रीढ़ की हड्डी
लेखक: जगदीशचंद्र माथुर | महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
15 प्रश्न
10 प्रश्न
सन् 1939
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
15 प्रश्न
🔥 अति महत्त्वपूर्ण
‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी की रचना सन् 1939 में हुई। इसके लेखक जगदीशचंद्र माथुर हैं, जिनका जन्म सन् 1917 में शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था।
⭐ महत्त्वपूर्ण
एकांकी के मुख्य पात्र हैं — उमा (लड़की), रामस्वरूप (लड़की का पिता), प्रेमा (लड़की की माँ), शंकर (लड़का), गोपालप्रसाद (लड़के का पिता) और रतन (रामस्वरूप का घरेलू सहायक)।
🔥 अति महत्त्वपूर्ण
गोपालप्रसाद का मानना था कि उन्हें ज़्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए। वे कहते थे कि लड़की बस हद से हद मैट्रिक-पास होनी चाहिए, क्योंकि उन्हें मेम साहब नहीं चाहिए।
⭐ महत्त्वपूर्ण
रामस्वरूप ने गोपालप्रसाद से यह झूठ बोला कि उमा केवल मैट्रिक तक पढ़ी है, जबकि सच यह था कि उमा ने बी.ए. पास किया हुआ था।
✅ Sure Shot
जब उमा आई तो उसकी नाक पर सोने की रिम वाला चश्मा था। यह देखकर गोपालप्रसाद और शंकर चौंक उठे। गोपालप्रसाद ने पूछा — “पढ़ाई-वढ़ाई की वजह से तो नहीं है कुछ?”
🔥 अति महत्त्वपूर्ण
उमा ने खुद की तुलना कुर्सी-मेज से की। उसने कहा — जब कुर्सी-मेज बिकती है तब दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीदार को दिखला देता है। इससे उमा ने लड़कियों को वस्तु समझे जाने पर व्यंग्य किया।
⭐ महत्त्वपूर्ण
उमा ने बताया कि शंकर पिछली फरवरी में लड़कियों के हॉस्टल के इर्द-गिर्द घूम रहा था और वहाँ से भगाया गया था। इससे शंकर की कायरता और चरित्र का पता चला।
⭐ महत्त्वपूर्ण
एकांकी के अंत में गोपालप्रसाद क्रोध में छड़ी उठाकर चले जाते हैं। उमा सिसकने लगती है और तभी रतन आकर कहता है “बाबूजी, मक्खन!” — इस व्यंग्यपूर्ण संवाद पर परदा गिरता है।
✅ Sure Shot
उमा ने मीरा का प्रसिद्ध भक्ति गीत ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’ सितार के साथ गाया। गाते समय उसकी आँखें शंकर की झेंपती आँखों से मिलीं और वह अचानक रुक गई।
⭐ महत्त्वपूर्ण
गोपालप्रसाद ने हँसते हुए कहा कि सरकार को खूबसूरती पर टैक्स लगाना चाहिए। यह उनका हास्य-व्यंग्य था, जिसमें उन्होंने स्त्री की सुंदरता को ही मुख्य गुण माना और शिक्षा को महत्त्व नहीं दिया।
⭐ महत्त्वपूर्ण
प्रेमा का मानना था कि पढ़ाई-लिखाई एक जंजाल है। वे कहती थीं कि पहले का जमाना अच्छा था — ‘आ-ई’ पढ़ लो, ‘स्त्री-सुबोधिनी’ पढ़ लो, यही काफी था। इससे उनकी रूढ़िवादी सोच का पता चलता है।
🔥 अति महत्त्वपूर्ण
यह शब्द दो अर्थों में आया है — (1) शंकर की शारीरिक रूप से झुकी कमर के लिए (बैकबोन नहीं), और (2) उमा द्वारा व्यंग्य में शंकर की नैतिक दृढ़ता की कमी के लिए।
⭐ महत्त्वपूर्ण
गोपालप्रसाद ने यह बात स्त्री-शिक्षा का विरोध करते हुए कही। उनके अनुसार उच्च शिक्षा, अखबार पढ़ना, राजनीति पर बहस — ये सब केवल पुरुषों के लिए हैं। स्त्री के लिए नहीं।
⭐ महत्त्वपूर्ण
उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं — भोर का तारा, कोणार्क, ओ मेरे सपने, शारदीया, पहला राजा, दस तस्वीरें, जिन्होंने जीना जाना। कोणार्क उनका सर्वाधिक चर्चित नाटक है।
