एक यात्रा — परमाणु के भीतर
1. परमाणु की अवधारणा
हमारे आसपास की सभी वस्तुएँ द्रव्य से बनी हैं। द्रव्य बहुत छोटे-छोटे कणों से बना होता है जिन्हें परमाणु कहा जाता है।
परमाणु इतने सूक्ष्म होते हैं कि उन्हें नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता।
वैज्ञानिकों ने लंबे समय तक यह जानने का प्रयास किया कि:
- क्या परमाणु द्रव्य की सबसे छोटी इकाई है?
- क्या परमाणु को और छोटे कणों में बाँटा जा सकता है?
- परमाणु किन कणों से मिलकर बना है?
- परमाणु के अंदर ये कण किस प्रकार व्यवस्थित होते हैं?
इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजते-खोजते परमाणु की संरचना की आधुनिक समझ विकसित हुई।
2. परमाणु सिद्धांत की उत्पत्ति
आचार्य कणाद
प्राचीन भारत में आचार्य कणाद ने विचार दिया कि यदि द्रव्य को लगातार विभाजित किया जाए, तो एक ऐसी अवस्था आएगी जहाँ ऐसे अत्यंत सूक्ष्म कण प्राप्त होंगे जिन्हें आगे विभाजित नहीं किया जा सकता।
उन्होंने इन कणों को परमाणु कहा।
उनके विचार संस्कृत ग्रंथ वैशेषिक सूत्र में मिलते हैं।
उनके अनुसार:
- परमाणु अत्यंत सूक्ष्म होते हैं।
- परमाणु इंद्रियों द्वारा अनुभव नहीं किए जा सकते।
- परमाणु मिलकर बड़े समूह बनाते हैं।
- इन्हीं संयोजनों से विभिन्न पदार्थ बनते हैं।
ल्यूसीपस और डेमोक्रिटस
प्राचीन ग्रीस में ल्यूसीपस और डेमोक्रिटस ने भी इसी प्रकार का विचार प्रस्तुत किया।
उन्होंने इन अविभाज्य कणों को एटोमॉस (atomos) कहा, जिसका अर्थ है — अविभाज्य।
परमाणु की प्रारंभिक अवधारणा मुख्यतः विचारों पर आधारित थी, प्रयोगों पर नहीं।
3. डाल्टन का परमाणु सिद्धांत
वर्ष 1808 में जॉन डाल्टन ने परमाणु सिद्धांत प्रस्तुत किया।
उनके अनुसार:
- सभी द्रव्य अत्यंत सूक्ष्म कणों से बने होते हैं।
- इन कणों को परमाणु कहा जाता है।
- परमाणु द्रव्य के निर्माण की मूल इकाइयाँ हैं।
- परमाणु को और छोटे कणों में विभाजित नहीं किया जा सकता।
डाल्टन का सिद्धांत द्रव्य की संरचना को समझाने वाला पहला वैज्ञानिक सिद्धांत था।
इससे परमाणु की संरचना के वैज्ञानिक अध्ययन की शुरुआत हुई।
4. परमाणु मॉडल का विकास
जैसे-जैसे वैज्ञानिकों ने नए प्रयोग किए और नए प्रमाण प्राप्त किए, परमाणु के मॉडल में परिवर्तन होते गए।
परमाणु मॉडल के विकास का क्रम:
डाल्टन मॉडल → टॉमसन मॉडल → रदरफोर्ड मॉडल → बोर मॉडल → आधुनिक क्वांटम यांत्रिक मॉडल
प्रारंभिक मॉडल पूरी तरह सही नहीं थे, लेकिन प्रत्येक मॉडल ने परमाणु की संरचना को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
5. इलेक्ट्रॉन की खोज
वर्ष 1897 में जे. जे. टॉमसन ने कैथोड किरणों का अध्ययन किया।
उन्होंने देखा कि:
- कैथोड किरणें कैथोड से ऐनोड की ओर जाती हैं।
- ये किरणें ऋणावेशित कणों की धाराएँ हैं।
- इन कणों का द्रव्यमान परमाणु के द्रव्यमान से बहुत कम होता है।
इन ऋणावेशित कणों को इलेक्ट्रॉन कहा गया।
इलेक्ट्रॉन का आवेश
इलेक्ट्रॉन पर ऋणात्मक आवेश होता है।
इसे सामान्यतः:
e⁻
से दर्शाया जाता है।
इलेक्ट्रॉन सभी परमाणुओं का एक मूल अवपरमाणुक घटक है।
6. टॉमसन का परमाणु मॉडल
