हस्तिनापुर उत्खनन एवं कुरु जनपद के पुरातात्विक साक्ष्य
उत्तर प्रदेश में कुरु जनपद के पुरातात्विक साक्ष्य — हस्तिनापुर उत्खनन, PGW संस्कृति एवं ऐतिहासिक महत्त्व
परिचय एवं उत्खनन की पृष्ठभूमि
हस्तिनापुर उत्खनन भारतीय पुरातत्व के इतिहास में एक मील का पत्थर है। UPPSC एवं अन्य राज्य लोक सेवा परीक्षाओं की दृष्टि से यह उत्खनन इसलिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसने कुरु जनपद और महाभारत काल को पहली बार पुरातात्विक आधार प्रदान किया।
हस्तिनापुर — भौगोलिक एवं ऐतिहासिक परिचय
हस्तिनापुर उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में गंगा नदी के दाहिने किनारे पर स्थित है। यह नगर महाभारत में वर्णित कुरु वंश की राजधानी माना जाता है। आधुनिक हस्तिनापुर कस्बा मेरठ से लगभग 37 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। यह स्थल गंगा-यमुना दोआब के उत्तरी भाग में स्थित है जो उत्तर वैदिक काल की सभ्यता का प्रधान केंद्र था।
उत्खनन की आवश्यकता क्यों पड़ी?
स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के महानिदेशक Sir Mortimer Wheeler ने भारत की पौराणिक परंपराओं को पुरातात्विक आधार देने की दिशा में कार्य आरम्भ किया। महाभारत में हस्तिनापुर का बार-बार उल्लेख होने के कारण यह स्थल उत्खनन के लिए चुना गया। इससे पूर्व 1878 में Sir Alexander Cunningham ने हस्तिनापुर का सर्वेक्षण किया था और इसे महाभारत की राजधानी के रूप में पहचाना था।
उत्खनन का मुख्य उद्देश्य था — यह निर्धारित करना कि महाभारत काल का हस्तिनापुर वास्तव में इसी स्थल पर था या नहीं, और यदि था तो किस कालखंड में। B.B. Lal के नेतृत्व में यह उत्खनन ASI द्वारा 1950 से 1952 के मध्य संपन्न हुआ।
B.B. Lal का उत्खनन (1950–52) — पद्धति एवं संस्तर
बृज बासी लाल (B.B. Lal) ने हस्तिनापुर में वैज्ञानिक उत्खनन पद्धति अपनाते हुए पाँच सांस्कृतिक संस्तरों (Cultural Periods) की पहचान की। यह उत्खनन भारत में स्तरीकृत उत्खनन (Stratigraphic Excavation) के आरम्भिक एवं महत्त्वपूर्ण उदाहरणों में से एक है।
उत्खनन पद्धति
B.B. Lal ने ऊर्ध्वाधर उत्खनन (Vertical Excavation) पद्धति अपनाई जिसमें भूमि को परत-दर-परत खोदा जाता है। प्रत्येक परत (Layer) में मिलने वाले मृद्भांड, धातु उपकरण, भवन अवशेष और अन्य वस्तुएँ उस काल की संस्कृति की पहचान कराती हैं। इस पद्धति से सापेक्ष तिथि निर्धारण (Relative Dating) संभव हुआ।
पाँच सांस्कृतिक संस्तर (Five Cultural Periods)
| संस्तर | काल (ईपू/ई.) | मृद्भांड प्रकार | प्रमुख विशेषता | UPPSC महत्त्व |
|---|---|---|---|---|
| I | ~2000–1500 ईपू | OCP (गेरुवर्णी) | ताम्र उपकरण, Copper Hoards | प्रारम्भिक बस्ती का प्रमाण |
