📘 अध्याय 3: संख्याओं का संसार
कक्षा 9 | गणित मंजरी (Ganit Manjari) | महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
🔹 भाग 1: लघु उत्तरीय प्रश्न (15 प्रश्न)
प्रश्न 1: प्राकृत संख्याओं (N) का समुच्चय कैसे लिखा जाता है?⭐
उत्तर: N = {1, 2, 3, 4, ….}
प्रश्न 2: लेबोम्बो अस्थि क्या है?⭐
उत्तर: यह लगभग 35,000 वर्ष पूर्व दक्षिण अफ्रीका में मिली एक अस्थि है, जिसमें सोच-समझकर उकेरे गए 29 समरूप खाँचे हैं।
प्रश्न 3: इशांगो अस्थि कहाँ पाई गई थी?⭐
उत्तर: कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में नील नदी के उद्गम के निकट, जिसकी तिथि लगभग 20,000 वर्ष पूर्व मानी गई है।
प्रश्न 4: शून्य को पूर्ण रूप से एक संक्रियात्मक संख्या में किसने बदला?⭐
उत्तर: ब्रह्मगुप्त ने, अपनी कृति ब्रह्मस्फुटसिद्धांत (628 सामान्य संवत) में।
प्रश्न 5: ब्रह्मगुप्त के अनुसार a − 0 का मान क्या होगा?⭐
उत्तर: a − 0 = a (संख्या अपरिवर्तित रहती है)।
प्रश्न 6: पूर्णांक (Z) किसे कहते हैं?⭐
उत्तर: धनात्मक प्राकृत संख्याओं, उनकी समकक्ष ऋणात्मक संख्याओं और शून्य के संयोजन से पूर्णांकों का समुच्चय बनता है।
प्रश्न 7: चिह्न ‘Z’ किस शब्द से लिया गया है?⭐
उत्तर: जर्मन शब्द ‘जाहलेन’ से, जिसका अर्थ है ‘संख्याएँ’।
प्रश्न 8: एक परिमेय संख्या की परिभाषा दीजिए।⭐
उत्तर: वह संख्या जिसे p/q के रूप में व्यक्त किया जा सके, जहाँ p और q पूर्णांक हैं और q ≠ 0 है, परिमेय संख्या कहलाती है।
प्रश्न 9: दो परिमेय संख्याएँ a/b और c/d कब समतुल्य कहलाती हैं?⭐⭐
उत्तर: जब ad = bc होता है, तब a/b और c/d समतुल्य परिमेय संख्याएँ कहलाती हैं।
प्रश्न 10: परिमेय संख्या x के निरपेक्ष मान की परिभाषा दीजिए।⭐⭐
उत्तर: संख्या रेखा पर 0 से x की दूरी को |x| कहते हैं। इसे निरपेक्ष मान कहा जाता है, और यह सदैव ऋणेतर होता है (|x| ≥ 0)।
प्रश्न 11: √2 की अपरिमेयता को सर्वप्रथम किसने सिद्ध किया था?⭐
उत्तर: हिप्पासस नामक गणितज्ञ ने, जो पाइथागोरस विद्यालय का सदस्य था (लगभग 400 सामान्य संवत पूर्व)।
प्रश्न 12: π की अपरिमेयता औपचारिक रूप से किसने सिद्ध की?⭐
उत्तर: गणितज्ञ लैम्बर्ट ने 1761 ई. में औपचारिक रूप से सिद्ध किया।
प्रश्न 13: π के लिए अनंत श्रेणी सबसे पहले किसने दी थी?⭐⭐
उत्तर: संगमग्राम के माधव ने, जिन्होंने केरल स्कूल ऑफ मैथेमेटिक्स की स्थापना की थी।
प्रश्न 14: चक्रीय संख्या (Cyclic Number) का उदाहरण दीजिए।⭐⭐
उत्तर: 142857, जो 1/7 के आवर्ती दशमलव प्रसार में मिलता है — इसे 1 से 6 तक किसी भी अंक से गुणा करने पर वही अंक चक्रीय क्रम में आते हैं।