✅ Sure Shot
उमा ने जाते गोपालप्रसाद से कहा — “घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं — यानी बैकबोन, बैकबोन!” — यह उमा का साहसी और व्यंग्यपूर्ण वक्तव्य था।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
10 प्रश्न
🔥 Most Important
यह एकांकी भारतीय समाज में परंपरागत विवाह व्यवस्था और स्त्री-शिक्षा के प्रति रूढ़िवादी सोच पर केंद्रित है।
- एकांकी में दिखाया गया है कि समाज में लड़कियों से अपेक्षा की जाती थी कि वे कम पढ़ी-लिखी हों।
- विवाह के लिए लड़कियों को बाजार की वस्तु की तरह देखा जाता था — उन्हें बिना उनकी मर्जी जाने परखा जाता था।
- गोपालप्रसाद जैसे पढ़े-लिखे वकील भी पुरानी सोच रखते थे — लड़कियों की पढ़ाई को व्यर्थ समझते थे।
- रामस्वरूप ने अपनी बेटी की शिक्षा छुपाई क्योंकि समाज की माँग थी कि बहू ज़्यादा शिक्षित न हो।
🔥 Most Important
उमा इस एकांकी की मुख्य पात्र और नायिका है। वह एक पढ़ी-लिखी, साहसी और आत्मसम्मानी युवती है।
- शिक्षित: उमा ने बी.ए. पास किया है और उसे अपनी शिक्षा पर गर्व है।
- साहसी: वह चुप नहीं बैठती — जब उसे वस्तु की तरह दिखाया जा रहा था, तो उसने खुलकर विरोध किया।
- स्वाभिमानी: उसने कहा — “मुझे अपनी इज़्ज़त, अपने मान का खयाल है।”
- बहुप्रतिभाशाली: वह सितार बजाती है, अच्छा गाती है, पेंटिंग करती है और सिलाई भी करती है।
- व्यंग्यपूर्ण वक्तव्य: उमा ने शंकर का झूठ सबके सामने उजागर किया और गोपालप्रसाद को उनकी औकात याद दिलाई।
✅ Sure Shot
गोपालप्रसाद एक अनुभवी, चालाक और दोहरे व्यक्तित्व वाले पात्र हैं।
- पढ़े-लिखे लेकिन रूढ़िवादी: वे वकील हैं, सभा-सोसाइटियों में जाते हैं, लेकिन लड़कियों की शिक्षा का विरोध करते हैं।
- दोहरा मापदंड: अपने बेटों को बी.ए., एम.ए. तक पढ़ाते हैं लेकिन बहू के लिए मैट्रिक तक ही चाहते हैं।
- व्यंग्यशील: “मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं” — इस तरह के उद्धरण देते हैं।
- घमंडी: जब उमा ने बी.ए. पास बताया तो वे गुस्से में चले गए।
- प्रतीक: वे उस समय के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जो शिक्षित होकर भी पुरानी सोच रखता था।
🔥 Most Important
रामस्वरूप एक अंतर्विरोधी व्यक्तित्व के पात्र हैं। वे बाहर से आधुनिक दिखते हैं लेकिन भीतर से रूढ़िवादी हैं।
- उन्होंने उमा को बी.ए. तक पढ़ाया — यह आधुनिक सोच का प्रतीक है।
- लेकिन जब विवाह का अवसर आया, उन्होंने गोपालप्रसाद से उमा की शिक्षा छुपा ली — यह रूढ़िवाद है।
- वे गोपालप्रसाद की हर बात पर “हँ-हँ-हँ” कहकर हामी भरते रहे — यह उनकी कमज़ोरी दर्शाता है।
- उन्हें गोपालप्रसाद के विचारों पर गुस्सा आता था, लेकिन वे बोल नहीं सके — क्योंकि उन्हें रिश्ते की ज़रूरत थी।
⭐ महत्त्वपूर्ण
‘रीढ़ की हड्डी’ शीर्षक पूरी तरह सार्थक और प्रतीकात्मक है।
- शाब्दिक अर्थ: शंकर की कमर झुकी हुई है — उसकी रीढ़ शारीरिक रूप से कमज़ोर है।
- लाक्षणिक अर्थ: शंकर में नैतिक साहस और चरित्र-दृढ़ता (बैकबोन) की कमी है।
- वह लड़कियों के हॉस्टल के आसपास घूमता था और भागने पर मजबूर हुआ — यह उसकी कायरता है।
- उमा ने इसी बात को उजागर करते हुए कहा — “रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं — बैकबोन, बैकबोन!”