| II | ~1100–800 ईपू | PGW (चित्रित धूसर) | लौह उपकरण, कुरु-महाभारत काल | सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण |
| III | ~600–200 ईपू | NBPW (उत्तरी काली पॉलिश) | पक्की ईंट, Punch-marked सिक्के | महाजनपद-मौर्य काल |
| IV | 200 ईपू–300 ई. | लाल मृद्भांड | टेराकोटा, शुंग-कुषाण प्रभाव | सांस्कृतिक निरंतरता |
| V | 300–1200 ई. | परिष्कृत लाल | गुप्त-मध्यकाल, सिक्के-मुहरें | दीर्घकालीन मानव-वास |
Painted Grey Ware (PGW) संस्कृति — विस्तृत विश्लेषण
चित्रित धूसर मृद्भांड (Painted Grey Ware / PGW) हस्तिनापुर उत्खनन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुरातात्विक खोज है। यह मृद्भांड संस्कृति उत्तर वैदिक काल (~1100–600 ईपू) का प्रतिनिधित्व करती है और कुरु जनपद की भौतिक संस्कृति का मूर्त प्रमाण है।
PGW की विशेषताएँ
- रंग: धूसर (Grey) — चाक पर निर्मित
- सतह: चिकनी, पतली दीवारें
- चित्रकारी: काले/गहरे भूरे रंग से ज्यामितीय आकृतियाँ
- आकृतियाँ: थाली (dish), कटोरा (bowl), घड़ा (jar)
- मिट्टी: बारीक छानी हुई, अच्छी तरह पकाई गई
- मुख्य क्षेत्र: गंगा-यमुना दोआब (UP)
- पश्चिम: हरियाणा, पंजाब, राजस्थान
- पूर्व: वाराणसी तक विस्तार
- लगभग 700+ स्थलों पर PGW के साक्ष्य
- सर्वाधिक घनत्व: उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा
- लौह उपकरण: तीर, भाले, चाकू, हल की फाल
- हड्डी के उपकरण
- मृद्भांड: काली लेपनी वाले बर्तन भी
- मनके (beads): फयांस, टेराकोटा
- पशु-अस्थियाँ: गाय, घोड़ा, भेड़
- मकान: मिट्टी के (कच्चे) — पक्की ईंटें अनुपस्थित
- फर्श: मिट्टी से लिपा, कभी-कभी चूना
- बाँस-नरकट के अवशेष (wattle-and-daub)
- भंडारण गड्ढे (storage pits)
- चूल्हे एवं अग्नि-स्थल
PGW संस्कृति और उत्तर वैदिक काल का सम्बन्ध
PGW संस्कृति और उत्तर वैदिक काल के बीच समानांतरता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। दोनों का कालखंड (~1100–600 ईपू), भौगोलिक विस्तार (गंगा-यमुना दोआब) और सामाजिक विशेषताएँ (लौह-प्रयोग, कृषि-विस्तार, नगर-प्रारम्भ) एक समान हैं। इतिहासकार B.B. Lal ने PGW को ही महाभारत काल की भौतिक संस्कृति घोषित किया।
| तुलना बिंदु | PGW संस्कृति | उत्तर वैदिक काल (साहित्यिक साक्ष्य) |
|---|---|---|
| कालखंड | ~1100–600 ईपू | ~1000–600 ईपू |
| भौगोलिक केंद्र | गंगा-यमुना दोआब | कुरु-पांचाल क्षेत्र |
| धातु-प्रयोग | लौह उपकरण | अथर्ववेद में लोहे का उल्लेख |
| आवास | कच्चे मिट्टी के घर | ग्रामीण बस्तियाँ (ग्राम) |
| अर्थव्यवस्था | कृषि + पशुपालन | गोपालन, कृषि-प्रधान |
| राजनीतिक इकाई | बड़ी बस्तियाँ (प्रोटो-नगर) | जनपद → महाजनपद संक्रमण |