प्रश्न 15: वास्तविक संख्याएँ (R) किसे कहते हैं?⭐
उत्तर: परिमेय और अपरिमेय संख्याएँ मिलकर पूरी वास्तविक संख्या रेखा (वास्तविक संख्याओं का समुच्चय R) बनाती हैं।
🔹 भाग 2: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (10 प्रश्न)
प्रश्न 1: सिद्ध कीजिए कि √2 एक अपरिमेय संख्या है। ⭐⭐⭐
चरण 1 — कल्पना: मान लीजिए √2 एक परिमेय संख्या है, इसलिए इसे सरलतम भिन्न p/q (q ≠ 0) के रूप में लिखा जा सकता है, जहाँ p और q सह-अभाज्य हैं। अतः √2 = p/q
चरण 2: दोनों पक्षों का वर्ग करने पर: 2 = p²/q²
चरण 3: दोनों पक्षों को q² से गुणा करने पर: 2q² = p²
चरण 4: चूँकि p², किसी पूर्णांक का दोगुना है, अतः p² एक सम संख्या है, इसलिए p भी सम पूर्णांक है। मान लीजिए p = 2k।
चरण 5: p = 2k को समीकरण में रखने पर: 2q² = (2k)² = 4k², अतः q² = 2k²
चरण 6: इससे स्पष्ट है कि q² भी सम संख्या है, अतः q भी सम पूर्णांक है।
चरण 7 — विरोधाभास: p और q दोनों सम हैं अर्थात दोनों का सार्व गुणनखंड 2 है, जबकि हमने माना था कि p/q अपने सरलतम रूप में है। यह विरोधाभास है।
∴ हमारी प्रारंभिक कल्पना असत्य है। अतः √2 एक अपरिमेय संख्या है।
प्रश्न 2: ब्रह्मगुप्त के शून्य संबंधी नियम लिखिए। ⭐⭐
दिया है: ब्रह्मगुप्त ने 628 सामान्य संवत में शून्य के लिए अंकगणित के नियम बनाए।
नियम 1: यदि किसी संख्या में शून्य का योग किया जाए तो संख्या अपरिवर्तित रहती है — a + 0 = a
नियम 2: यदि किसी संख्या में से शून्य को घटाया जाए तो संख्या अपरिवर्तित रहती है — a − 0 = a
नियम 3: यदि किसी संख्या को शून्य से गुणा किया जाए तो परिणाम शून्य होता है — a × 0 = 0
∴ इन्हीं नियमों ने शून्य को एक वास्तविक संख्या के रूप में स्थापित किया।
प्रश्न 3: ब्रह्मगुप्त द्वारा दिए गए पूर्णांकों के अंकगणित के नियम उदाहरण सहित लिखिए। ⭐⭐⭐
नियम 1: धन-संपत्ति और धन-संपत्ति के योग का परिणाम धन-संपत्ति होता है — जैसे 5 + 4 = 9
नियम 2: ऋणभार और ऋणभार के योग का परिणाम ऋणभार होता है — (−5) + (−4) = −9
नियम 3: किसी धन-संपत्ति या ऋणभार से शून्य घटाने पर वह अपरिवर्तित रहती है — 7 − 0 = 7, −6 − 0 = −6
नियम 4: धन-संपत्ति और ऋणभार का गुणनफल ऋणभार होता है — (−3) × 4 = −12
नियम 5: दो ऋणभारों का गुणनफल धन-संपत्ति होता है — (−3) × (−4) = 12
प्रश्न 4: सांत (Terminating) और आवर्ती (Recurring) दशमलव में अंतर उदाहरण सहित समझाइए। ⭐⭐
सांत दशमलव: जब भाग की प्रक्रिया में शेषफल के रूप में अंततः 0 प्राप्त होता है, तो विभाजन परिमित दशमलव स्थानों पर समाप्त हो जाता है।
