आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान्रिपुः
– माता! आज तो छुट्टी का दिन है। आज मैं सारे दिन आराम करूँगा ।
– छुट्टी विद्यालय की है ना कि अपने अध्ययन की। बहुत आलस करते हो। उठो, मेहनत करो।
– अधिक मेहनत से क्या मैं पास होऊँगा ?
– जो परिश्रम करता है, वह ही जीवन में सफलता प्राप्त करता है। परिश्रम ही मनुष्य का मित्र है। आलस्य तो दुश्मन के समान है।
– वह कैसे माता ?
– यदि जानना चाहते हो तो इस कथा को सुनो।
एकस्मिन् विशाले ग्रामे कश्चन भिक्षुकः आसीत्। यद्यपि सः उन्नतः दृढकाय: च युवकः आसीत् तथापि सः भिक्षाटनं करोति स्म। मार्गे यः कोऽपि मिलति तं सः कथयति – “कृपया भिक्षां यच्छतु। दरिद्राय दानं करोतु। पुण्यं प्राप्नोतु।” इति। केचन जनाः तस्मै धनं यच्छन्ति। केचन च तर्जयन्ति।
हिंदी अनुवाद:
एक बड़े गाँव में एक भिक्षुक रहता था। यद्यपि वह लंबा, बलिष्ठ और युवा था, फिर भी वह भिक्षा माँगकर जीवनयापन करता था। रास्ते में जो भी मिलता, वह उससे कहता, “कृपया भिक्षा दें। गरीब को दान करें। पुण्य प्राप्त करें।” कुछ लोग उसे धन दे देते थे, जबकि कुछ उसे डाँटते थे।
एकदा तेन मार्गेण कश्चित् धनिकः आगच्छति। सः भिक्षुकः मनसि एव चिन्तयति – ”अहो मम भाग्यम्। अद्य अहं प्रभूतं धनं प्राप्नोमि” इति।
भिक्षुकः धनिकं वदति “आर्य! अहम् अतीव दरिद्रः अस्मि। कृपया दानं करोतु” इति।
धनिकः तं पृष्टवान् – ”त्वं किम् इच्छसि?”
‘आर्य! अहं प्रभूतं धनम् इच्छामि”
इति सः सविनयम् उक्तवान्।
हिंदी अनुवाद:
एक दिन उसी रास्ते से एक धनी व्यक्ति आ रहा था। भिक्षुक ने मन ही मन सोचा, “वाह, मेरा भाग्य! आज मैं बहुत सारा धन प्राप्त करूँगा।” भिक्षुक ने धनी व्यक्ति से कहा, “महोदय! मैं बहुत गरीब हूँ। कृपया दान करें।”
धनी व्यक्ति ने उससे पूछा, “तुम क्या चाहते हो?”
भिक्षुक ने विनम्रतापूर्वक कहा,
“महोदय! मैं बहुत सारा धन चाहता हूँ।”
तदा धनिकः वदति – ”अहं तुभ्यं सहस्रं रूप्यकाणि यच्छामि। त्वं मह्यं तव पादौ यच्छ।”
भिक्षुकः वदति – “अहं मम पादौ तुभ्यं कथं ददामि? विना पादौ कथं वा चलामि?”
धनिकः वदति – ”अस्तु त्वं पञ्चसहस्त्रं रूप्यकाणि स्वीकुरु मह्यं तव हस्तौ यच्छ।”
भिक्षुकः वदति – ”हस्ताभ्यां विना अहं कथं भिक्षां स्वीकरोमि?”
एवमेव धनिकः सहस्राधिकैः रूप्यकैः तस्य अनेकानि शरीराङ्गानि क्रेतुम् इष्टवान्। किन्तु भिक्षुकः निराकृतवान्।
हिंदी अनुवाद:
तब धनी व्यक्ति बोला, “मैं तुम्हें एक हजार चाँदी के सिक्के दूँगा। तुम मुझे अपने दोनों पैर दे दो।”
भिक्षुक ने कहा, “मैं अपने पैर आपको कैसे दे सकता हूँ? पैरों के बिना मैं कैसे चलूँगा?”
धनी व्यक्ति बोला, “ठीक है, तुम पाँच हजार चाँदी के सिक्के ले लो और मुझे अपने दोनों हाथ दे दो।”
भिक्षुक ने कहा, “हाथों के बिना मैं भिक्षा कैसे लूँगा?” इस प्रकार धनी व्यक्ति ने हजारों सिक्कों के बदले उसके कई शरीर के अंग खरीदने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन भिक्षुक ने हर बार मना कर दिया।
तदा धनिकः उक्तवान्। ”पश्य मित्र! तव समीपे एव सहस्राधिकमूल्यकानि वस्तूनि सन्ति। तथापि किमर्थं त्वम् आत्मानं दुर्बलं मन्यसे? सौभाग्येन एव वयं मानवजन्म प्राप्तवन्तः। अस्य सफलतार्थं प्रयत्नं कुरु। इतः गच्छ, शुभं भवतु” इति।
हिंदी अनुवाद:
तब धनी व्यक्ति ने कहा, “देखो मित्र! तुम्हारे पास ही हजारों की कीमत वाले अंग हैं। फिर भी तुम स्वयं को कमजोर क्यों मानते हो? सौभाग्य से हमें मानव जन्म प्राप्त हुआ है। इसे सफल बनाने के लिए प्रयास करो। अब जाओ, तुम्हारा कल्याण हो।”
तस्माद् दिनात् भिक्षुकः भिक्षाटनं त्यक्त्वा परिश्रमेण धनार्जनं कृत्वा सगौरवं जीवनयापनम् आरब्धवान् अतः एव सज्जनाः वदन्ति।
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
हिंदी अनुवाद:
उस दिन से भिक्षुक ने भिक्षा माँगना छोड़ दिया और परिश्रम से धन कमाकर सम्मानपूर्वक जीवन जीना शुरू किया। इसलिए सज्जन लोग कहते हैं।
पदच्छेद: आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः, न अस्ति उद्यमसमः बन्धुः कृत्वा यं न अवसीदति।
अन्वय: आलस्य मनुष्यों के शरीर में स्थित एक बड़ा शत्रु है। परिश्रम जैसा कोई मित्र नहीं है, क्योंकि परिश्रम करने से कोई दुखी नहीं होता।
भावार्थ: आलस्य मनुष्य के शरीर में रहने वाला सबसे बड़ा दुश्मन है। इसके कारण कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। इसके विपरीत, परिश्रम जैसा कोई मित्र नहीं है, क्योंकि परिश्रम करने पर कोई भी व्यक्ति दुखी नहीं होता।







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