ध्वनि तरंगें — अभिलक्षण एवं अनुप्रयोग
1. ध्वनि का परिचय
ध्वनि हमारे दैनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण संवेदी अनुभव है। हम अपने आसपास अनेक प्रकार की ध्वनियाँ सुनते हैं, जैसे—
- मनुष्य की वाणी
- पक्षियों की चहचहाहट
- समुद्र की लहरों की आवाज
- पत्तियों की सरसराहट
- मोबाइल फोन की घंटी
- वाहनों के हॉर्न
- संगीत
- बादलों की गड़गड़ाहट
ध्वनि ऊर्जा का एक रूप है। ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है; यह केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती है।
इस अध्याय में मुख्य रूप से यह अध्ययन किया गया है कि—
- ध्वनि कैसे उत्पन्न होती है?
- ध्वनि किस प्रकार संचरित होती है?
- ध्वनि तरंगों की विशेषताएँ क्या हैं?
- ध्वनि का परावर्तन कैसे होता है?
- ध्वनि तरंगों का विभिन्न क्षेत्रों में क्या उपयोग है?
10.1 ध्वनि का उत्पादन
ध्वनि कंपन से उत्पन्न होती है
जब कोई वस्तु कंपन करती है, तो ध्वनि उत्पन्न होती है।
कंपन का अर्थ है—किसी वस्तु की आगे-पीछे होने वाली आवर्ती गति या दोलन।
उदाहरण
- तनी हुई डोरी को खींचकर छोड़ने पर वह कंपन करती है और ध्वनि उत्पन्न करती है।
- धातु की वस्तु पर प्रहार करने पर उसमें कंपन होता है और ध्वनि उत्पन्न होती है।
- बाँसुरी में फूँक मारने पर उसके भीतर की वायु कंपन करती है और ध्वनि उत्पन्न होती है।
- वाद्य यंत्रों में तार, पतले पटल, वायु-स्तंभ या अन्य कंपन करने वाले भाग ध्वनि उत्पन्न करते हैं।
जो वस्तु ध्वनि उत्पन्न करती है, उसे ध्वनि का स्रोत कहते हैं।
रबड़ बैंड का प्रयोग
जब रबड़ बैंड को खींचकर छोड़ते हैं—
- रबड़ बैंड कंपन करता है।
- कंपन के कारण ध्वनि उत्पन्न होती है।
- जब कंपन रुक जाता है, तो ध्वनि भी बंद हो जाती है।
इससे निष्कर्ष निकलता है कि:
ध्वनि कंपन करने वाली वस्तुओं द्वारा उत्पन्न होती है।
रबड़ बैंड को अधिक कसकर या ढीला करके उसके तनाव में परिवर्तन करने पर उत्पन्न ध्वनि में भी परिवर्तन होता है।
मनुष्य और जंतु ध्वनि कैसे उत्पन्न करते हैं?
मनुष्य और कुछ जंतुओं में ध्वनि वाक् तंत्रियों (Vocal Cords) के कंपन से उत्पन्न होती है।
वाक् तंत्रियाँ गले में स्थित वाक् यंत्र या कंठ (Larynx) में पेशीय पट्टियों जैसी होती हैं।
मनुष्य में निम्न अंग ध्वनि को वाणी या गीत में बदलने में सहायता करते हैं—
- जीभ
- होंठ
- मुँह
- नासिका गुहा
कुछ जंतु अपने शरीर के अंगों को आपस में रगड़कर या टकराकर ध्वनि उत्पन्न करते हैं।
उदाहरण: टिड्डे और झींगुर अपने पंखों या टाँगों को रगड़कर ध्वनि उत्पन्न करते हैं।
10.1.1 स्वरित्र द्विभुज (Tuning Fork)
स्वरित्र द्विभुज एक U-आकार की धातु की छड़ होती है, जिसके साथ एक आधार-स्तंभ जुड़ा होता है।
इसके U आकार के दोनों भाग भुजाएँ कहलाते हैं।
इसे कंपन कराने के लिए इसकी भुजा को रबड़ पैड से टकराया जाता है।
जब स्वरित्र द्विभुज को रबड़ पैड से टकराया जाता है—