PGW के प्रमुख स्थल — उत्तर प्रदेश में
प्रमुख पुरातात्विक साक्ष्य एवं अवशेष
हस्तिनापुर एवं कुरु जनपद क्षेत्र के उत्खनन से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्य पाँच प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किए जा सकते हैं — मृद्भांड, धातु उपकरण, भवन अवशेष, जैव अवशेष और लघु कलाकृतियाँ।
मृद्भांड पुरातत्व में कालखंड-निर्धारण का सर्वाधिक विश्वसनीय माध्यम है। हस्तिनापुर से निम्न मृद्भांड मिले:
- OCP (Ochre Coloured Pottery): काल I का मृद्भांड; गेरुवर्णी, मोटा; ताम्र-काल सभ्यता का प्रतीक। ~2000–1500 ईपू
- PGW (Painted Grey Ware): काल II का प्रमुख मृद्भांड; धूसर पृष्ठभूमि पर काले ज्यामितीय चित्र; चाक-निर्मित, पतला। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण
- NBPW (Northern Black Polished Ware): काल III; अत्यंत चमकदार काली पॉलिश; मौर्यकाल का प्रतीक।
- Red Ware (लाल मृद्भांड): काल IV–V; सामान्य लाल रंग; शुंग से मध्यकाल तक निरंतर।
- Black-and-Red Ware (BRW): कहीं-कहीं काल I–II संक्रमण में मिला; ऊपर काला, अंदर लाल।
हस्तिनापुर उत्खनन में लौह उपकरणों की प्राप्ति ने इस स्थल को भारत में लौह-युग की शुरुआत से जोड़ा:
- लौह तीर (Iron Arrowheads): PGW संस्तर में बड़ी संख्या में मिले; महाभारत की युद्ध-परंपरा से सम्बद्ध।
- लौह भाला (Iron Spearhead): युद्ध-उपकरण; उत्तर वैदिक काल में लोहे के प्रयोग का प्रमाण।
- लौह चाकू एवं कुल्हाड़ी: दैनिक उपयोग के उपकरण; कृषि एवं गृहस्थी में प्रयुक्त।
- ताम्र उपकरण (Copper Tools): काल I (OCP) में; ताम्र कुल्हाड़ी, anthropomorphic figures, Harpoon।
- ताम्र सिक्के (Punch-marked Coins): काल III (NBPW) में; मौर्यकालीन व्यापार के प्रमाण।
हस्तिनापुर में PGW काल के भवन अवशेष अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं:
- कच्ची मिट्टी के मकान (Mud Houses): PGW संस्तर में पक्की ईंटें अनुपस्थित; मिट्टी एवं बाँस-नरकट (wattle-and-daub) के मकान।
- मिट्टी के चूल्हे (Hearths): प्रत्येक घर में एक या अधिक चूल्हे; अग्निपूजा की परंपरा का संकेत।
- भंडारण गड्ढे (Storage Pits): अनाज संग्रह के प्रमाण; कृषि-अधिशेष की व्यवस्था।
- पक्की ईंटें (NBPW काल में): काल III से पक्की ईंटों का प्रयोग आरम्भ; नगरीकरण का संकेत।
- प्राकार/रक्षा दीवार: बाद के संस्तरों में किलेबंदी के अंशिक प्रमाण।
उत्खनन में मिले जैव अवशेष उस काल की अर्थव्यवस्था एवं खान-पान पर प्रकाश डालते हैं:
- पशु-अस्थियाँ: गाय (Bos indicus), भेड़-बकरी, घोड़ा (Equus caballus), हाथी (Elephas maximus)। पशुपालन की पुष्टि।
- घोड़े की अस्थियाँ: महाभारत में वर्णित अश्वमेध यज्ञ एवं रथ-युद्ध परंपरा की पुष्टि।