इलेक्ट्रॉन की खोज के बाद यह प्रश्न उठा कि परमाणु विद्युत रूप से उदासीन क्यों होता है।
टॉमसन ने प्रस्तावित किया कि:
- परमाणु धनात्मक आवेश का एक गोला है।
- इस धनात्मक गोले में इलेक्ट्रॉन समान रूप से वितरित होते हैं।
- धनात्मक और ऋणात्मक आवेशों की कुल मात्रा बराबर होती है।
- इसलिए परमाणु विद्युत रूप से उदासीन होता है।
इस मॉडल को प्लम पुडिंग मॉडल कहा गया।
इसे एक तरबूज से भी समझाया जा सकता है:
- लाल गूदा — धनात्मक आवेश
- बीज — इलेक्ट्रॉन
टॉमसन मॉडल की कमी
यह मॉडल परमाणु के अंदर धनात्मक आवेश और इलेक्ट्रॉनों के वितरण को समझाता था, लेकिन बाद के प्रयोगों के परिणामों की व्याख्या नहीं कर सका।
7. रदरफोर्ड का स्वर्ण-पर्ण प्रयोग
वर्ष 1911 में गाइगर और मार्सडेन ने रदरफोर्ड के निर्देशन में स्वर्ण-पर्ण प्रयोग किया।
इस प्रयोग में:
- बहुत पतली स्वर्ण-पर्ण का उपयोग किया गया।
- उस पर धनावेशित अल्फा (α) कणों की बौछार की गई।
अल्फा कण धनावेशित सूक्ष्म कण होते हैं।
प्रयोग के प्रमुख अवलोकन
अधिकांश अल्फा कण
अधिकांश अल्फा कण बिना किसी विक्षेपण के सीधे स्वर्ण-पर्ण से निकल गए।
कुछ अल्फा कण
कुछ कण थोड़े कोण पर मुड़े।
बहुत कम कण
कुछ अल्फा कण बहुत बड़े कोण पर विक्षेपित हुए।
कुछ कण
कुछ अल्फा कण वापस लौट आए।
अल्फा कणों के सीधे मार्ग से मुड़ने की घटना को प्रकीर्णन कहा जाता है।
8. रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल
स्वर्ण-पर्ण प्रयोग के आधार पर रदरफोर्ड ने निष्कर्ष निकाला कि:
1. परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त होता है
क्योंकि अधिकांश अल्फा कण बिना विक्षेपित हुए सीधे निकल गए।
2. नाभिक की उपस्थिति
परमाणु के केंद्र में एक बहुत छोटा और सघन भाग होता है जिसे नाभिक कहते हैं।
3. नाभिक धनावेशित होता है
परमाणु का धनावेश नाभिक में केंद्रित होता है।
4. परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान नाभिक में होता है
5. इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर घूमते हैं
इस मॉडल को ग्रहीय मॉडल कहा गया क्योंकि इसमें इलेक्ट्रॉनों को नाभिक के चारों ओर घूमते हुए माना गया।
नाभिक परमाणु की तुलना में अत्यंत छोटा होता है।
9. रदरफोर्ड मॉडल की सीमा
रदरफोर्ड मॉडल परमाणु की स्थिरता को समझाने में असफल रहा।
यदि इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर वृत्ताकार गति करते हैं, तो उनकी दिशा लगातार बदलती रहती है। इस कारण वे त्वरित गति में होते हैं।
इस स्थिति में इलेक्ट्रॉन को ऊर्जा खोनी चाहिए।
ऊर्जा खोते-खोते इलेक्ट्रॉन:
- धीरे-धीरे नाभिक के पास आना चाहिए।
- अंततः नाभिक में गिर जाना चाहिए।
- परमाणु नष्ट हो जाना चाहिए।
लेकिन वास्तव में परमाणु स्थायी होते हैं।
इसलिए रदरफोर्ड मॉडल परमाणु की स्थिरता को पूरी तरह समझाने में सफल नहीं था।
10. प्रोटॉन की खोज
रदरफोर्ड ने नाभिक में धनावेशित कणों की उपस्थिति बताई। इन कणों को प्रोटॉन कहा गया।
प्रोटॉन की विशेषताएँ
- प्रोटॉन पर धनात्मक आवेश होता है।
- इसका आवेश इलेक्ट्रॉन के आवेश के बराबर लेकिन विपरीत होता है।