उदाहरण: 3/8 = 0.375
आवर्ती दशमलव: जब भाग में शेषफल कभी 0 नहीं होता, किंतु अंकों का क्रम अनंत बार दोहराता रहता है।
उदाहरण: 5/11 = 0.454545… = 0.4̄5̄
∴ p/q का दशमलव प्रसार सांत तभी होगा जब q का अभाज्य गुणनखंडन केवल 2, केवल 5, अथवा 2 और 5 दोनों हो; अन्यथा वह आवर्ती होगा।
प्रश्न 5: 0.6̄ (शुद्ध आवर्ती दशमलव) को p/q रूप में बदलिए। ⭐⭐⭐
चरण 1: मान लीजिए x = 0.6̄
चरण 2: चूँकि एक अंक की पुनरावृत्ति है, अतः दोनों पक्षों को 10¹ = 10 से गुणा करने पर: 10x = 6.6̄
चरण 3: पहले समीकरण को दूसरे में से घटाने पर: 10x − x = 6.6̄ − 0.6̄ = 6, अर्थात 9x = 6
चरण 4: x का मान ज्ञात करने पर: x = 6/9 = 2/3
∴ उत्तर = 0.6̄ = 2/3
प्रश्न 6: 2.357̄ (सामान्य आवर्ती दशमलव) को p/q रूप में रूपांतरित कीजिए। ⭐⭐⭐
चरण 1: मान लीजिए x = 2.357̄ (यहाँ ’35’ अनावर्ती है और ‘7’ आवर्ती है)
चरण 2: अनावर्ती अंकों को दशमलव बिंदु से पहले लाने के लिए 10² = 100 से गुणा करने पर: 100x = 235.7̄
चरण 3: अब पूर्ण आवर्ती चक्र को स्थानांतरित करने के लिए 10¹ = 10 से गुणा करने पर: 1000x = 2357.7̄
चरण 4: घटाने पर: 1000x − 100x = 2357.7̄ − 235.7̄, अर्थात 900x = 2122
∴ उत्तर: x = 2122/900 = 1061/450
प्रश्न 7: संख्या रेखा पर √2 लंबाई की रचना कैसे करें? चरणबद्ध वर्णन कीजिए। ⭐⭐⭐
चरण 1: संख्या रेखा पर OA = 1 इकाई नापिए और A से OA पर एक लंब खींचिए।
चरण 2: इस लंब रेखा पर बिंदु B इस प्रकार अंकित कीजिए कि AB = 1 इकाई हो, और मूलबिंदु O को B से मिलाइए। बौधायन-पाइथागोरस प्रमेय से OB = √2 इकाई प्राप्त होती है।
चरण 3: ‘O’ को केंद्र मानकर और OB को त्रिज्या लेकर परकार से एक चाप खींचिए, जो संख्या रेखा को बिंदु P पर काटे। तब OP = √2 इकाई होगी।
∴ बिंदु P संख्या रेखा पर अपरिमेय संख्या √2 को प्रदर्शित करता है।
प्रश्न 8: परिमेय संख्याओं की सघनता (Density) को उदाहरण सहित समझाइए। ⭐⭐
दिया है: दो परिमेय संख्याएँ 1 और 3/2
सूत्र: दो परिमेय संख्याओं a और b के मध्य एक और परिमेय संख्या उनका माध्य (a+b)/2 ज्ञात करके प्राप्त की जा सकती है।
चरण: 1 और 3/2 के मध्य माध्य = (1 + 3/2) / 2 = (5/2) / 2 = 5/4
∴ 5/4, संख्या 1 और 3/2 के मध्य स्थित एक परिमेय संख्या है। इस प्रकार दो परिमेय संख्याओं के मध्य कितनी भी निकटता क्यों न हो, हमेशा अनंत परिमेय संख्याएँ विद्यमान होती हैं — इसे ही सघनता कहते हैं।
प्रश्न 9: इशांगो अस्थि और लेबोम्बो अस्थि का गणितीय इतिहास में क्या महत्व है? ⭐⭐⭐