- इसकी भुजाएँ कंपन करती हैं।
- ध्वनि उत्पन्न होती है।
- इसकी कंपन करती हुई भुजा को जल की सतह से स्पर्श कराने पर जल की सतह पर तरंगें बनती हैं।
इससे यह सिद्ध होता है कि स्वरित्र द्विभुज की भुजाएँ वास्तव में कंपन कर रही हैं।
10.2 ध्वनि का संचरण
ध्वनि अपने स्रोत से हमारे कानों तक पहुँचने के लिए किसी माध्यम के द्वारा संचरित होती है।
ध्वनि निम्न माध्यमों से होकर संचरित हो सकती है—
- ठोस
- द्रव
- गैस
जिस पदार्थ के माध्यम से ध्वनि संचरित होती है, उसे माध्यम (Medium) कहते हैं।
ठोस माध्यम में ध्वनि का संचरण
यदि किसी मेज पर हल्का प्रहार किया जाए और एक कान मेज पर रखकर सुना जाए, तो ध्वनि सुनाई देती है।
इससे सिद्ध होता है कि ध्वनि ठोस पदार्थों से होकर भी संचरित हो सकती है।
द्रव माध्यम में ध्वनि का संचरण
जब पानी में डूबे हुए दो धातु के चम्मचों को आपस में टकराया जाता है, तो ध्वनि सुनाई देती है।
इससे पता चलता है कि ध्वनि द्रवों से होकर भी संचरित हो सकती है।
10.2.1 ध्वनि संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता
ध्वनि के संचरण के लिए माध्यम आवश्यक है।
निर्वात
ऐसा स्थान जहाँ कोई पदार्थ या माध्यम नहीं होता, निर्वात (Vacuum) कहलाता है।
ध्वनि निर्वात में संचरित नहीं हो सकती।
निर्वात बेलजार प्रयोग
एक बेलजार में विद्युत घंटी रखकर उसे बजाया जाता है।
जब बेलजार से वायु धीरे-धीरे बाहर निकाली जाती है—
- घंटी की ध्वनि धीरे-धीरे कम होती जाती है।
- लगभग निर्वात की स्थिति में घंटी दिखाई देती है, लेकिन उसकी ध्वनि सुनाई नहीं देती।
- जब वायु को फिर से बेलजार में प्रवेश कराया जाता है, तो ध्वनि फिर सुनाई देने लगती है।
निष्कर्ष:
ध्वनि के संचरण के लिए माध्यम आवश्यक है।
यह माध्यम ठोस, द्रव या गैस हो सकता है।
इसी कारण बाह्य अंतरिक्ष में अंतरिक्ष यात्री सीधे एक-दूसरे की आवाज नहीं सुन सकते, क्योंकि वहाँ लगभग निर्वात होता है।
10.3 ध्वनि तरंगें
ध्वनि का संचरण माध्यम के कणों के कंपन के कारण होता है।
ध्वनि के संचरण में माध्यम के कण अपने स्थान से बहुत दूर नहीं जाते। वे अपनी माध्य स्थिति के इधर-उधर कंपन करते हैं।
ध्वनि के रूप में ऊर्जा एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचती है, लेकिन माध्यम के कण स्वयं ध्वनि के साथ आगे नहीं बढ़ते।
संपीडन और विरलन
जब कोई पिस्टन वायु से भरी नली में आगे की ओर गति करता है, तो वह अपने सामने के वायु कणों को पास-पास कर देता है।
इससे उच्च घनत्व वाला क्षेत्र बनता है, जिसे संपीडन (Compression) कहते हैं।
इसे C से दर्शाया जाता है।
जब पिस्टन पीछे की ओर गति करता है, तो वायु कणों के बीच दूरी बढ़ जाती है।
इससे निम्न घनत्व वाला क्षेत्र बनता है, जिसे विरलन (Rarefaction) कहते हैं।
इसे R से दर्शाया जाता है।
पिस्टन के आगे-पीछे दोलन करने पर क्रमशः—
संपीडन → विरलन → संपीडन → विरलन
उत्पन्न होते हैं।