- प्रोटॉन का द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन से बहुत अधिक होता है।
- प्रोटॉन नाभिक में स्थित होता है।
किसी उदासीन परमाणु में:
प्रोटॉनों की संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या
उदाहरण:
- हीलियम में 2 प्रोटॉन और 2 इलेक्ट्रॉन।
- सोडियम में 11 प्रोटॉन और 11 इलेक्ट्रॉन।
11. बोर का परमाणु मॉडल
वर्ष 1913 में नील्स बोर ने परमाणु का नया मॉडल प्रस्तुत किया।
बोर के अनुसार:
1. इलेक्ट्रॉन निश्चित कक्षाओं में घूमते हैं
इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर किसी भी स्थान पर नहीं घूमते, बल्कि निश्चित कक्षाओं में गति करते हैं।
इन कक्षाओं को कहा जाता है:
- कक्षाएँ
- कोश
- ऊर्जा स्तर
2. कोशों की पहचान
इन कोशों को इस प्रकार दर्शाया जाता है:
K, L, M, N …
या:
n = 1, 2, 3, 4 …
3. प्रत्येक कोश की निश्चित ऊर्जा होती है
4. इलेक्ट्रॉन निश्चित कोशों के बीच नहीं पाए जाते
5. निश्चित कोश में इलेक्ट्रॉन ऊर्जा का ह्रास नहीं करते
6. नाभिक से दूरी बढ़ने पर ऊर्जा बढ़ती है
इस प्रकार:
K कोश की ऊर्जा < L कोश की ऊर्जा < M कोश की ऊर्जा < N कोश की ऊर्जा
7. इलेक्ट्रॉन ऊर्जा ग्रहण या उत्सर्जित करके एक कोश से दूसरे कोश में जा सकते हैं
बोर मॉडल ने परमाणु की स्थिरता को समझाने में सहायता की।
12. न्यूट्रॉन की खोज
परमाणु के द्रव्यमान को समझने में एक समस्या थी।
उदाहरण के लिए:
- हाइड्रोजन में 1 प्रोटॉन होता है।
- हीलियम में 2 प्रोटॉन होते हैं।
- फिर भी हीलियम का द्रव्यमान हाइड्रोजन से लगभग 4 गुना होता है।
इससे वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि नाभिक में प्रोटॉन के अलावा कोई अन्य कण भी होना चाहिए।
वर्ष 1932 में जेम्स चैडविक ने एक नए अवपरमाणुक कण की खोज की।
इस कण को न्यूट्रॉन कहा गया।
न्यूट्रॉन की विशेषताएँ
- न्यूट्रॉन पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता।
- इसका द्रव्यमान लगभग प्रोटॉन के बराबर होता है।
- न्यूट्रॉन नाभिक में पाया जाता है।
- हाइड्रोजन के अतिरिक्त सामान्यतः अन्य परमाणुओं में न्यूट्रॉन पाए जाते हैं।
परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान प्रोटॉन और न्यूट्रॉन के कारण होता है।
13. अवपरमाणुक कण
| कण | प्रतीक | आपेक्षिक आवेश |
|---|---|---|
| इलेक्ट्रॉन | e⁻ | –1 |
| प्रोटॉन | p⁺ | +1 |
| न्यूट्रॉन | n⁰ | 0 |
स्थिति
| कण | स्थिति |
|---|---|
| प्रोटॉन | नाभिक में |
| न्यूट्रॉन | नाभिक में |
| इलेक्ट्रॉन | नाभिक के चारों ओर |
14. नाभिक में प्रोटॉन और न्यूट्रॉन
हल्के परमाणुओं में प्रोटॉन और न्यूट्रॉन की संख्या प्रायः लगभग समान होती है।
भारी परमाणुओं में न्यूट्रॉन की संख्या प्रोटॉन की संख्या से अधिक होती जाती है।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि:
- प्रोटॉन सभी धनावेशित होते हैं।
- वे एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं।
- न्यूट्रॉन विद्युत रूप से उदासीन होते हैं।
- न्यूट्रॉन नाभिकीय बल को मजबूत करने में सहायता करते हैं।
