जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण
भूमिका — जैव विविधता क्या है?
पृथ्वी पर जीवों के असंख्य रूप और प्रकार पाए जाते हैं — सूक्ष्मदर्शी जीवों से लेकर विशाल वृक्षों तक। इस असीम विविधता को ही ‘जैव विविधता’ (Biodiversity) कहते हैं।
मुख्य बिंदु:
- जैव विविधता पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।
- महासागरों के सूक्ष्मदर्शी शैवाल अधिकांश ऑक्सीजन बनाते हैं।
- कवक और जीवाणु मृत पत्तियों को अपघटित करके मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं।
- पक्षी, मधुमक्खी और चमगादड़ परागण में मदद करते हैं।
- मानव भोजन, आवास, दवा और आजीविका के लिए जैव विविधता पर निर्भर है।
- किसान सूखा-सहनशील, कीट-प्रतिरोधी फसलों की विविध किस्मों को संरक्षित करते आए हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा बढ़ती है।
जीवों में समानताएँ और असमानताएँ दोनों होती हैं। इन गुणों और विकासीय संबंधों के आधार पर जीवों को समूहों में बाँटना ही ‘वर्गीकरण’ कहलाता है।
12.1 जैव विविधता हॉटस्पॉट के रूप में भारत
भारत के प्राकृतिक भूदृश्य में बहुत विविधता है — उत्तर में पर्वत, पश्चिम में मरुस्थल, पूर्वोत्तर में वर्षावन, दक्षिण में पठार तथा लंबी तटरेखाएँ। हर क्षेत्र की मिट्टी और जलवायु अलग-अलग है, इसलिए अलग-अलग जातियाँ वहाँ पाई जाती हैं।
स्थानिक (Endemic) जातियाँ ऐसी जातियाँ जो विश्व के केवल किसी एक विशेष क्षेत्र में ही पाई जाती हैं, अन्यत्र प्राकृतिक रूप से नहीं मिलतीं। उदाहरण — नीलगिरी तहर, सिंहपुच्छी वानर (लायन टेल्ड मकाक), नेपेन्थिस खासियाना (घटपर्णी पौधा), नीलकुरिंजी — ये केवल भारत में पाए जाते हैं।
जैव विविधता हॉटस्पॉट ऐसे क्षेत्र जो बड़ी संख्या में स्थानिक जातियों को आश्रय देते हैं और जहाँ पर्यावास की अत्यधिक क्षति हुई है, ‘हॉटस्पॉट’ कहलाते हैं। उदाहरण — पश्चिमी घाट, इंडो-बर्मा (पूर्वोत्तर भारत सहित), हिमालय, सुंदरलैंड (निकोबार द्वीप समूह सहित)।
12.2 जैव विविधता का विकास कैसे हुआ?
वर्तमान की विविधता लंबे समय तक निरंतर होने वाले परिवर्तनों का परिणाम है, जो जीवों और उनके पर्यावरण के बीच पारस्परिक क्रियाओं से बनी है। इस विविधता का व्यवस्थित अध्ययन वर्गीकरण द्वारा ही संभव है।
विज्ञान में भारत का योगदान: संगम तिनाई द्वारा भूदृश्यों का वर्गीकरण और पवित्र उपवनों का संरक्षण जैसी प्राचीन भारतीय परंपराएँ स्थानीय स्तर पर पर्यावासों को प्रभावी ढंग से संरक्षित करती रही हैं, जो आधुनिक पारिस्थितिकी सिद्धांतों से मेल खाती हैं।
12.3 जीवों का वर्गीकरण कैसे करें?
