ऐसी भी बातें होती हैं
(लता मंगेशकर से साक्षात्कार)
लेखक: यतींद्र मिश्र | गंगा पाठ्यपुस्तक — अध्याय 4
15 प्रश्न
10 प्रश्न
25 प्रश्न
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
Q1 – Q15
🔥 अति महत्वपूर्ण
लता मंगेशकर ने अपनी अद्भुत आवाज़ से भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में अपनी पहचान बनाई। वे भारतीय संगीत जगत का एक अमर नाम हैं। उनकी असाधारण संगीत-साधना और देश को गौरवान्वित करने के कारण उन्हें ‘भारत रत्न’ की उपाधि दी गई।
✅ निश्चित प्रश्न
लता मंगेशकर ने मात्र पाँच वर्ष की आयु में अपने पिता पं. दीनानाथ मंगेशकर से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली और जीवनपर्यंत संगीत के प्रति समर्पित रहीं।
⭐ महत्वपूर्ण
पिताजी शरारत करने पर बच्चों को गंभीरता से देखते थे — कुछ कहते नहीं थे, न डाँटते थे — लेकिन उनकी दृष्टि मात्र से बच्चों का रोना शुरू हो जाता था। इसी चुप्पी भरे अनुशासन में उनका स्नेह भी छिपा था।
🔥 अति महत्वपूर्ण
पं. दीनानाथ मंगेशकर एक राग गाते समय उसमें सुर बदलकर किसी भी सुर को ‘सा’ (षडज) बनाकर राग को नया रूप दे देते थे और फिर उसी समय पुराने राग में वापस लौट आते थे। यह उनकी अद्भुत विशेषता थी।
⭐ महत्वपूर्ण
लता जी ने पिता से सीखा कि जो बात सही लगे, उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है। उन्होंने जीवन में कभी किसी से कुछ माँगा नहीं — यही उनके पिता के संस्कारों की देन थी।
✅ निश्चित प्रश्न
प्रभात फिल्म की ‘संत तुकाराम’ में तुकाराम सदेह बैकुंठ जाते हैं। बच्चे घर में गद्दे-तकिये एक के ऊपर एक रखकर ऊँचा ‘स्वर्ग’ बनाते थे। लता उस पर बैठकर गीत गाती थीं और मीना, आशा व पंढरीनाथ नीचे तुकाराम के अनुयायी बनकर रोते थे।
⭐ महत्वपूर्ण
लता जी ने शुरुआती दौर में लगभग छह-सात फिल्मों में अभिनय किया था। उन्हें मेकअप करना, लाइट के सामने जाना और लोगों के सामने रोना-हँसना पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अभिनय छोड़कर गायन को ही अपना जीवन बना लिया।
🔥 अति महत्वपूर्ण
पचास के दशक में लता जी ने ऐन दीवाली के दिन तड़के पाँच बजे नहा-धोकर अपने सीनियर संगीतकारों — नौशाद, अनिल विश्वास, रोशनलाल, मदन भैया, बर्मन दादा — के घर मिठाई लेकर जाने का रिवाज शुरू किया था।
⭐ महत्वपूर्ण
मंगलागौर विवाह के बाद नई बहू के घर आने पर होने वाला एक पूजा उत्सव है, जिसमें पास-पड़ोस की महिलाएँ आती हैं और ठेठ गँवई अंदाज में गीत गाती और नाचती हैं। यह महाराष्ट्र की एक पारंपरिक लोक परंपरा है।
✅ निश्चित प्रश्न
मुंबई के एक संगीत कार्यक्रम में उस्ताद अली अकबर खाँ जब पूरी तल्लीनता से सरोद बजा रहे थे, तभी ‘ठन’ की आवाज़ के साथ सरोद का एक तार टूट गया। बाद में उन्होंने लता जी को बताया — “बहन, जब बहुत सुर में तार लगता है, तो टूट जाता है।”
🔥 अति महत्वपूर्ण
यह मराठी कहावत है जिसका अर्थ है — गाँव तो बह जाता है, लेकिन जो नाम (यश) है, वह रह जाता है। लता जी इसके माध्यम से बताती हैं कि शरीर नश्वर है, लेकिन अच्छे कर्मों से बना यश सदा अमर रहता है।
⭐ महत्वपूर्ण