- मछली की अस्थियाँ: गंगा-मछली; जलीय संसाधनों का उपयोग।
- बीज एवं अनाज: धान (Rice), गेहूँ, जौ के बीज; कृषि-आर्थव्यवस्था का प्रमाण।
- लकड़ी-कोयला (Charcoal): Radio-carbon dating के लिए उपयोगी; काल निर्धारण में सहायक।
- मिट्टी के खिलौने (Terracotta Figurines): पशु-आकृतियाँ, मानव-मूर्तियाँ; धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन का संकेत।
- मनके (Beads): फयांस, टेराकोटा, अर्ध-कीमती पत्थर; आभूषण परंपरा एवं व्यापार के प्रमाण।
- हड्डी की कंघी एवं सुइयाँ: दैनिक जीवन के उपकरण।
- मृद्भांड पर खुदे चिह्न (Graffiti Marks): संभवतः प्रारम्भिक लेखन-परंपरा के संकेत।
- पत्थर के उपकरण (Querns — पीसने की चक्की): अनाज पीसने के प्रमाण; घरेलू अर्थव्यवस्था।
महाभारत एवं पुरातात्विक साक्ष्यों का सम्बन्ध
हस्तिनापुर उत्खनन की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि इसने महाभारत के ऐतिहासिक आधार पर गम्भीर पुरातात्विक बहस आरम्भ की। B.B. Lal सहित अनेक विद्वानों ने PGW संस्कृति को महाभारत काल से जोड़ा।
महाभारत के उल्लेखों की पुरातात्विक पुष्टि
| महाभारत का उल्लेख | पुरातात्विक साक्ष्य | सम्बन्ध |
|---|---|---|
| हस्तिनापुर — कुरु राजधानी | PGW संस्तर, मेरठ UP | सीधा भौगोलिक अनुरूपण |
| बाढ़ द्वारा नगर-विनाश (महा. आदिपर्व) | PGW संस्तर में अचानक विराम; ऊपर रेत-मिट्टी की परत | गंगा-बाढ़ का पुरातात्विक प्रमाण |
| रथ एवं घोड़ा — युद्ध में केंद्रीय भूमिका | घोड़े की अस्थियाँ, लौह तीर-भाले | युद्ध-परंपरा की पुष्टि |
| लोहे के अस्त्र-शस्त्र | लौह उपकरण PGW संस्तर में | लौह-काल से अनुरूपण |
| कृषि एवं गोपालन | पशु-अस्थियाँ, अनाज-बीज | ग्रामीण अर्थव्यवस्था की पुष्टि |
| द्वारका विस्थापन (पांडवों का जाना) | PGW काल के पश्चात् NBPW (नए लोग/संस्कृति) | सांस्कृतिक परिवर्तन का प्रतीक |
बाढ़-परत — सर्वाधिक नाटकीय साक्ष्य
B.B. Lal ने हस्तिनापुर उत्खनन में PGW संस्तर और NBPW संस्तर के बीच एक रेत-मिट्टी की परत (Alluvial Deposit) की पहचान की। यह परत स्पष्ट रूप से गंगा की भीषण बाढ़ का प्रमाण है। महाभारत के आदिपर्व में वर्णित है कि हस्तिनापुर के राजा निचक्षु ने गंगा की बाढ़ से नगर नष्ट होने पर अपनी राजधानी कौशाम्बी स्थानांतरित की थी। पुरातात्विक बाढ़-परत इस वर्णन की पुष्टि करती है।
महाभारत तिथि-निर्धारण विवाद
महाभारत काल की तिथि पर विद्वानों में मतभेद है। B.B. Lal के PGW साक्ष्यों के आधार पर ~1000–800 ईपू की तिथि सुझाई जाती है। परंतु कुछ परम्परावादी विद्वान ~3100 ईपू (युधिष्ठिर-शक के आधार पर) की तिथि मानते हैं। पुरातात्विक साक्ष्य स्पष्ट रूप से ~1000–800 ईपू की तिथि का समर्थन करते हैं।