वैज्ञानिक पहले आसानी से दिखने वाली बाहरी विशेषताओं को देखते हैं, फिर विस्तृत विशेषताओं का अध्ययन करते हैं। एक ही जीव को अलग-अलग मानदंड चुनने पर अलग-अलग समूहों में रखा जा सकता है।
12.3.1 वर्गीकरण के मानदंड (Criteria)
- बाह्य विशेषताएँ — आकार, आमाप और शारीरिक संगठन।
- पोषण की विधि — स्वपोषी (खुद भोजन बनाने वाले) अथवा विषमपोषी (दूसरों पर निर्भर)।
- आंतरिक संरचनाएँ — कंकाल, अंगों की उपस्थिति/अनुपस्थिति, ऊतकों के प्रकार।
- कोशिका संरचना — एककोशिकीय/बहुकोशिकीय, सुकेंद्रकी/पूर्वकेंद्रकी, कोशिका भित्ति उपस्थित/अनुपस्थित।
- पारिस्थितिकीय भूमिका — उत्पादक, उपभोक्ता या अपघटक।
- जनन — अलैंगिक और/अथवा लैंगिक विधि।
- आनुवंशिक समानता — DNA के आधार पर वंशगत गुणों की समानता।
समान विशेषताएँ यह दर्शाती हैं कि जीव एक ही पूर्वज से विकसित हुए हैं।
12.4 वर्गीकरण की आवश्यकता
जैसे किसी बड़े पुस्तकालय में पुस्तकों को विषय/लेखक के आधार पर व्यवस्थित न किया जाए तो पुस्तक ढूँढना कठिन होगा, वैसे ही पृथ्वी पर करोड़ों जीवों को समझने के लिए क्रमबद्ध वर्गीकरण आवश्यक है।
जैविक वर्गीकरण के लाभ:
- यह सजीवों के अध्ययन को अधिक व्यवस्थित और क्रमबद्ध बनाता है।
- जीवों के बीच संबंध समझने में सहायता करता है।
- विश्व के सभी वैज्ञानिकों के लिए एक समान प्रणाली उपलब्ध कराता है, जिससे जीवों पर चर्चा सरल होती है।
उदाहरण (पक्के बाघ अभयारण्य, अरुणाचल प्रदेश): यहाँ पक्षियों की लगभग 300 जातियाँ मिलती हैं, जिनमें 4 प्रकार के धनेश (hornbill) पक्षी भी शामिल हैं — लाल गर्दन वाला धनेश, श्वेत-श्याम धनेश, महाधनेश और मोरछली धनेश। ये वृक्षों के आकार और फलों की उपलब्धता के आधार पर वन के अलग-अलग भागों में पाए जाते हैं।
12.5 समय के साथ विकसित वर्गीकरण प्रणालियाँ
- अरस्तू (लगभग चौथी शताब्दी ई.पू.) — जीवों को पर्यावास (भूमि, जल, वायु) और बाहरी स्वरूप के आधार पर समूहित किया। सीमा — केवल दिखने वाली विशेषताओं पर आधारित थी।
- द्विजगत प्रणाली (18वीं शताब्दी) — जीवों को प्लांटी (पादप जगत) और एनिमेलिया (जंतु जगत) में बाँटा। समस्या — अमीबा, पैरामीशियम, जीवाणु जैसे जीवों को कहाँ रखें, यह स्पष्ट नहीं था।
- तीसरा जगत ‘प्रोटिस्टा’ जोड़ा गया — इसमें एककोशिकीय सूक्ष्मजीवों को रखा गया।
- चार जगत प्रणाली — सूक्ष्मदर्शी में सुधार से पता चला कि अमीबा में झिल्ली-आबद्ध केंद्रक होता है पर जीवाणु में नहीं। इसलिए जीवाणुओं को अलग जगत ‘मोनेरा’ में रखा गया। अब चार जगत बने — प्लांटी, एनिमेलिया, प्रोटिस्टा, मोनेरा।
- कवक (फंजाई) के लिए अलग जगत — मशरूम जैसे कवक पौधों की तरह स्थिर रहते हैं परंतु विषमपोषी होते हैं (अवशोषण द्वारा पोषण लेते हैं, कुछ सहजीवी व कुछ परजीवी)। इसलिए कवकों को अलग जगत ‘फंजाई’ में रखा गया।
12.6 पाँच जगत वर्गीकरण (Whittaker)
मुख्य मानदंड:
- कोशिका प्रकार — पूर्वकेंद्रकी अथवा सुकेंद्रकी
- कोशिका संरचना — कोशिका भित्ति उपस्थित अथवा अनुपस्थित
- संगठन का स्तर — एककोशिकीय अथवा बहुकोशिकीय
- पोषण की विधि — स्वपोषी अथवा विषमपोषी
