📝 क्या लिखूँ? — महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
पदमलाल पुन्नालाल बख्शी | निबंध | बोर्ड परीक्षा सहायक सामग्री
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
15 प्रश्न
🔥 अतिमहत्वपूर्ण
✅ निश्चित प्रश्न
⭐ महत्वपूर्ण
🔥 अतिमहत्वपूर्ण
⭐ महत्वपूर्ण
✅ निश्चित प्रश्न
⭐ महत्वपूर्ण
🔥 अतिमहत्वपूर्ण
✅ निश्चित प्रश्न
🔥 अतिमहत्वपूर्ण
⭐ महत्वपूर्ण
🆕 नए पैटर्न
✅ निश्चित प्रश्न
⭐ महत्वपूर्ण
🔥 अतिमहत्वपूर्ण
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
10 प्रश्न
🔥 अतिमहत्वपूर्ण
ए.जी. गार्डिनर और लेखक के विचारों में निम्नलिखित अंतर है:
गार्डिनर के अनुसार विषय केवल खूँटी की तरह होता है जिस पर भावों का हैट टाँगा जाता है, अर्थात मन के भाव ही असली वस्तु हैं। लेकिन लेखक इस आदर्श स्थिति को व्यवहारिक नहीं मानते और स्वीकार करते हैं कि उन्हें कठिन परिश्रम करके लिखना होता है। इस प्रकार एक ओर स्वतः स्फूर्त लेखन का सिद्धांत है और दूसरी ओर प्रयत्नसाध्य लेखन का व्यावहारिक अनुभव।
🔥 अतिमहत्वपूर्ण
मानटेन को अंग्रेजी निबंध की इस पद्धति का जन्मदाता माना जाता है। इस पद्धति की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
- जो कुछ स्वयं देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को निबंध में लिखा।
- ये निबंध मन की स्वच्छंद रचनाएँ होती हैं।
- इनमें न कवि की उदात्त कल्पना है, न आख्यायिका-लेखक की सूक्ष्म दृष्टि और न ही विज्ञों की गंभीर तर्कपूर्ण विवेचना।
- इनमें लेखक की सच्ची अनुभूति और सच्चे भावों की सच्ची अभिव्यक्ति होती है।
लेखक ने इस पद्धति को इसलिए अपनाया क्योंकि परंपरागत आचार्यों के नियम (छोटे वाक्य, रूपरेखा निर्माण आदि) उनके लिए कठिन थे। इस स्वच्छंद पद्धति से वे अपने अनुभव और भावों को सरलता से व्यक्त कर सकते थे।
✅ निश्चित प्रश्न
लेखक ने ‘दूर के ढोल सुहावने’ की व्याख्या बड़े ही रोचक ढंग से की है। ढोल के पास बैठे व्यक्तियों के कान के पर्दे फटते हैं, परंतु दूर किसी नदी के तट पर वही शब्द मधुरता का संचार करते हैं।
दूर बैठा व्यक्ति उस ध्वनि में किसी विवाहोत्सव का चित्र अंकित कर लेता है — लज्जाशील नव-वधू की कल्पना करता है, प्रेम-उल्लास-आनंद का अनुभव करता है। वस्तुतः ढोल की ध्वनि के साथ आनंद का कलरव, उत्सव का प्रमोद और प्रेम का संगीत — ये तीनों मिले रहते हैं।
यही बात जीवन में भी सत्य है — दूर रहने से यथार्थता की कठोरता का अनुभव नहीं होता। इसीलिए तरुण भविष्य को और वृद्ध अपने अतीत को सुखद मानते हैं, क्योंकि दोनों वर्तमान से दूर होते हैं।
🔥 अतिमहत्वपूर्ण
लेखक के अनुसार तरुण और वृद्ध दोनों को वर्तमान से असंतोष होता है, परंतु उनकी असंतुष्टि के कारण भिन्न हैं:
- तरुण वर्ग: संसार के जीवन-संग्राम से दूर होने के कारण उन्हें संसार का चित्र मनमोहक प्रतीत होता है। वे भविष्य को उज्ज्वल मानते हैं और उसे वर्तमान में लाना चाहते हैं, इसलिए क्रांति के समर्थक होते हैं।
- वृद्ध वर्ग: वे अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आए हैं, इसलिए अतीत की स्मृति सुखद लगती है। वे अतीत-गौरव के संरक्षक होते हैं और उसे वर्तमान में खींचकर देखना चाहते हैं।
इन्हीं दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है और इसीलिए वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है। यह ‘दूर के ढोल सुहावने’ की अवधारणा से जुड़ा हुआ है — दोनों के लिए दूरस्थ (भविष्य या अतीत) सुखद लगता है।
✅ निश्चित प्रश्न
लेखक के अनुसार समाज-सुधार की प्रक्रिया अनादि काल से चली आ रही है और यह निरंतर जारी है। उनके मुख्य विचार इस प्रकार हैं:
- मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल नहीं हुआ जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो।
- बुद्धदेव से लेकर महात्मा गांधी तक अनेक सुधारक हुए परंतु सुधारों का अंत नहीं हुआ।
- जीवन में नए-नए दोष उत्पन्न होते जाते हैं और नए-नए सुधार होते जाते हैं।
- जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गए हैं — इसीलिए उन सुधारों का फिर नव सुधार किया जाता है।