~1100–800 ईपू; B.B. Lal, R.S. Sharma सहित अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों द्वारा स्वीकृत; पुरातात्विक एवं भाषाशास्त्रीय साक्ष्यों पर आधारित।
~3102 ईपू (कलियुग प्रारम्भ के आधार पर); ज्योतिष-गणना आधारित; पुरातात्विक साक्ष्यों से असमर्थित।
हस्तिनापुर के PGW संस्तर के लकड़ी-कोयले का C-14 परीक्षण ~800–900 ईपू की तिथि देता है, जो PGW अनुमान से अनुरूप है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ~1100–600 ईपू को PGW संस्कृति का काल मानता है, जो कुरु जनपद की ऐतिहासिक तिथि के अनुरूप है।
उत्तर: B.B. Lal (1950–52) के हस्तिनापुर उत्खनन ने पाँच सांस्कृतिक संस्तरों की पहचान की, जिनमें काल II (PGW संस्कृति, ~1100–800 ईपू) को महाभारत काल से जोड़ा जाता है। पक्ष में साक्ष्य: (i) PGW-लौह उपकरण — युद्ध में लोहे का प्रयोग, (ii) घोड़े की अस्थियाँ — रथ-युद्ध परंपरा, (iii) बाढ़-परत — आदिपर्व में निचक्षु के कौशाम्बी पलायन की पुष्टि, (iv) भौगोलिक स्थान — मेरठ में गंगा-तट पर हस्तिनापुर। सीमाएँ: (i) PGW एक व्यापक संस्कृति है, केवल हस्तिनापुर तक सीमित नहीं, (ii) राजमहल-जैसी भव्य संरचनाएँ नहीं मिलीं, (iii) महाभारत में वर्णित नगरीय वैभव से PGW बस्ती का अंतर। निष्कर्ष: पुरातात्विक साक्ष्य महाभारत को पूर्णतः पौराणिक नहीं मानने देते, परंतु ग्रंथ में वर्णित वैभव का पुरातात्विक समर्थन सीमित है।
अन्य उत्खनन स्थल — कुरु जनपद क्षेत्र
हस्तिनापुर के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश एवं समीपवर्ती क्षेत्रों में अनेक स्थलों पर उत्खनन हुए हैं जो कुरु जनपद की सीमाओं के भीतर या निकट स्थित थे। ये स्थल कुरु सभ्यता के व्यापक विस्तार को प्रमाणित करते हैं।
अतरंजीखेड़ा (एटा, UP)
उत्खनन: 1961–74इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली)
पुराना किला उत्खननकुरुक्षेत्र (हरियाणा)
विभिन्न उत्खनननोह (मथुरा, UP)
उत्खनन: 1957–59कुरु-क्षेत्र के PGW स्थलों का तुलनात्मक विश्लेषण
| स्थल | राज्य | उत्खनकर्ता | वर्ष | प्रमुख साक्ष्य |
|---|---|---|---|---|
| हस्तिनापुर | UP (मेरठ) | B.B. Lal | 1950–52 | PGW, OCP, बाढ़-परत, लौह उपकरण |
| अतरंजीखेड़ा | UP (एटा) | R.C. Gaur | 1961–74 | लौह-भट्टी, PGW, OCP |
| नोह | UP (मथुरा) | B.B. Lal | 1957–59 | OCP, PGW, यमुना-तट बस्ती |
| इन्द्रप्रस्थ | दिल्ली | B.B. Lal | 1954–55 | PGW, पुराना किला परिसर |
| कुरुक्षेत्र | हरियाणा | विभिन्न | बहु-कालिक | PGW, सरस्वती-तट अवशेष |
| भगवानपुरा | हरियाणा | J.P. Joshi | 1975–76 | PGW + हड़प्पा संस्कृति साथ-साथ |
- उत्खनकर्ता: J.P. Joshi, 1975–76