12.6.1 जगत मोनेरा — एककोशिकीय पूर्वकेंद्री जीव
उदाहरण — जीवाणु और नील-हरित शैवाल (साइनोबैक्टीरिया)। ये मिट्टी, जल, वायु, उष्ण स्रोत जैसी चरम परिस्थितियों में तथा मानव शरीर के भीतर भी पाए जाते हैं।
- कुछ जीवाणु हानिकारक (रोगजनक) होते हैं, कुछ लाभदायक — जैसे लैक्टोबैसिलस और राइजोबियम।
- नील-हरित शैवाल स्वपोषी और अपघटक होते हैं।
- कुछ जीवाणु तेल, कीटनाशक, वाहित मल जैसे प्रदूषकों को भी विघटित करते हैं।
ज्ञानसूत्र: सायनोबैक्टीरिया ने प्रकाश-संश्लेषण द्वारा सबसे पहले ऑक्सीजन बनाई थी। लगभग 2.5 अरब वर्ष पहले वायुमंडल में ऑक्सीजन जमा हुई। इनके प्राचीन जीवाश्म ‘स्ट्रोमेटोलाइट्स’ राजस्थान और मध्य प्रदेश में मिले हैं।
12.6.2 जगत प्रोटिस्टा
इसमें एककोशिकीय सुकेंद्रकी जीव आते हैं जो जल या नम स्थानों में रहते हैं — जैसे अमीबा, पैरामीशियम, क्लैमाइडोमोनास, यूग्लीना। कुछ स्वपोषी होते हैं, कुछ विषमपोषी। ये जलीय आहार श्रृंखलाओं में महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं — कुछ ऑक्सीजन बनाते हैं, कुछ छोटे जीवों का भोजन बनते हैं, कुछ अपघटक का कार्य करते हैं।
12.6.3 जगत फंजाई (कवक)
ये प्रायः बहुकोशिकीय सुकेंद्रकी जीव हैं जिनकी कोशिका भित्ति ‘काइटिन’ की बनी होती है। ये अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते, मृत/सड़े पदार्थों से पोषक तत्व अवशोषित करते हैं (महीन तंतु मिलकर ‘कवक जाल’ या माइसीलियम बनाते हैं)।
- अधिकांश कवक मृतपोषी (saprophyte) होते हैं — मृत कार्बनिक पदार्थ खाते हैं और अपघटक की भूमिका निभाते हैं।
- कुछ कवक सहजीवी, कुछ परजीवी होते हैं (पौधों और जंतुओं में रोग फैलाते हैं)।
- बीजाणु द्वारा लैंगिक और अलैंगिक दोनों प्रकार से जनन करते हैं; गर्म व नम स्थान में अच्छी वृद्धि करते हैं।
- उदाहरण — यीस्ट, ब्रेड मोल्ड (डबलरोटी की फफूंद), मशरूम, ऐस्पजिल्लस।
नोट: यीस्ट एककोशिकीय होते हुए भी काइटिन की कोशिका भित्ति के कारण फंजाई जगत में रखा जाता है।
12.6.4 जगत प्लांटी (पादप जगत)
पादप बहुकोशिकीय, स्वपोषी जीव हैं जो प्रकाश संश्लेषण करते हैं। इनकी कोशिका भित्ति मुख्यतः सेल्युलोस की बनी होती है, जो अवलंब और सुरक्षा देती है। जगत प्लांटी को 5 वर्गों में बाँटा गया है:
| वर्ग | मुख्य विशेषताएँ | उदाहरण |
|---|---|---|
| थैलोफाइटा (शैवाल) |
| स्पाइरोगायरा |
| ब्रायोफाइटा |
| मॉस, लिवरवर्ट |
| टेरिडोफाइटा |
| फर्न |
| जिम्नोस्पर्म (अनावृतबीजी) |
| चीड़ |
| एंजियोस्पर्म (आवृतबीजी) |
| गुलाब, घास |
लाइकेन — यह शैवाल (स्वपोषी) और कवक (विषमपोषी) का सहजीवी संबंध है। कवक सुरक्षा देता है, शैवाल भोजन बनाता है। लाइकेन वायु प्रदूषण के प्राकृतिक सूचक (bioindicator) होते हैं — प्रदूषण के अनुसार इनका रंग बदलता है।
12.6.5 जगत एनिमेलिया (जंतु जगत)
जंतु बहुकोशिकीय, विषमपोषी सुकेंद्रकी जीव हैं जो भोजन के लिए दूसरे जीवों पर निर्भर रहते हैं। वर्गीकरण का मुख्य आधार है — ‘पृष्ठरज्जु’ (notochord, एक लचीली छड़ाकार संरचना) की उपस्थिति या अनुपस्थिति।