- भारी नाभिक में अधिक न्यूट्रॉन नाभिक के कणों को बाँधे रखने में सहायता करते हैं।
15. तत्वों के प्रतीक
तत्वों को सरलता से लिखने के लिए रासायनिक प्रतीकों का उपयोग किया जाता है।
जॉन डाल्टन ने तत्वों के लिए चित्रात्मक प्रतीक प्रस्तुत किए थे।
बाद में बर्जेलियस ने तत्वों के प्रतीकों को उनके लैटिन नामों से लेने का सुझाव दिया।
आज तत्वों के नाम और प्रतीक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानकीकृत किए जाते हैं।
प्रतीक लिखने के नियम
नियम 1
कई तत्वों के प्रतीक उनके नाम के पहले अक्षर या पहले दो अक्षरों से बनते हैं।
उदाहरण:
- हाइड्रोजन — H
- ऐलुमिनियम — Al
नियम 2
प्रतीक का पहला अक्षर हमेशा बड़े अक्षर में लिखा जाता है।
यदि प्रतीक में दूसरा अक्षर हो तो वह छोटे अक्षर में लिखा जाता है।
उदाहरण:
- Co — कोबाल्ट
- Al — ऐलुमिनियम
नियम 3
कुछ तत्वों के प्रतीक उनके लैटिन, ग्रीक या जर्मन नामों से लिए गए हैं।
उदाहरण:
- आयरन — Fe
- मरकरी — Hg
- टंगस्टन — W
अंतरराष्ट्रीय प्रतीकों के उपयोग से वैज्ञानिकों को भाषा की बाधा के बिना संचार करने में सहायता मिलती है।
16. परमाणु क्रमांक
किसी तत्व के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या को परमाणु क्रमांक कहते हैं।
इसे Z से दर्शाया जाता है।
सूत्र
परमाणु क्रमांक = प्रोटॉनों की संख्या
किसी उदासीन परमाणु में:
प्रोटॉनों की संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या
इसलिए:
परमाणु क्रमांक = प्रोटॉनों की संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या
महत्व
परमाणु क्रमांक:
- तत्व की पहचान करता है।
- तत्व के रासायनिक व्यवहार को निर्धारित करता है।
उदाहरण:
- हाइड्रोजन का परमाणु क्रमांक = 1
- हीलियम का परमाणु क्रमांक = 2
17. द्रव्यमान संख्या
नाभिक में उपस्थित प्रोटॉन और न्यूट्रॉन की कुल संख्या को द्रव्यमान संख्या कहते हैं।
इसे A से दर्शाया जाता है।
सूत्र
द्रव्यमान संख्या = प्रोटॉनों की संख्या + न्यूट्रॉनों की संख्या
या:
A = p + n
प्रोटॉन और न्यूट्रॉन को मिलाकर न्यूक्लिऑन कहा जाता है।
इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान बहुत कम होता है, इसलिए द्रव्यमान की गणना में सामान्यतः उसके द्रव्यमान की उपेक्षा की जाती है।
उदाहरण
हाइड्रोजन
- प्रोटॉन = 1
- न्यूट्रॉन = 0
- द्रव्यमान संख्या = 1
हीलियम
- प्रोटॉन = 2
- न्यूट्रॉन = 2
- द्रव्यमान संख्या = 4
लीथियम
- प्रोटॉन = 3
- न्यूट्रॉन = 4
- द्रव्यमान संख्या = 7
18. परमाणु का मानक निरूपण
किसी तत्व को इस प्रकार लिखा जाता है:
ᴬZX
जहाँ:
- X = तत्व का प्रतीक
- A = द्रव्यमान संख्या
- Z = परमाणु क्रमांक
उदाहरण
कार्बन:
¹²₆C
इसमें:
- कार्बन का प्रतीक = C
- परमाणु क्रमांक = 6
- द्रव्यमान संख्या = 12
19. ऊर्जा स्तरों में इलेक्ट्रॉनों का वितरण
बोर और बरी के अनुसार:
किसी कोश में इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या:
सूत्र
2n²
जहाँ n = कोश की संख्या।
K कोश
n = 1
अधिकतम इलेक्ट्रॉन:
2 × 1² = 2
L कोश
n = 2
अधिकतम इलेक्ट्रॉन:
2 × 2² = 8
M कोश
n = 3
