ति में कमी: यह युद्ध दर्शाता है कि मराठा शक्ति अब अपरिहार्य नहीं थी।


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