संपीडन और विरलन की यह श्रृंखला माध्यम में आगे बढ़ती है।
ध्वनि तरंग की परिभाषा
माध्यम के कणों के वास्तविक संचरण के बिना क्रमिक रूप से संचरित होने वाले संपीडनों और विरलनों की श्रृंखला को ध्वनि तरंग कहते हैं।
जिस दिशा में तरंग गमन करती है, उसे तरंग के संचरण की दिशा कहते हैं।
महत्वपूर्ण बात
माध्यम के कण तरंग के साथ आगे नहीं बढ़ते। वे केवल अपनी माध्य स्थिति के इधर-उधर कंपन करते हैं।
ध्वनि तरंगों की प्रकृति
ध्वनि एक अनुदैर्ध्य तरंग है
ध्वनि तरंग में माध्यम के कण तरंग के संचरण की दिशा के समानांतर आगे-पीछे कंपन करते हैं।
इस प्रकार की तरंग को अनुदैर्ध्य तरंग कहते हैं।
ध्वनि एक यांत्रिक तरंग है
जिन तरंगों के संचरण के लिए भौतिक माध्यम की आवश्यकता होती है, उन्हें यांत्रिक तरंगें कहते हैं।
क्योंकि ध्वनि के संचरण के लिए माध्यम आवश्यक है, इसलिए:
ध्वनि एक यांत्रिक तरंग है।
ध्वनि और अन्य तरंगों में अंतर
यांत्रिक तरंगें दो प्रकार की होती हैं—
- अनुदैर्ध्य तरंगें
- अनुप्रस्थ तरंगें
ध्वनि एक अनुदैर्ध्य तरंग है।
इसके विपरीत प्रकाश एक अनुप्रस्थ तरंग है और निर्वात में भी संचरित हो सकता है।
ध्वनि तरंगों की ऊर्जा
ध्वनि ऊर्जा का एक रूप है।
जब ध्वनि स्रोत कंपन करता है, तो वह अपने आसपास के माध्यम को ऊर्जा प्रदान करता है।
माध्यम के कण कंपन करते हैं और अपने पास के अन्य कणों से टकराकर ऊर्जा को आगे स्थानांतरित करते हैं।
इस प्रकार:
ध्वनि तरंगों के संचरण में ऊर्जा का स्थानांतरण होता है, माध्यम के कणों का नहीं।
माइक्रोफोन
माइक्रोफोन ध्वनि ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है।
जब हम माइक्रोफोन के सामने बोलते या गाते हैं—
- ध्वनि तरंगें माइक्रोफोन की पतली झिल्ली पर पड़ती हैं।
- झिल्ली कंपन करने लगती है।
- ये कंपन विद्युत संकेतों में बदल जाते हैं।
स्पीकर
स्पीकर माइक्रोफोन के विपरीत कार्य करता है।
- विद्युत संकेत स्पीकर के भीतर की झिल्ली या शंकु को कंपन कराते हैं।
- इन कंपनों से ध्वनि उत्पन्न होती है।
यदि सभी उपकरण ठीक से कार्य करें, तो स्पीकर से निकलने वाली ध्वनि मूल ध्वनि के समान होती है।
10.5 ध्वनि तरंग का आलेखीय निरूपण
ध्वनि तरंग के संचरण के समय माध्यम का घनत्व स्रोत से दूरी के साथ बदलता रहता है।
- संपीडन के क्षेत्र में घनत्व औसत घनत्व से अधिक होता है।
- विरलन के क्षेत्र में घनत्व औसत घनत्व से कम होता है।
आलेख में—
- अधिकतम घनत्व को शिखर (Crest) कहा जाता है।
- न्यूनतम घनत्व को गर्त (Trough) कहा जाता है।
ध्वनि तरंग के संचरण में ऊर्जा का स्थानांतरण होता है, लेकिन माध्यम के कण तरंग के साथ आगे नहीं बढ़ते।
10.6 ध्वनि तरंग के अभिलक्षण
ध्वनि तरंग के मुख्य अभिलक्षण हैं—
- तरंगदैर्घ्य
- आवृत्ति
- आवर्तकाल
- आयाम
- ध्वनि की तीव्रता
- ध्वनि की चाल
10.6.1 तरंगदैर्घ्य, आवृत्ति और आवर्तकाल
1. तरंगदैर्घ्य (Wavelength)