बचपन में लता जी ने पंडित कुमार गंधर्व को काली शेरवानी पहने और मेडल लगाकर गाते देखा था। तब से उनका सपना था कि जब बड़ी होंगी, तो उन्हें भी ऐसे ही मेडल मिलेंगे और वे किसी कार्यक्रम में पहनकर जाएंगी।
⭐ महत्वपूर्ण
लता जी ने स्वयं निर्माता भालजी पेंढारकर (जिन्हें वे ‘बाबा’ कहती थीं) से अनुरोध किया था कि ‘छत्रपति शिवाजी’ फिल्म के अंतिम गीत की दो पंक्तियाँ वे भी गाएंगी। उन्होंने हिंदी और मराठी दोनों संस्करणों में यह पंक्तियाँ गाईं।
✅ निश्चित प्रश्न
‘आएगा आने वाला’ (फिल्म महल) की रिकॉर्डिंग में लता जी को हॉल में बहुत दूर से चलकर दबे पाँव माइक तक आना पड़ता था। इसी क्रम में माइक पर आवाज़ का उतार-चढ़ाव कैद किया जाता था — यह उस समय की तकनीकी सीमाओं की विशेषता थी।
🔥 अति महत्वपूर्ण
लता जी के कोरस गाने वाली लड़कियों के साथ बेहद आत्मीय और घनिष्ठ संबंध थे। वे सब उनके घर जैसी थीं — सबका घर में आना-जाना होता था। रिकॉर्डिंग के दौरान स्टूडियो में जब कुर्सियाँ नहीं होती थीं, तो लता जी भी उनके साथ ज़मीन पर बैठ जाती थीं।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
Q1 – Q10
🔥 अति महत्वपूर्ण
पं. दीनानाथ मंगेशकर लता जी के जीवन के सबसे बड़े प्रेरणास्रोत थे। उनका प्रभाव लता जी के व्यक्तित्व के हर पहलू में दिखाई देता है।
- अनुशासन: पिताजी बिना कुछ कहे सिर्फ गंभीरता से देखते थे — इतने से ही बच्चे सब समझ जाते थे। यह अनोखा पारिवारिक अनुशासन था।
- स्वाभिमान: उन्होंने सिखाया कि जो सही लगे, वही करो — किसी के आगे झुकना नहीं। लता जी ने जीवनभर इसका पालन किया।
- संगीत-साधना: पाँच वर्ष की आयु में ही पिता ने संगीत की शिक्षा दी। पिता स्वयं मराठी रंगमंच पर कर्नाटक और पंजाब का संगीत लेकर आए थे।
- कर्तव्यनिष्ठा: पिताजी के निधन के बाद लता जी ने 13 वर्ष की आयु में ही परिवार का बोझ उठाया — यह उनके संस्कारों का ही परिणाम था।
लता जी स्वयं कहती हैं — “बाबा ने जैसा सिखाया था, उस पर हम सभी भाई-बहनों ने चलने का प्रयास किया।”
✅ निश्चित प्रश्न
लता जी का कार्य जीवन अत्यंत परिश्रममय था। वे इसे चुनौती नहीं मानती थीं, बल्कि यही उनका जीवन था।
- उनकी रिकॉर्डिंग सुबह से रात तक चलती रहती थी।
- एक स्टूडियो से दूसरे और तीसरे स्टूडियो के चक्कर में पूरा दिन निकल जाता था।
- वे अपने गाने और रिकॉर्डिंग के अलावा किसी दूसरी चीज़ की सुध नहीं रखती थीं।
- उनके दिमाग में हमेशा यही रहता था कि परिवार को कैसे देखा जाए — कितना कमाया जाए।
- रिकॉर्डिंग की तकलीफों से अधिक वे इस बात की चिंता करती थीं कि अगले गीत कब रिकॉर्ड होंगे।
यह प्रश्न लता जी की कर्तव्यनिष्ठा और परिवार के प्रति उत्तरदायित्व को दर्शाता है।
🔥 अति महत्वपूर्ण
पचास के दशक में लता जी ने दीवाली पर तड़के पाँच बजे ही संगीतकारों के घर मिठाई देने का रिवाज शुरू किया। एक बार वे नौशाद साहब के घर साढ़े पाँच बजे पहुँचीं। उनींदे नौशाद साहब उन्हें गेट पर देखकर डर गए और पूछने लगे कि क्या कोई मुसीबत आई।
लता जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि दीवाली पर बधाई देने आई हूँ। नौशाद साहब ने कहा — “लता, तुम हम सबको मिठाई बाँट रही हो, लेकिन हम सारे संगीतकारों को मिलकर तुम्हें मिठाई खिलानी चाहिए, जो तुमने हमारी धुनों में इतनी मिठास घोली है।”
