क्या लिखूँ? — प्रश्न-अभ्यास
लेखक: पदमलाल पुन्नालाल बख्शी | कक्षा 9 हिंदी | NCERT पाठ्यपुस्तक गंगा
मेरे उत्तर मेरे तर्क — वस्तुनिष्ठ प्रश्न (रचना से संवाद)
5 प्रश्न
इन प्रश्नों में सटीक उत्तर चुनना है और यह भी बताना है कि वह उत्तर उपयुक्त क्यों लगता है।
🔥 बार-बार पूछा गया
“हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है… असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं।” निबंध में ‘हैट’ और ‘खूँटी’ का उल्लेख किस भाव को सबसे अधिक उजागर करता है?
ए.जी. गार्डिनर के कथन का उल्लेख करते हुए लेखक ने ‘हैट’ और ‘खूँटी’ का उदाहरण दिया है। इसमें ‘हैट’ लेखक के मनोभाव (आंतरिक भाव) का प्रतीक है और ‘खूँटी’ विषय का। गार्डिनर के अनुसार असली महत्त्व लेखक के भावों का है, न कि विषय का। विषय तो केवल एक माध्यम है — जैसे हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम आ सकती है, उसी प्रकार भावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त है। इसलिए विकल्प (क) सबसे सटीक है।
⭐ अति महत्वपूर्ण
“उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है… उसका उल्लास रहता है।” मानटेन की पद्धति लेखक के लिए किस निर्णय का आधार बनती है?
मानटेन की पद्धति में लेखक जो स्वयं देखता, सुनता और अनुभव करता है, उसी को निबंधों में लिखता है। ऐसे निबंध मन की स्वच्छंद रचनाएँ होती हैं, जिनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है। इस पद्धति से प्रेरित होकर लेखक (बख्शी जी) ने यह निर्णय लिया कि वह भी इसी पद्धति का अनुसरण करके अनुभव-आधारित स्वच्छंद लेखन करेंगे। इसलिए विकल्प (घ) सबसे उपयुक्त है।
⭐ अति महत्वपूर्ण
“तरुणों के लिए भविष्य उज्ज्वल… वृद्धों के लिए अतीत सुखद…” यह तुलना किस पर आधारित है?
तरुणों के लिए भविष्य उज्ज्वल लगता है क्योंकि उनमें अभिलाषाएँ (इच्छाएँ और आकांक्षाएँ) अधिक होती हैं — वे भविष्य का सुनहरा सपना देखते हैं। वृद्धों के लिए अतीत सुखद लगता है क्योंकि उनके पास अनुभव का भंडार है — वे बीते दिनों को याद करते हैं। यह तुलना अभिलाषा (तरुण) बनाम अनुभव (वृद्ध) पर आधारित है। इसलिए विकल्प (घ) सर्वाधिक उपयुक्त है।
🔥 बार-बार पूछा गया
निबंध में अमीर खुसरो की कहानी का उल्लेख किस संदर्भ में किया गया है?
लेखक के सामने दो विषयों पर एक साथ निबंध लिखने की कठिनाई थी। इस समस्या का समाधान खोजते हुए उन्हें अमीर खुसरो की वह कहानी याद आई जिसमें उन्होंने एक ही पद्य में चारों महिलाओं की इच्छाओं (खीर, चरखा, कुत्ता, ढोल) की पूर्ति कर दी थी। इस उदाहरण से लेखक को प्रेरणा मिली कि वह भी एक ही निबंध में दोनों विषयों (‘दूर के ढोल सुहावने’ और ‘समाज-सुधार’) को समाविष्ट कर सकते हैं। इसलिए विकल्प (ख) उचित है।
⭐ अति महत्वपूर्ण
निबंध में समाज-सुधार के संदर्भ में क्या कहा गया है?