अधिकतम इलेक्ट्रॉन:
2 × 3² = 18
इलेक्ट्रॉन भरने का क्रम
इलेक्ट्रॉन पहले नाभिक के निकटतम कोश में भरते हैं।
क्रम:
K → L → M → N
अर्थात:
- पहले K कोश भरेगा।
- फिर L कोश।
- उसके बाद M कोश।
- फिर N कोश।
बाह्यतम कोश में अधिकतम 8 इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं। प्रथम कोश में अधिकतम 2 इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं।
किसी परमाणु में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को इलेक्ट्रॉनिक विन्यास कहते हैं।
20. प्रथम 18 तत्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
| तत्व | प्रतीक | परमाणु क्रमांक | इलेक्ट्रॉनिक विन्यास |
|---|---|---|---|
| हाइड्रोजन | H | 1 | 1 |
| हीलियम | He | 2 | 2 |
| लीथियम | Li | 3 | 2, 1 |
| बेरिलियम | Be | 4 | 2, 2 |
| बोरॉन | B | 5 | 2, 3 |
| कार्बन | C | 6 | 2, 4 |
| नाइट्रोजन | N | 7 | 2, 5 |
| ऑक्सीजन | O | 8 | 2, 6 |
| फ्लुओरीन | F | 9 | 2, 7 |
| निऑन | Ne | 10 | 2, 8 |
| सोडियम | Na | 11 | 2, 8, 1 |
| मैग्नीशियम | Mg | 12 | 2, 8, 2 |
| ऐलुमिनियम | Al | 13 | 2, 8, 3 |
| सिलिकॉन | Si | 14 | 2, 8, 4 |
| फॉस्फोरस | P | 15 | 2, 8, 5 |
| सल्फर | S | 16 | 2, 8, 6 |
| क्लोरीन | Cl | 17 | 2, 8, 7 |
| आर्गन | Ar | 18 | 2, 8, 8 |
21. संयोजकता
किसी परमाणु की दूसरे परमाणुओं के साथ संयोजित होने की क्षमता को संयोजकता कहते हैं।
परमाणु स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्राप्त करने के लिए:
- इलेक्ट्रॉन त्याग सकते हैं।
- इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर सकते हैं।
- इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी कर सकते हैं।
इन प्रक्रियाओं में भाग लेने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या संयोजकता से संबंधित होती है।
22. संयोजकता कोश और संयोजकता इलेक्ट्रॉन
परमाणु का सबसे बाहरी कोश जिसमें इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं, संयोजकता कोश कहलाता है।
इस कोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉन संयोजकता इलेक्ट्रॉन कहलाते हैं।
23. अष्टक
यदि किसी परमाणु के बाहरी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन होते हैं, तो इसे अष्टक कहा जाता है।
हीलियम में बाहरी कोश में 2 इलेक्ट्रॉन होते हैं और यह भी स्थायी विन्यास रखता है।
जिन तत्वों का बाहरी कोश पूर्ण होता है:
- वे अधिक स्थायी होते हैं।
- वे सामान्यतः कम अभिक्रियाशील होते हैं।
जिन तत्वों का बाहरी कोश अपूर्ण होता है:
- वे अधिक अभिक्रियाशील होते हैं।
- वे स्थायी विन्यास प्राप्त करने के लिए इलेक्ट्रॉन त्यागते, ग्रहण करते या साझा करते हैं।
संयोजकता के सामान्य नियम
संयोजकता इलेक्ट्रॉन 4 से कम हों
परमाणु सामान्यतः अष्टक पूरा करने के लिए इलेक्ट्रॉन त्यागने का प्रयास करता है।
उदाहरण: सोडियम
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:
2, 8, 1
यह 1 इलेक्ट्रॉन त्यागकर स्थायी विन्यास प्राप्त कर सकता है।
इसकी संयोजकता = 1