- नॉन-कॉर्डेटा (अकशेरुकी) — पृष्ठरज्जु रहित जीव
- कॉर्डेटा (कशेरुकी) — पृष्ठरज्जु सहित जीव; आगे प्रोटोकॉर्डेटा और वर्टीब्रेटा में बाँटे गए
नॉन-कॉर्डेटा (अकशेरुकी जीव) के संघ:
| संघ | पर्यावास | संगठन स्तर | मुख्य विशेषताएँ | उदाहरण |
|---|---|---|---|---|
| पोरीफेरा | जल (समुद्री) | कोशिकीय |
| स्पंज |
| नाइडेरिया | जल (अलवण एवं समुद्री) | ऊतक |
| हाइड्रा, जेलीफिश, कोरल |
| प्लेटीहेल्मिन्थीस | जल / परपोषी के अंदर | अंग |
| फीताकृमि |
| नेमेटोडा | मृदा / जल / परपोषी के अंदर | अंग तंत्र (पाचन तंत्र) |
| गोलकृमि |
| एनेलिडा | नम मिट्टी / जल | अंग तंत्र |
| केंचुआ |
| आर्थ्रोपोडा | भूमि / जल | अंग तंत्र |
| कीट, केकड़ा, मकड़ी |
| मोलस्का | जल / नम भूमि | अंग तंत्र |
| घोंघा, स्क्विड, ऑक्टोपस |
| एकाइनोडर्मेटा | समुद्री जल | अंग तंत्र |
| स्टारफिश, समुद्री अर्चिन |
कॉर्डेटा (कशेरुकी जीव):
- प्रोटोकॉर्डेटा — जीवन की किसी अवस्था में पृष्ठरज्जु उपस्थित (उदाहरण — एम्फिऑक्सस); ये सरल से जटिल कॉर्डेट में विकास को दर्शाते हैं।
- वर्टीब्रेटा — कशेरुक दंड (रीढ़ की हड्डी) युक्त; यह अंतःकंकाल शरीर को सहारा देता है और मस्तिष्क-मेरुरज्जु की रक्षा करता है। इन्हें 5 समूहों में बाँटा गया है — मत्स्य (Pisces), उभयचर (Amphibia), सरीसृप (Reptilia), पक्षी (Aves), स्तनधारी (Mammalia)।
12.7 अनुकूलन — संरचनात्मक परिवर्तनों के परिणाम
शरीर की संरचना में लंबे समय में हुए परिवर्तन ही आज की विविधता का कारण हैं।
- मछलियों में पंख व क्लोम — तैरने और साँस लेने में सहायक।
- पक्षियों में पंख व खोखली हड्डियाँ — उड़ने में सहायक।
- व्हेल में वसा का संचय, ध्रुवीय भालू में मोटा फर — चरम ठंड में जीवित रहने में सहायक।
- मादा स्तनधारियों में स्तन ग्रंथियाँ — शिशुओं की उत्तरजीविता बढ़ाती हैं।
12.8 वैज्ञानिक नामकरण — द्विनाम पद्धति (Binomial Nomenclature)
एक ही जंतु के अलग-अलग भाषाओं में अलग नाम होने से भ्रम होता है (जैसे टाइगर — हिंदी में बाघ, तमिल में पुलि, अंग्रेजी में Tiger)। इस भ्रम से बचने के लिए कैरोलस लिनियस ने 18वीं शताब्दी में ‘द्विनाम पद्धति’ दी।
इसमें हर जीव का वैज्ञानिक नाम दो भागों में लैटिन भाषा में लिखा जाता है — पहला भाग ‘वंश’ (Genus) और दूसरा भाग ‘जाति’ (Species) का नाम।
| सामान्य नाम | वैज्ञानिक नाम |
|---|---|
| बाघ | पेंथेरा टाइग्रिस (Panthera tigris) |
| आम | मैंजीफेरा इंडिका (Mangifera indica) |
वैज्ञानिक नाम लिखने के नियम:
- प्रत्येक वैज्ञानिक नाम के दो भाग होते हैं — वंश और जाति।
- वंश का नाम पहले लिखा जाता है, इसका पहला अक्षर बड़ा (Capital) होता है; जाति का नाम छोटे अक्षरों में लिखा जाता है।
- वैज्ञानिक नाम तिरछे (italics) अक्षरों में लिखा जाता है; हाथ से लिखते समय इसे रेखांकित किया जाता है।
वर्गीकरण पदानुक्रम (Hierarchy) के उदाहरण
| स्तर | बाघ | मटर का पौधा |
|---|---|---|
| जगत | एनिमेलिया | प्लांटी |
| संघ | कॉर्डेटा | मैग्नोलियोफाइटा |