दो क्रमागत शिखरों या दो क्रमागत गर्तों के बीच की दूरी को तरंगदैर्घ्य कहते हैं।
इसे λ (लैम्ब्डा) से दर्शाया जाता है।
SI मात्रक
मीटर (m)
2. आवृत्ति (Frequency)
किसी निश्चित बिंदु पर प्रति इकाई समय में होने वाले पूर्ण दोलनों की संख्या को आवृत्ति कहते हैं।
इसे सामान्यतः ν (न्यू) से दर्शाया जाता है।
SI मात्रक
हर्ट्ज (Hz)
1 Hz का अर्थ है—प्रति सेकंड 1 दोलन।
सूत्र
आवृत्ति = दोलनों की संख्या / लिया गया समय
3. आवर्तकाल (Time Period)
किसी निश्चित बिंदु पर एक पूर्ण दोलन पूरा करने में लगने वाले समय को आवर्तकाल कहते हैं।
इसे T से दर्शाया जाता है।
SI मात्रक
सेकंड (s)
आवृत्ति और आवर्तकाल एक-दूसरे के व्युत्क्रम होते हैं।
सूत्र
T = 1/ν
अर्थात्—
- आवर्तकाल कम → आवृत्ति अधिक
- आवर्तकाल अधिक → आवृत्ति कम
10.6.2 ध्वनि तरंगों का आयाम और तीव्रता
आयाम
ध्वनि तरंग का आयाम संपीडन या विरलन में वायु के घनत्व में औसत घनत्व की तुलना में होने वाला अधिकतम परिवर्तन है।
यदि घनत्व में परिवर्तन अधिक है, तो तरंग का आयाम भी अधिक होता है।
आयाम और ऊर्जा
- अधिक आयाम वाली तरंग अधिक ऊर्जा वहन करती है।
- कम आयाम वाली तरंग कम ऊर्जा वहन करती है।
इसलिए जब किसी धातु की प्लेट पर अधिक शक्ति से प्रहार किया जाता है, तो उसमें अधिक आयाम के कंपन उत्पन्न होते हैं और अधिक ऊर्जा माध्यम में
स्थानांतरित होती है।
ध्वनि की तीव्रता
ध्वनि के संचरण की दिशा के लंबवत एकांक क्षेत्रफल से एकांक समय में संचरित ध्वनि ऊर्जा की मात्रा को ध्वनि की तीव्रता कहते हैं।
जब ध्वनि स्रोत से दूरी बढ़ती है, तो ध्वनि अधिक बड़े क्षेत्र में फैलती जाती है।
इसलिए स्रोत से दूरी बढ़ने पर ध्वनि की तीव्रता कम होती जाती है।
10.6.3 ध्वनि की चाल
ध्वनि की चाल यह बताती है कि ध्वनि तरंगें किसी माध्यम में कितनी तेजी से संचरित होती हैं।
ध्वनि की चाल माध्यम के अनुसार बदलती है।
सामान्य रूप से—
ठोसों में ध्वनि की चाल सबसे अधिक होती है।
वायु में ध्वनि की चाल तापमान और आर्द्रता पर भी निर्भर करती है।
तापमान या आर्द्रता बढ़ने पर वायु में ध्वनि की चाल बढ़ती है।
PDF में दिए गए उदाहरण के अनुसार—
- 0°C पर शुष्क वायु में ध्वनि की चाल लगभग 331 m/s
- 22°C पर ध्वनि की चाल लगभग 344 m/s
होती है।
किसी माध्यम में ध्वनि की चाल सामान्यतः ध्वनि स्रोत या आवृत्ति पर निर्भर नहीं करती।
यदि स्रोत की आवृत्ति बदलती है, तो उसी माध्यम में तरंगदैर्घ्य बदल सकता है, लेकिन ध्वनि की चाल स्थिर रह सकती है।
10.6.4 मानव द्वारा ध्वनि-बोध
ध्वनि के भौतिक गुण जैसे—
- आवर्तकाल
- तरंगदैर्घ्य
- आवृत्ति
- आयाम
- चाल
मापे जा सकते हैं।
लेकिन ध्वनि का अनुभव व्यक्ति के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
ध्वनि के मानवीय बोध का वर्णन मुख्य रूप से निम्न शब्दों से किया जाता है—
- तारत्व
- प्रबलता
तारत्व (Pitch)
ध्वनि की आवृत्ति का मानवीय बोध तारत्व कहलाता है।
उच्च तारत्व
अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि सामान्यतः अधिक तीक्ष्ण या कर्णभेदी लगती है।
उदाहरण:
- सीटी की ध्वनि
- सायरन की ध्वनि
निम्न तारत्व
कम आवृत्ति वाली ध्वनि अधिक गंभीर या भारी लगती है।
पुरुष, महिला और बच्चों की आवाजों में तारत्व अलग-अलग हो सकता है।
किशोरावस्था में लड़कों की वाक् तंत्रियाँ लंबी और मोटी हो जाती हैं। वे सामान्यतः कम कंपन करती हैं, इसलिए उनकी आवाज में अधिक गहराई आ जाती है।
प्रबलता (Loudness)
मनुष्य को ध्वनि तरंगों के आयाम का जो अनुभव होता है, उसे ध्वनि की प्रबलता कहते हैं।
- अधिक आयाम → अधिक तेज ध्वनि
- कम आयाम → धीमी ध्वनि
ध्वनि स्रोत से दूर जाने पर ध्वनि की प्रबलता कम होती जाती है।
प्रबलता और तीव्रता में अंतर
- तीव्रता एक मापने योग्य भौतिक राशि है।
- प्रबलता श्रोता की सुनने की क्षमता पर निर्भर करती है।
ध्वनि की प्रबलता सामान्यतः डेसिबेल (dB) में मापी जाती है।
मानव श्रवण सीमा
मनुष्य सामान्यतः लगभग:
20 Hz से 20 kHz
तक की ध्वनियाँ सुन सकता है।
अवश्रव्य तरंगें
20 Hz से कम आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को अवश्रव्य तरंगें कहते हैं।
कुछ जीव, जैसे हाथी, ऐसी ध्वनियाँ सुन सकते हैं।
पराश्रव्य तरंगें
20 kHz से अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को पराश्रव्य तरंगें कहते हैं।
कुछ जीव, जैसे—
- चमगादड़
- डॉल्फिन
पराश्रव्य तरंगों को सुन सकते हैं।
10.7 ध्वनि का परावर्तन
जब ध्वनि तरंगें किसी ठोस या द्रव जैसी बाधा से टकराकर वापस लौटती हैं, तो इस घटना को ध्वनि का परावर्तन कहते हैं।
ध्वनि परावर्तन में वही नियम लागू होते हैं जो प्रकाश के परावर्तन में होते हैं।
ध्वनि के परावर्तन के समय—
- आपतित ध्वनि
- अभिलंब
- परावर्तित ध्वनि
एक ही तल में होते हैं।
ध्वनि के परावर्तन का सबसे सामान्य उदाहरण प्रतिध्वनि है।
10.7.1 प्रतिध्वनि (Echo)
जब ध्वनि किसी दूर स्थित कठोर सतह से टकराकर वापस लौटती है और कुछ समय बाद वही ध्वनि फिर सुनाई देती है, तो इसे प्रतिध्वनि कहते हैं।
उदाहरण
- पर्वत के पास चिल्लाना
- खड़ी चट्टान के पास आवाज लगाना
- लंबे मार्ग या बड़े स्थान में ध्वनि का लौटना
यदि मूल ध्वनि और परावर्तित ध्वनि के बीच कम से कम 0.1 सेकंड का समय अंतराल हो, तो दोनों ध्वनियाँ अलग-अलग सुनाई देती हैं।
यदि समय अंतराल इससे कम हो, तो मस्तिष्क दोनों ध्वनियों को अलग-अलग पहचान नहीं पाता।
10.8 ध्वनि तरंगों के अनुप्रयोग
ध्वनि तरंगों का उपयोग अनेक क्षेत्रों में किया जाता है।
1. प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण
कुछ जीव ध्वनि के परावर्तन का उपयोग अपने आसपास की वस्तुओं का पता लगाने के लिए करते हैं।
इस क्षमता को प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण (Echolocation) कहते हैं।
चमगादड़
चमगादड़ अंधेरे में उड़ते हुए—
- पराश्रव्य तरंगें उत्पन्न करते हैं।
