वर्षा — दक्षिण-पश्चिम मानसून और क्षेत्रीय वितरण
राजस्थान में मानसूनी वर्षा का पूर्व-पश्चिम ढाल, मानसून की गतिविधि और परीक्षा-केंद्रित विश्लेषण
दक्षिण-पश्चिम मानसून का परिचय
राजस्थान में वर्षा का मुख्य स्रोत दक्षिण-पश्चिम मानसून है, जो जून से सितंबर तक सक्रिय रहता है। यह मानसून अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से उठने वाली नम हवाओं से उत्पन्न होता है और राजस्थान की वार्षिक वर्षा का लगभग 90% प्रदान करता है।
मानसून की उत्पत्ति और प्रवाह
दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्पत्ति दक्षिणी गोलार्ध में होती है। जब सूर्य कर्क रेखा पर सीधा आता है, तो भारतीय उपमहाद्वीप पर निम्न दाब क्षेत्र बनता है। इसके कारण अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से नम हवाएं भारत की ओर प्रवाहित होती हैं।
- अरब सागर शाखा: पश्चिमी घाट से टकराकर महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान में प्रवेश करती है
- बंगाल की खाड़ी शाखा: पूर्वी भारत से होकर राजस्थान के पूर्वी भागों में पहुंचती है
- नम हवाएं: समुद्र से आने वाली हवाएं जलवाष्प से भरी होती हैं
राजस्थान में वर्षा का वितरण
राजस्थान में वर्षा का वितरण पूर्व से पश्चिम की ओर घटता है। पूर्वी क्षेत्रों में 60 सेमी से अधिक वर्षा होती है, जबकि पश्चिमी क्षेत्रों में यह 10 सेमी से भी कम हो जाती है। यह ढाल राजस्थान की जलवायु को परिभाषित करता है।
| क्षेत्र | वार्षिक वर्षा (सेमी) | जलवायु प्रकार | मुख्य जिले |
|---|---|---|---|
| 1 पूर्वी | 60+ सेमी | उपआर्द्र | झालावाड़, कोटा, बूंदी |
| 2 मध्य-पूर्वी | 40–60 सेमी | अर्ध-शुष्क | अजमेर, भीलवाड़ा, टोंक |
| 3 मध्य | 20–40 सेमी | अर्ध-शुष्क | जयपुर, दौसा, सवाई माधोपुर |
| 4 पश्चिमी | <20 सेमी | शुष्क | जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर |
क्षेत्रीय विशेषताएं
झालावाड़ राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा वाला जिला है, जहां वार्षिक वर्षा 80–90 सेमी तक होती है। इसके विपरीत, जैसलमेर में वर्षा मात्र 10–15 सेमी होती है। यह विशाल अंतर राजस्थान की विविध जलवायु को दर्शाता है।
- पूर्वी राजस्थान: विंध्य पर्वतमाला के प्रभाव से अधिक वर्षा
- मध्य राजस्थान: मानसून की शक्ति में कमी के कारण मध्यम वर्षा
- पश्चिमी राजस्थान: अरावली पर्वतमाला की छाया क्षेत्र में न्यूनतम वर्षा
- माउंट आबू: समुद्र तल से 1,722 मीटर ऊंचाई के कारण 150+ सेमी वर्षा
मानसून की गतिविधि और समय
दक्षिण-पश्चिम मानसून राजस्थान में जून के प्रथम सप्ताह में प्रवेश करता है और सितंबर के अंत तक सक्रिय रहता है। इस अवधि में मानसून की तीव्रता में उतार-चढ़ाव होता है, जिसे ‘मानसून विस्फोट’ (Monsoon Burst) कहा जाता है।
मानसून की विशेषताएं
राजस्थान में मानसून की वर्षा अनिश्चित और अनियमित है। कुछ वर्षों में अत्यधिक वर्षा होती है, तो कुछ वर्षों में सूखा पड़ता है। इस अनिश्चितता के कारण किसान और पशुपालन को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
पूर्व-पश्चिम ढाल और कारण
राजस्थान में वर्षा का पूर्व-पश्चिम ढाल भौगोलिक और जलवायु संबंधी कारकों का परिणाम है। अरावली पर्वतमाला की स्थिति, समुद्र से दूरी और पर्वत छाया प्रभाव इस ढाल के मुख्य कारण हैं।