| उपसंघ / वर्ग | वर्टीब्रेटा → मैमेलिया | मैग्नोलियोप्सिडा |
| गण | कार्निवोरा | फैबेलिस |
| कुल | फेलिडी | फैबेसी |
| वंश | पेंथेरा | पाइसम |
| जाति | पी. टाइग्रिस | पाइसम सेटाइवम |
जीवों के तीन डोमेन (Three Domains of Life): बैक्टीरिया, आर्किया और यूकेरिया — यह एक और अधिक आधुनिक वर्गीकरण स्तर है जो पाँच जगत से भी एक कदम ऊपर आता है, जिसे आनुवंशिक (DNA) अनुसंधान की प्रगति के बाद जोड़ा गया।
12.9 जीवाश्म — प्रमाण के रूप में
जीवाश्म (Fossils) पादपों और जंतुओं के परिरक्षित अवशेष हैं जो चट्टानों, रेत और मिट्टी की परतों में दबे मिलते हैं। पुरानी परतों में साधारण जीव और नई परतों में अधिक जटिल जीव मिलते हैं। जीवाश्म यह समझने में मदद करते हैं कि करोड़ों वर्षों में जीवन में क्या-क्या परिवर्तन हुए।
वैज्ञानिक बीरबल साहनी ने जीवाश्म पादपों का अध्ययन किया और लखनऊ में ‘बीरबल साहनी जीवाश्म विज्ञान संस्थान (बी.एस.आई.पी.)’ की स्थापना की।
12.10 जैव विविधता पर मंडराता खतरा
हर जाति चाहे छोटी हो या बड़ी, प्रकृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है — पौधे भोजन व ऑक्सीजन बनाते हैं, जंतु परागण व बीज प्रकीर्णन करते हैं, सूक्ष्मजीव पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण करते हैं।
जैव विविधता के ह्रास के कारण:
- प्रदूषण
- वनों की कटाई
- संसाधनों का अत्यधिक उपयोग
- जलवायु परिवर्तन
जब कोई एक जाति विलुप्त होती है तो उस पर निर्भर अन्य जातियाँ भी धीरे-धीरे कम होकर विलुप्त हो सकती हैं।
सारांश (Summary)
- पृथ्वी पर जीवन सरल जीवाणुओं से लेकर जटिल जंतुओं तक अनेक रूपों में पाया जाता है।
- वैज्ञानिक जीवों का वर्गीकरण कोशिका संरचना, कोशिकाओं की संख्या, पोषण की विधि और पारिस्थितिकीय भूमिका के आधार पर करते हैं।
- विट्टेकर की पाँच-जगत वर्गीकरण प्रणाली — मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी और एनिमेलिया — जैव विविधता को समझने की एक सरल व उपयोगी प्रणाली है।
- जगत प्लांटी को 5 वर्गों में बाँटा गया है — थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म, एंजियोस्पर्म।
- जगत एनिमेलिया को पृष्ठरज्जु के आधार पर नॉन-कॉर्डेटा (अकशेरुकी) और कॉर्डेटा (कशेरुकी) में बाँटा गया है। नॉन-कॉर्डेटा को आगे 8 संघों में बाँटा गया है — पोरीफेरा, नाइडेरिया, प्लेटीहेल्मिन्थीस, नेमेटोडा, एनेलिडा, आर्थ्रोपोडा, मोलस्का व एकाइनोडर्मेटा।
- प्रोटोकॉर्डेटा अकशेरुकी से कशेरुकी जीवों की ओर परिवर्तन को दर्शाते हैं। कशेरुकी जीवों को आगे मत्स्य, उभयचर, सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी में बाँटा गया है।
- वैज्ञानिक नामकरण की द्विनाम पद्धति (कैरोलस लिनियस द्वारा) से जीवों को सार्वभौमिक वैज्ञानिक नाम मिलता है।
- जीवाश्म समय के साथ जैव विविधता में हुए परिवर्तन के प्रमाण देते हैं।
- मानवीय गतिविधियों (प्रदूषण, वनों की कटाई) और जलवायु परिवर्तन के कारण जैव विविधता को खतरा है।

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