- ये तरंगें आसपास की वस्तुओं या शिकार से टकराकर वापस लौटती हैं।
- चमगादड़ लौटने वाली प्रतिध्वनि का अनुभव करते हैं।
- इससे उन्हें बाधाओं और शिकार की स्थिति का पता चलता है।
डॉल्फिन, व्हेल और कुछ पक्षी भी दिशा-निर्धारण तथा शिकार के लिए प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण का उपयोग करते हैं।
2. सोनार (SONAR)
मनुष्यों ने प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण के सिद्धांत का उपयोग जल के भीतर वस्तुओं का पता लगाने के लिए सोनार में किया है।
SONAR का पूरा नाम है:
Sound Navigation and Ranging
सोनार की कार्यप्रणाली
- जहाज से पराश्रव्य तरंगें जल में भेजी जाती हैं।
- ये तरंगें जल के भीतर किसी वस्तु से टकराती हैं।
- परावर्तित तरंगें वापस आती हैं।
- लौटने वाली तरंगों का विश्लेषण किया जाता है।
- इससे जल के भीतर वस्तु की स्थिति और दूरी का पता लगाया जाता है।
सोनार का उपयोग—
- पनडुब्बियों का पता लगाने में
- जहाजों के अवशेषों का पता लगाने में
- जल के भीतर स्थित वस्तुओं का स्थान ज्ञात करने में
किया जाता है।
3. पराश्रव्य तरंगों के अन्य उपयोग
पराश्रव्य तरंगों का उपयोग निम्न क्षेत्रों में किया जाता है—
- अल्ट्रासोनिक वेल्डिंग
- संवेदनशील मशीनों के भागों की सफाई
- औद्योगिक परीक्षण
- धातु के अंदर छिपे दोषों का पता लगाने
- ध्वनि तरंगों के परावर्तन द्वारा वस्तुओं का स्थान ज्ञात करने
में।
अध्याय का संक्षिप्त सार
- ध्वनि कंपन करने वाली वस्तुओं द्वारा उत्पन्न होती है।
- ध्वनि के संचरण के लिए माध्यम आवश्यक है।
- ध्वनि ठोस, द्रव और गैसों में संचरित हो सकती है।
- ध्वनि निर्वात में संचरित नहीं हो सकती।
- ध्वनि एक यांत्रिक और अनुदैर्ध्य तरंग है।
- ध्वनि के संचरण में ऊर्जा का स्थानांतरण होता है, माध्यम के कणों का नहीं।
- ध्वनि तरंग संपीडन और विरलन के रूप में संचरित होती है।
- तरंगदैर्घ्य दो क्रमागत शिखरों या गर्तों के बीच की दूरी है।
- आवृत्ति प्रति सेकंड होने वाले पूर्ण दोलनों की संख्या है।
- आवर्तकाल एक पूर्ण दोलन में लगा समय है।
- आवृत्ति और आवर्तकाल एक-दूसरे के व्युत्क्रम हैं।
- अधिक आयाम वाली ध्वनि अधिक ऊर्जा वहन करती है।
- ध्वनि की तीव्रता दूरी बढ़ने पर कम होती है।
- ध्वनि की चाल माध्यम पर निर्भर करती है।
- तारत्व ध्वनि की आवृत्ति का मानवीय बोध है।
- प्रबलता ध्वनि के आयाम का मानवीय बोध है।
- मनुष्य की श्रवण सीमा लगभग 20 Hz से 20 kHz है।
- 20 Hz से कम ध्वनियाँ अवश्रव्य कहलाती हैं।
- 20 kHz से अधिक ध्वनियाँ पराश्रव्य कहलाती हैं।
- ध्वनि किसी बाधा से टकराकर परावर्तित हो सकती है।
- परावर्तित ध्वनि को उचित समय अंतराल पर प्रतिध्वनि के रूप में सुना जा सकता है।
- चमगादड़ और डॉल्फिन प्रतिध्वनि द्वारा स्थान निर्धारण का उपयोग करते हैं।
- सोनार पराश्रव्य तरंगों और उनके परावर्तन पर आधारित है।

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