इस घटना से लता जी की विनम्रता, कृतज्ञता, गुरु-सम्मान और उत्सवप्रियता प्रकट होती है।
✅ निश्चित प्रश्न
साक्षात्कार में यतींद्र मिश्र ने लता जी से तानसेन के दीपक राग गाने से दीये जलने और उनकी पुत्रियों के मेघ राग गाने से वर्षा होने की कथाओं पर विचार माँगे।
- लता जी ने कहा — हो सकता है उनकी कला में कोई सच्चा सुर या आत्मा की आवाज़ रही होगी, तभी ऐसा हुआ होगा।
- वे निश्चित रूप से यह नहीं कह सकतीं कि ऐसा हुआ होगा, क्योंकि उनका स्वयं ऐसा कोई अनुभव नहीं है।
- किंतु वे मानती हैं कि संगीत में असीम शक्ति है जो अप्रत्याशित रच देती है।
उन्होंने उस्ताद अली अकबर खाँ के सरोद का तार टूटने की घटना सुनाई — जो संगीत की अपार शक्ति का प्रमाण है। इस प्रसंग के बाद उन्हें लगा कि तानसेन से कोई ऐसा सुर ज़रूर लगा होगा।
यह उत्तर संगीत की शक्ति और लता जी की दार्शनिक सोच दोनों पर प्रकाश डालता है।
🔥 अति महत्वपूर्ण
लता जी ने बताया कि उनके घर में होली का तरीका बाकी देश से अलग था:
- होली जलाने के दिन होलिका पूजा होती थी जिसमें प्रसाद चढ़ाया जाता था।
- नारियल जलाकर उसे तोड़कर प्रसाद लिया जाता था और राख को ‘गुड़वड़’ कहकर एक-दूसरे पर डाला जाता था।
- होली के पाँचवें दिन ‘रंग-पंचमी’ पर माँ और पिताजी बच्चों पर केसर छिड़कते थे।
- माँ घर में मिठाई बनाकर भगवान को चढ़ाती थीं और सभी की आरतियाँ उतारती थीं।
आजकल लता जी ने होली खेलना बंद कर दिया है। उनके घर में दशहरा, दीवाली और नवरात्रि का विशेष महत्व था।
‘गुड़वड़’ और ‘रंग-पंचमी’ शब्दों को उत्तर में अवश्य शामिल करें।
⭐ महत्वपूर्ण
यतींद्र मिश्र ने पूछा — अगर 1949-50 में ए.आर. रहमान या जतिन-ललित होते, तो ‘आएगा आने वाला’ जैसे गाने कैसे बनते?
लता जी ने हँसते हुए कहा कि यह कल्पना तो सुनने में अच्छी लगती है, पर इसका पूरा आकलन करना मुश्किल है। उनके मुख्य विचार:
- पुराने समय में तकनीक कम थी, पर संगीतकारों ने नए तरीके और टोटके आज़माए — अनिल विश्वास, श्याम सुंदर, सलिल चौधरी, सी. रामचंद्र ने अनोखे प्रयोग किए।
- अगर इन पुराने संगीतकारों को आधुनिक तकनीक मिलती तो वे और कमाल करते।
- आज के संगीतकार जैसे रहमान, जतिन-ललित भी यदि पुराने दौर में काम करते, तो उन्हें भी अनेक कठिनाइयाँ होतीं।
लता जी दोनों युगों के संगीत को सम्मान देती हैं — यही उनकी परिपक्वता है।
✅ निश्चित प्रश्न
पूरे साक्षात्कार से लता मंगेशकर का बहुआयामी व्यक्तित्व उभरकर आता है:
- सादगी और विनम्रता: वे करोड़ों का प्रेम पाकर भी बेहद सरल रहीं। छोटे-से घर में रहकर खुश थीं।
- स्वाभिमान: जीवन में कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया।
- कर्तव्यनिष्ठा: पिता के निधन के बाद 13 वर्ष में ही परिवार संभाला।
- एकाग्रता और साधना: गाने और रिकॉर्डिंग के अलावा किसी और चीज़ पर ध्यान नहीं देती थीं।
- आत्मीयता: कोरस की लड़कियों और सहयोगियों से घनिष्ठ संबंध।
- दार्शनिकता: जीवन और मृत्यु को समभाव से देखती थीं।
पाठ के अनुसार उनकी छवि “सादगी, समर्पण और आत्मसम्मान” की है।