निबंध में स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल नहीं हुआ जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो। बुद्धदेव से लेकर महात्मा गांधी तक सुधारकों की एक लंबी परंपरा रही है और सुधारों का अंत कभी नहीं हुआ। जीवन में नए-नए दोष उत्पन्न होते हैं और नए-नए सुधार होते रहते हैं। इसलिए विकल्प (क) सही और उपयुक्त है।
मेरी समझ मेरे विचार — बोध-प्रश्न
5 प्रश्न
इन प्रश्नों के उत्तर कक्षा में चर्चा के आधार पर लिखने हैं। उत्तर विस्तारपूर्वक और अपने विचारों के साथ लिखें।
🔥 बार-बार पूछा गया
निबंध लेखन के विषय में ए.जी. गार्डिनर और लेखक के विचारों में क्या अंतर है?
| ए.जी. गार्डिनर के विचार | लेखक (बख्शी जी) के विचार |
|---|---|
| लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है जिसमें भाव अपने आप उठते हैं। | उन्हें ऐसी स्वतः स्फूर्त मानसिक स्थिति का अनुभव नहीं होता। |
| उस स्थिति में विषय की चिंता नहीं रहती — कोई भी विषय उपयुक्त रहता है। | उन्हें सोचना, चिंता करनी और परिश्रम करना पड़ता है, तब निबंध लिख पाते हैं। |
| मन के भाव ही यथार्थ वस्तु हैं, विषय नहीं। | विषय की कठिनाई उनके सामने एक बड़ी चुनौती होती है। |
संक्षेप में — गार्डिनर के लिए लेखन एक स्वतःस्फूर्त प्रक्रिया है, जबकि बख्शी जी के लिए यह सुविचारित परिश्रम से होने वाली प्रक्रिया है।
⭐ अति महत्वपूर्ण
लेखक के अनुसार वृद्ध और तरुण दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं, पर दोनों की असंतुष्टि के कारण भिन्न हैं। आपके विचार से उनकी असंतुष्टि के क्या-क्या कारण हो सकते हैं?
🧑 तरुणों की असंतुष्टि के कारण
- वर्तमान में अपनी आकांक्षाएँ पूरी नहीं होतीं।
- परिवर्तन की इच्छा और क्रांतिकारी सोच।
- समाज की कमियाँ दिखती हैं, सुधार करना चाहते हैं।
- भविष्य उज्ज्वल लगता है इसलिए वर्तमान अपर्याप्त।
👴 वृद्धों की असंतुष्टि के कारण
- अतीत की मधुर स्मृतियाँ वर्तमान से बेहतर लगती हैं।
- नई पीढ़ी के बदलते मूल्यों से असहमति।
- शारीरिक कमज़ोरी और सक्रियता में कमी।
- पुरानी परंपराओं के समाप्त होने का दुःख।
दोनों की असंतुष्टि का मूल कारण है — ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’। तरुण भविष्य को सुनहरा देखते हैं और वृद्ध अतीत को। दोनों को वर्तमान कम आकर्षक लगता है।
🔥 बार-बार पूछा गया
नमिता और अमिता किन विषयों पर निबंध लिखवाना चाहती हैं? उनके द्वारा सुझाए गए विषयों पर निबंध लिखने में लेखक को क्या-क्या कठिनाइयाँ आईं?
दोनों के विषय: नमिता चाहती थी कि लेखक ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ पर निबंध लिखें, और अमिता चाहती थी कि लेखक ‘समाज-सुधार’ पर निबंध लिखें।
कठिनाइयाँ:
- सामग्री की समस्या: न पुस्तकालय था, न विश्वकोश — केवल दो घंटे में अपने ज्ञान के आधार पर लिखना था।
- रूपरेखा बनाने में कठिनाई: लेखक सोच नहीं सके कि इन विषयों की रूपरेखा कैसी हो।
- विषय की विशालता: ‘दूर के ढोल’ — क्या इस पर 5 पृष्ठ लिखे जा सकते हैं? ‘समाज-सुधार’ — इस पर अनादि काल से चर्चा होती आई है, इसे पाँच पेज में कैसे समेटें?