अरावली पर्वतमाला पूर्व-पश्चिम दिशा में फैली है। यह मानसून की नम हवाओं को रोकती है, जिससे पूर्वी ढलान पर अधिक वर्षा होती है और पश्चिमी ढलान पर कम।
पूर्वी राजस्थान बंगाल की खाड़ी के निकट है, जहां नम हवाएं अधिक प्रभावी होती हैं। पश्चिमी राजस्थान समुद्र से दूर है, इसलिए नमी कम होती है।
अरावली पर्वतमाला पश्चिमी राजस्थान को ‘छाया क्षेत्र’ (Rain Shadow Area) में रखती है। मानसून की नम हवाएं पर्वत के पूर्वी ढलान पर वर्षा करती हैं और सूखी हवाएं पश्चिम की ओर जाती हैं।
पूर्वी राजस्थान विंध्य पर्वतमाला के प्रभाव क्षेत्र में है, जहां अतिरिक्त वर्षा होती है। पश्चिमी राजस्थान थार मरुस्थल के विस्तार में है, जहां वर्षा न्यूनतम है।
छाया क्षेत्र (Rain Shadow Area) की व्याख्या
जब नम हवाएं पर्वत से टकराती हैं, तो उन्हें ऊपर उठना पड़ता है। ऊंचाई पर तापमान कम होने से जलवाष्प संघनित होता है और वर्षा होती है। पर्वत के दूसरी ओर उतरते समय हवाएं सूख जाती हैं, जिससे वहां वर्षा नहीं होती। इसे ‘छाया क्षेत्र’ कहा जाता है।
- Windward Side (पवन की ओर): पर्वत का पूर्वी ढलान, जहां अधिक वर्षा होती है
- Leeward Side (पवन के विपरीत): पर्वत का पश्चिमी ढलान, जहां कम वर्षा होती है
- Rain Shadow Effect: पश्चिमी राजस्थान में अरावली के कारण यह प्रभाव स्पष्ट दिखता है
परीक्षा-केंद्रित विश्लेषण
Rajasthan Govt Exam में वर्षा से संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। मानसून की गतिविधि, वर्षा का वितरण, और इसके कृषि व जल संसाधन पर प्रभाव परीक्षा के महत्वपूर्ण विषय हैं।
परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले विषय
मानसून: ऋतु-आधारित हवाएं जो वर्ष में दो बार अपनी दिशा बदलती हैं। राजस्थान में दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून–सितंबर) मुख्य है।
- अरब सागर शाखा: गुजरात-राजस्थान में प्रवेश करती है
- बंगाल की खाड़ी शाखा: पूर्वी राजस्थान में वर्षा करती है
राजस्थान में वर्षा का वितरण असमान है:
- पूर्वी राजस्थान: 60+ सेमी (झालावाड़ 80–90 सेमी)
- मध्य राजस्थान: 20–40 सेमी
- पश्चिमी राजस्थान: <20 सेमी (जैसलमेर 10–15 सेमी)
अरावली पर्वतमाला पश्चिमी राजस्थान को ‘छाया क्षेत्र’ में रखती है। नम हवाएं पर्वत के पूर्वी ढलान पर वर्षा करती हैं, और सूखी हवाएं पश्चिम की ओर जाती हैं।
- Windward Side: पूर्वी ढलान — अधिक वर्षा
- Leeward Side: पश्चिमी ढलान — कम वर्षा
राजस्थान में मानसून की वर्षा अनिश्चित है। कुछ वर्षों में अत्यधिक वर्षा होती है, तो कुछ वर्षों में सूखा पड़ता है। यह अनिश्चितता कृषि और पशुपालन को प्रभावित करती है।
- मानसून विराम: अगस्त में वर्षा में 50% तक की कमी
- सूखे की आवृत्ति: राजस्थान में बार-बार सूखा पड़ता है
मुख्य तथ्य (Quick Revision)
परीक्षा प्रश्न और सारांश
अभ्यास प्रश्न
- अरावली पर्वतमाला: यह पूर्व-पश्चिम दिशा में फैली है और मानसून की नम हवाओं को रोकती है।
- छाया क्षेत्र: पर्वत के पश्चिमी ढलान पर हवाएं सूख जाती हैं, जिससे कम वर्षा होती है।
- समुद्र से दूरी: पूर्वी राजस्थान बंगाल की खाड़ी के निकट है, जहां नम हवाएं अधिक प्रभावी होती हैं।
- भौगोलिक स्थिति: पूर्वी राजस्थान विंध्य पर्वतमाला के प्रभाव क्षेत्र में है, जबकि पश्चिमी राजस्थान थार मरुस्थल के विस्तार में है।


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