लेबोम्बो अस्थि: लगभग 35,000 वर्ष पूर्व दक्षिण अफ्रीका और स्वाजीलैंड के मध्य स्थित लेबोम्बो पर्वत में मिली। इसमें सोच-समझकर उकेरे गए 29 समरूप खाँचे हैं, जो संभवतः चंद्रमा की कलाओं या मासिक धर्म की गणना के लिए उपयोग होते थे।
इशांगो अस्थि: कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में नील नदी के उद्गम के निकट मिली, जिसकी तिथि लगभग 20,000 वर्ष पूर्व मानी गई है। इसमें असमान खाँचों के तीन स्तंभ हैं। एक स्तंभ में 11, 13, 17, 19 (10 से 20 के मध्य की अभाज्य संख्याएँ) खाँचे हैं, और एक अन्य स्तंभ 2 से गुणा (दोगुना) करने की संकल्पना दर्शाता है।
∴ ये प्राचीन अवशेष दर्शाते हैं कि ‘संख्या’ की अमूर्त संकल्पना कई हजार वर्ष पुरानी है, और मानव ने कागज से पहले अस्थियों पर गिनती के चिह्न बनाए थे।
प्रश्न 10: प्राकृत संख्या, पूर्णांक, परिमेय संख्या, अपरिमेय संख्या और वास्तविक संख्या के बीच संबंध समझाइए। ⭐⭐⭐
प्राकृत संख्याएँ (N): मूलभूत गणन संख्याएँ {1, 2, 3, …} हैं। ये पूर्णांकों के समूह में सम्मिलित होती हैं।
पूर्णांक (Z): इनमें शून्य और ऋणात्मक संख्याएँ भी सम्मिलित होती हैं {…, −2, −1, 0, 1, 2,…}। ये बाद में परिमेय संख्याओं में समाहित हो जाती हैं।
परिमेय संख्याएँ (Q): इसमें p/q रूप के सभी भिन्न सम्मिलित हैं, जहाँ p, q पूर्णांक और q ≠ 0 है। ये सांत या आवर्ती दशमलव होती हैं।
अपरिमेय संख्याएँ (I): ये संख्याएँ भिन्नों के रूप में व्यक्त नहीं की जा सकतीं (जैसे √2, π, √10) और न ही इन्हें सांत या आवर्ती दशमलव के रूप में लिखा जा सकता है।
वास्तविक संख्याएँ (R): परिमेय और अपरिमेय संख्याएँ साथ मिलकर पूरी वास्तविक संख्या रेखा का निर्माण करती हैं।
∴ इस प्रकार N ⊂ Z ⊂ Q ⊂ R, तथा अपरिमेय संख्याएँ (I) भी R का भाग हैं, जो Q से पृथक हैं।
📌 याद रखें:
📌 शून्य को औपचारिक संख्या में बदलने का श्रेय ब्रह्मगुप्त को जाता है (628 सामान्य संवत)।
📌 √2 की अपरिमेयता हिप्पासस ने और π की माधव व लैम्बर्ट से जुड़ी है।
📌 दो परिमेय संख्याओं के मध्य नई परिमेय संख्या माध्य [(a+b)/2] से मिलती है।
📌 p/q का दशमलव प्रसार सांत होता है यदि q का अभाज्य गुणनखंड केवल 2 और/या 5 हो।
📌 शून्य को औपचारिक संख्या में बदलने का श्रेय ब्रह्मगुप्त को जाता है (628 सामान्य संवत)।
📌 √2 की अपरिमेयता हिप्पासस ने और π की माधव व लैम्बर्ट से जुड़ी है।
📌 दो परिमेय संख्याओं के मध्य नई परिमेय संख्या माध्य [(a+b)/2] से मिलती है।
📌 p/q का दशमलव प्रसार सांत होता है यदि q का अभाज्य गुणनखंड केवल 2 और/या 5 हो।

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