- इस प्रकार शीर्षक व्यक्ति के आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक है।
✅ Sure Shot
एकांकी में पुरुष और स्त्री के प्रति दोहरे मानदंड को स्पष्ट रूप से दिखाया गया है।
- गोपालप्रसाद के लड़के (शंकर) को मेडिकल कॉलेज में पढ़ाया गया, लेकिन बहू के लिए मैट्रिक पास भी काफी बताया।
- लड़कों की शिक्षा को “काबिल होना” और लड़कियों की शिक्षा को “जंजाल” कहा गया।
- उमा की प्रतिभा — गाना, सितार, पेंटिंग, सिलाई — इन सबकी सराहना विवाह में हुई, लेकिन उसकी बौद्धिक शिक्षा को छुपाना पड़ा।
- शंकर की कुचरित्रता को अनदेखा किया गया जबकि उमा की शिक्षा से आपत्ति थी।
⭐ महत्त्वपूर्ण
इस एकांकी की संवाद-शैली स्वाभाविक, व्यंग्यपूर्ण और प्रभावशाली है।
- स्वाभाविकता: संवाद रोज़मर्रा की भाषा में हैं — जैसे वास्तविक जीवन में लोग बोलते हैं।
- व्यंग्य: उमा के संवाद में तीखा व्यंग्य है — “कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछा जाता।”
- हास्य: रामस्वरूप का “हँ-हँ-हँ” और रतन का “बाबूजी, मक्खन!” हास्य उत्पन्न करते हैं।
- चरित्र-उद्घाटन: संवाद के ज़रिए पात्रों का असली स्वभाव सामने आता है।
- मुहावरेदार भाषा: “भीगी बिल्ली”, “सिर चढ़ाना”, “काँटों में घसीटना” जैसे मुहावरे भाषा को जीवंत बनाते हैं।
🔥 Most Important
एकांकी के अंत में जब पूरे घर में भावनात्मक तूफान आया हुआ है, तभी रतन आकर कहता है — “बाबूजी, मक्खन!” — यह एक बेहद प्रभावशाली व्यंग्यपूर्ण अंत है।
- हास्य: इस गंभीर क्षण में मक्खन की याद आना हँसी उत्पन्न करती है।
- व्यंग्य: बड़ी-बड़ी बातें हुईं — स्त्री-शिक्षा, रिश्ता, अपमान — और अंत में चर्चा मक्खन पर आ जाती है।
- यथार्थवाद: यह दर्शाता है कि जीवन की छोटी-छोटी ज़रूरतें हमेशा बनी रहती हैं।
- यह अंत बताता है कि रामस्वरूप का सारा प्रयास और दिखावा व्यर्थ गया — घर में मक्खन भी नहीं था।
⭐ महत्त्वपूर्ण
जगदीशचंद्र माथुर का जन्म सन् 1917 में शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की।
- वे इंडियन सिविल सर्विस में भी चयनित हुए।
- बिहार राज्य के शिक्षा सचिव, आकाशवाणी के महानिदेशक तथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहे।
- प्रयाग में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने लेखन शुरू किया — चाँद और रूपाभ पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ छपती थीं।
- उनकी प्रमुख कृतियाँ — कोणार्क, भोर का तारा, शारदीया आदि हैं।
- सन् 1978 में उनका निधन हुआ।
✅ Sure Shot
प्रेमा और उमा माँ-बेटी हैं, लेकिन उनकी सोच में ज़मीन-आसमान का फर्क है।
रूढ़िवादी सोच, पढ़ाई को ‘जंजाल’ मानती है, पुराने जमाने को अच्छा मानती है, उमा को पाउडर लगाने के लिए कहती है।
प्रगतिशील, बी.ए. पास, आत्मसम्मानी, पाउडर-पाउडर से नफरत, साहसपूर्वक अपने विचार व्यक्त करती है।
प्रेमा उस पुरानी पीढ़ी का प्रतीक है जो समझौतों में जीती है, जबकि उमा नई पीढ़ी की शिक्षित और स्वाभिमानी स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है। यह तुलना दर्शाती है कि शिक्षा से स्त्री की सोच में कैसा परिवर्तन आता है।
📌 मुख्य बिंदु — एक नज़र में

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