इसीलिए जीवन को प्रगतिशील माना गया है। सुधारकों का दल नगर-नगर और गाँव-गाँव में होता है। न दोषों का अंत है और न सुधारों का — यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
⭐ महत्वपूर्ण
पाठ में अमीर खुसरो की एक कहानी का उल्लेख बहुत रोचक संदर्भ में किया गया है। एक बार प्यास लगने पर अमीर खुसरो एक कुएँ के पास पहुँचे जहाँ चार औरतें पानी भर रही थीं। पानी माँगने पर:
- पहली ने खीर पर कविता सुनने की इच्छा प्रकट की।
- दूसरी ने चरखे पर।
- तीसरी ने कुत्ते पर।
- चौथी ने ढोल पर।
अमीर खुसरो ने अपनी प्रतिभा से एक ही पद्य में चारों की इच्छाओं की पूर्ति कर दी: “खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला। आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।”
उद्देश्य: इस कहानी का उल्लेख लेखक ने इसलिए किया क्योंकि उन्हें दो विषयों पर अलग-अलग निबंध लिखने थे। खुसरो की पद्धति से प्रेरित होकर उन्होंने निश्चय किया कि वे दोनों विषयों को एक ही निबंध में समाविष्ट कर देंगे।
🔥 अतिमहत्वपूर्ण
लेखक को निबंध लिखने में कई प्रकार की कठिनाइयाँ आईं:
- मानसिक स्थिति का अभाव: उन्हें गार्डिनर जैसी स्वतःस्फूर्त भावों की मानसिक स्थिति का अनुभव कभी नहीं हुआ। उन्हें सोचना, परिश्रम करना पड़ता है।
- सामग्री की समस्या: दोनों विषयों पर पुस्तकालय में जाकर अनुसंधान का समय नहीं था और न ही विश्वकोश उपलब्ध था।
- रूपरेखा नहीं बन सकी: आचार्यों के अनुसार रूपरेखा पहले बनानी चाहिए, परंतु लेखक ने स्वीकार किया कि उनसे रूपरेखा तैयार नहीं होगी।
- शैली का प्रश्न: परंपरागत शैली में लंबे-गंभीर वाक्य चाहिए, परंतु वे छोटे वाक्य लिखना चाहते हैं।
- समय की कमी: उन्हें दो घंटे में दो निबंध तैयार करने थे।
🆕 नए पैटर्न
पदमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म सन् 1894 में खैरागढ़, राजनंदगांव, छत्तीसगढ़ में हुआ था। हिंदी साहित्य में उनकी ख्याति कुशल आलोचक, कवि, निबंधकार और हास्य व्यंग्यकार के रूप में है। निबंध लेखन के लिए वे विशेष रूप से स्मरणीय हैं।
प्रमुख रचनाएँ:
- निबंध संग्रह: पंच-पात्र, पदम-वन, प्रबंध पारिजात, कुछ बिखरे पन्ने
- काव्य: अश्रुदल, शतदल
- कहानी संग्रह: झलमला, त्रिवेणी
- आलोचना: विश्व साहित्य, हिंदी कहानी साहित्य, हिंदी साहित्य विमर्श, हिंदी उपन्यास साहित्य
उन्होंने सरस्वती और छाया पत्रिकाओं का संपादन भी किया। उनके लेखन में अध्यात्म, समाजसुधार और लोकजीवन को प्रमुखता मिली है। सन् 1971 में उनका निधन हुआ।
✅ निश्चित प्रश्न
‘क्या लिखूँ?’ निबंध की आत्मपरक शैली की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं:
- लेखक स्वयं पाठकों से संवाद करता है, जिससे पाठक को लगता है कि लेखक उनसे सीधे बात कर रहा है।
- लेखक अपनी समस्याओं, विचारों और अनुभवों को खुलकर प्रकट करता है।
- स्वीकारोक्ति की भावना — लेखक निःसंकोच मानता है कि वे गार्डिनर जैसी स्थिति से अपरिचित हैं।
- हास्य और व्यंग्य का सहज समावेश — स्वयं ‘मास्टर’ होने का उल्लेख।
लाभ: इस आत्मपरक शैली से निबंध अधिक जीवंत, आत्मीय और प्रभावशाली बना है। पाठक लेखक की कठिनाइयों से जुड़ाव महसूस करता है। यह शैली निबंध को शुष्क सैद्धांतिक विवेचन से बचाकर रोचक एवं पठनीय बनाती है।
🔥 अतिमहत्वपूर्ण
पाठ में निबंध-लेखन की मुख्यतः दो पद्धतियों का उल्लेख है:
1. परंपरागत आचार्यों की पद्धति:
- निबंध छोटा और रूपरेखा से युक्त होना चाहिए।
- भाषा प्रवाहमयी, गंभीर और दुर्बोध होनी चाहिए।
- अलंकार, मुहावरे, लोकोक्तियों का समावेश आवश्यक है।
- पहले सामग्री एकत्र करके रूपरेखा बनाना फिर लिखना।
2. मानटेन की पद्धति (अंग्रेजी पद्धति):
- जो देखा, सुना, अनुभव किया — वही लिखा।
- मन की स्वच्छंद रचना — बिना किसी बंधन के।
- लेखक की सच्ची अनुभूति और व्यक्तित्व का प्रतिबिंब।
लेखक ने मानटेन की पद्धति को अपनाना अधिक व्यावहारिक माना। यह पद्धति इसलिए श्रेष्ठ लगती है क्योंकि इसमें लेखक की आत्मा बोलती है, अनुभव जीवंत रहते हैं और पाठक तुरंत जुड़ाव महसूस करता है।

Leave a Reply