संयोजकता इलेक्ट्रॉन 4 से अधिक हों
परमाणु अष्टक पूरा करने के लिए इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर सकता है।
उदाहरण: ऑक्सीजन
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:
2, 6
यह 2 इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर सकती है।
इसकी संयोजकता = 2
कार्बन
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:
2, 4
कार्बन के लिए 4 इलेक्ट्रॉन त्यागना या 4 इलेक्ट्रॉन ग्रहण करना सरल नहीं होता।
इसलिए यह अन्य परमाणुओं के साथ इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी करता है।
इसकी संयोजकता = 4।
24. समस्थानिक
एक ही तत्व के ऐसे परमाणु जिनका:
- परमाणु क्रमांक समान हो।
- द्रव्यमान संख्या अलग-अलग हो।
उन्हें समस्थानिक कहते हैं।
कारण
समस्थानिकों में:
- प्रोटॉनों की संख्या समान होती है।
- न्यूट्रॉनों की संख्या अलग-अलग होती है।
इसलिए उनकी द्रव्यमान संख्या अलग होती है।
सूत्र
द्रव्यमान संख्या = प्रोटॉन + न्यूट्रॉन
हाइड्रोजन के समस्थानिक
हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक हैं:
- प्रोटियम
- ड्यूटीरियम
- ट्राइटियम
इन सभी में:
- प्रोटॉन की संख्या = 1
लेकिन न्यूट्रॉन की संख्या अलग-अलग होती है।
समस्थानिकों के गुण
समस्थानिकों के:
- रासायनिक गुण लगभग समान होते हैं।
- भौतिक गुण अलग हो सकते हैं।
रासायनिक गुण समान होने का कारण यह है कि उनके:
- इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है।
- इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होता है।
- संयोजकता इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है।
कार्बन के समस्थानिक
कार्बन के प्रमुख समस्थानिक हैं:
- कार्बन-12
- कार्बन-13
- कार्बन-14
इन सभी में:
- 6 प्रोटॉन
- 6 इलेक्ट्रॉन
होते हैं, लेकिन न्यूट्रॉनों की संख्या अलग होती है।
25. समस्थानिकों के उपयोग
कुछ समस्थानिकों के विशेष गुण होते हैं और उनका उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में किया जाता है।
यूरेनियम-235
नाभिकीय परमाणु संयंत्रों में विद्युत उत्पादन के लिए ईंधन के रूप में।
कोबाल्ट-60
कैंसर के उपचार में रेडियोथेरेपी के लिए।
आयोडीन-131
घेंघा रोग और थायरॉइड कैंसर के उपचार में।
कार्बन-14
पुरातत्व और भूविज्ञान में प्राचीन जीवाश्मों तथा कलाकृतियों की आयु ज्ञात करने के लिए।
26. एकीकृत परमाणु द्रव्यमान इकाई
परमाणु बहुत छोटे होते हैं। इसलिए उनका द्रव्यमान किलोग्राम या ग्राम में मापना सुविधाजनक नहीं होता।
इसलिए परमाणु द्रव्यमान के लिए एक विशेष इकाई का उपयोग किया जाता है:
एकीकृत परमाणु द्रव्यमान इकाई (u)
पहले इसे परमाणु द्रव्यमान इकाई (amu) भी कहा जाता था।
27. औसत परमाणु द्रव्यमान
किसी तत्व के विभिन्न समस्थानिकों के द्रव्यमानों का औसत परमाणु द्रव्यमान कहलाता है।
यदि समस्थानिकों की मात्रा समान मानी जाए, तो साधारण औसत लिया जा सकता है।
लेकिन प्रकृति में समस्थानिक समान मात्रा में नहीं पाए जाते।
इसलिए वास्तविक परमाणु द्रव्यमान ज्ञात करने के लिए उनकी प्राकृतिक प्रचुरता को ध्यान में रखा जाता है।