- महत्त्व: यहाँ हड़प्पा संस्कृति और PGW संस्कृति एक ही संस्तर में साथ-साथ मिली।
- निहितार्थ: हड़प्पा सभ्यता के अंत और वैदिक PGW सभ्यता के प्रारम्भ के बीच कोई लंबा अंतराल नहीं था।
- वाद-विवाद: इसने “आर्य बाहरी आगमन बनाम स्वदेशी” बहस को नया आयाम दिया।
विश्लेषण — ऐतिहासिक महत्त्व, सीमाएँ एवं विवाद
हस्तिनापुर उत्खनन के निष्कर्षों का बहुआयामी विश्लेषण UPPSC Mains की दृष्टि से अनिवार्य है। इन निष्कर्षों के ऐतिहासिक महत्त्व के साथ-साथ उनकी सीमाओं एवं विवादों को समझना आवश्यक है।
उत्खनन के ऐतिहासिक योगदान
सीमाएँ एवं आलोचनाएँ
- अपूर्ण उत्खनन: हस्तिनापुर का केवल एक सीमित क्षेत्र खोदा गया। विशाल टीले का बड़ा भाग अभी भी अनखुदा है।
- भव्य संरचनाओं का अभाव: महाभारत में वर्णित भव्य राजप्रासाद और नगर की तुलना में PGW बस्ती सामान्य कच्चे मकानों की थी।
- गंगा द्वारा क्षति: गंगा की बाढ़ ने ऊपरी संस्तरों को बार-बार नष्ट किया, जिससे साक्ष्य अधूरे रह गए।
- लेखन के साक्ष्य नहीं: PGW संस्तर में कोई लिपि या अभिलेख नहीं मिला, जो महाभारत-काल की प्रशासनिक जटिलता को प्रमाणित करता।
- नगरीकरण का अभाव: PGW काल में हस्तिनापुर एक नगर नहीं, बल्कि बड़ी बस्ती (proto-urban settlement) थी।
- तिथि-विवाद: C-14 तिथि और परम्परागत तिथि में भारी अंतर; एकमत नहीं।
B.B. Lal का पुनर्मूल्यांकन
B.B. Lal ने स्वयं अपने जीवन के उत्तरार्ध में (2002 एवं 2018 में प्रकाशित पुस्तकों में) अपने 1950–52 के निष्कर्षों को और बल दिया। उनकी पुस्तक “The Homeland of the Aryans” (2005) और “Rāma: His Historicity, Mandir and Setu” में उन्होंने तर्क दिया कि PGW संस्कृति के लोग स्वदेशी थे और हड़प्पा-PGW में सांस्कृतिक निरंतरता थी। यह स्थिति आर्य-बाहरी आगमन सिद्धांत के विरुद्ध जाती है।
सारांश एवं परीक्षा प्रश्न
त्वरित पुनरावृत्ति (Quick Revision)
अभ्यास प्रश्न (Interactive MCQ)
Mains के लिए: बाढ़-परत + महाभारत का सम्बन्ध | PGW = उत्तर वैदिक काल की भौतिक संस्कृति | लौह-युग + कृषि-क्रांति | उत्खनन की सीमाएँ (भव्य संरचना नहीं, अपूर्ण उत्खनन) अवश्य लिखें।
निष्कर्ष
हस्तिनापुर उत्खनन (1950–52) भारतीय पुरातत्व का एक ऐतिहासिक अध्याय है। B.B. Lal द्वारा पहचाने गए पाँच सांस्कृतिक संस्तर, विशेषकर PGW संस्कृति, ने कुरु जनपद और उत्तर वैदिक काल को पुरातात्विक ठोसपन प्रदान किया। बाढ़-परत, लौह उपकरण, घोड़े की अस्थियाँ और सांस्कृतिक निरंतरता के साक्ष्य यह सिद्ध करते हैं कि हस्तिनापुर वास्तव में एक ऐतिहासिक नगर था। उत्तर प्रदेश में इस स्थल का संरक्षण एवं आगे का उत्खनन भारतीय इतिहास की अनेक गुत्थियों को सुलझा सकता है।


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