🔥 अति महत्वपूर्ण
यह साक्षात्कार एक आत्मीय बातचीत का रूप लेता है — न कि औपचारिक प्रश्नोत्तर:
- आत्मीय भाषा: यतींद्र मिश्र ने लता जी को ‘दीदी’ कहकर संबोधित किया — यह सम्बन्ध की गर्मजोशी दर्शाता है।
- भावनात्मक वातावरण: लता जी कहीं हँसती हैं, कहीं खिलखिलाती हैं — ‘खिलखिलाकर हँसती हैं’ जैसे संकेत हैं।
- संस्मरण शैली: उत्तर केवल सूचना नहीं, बल्कि जीवंत यादों के रूप में आते हैं।
- सरल हिंदी: भाषा सहज और सुगम है जो आम पाठक को भी समझ आती है।
- विस्तृत प्रश्न: साक्षात्कारकर्ता विस्तारपूर्वक संदर्भ देकर प्रश्न करते हैं जिससे उत्तर भी विस्तृत मिलते हैं।
⭐ महत्वपूर्ण
लता जी ने बताया कि महाराष्ट्र में नवरात्रि को वे राम-आगमन मानकर मनाते हैं, जबकि गुजरात, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में यह दुर्गा की आराधना के रूप में मनाया जाता है।
गुड़ी पड़वा: नवरात्रि के पहले दिन ‘गुड़ी पड़वा’ मनाते हैं। इसमें घर के बाहर ‘गुड़ी’ बाँधते हैं और कलश स्थापना होती है। सूर्योदय के समय गुड़ी पर बताशों की माला चढ़ाई जाती है और सूर्यास्त तक उतार ली जाती है।
- ऐसी मान्यता है कि भगवान राम चौदह वर्ष बाद अयोध्या लौटे तब हर घर में बताशों की लड़ी सजाकर गुड़ी बाँधी गई थी।
- नौ दिन उत्सव मनाने के बाद नवमी को रामनवमी आती है।
यह प्रश्न भारत की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है — उत्तर में यह पक्ष अवश्य लिखें।
🔥 अति महत्वपूर्ण
साक्षात्कार के अंत में जब यतींद्र मिश्र ने कहा कि ‘दूसरी लता मंगेशकर होना इस दुनिया में संभव नहीं’ तो लता जी ने गहरी दार्शनिक बात कही।
- वे मानती हैं कि ईश्वर ने उन्हें बहुत कुछ दिया — इसकी कोई शिकायत नहीं।
- लोगों का प्यार ही उनकी अमरता है — यह प्रेम ही उनके लिए सब कुछ है।
- वे समझती हैं कि शरीर नश्वर है — “उसे तो जाना ही है, आज नहीं तो कल।”
- इस पर उन्हें कोई अफसोस नहीं — यह जीवन की सहज स्वीकृति है।
- मराठी कहावत ‘गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन’ में उनकी पूरी जीवन-दृष्टि है — नाम यानी यश हमेशा रहता है।
- उनकी सबसे बड़ी खुशी यह है कि उन्होंने पिता का नाम आगे बढ़ाया।
लता जी की जीवन-दृष्टि त्याग, कृतज्ञता और समभाव पर आधारित है। वे सांसारिक प्रसिद्धि से ऊपर उठकर सोचती हैं — यही उनकी महानता का रहस्य है।
पाठ-सार एवं मुख्य बिंदु
Quick Revision
यतींद्र मिश्र, जन्म 1977, अयोध्या। लखनऊ विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए.। तीन काव्य-संग्रह प्रकाशित।
इंदौर, मध्यप्रदेश में जन्म। ‘भारत रत्न’ से सम्मानित। आवाज़ से विश्वभर में पहचान।
स्वाभिमान, अनुशासन, सच्चाई। “सही लगे वह करो, किसी के आगे झुकना नहीं।”
अली अकबर खाँ का सरोद तार टूटा — “जब बहुत सुर में तार लगता है, तो टूट जाता है।”
‘गुड़वड़’, रंग-पंचमी, केसर — महाराष्ट्र की विशेष परंपरा। दशहरा-दीवाली का विशेष महत्व।
“गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन” — गाना अमर, शरीर नश्वर। पिता का नाम आगे बढ़ाना ही सबसे बड़ी खुशी।

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