इसे भारित औसत परमाणु द्रव्यमान कहा जाता है।
उदाहरण: क्लोरीन
क्लोरीन के दो प्रमुख समस्थानिक हैं:
क्लोरीन-35 — लगभग 75%
क्लोरीन-37 — लगभग 25%
इसलिए क्लोरीन का भारित औसत परमाणु द्रव्यमान लगभग:
35.5 u
होता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक क्लोरीन परमाणु का द्रव्यमान 35.5 u होता है। यह प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले समस्थानिकों के द्रव्यमानों का भारित औसत है।
28. समभारिक
विभिन्न तत्वों के ऐसे परमाणु जिनकी:
- द्रव्यमान संख्या समान हो।
- परमाणु क्रमांक अलग-अलग हो।
उन्हें समभारिक कहते हैं।
उदाहरण
- कैल्शियम — परमाणु क्रमांक 20
- पोटैशियम — परमाणु क्रमांक 19
- आर्गन — परमाणु क्रमांक 18
इनकी द्रव्यमान संख्या 40 हो सकती है।
इसलिए ये अलग-अलग तत्व होते हुए भी समान द्रव्यमान संख्या रखते हैं।
29. परमाणु मॉडल का आधुनिक विकास
परमाणु मॉडल के विकास का क्रम:
1. डाल्टन मॉडल
परमाणु को अविभाज्य कण माना गया।
2. टॉमसन मॉडल
परमाणु में धनात्मक आवेश और इलेक्ट्रॉनों का वितरण बताया गया।
3. रदरफोर्ड मॉडल
नाभिक की खोज और परमाणु के अधिकांश भाग को रिक्त बताया गया।
4. बोर मॉडल
इलेक्ट्रॉनों के निश्चित ऊर्जा स्तरों और कोशों की अवधारणा दी गई।
5. आधुनिक परमाणु मॉडल
क्वांटम यांत्रिक मॉडल के अनुसार इलेक्ट्रॉन किसी निश्चित पथ पर नहीं घूमते।
इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन अभ्र के रूप में पाए जाते हैं।
हम केवल उन क्षेत्रों का अनुमान लगा सकते हैं जहाँ इलेक्ट्रॉन के पाए जाने की संभावना अधिक होती है। इलेक्ट्रॉन की वास्तविक स्थिति को निश्चित रूप से बताना संभव नहीं है।
इसलिए परमाणु की संरचना का अध्ययन अभी भी वैज्ञानिक खोज का विषय है।
30. अध्याय का संक्षिप्त पुनरावलोकन
- परमाणु द्रव्य के निर्माण की मूल इकाई है।
- आचार्य कणाद और डेमोक्रिटस ने परमाणु की प्रारंभिक अवधारणा दी।
- डाल्टन ने पहला वैज्ञानिक परमाणु सिद्धांत प्रस्तुत किया।
- जे. जे. टॉमसन ने इलेक्ट्रॉन की खोज की।
- टॉमसन ने प्लम पुडिंग मॉडल दिया।
- रदरफोर्ड के स्वर्ण-पर्ण प्रयोग से नाभिक की खोज हुई।
- रदरफोर्ड के अनुसार परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त होता है।
- प्रोटॉन धनावेशित कण है।
- न्यूट्रॉन उदासीन कण है।
- इलेक्ट्रॉन ऋणावेशित कण है।
- बोर ने निश्चित ऊर्जा स्तरों और कोशों का मॉडल प्रस्तुत किया।
- परमाणु क्रमांक प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होता है।
- द्रव्यमान संख्या प्रोटॉन और न्यूट्रॉन की कुल संख्या होती है।
- इलेक्ट्रॉनिक विन्यास कोशों में इलेक्ट्रॉनों का वितरण है।
- संयोजकता परमाणु की संयोजन क्षमता है।
- पूर्ण बाहरी कोश वाला परमाणु अधिक स्थायी होता है।
- समस्थानिकों का परमाणु क्रमांक समान लेकिन द्रव्यमान संख्या अलग होती है।
- समभारिकों की द्रव्यमान संख्या समान लेकिन परमाणु क्रमांक अलग होता है।
- परमाणु की संरचना के विषय में वैज्ञानिक खोज अभी भी जारी है।

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