- शैली की उलझन: परंपरागत आचार्यों के मत अलग-अलग, उनका अनुसरण करना कठिन था।
- दो विषय एक साथ: एक ही बार में दो अलग-अलग विषयों पर निबंध लिखने की दुविधा।
⭐ अति महत्वपूर्ण
निबंधशास्त्र के आचार्यों ने आदर्श निबंध लिखने की कौन-सी युक्तियाँ सुझाई हैं? आप किसी भी विषय पर निबंध लिखने से पहले किस तरह की तैयारी करते हैं?
आचार्यों द्वारा सुझाई गई युक्तियाँ:
- निबंध छोटा होना चाहिए — छोटा निबंध बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है क्योंकि बड़े निबंध में रचना की सुंदरता नहीं बनी रहती।
- निबंध के दो प्रधान अंग — सामग्री और शैली। सामग्री अर्थात् विचारों का संग्रह, और शैली अर्थात् भाव-अभिव्यक्ति का ढंग।
- रूपरेखा बनाना — निबंध लिखने से पहले उसकी रूपरेखा तैयार करनी चाहिए।
- भाषा में प्रवाह — वाक्य छोटे-छोटे हों और एक-दूसरे से संबद्ध हों।
- अलंकार, मुहावरे, लोकोक्तियाँ का समावेश।
मेरी तैयारी (छात्र अपने अनुभव के आधार पर लिखें): विषय को पहले समझना, संबंधित जानकारी एकत्र करना, मुख्य बिंदुओं की रूपरेखा बनाना, उचित उदाहरण सोचना।
🔥 बार-बार पूछा गया
मानटेन ने “जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया।” निबंध लेखन के लिए देखने, सुनने और अनुभव करने की क्या उपयोगिता हो सकती है?
मानटेन की यह पद्धति निबंध लेखन के लिए अत्यंत उपयोगी है। देखने, सुनने और अनुभव करने की उपयोगिता इस प्रकार है:
- सच्ची अनुभूति: स्वयं देखा और अनुभव किया हुआ लेखन प्रामाणिक और प्रभावशाली होता है।
- विचारों की मौलिकता: अपने अनुभव से उत्पन्न विचार नकल नहीं होते — वे मौलिक होते हैं।
- जीवंतता: अनुभव-आधारित निबंध पाठक को सजीव और आत्मीय लगते हैं।
- उल्लास और स्वच्छंदता: ऐसे निबंधों में लेखक का उल्लास रहता है, जो पाठक को भी आनंद देता है।
- सामग्री की उपलब्धता: जीवन में देखे-सुने अनुभव निबंध के लिए सदा तैयार सामग्री का काम करते हैं।
मानटेन को आधुनिक निबंध-विधा का जन्मदाता माना जाता है। उनकी पद्धति में कवि की उदात्त कल्पना, आख्यायिका-लेखक की सूक्ष्म दृष्टि या विज्ञों की गंभीर विवेचना की आवश्यकता नहीं — केवल जीवंत अनुभव चाहिए।
भाव-विस्तार — विधा से संवाद
4 वाक्य
किसी छोटे वाक्य के अर्थ को अपने शब्दों में विस्तार से लिखना। पाठ्यपुस्तक में एक उदाहरण दिया गया है। उसी आधार पर नीचे दिए गए वाक्यों का भाव-विस्तार कीजिए।
“तरुण क्रांति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक।”भाव-विस्तार: युवा पीढ़ी में किसी समस्या को लेकर आक्रोश की भावना प्रबल होती है। वह किसी भी समस्या के समाधान के लिए बैठकर बातचीत करने के बजाय उस पर त्वरित निर्णय लेना चाहते हैं, जबकि वृद्ध पीढ़ी किसी समस्या के समाधान के लिए अनुभव और परंपरागत ढंग पर विश्वास करती है।
⭐ अति महत्वपूर्ण
“जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है।”
जो युवा अभी तक संसार की कठोर वास्तविकताओं से परिचित नहीं हुए हैं — जिन्होंने अभी जीवन के संघर्ष को नहीं झेला — उन्हें जीवन और समाज बहुत सुंदर और आकर्षक दिखता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे दूर से पर्वत बहुत सुंदर लगते हैं, पर पास जाने पर उनकी कठोर चट्टानें और दुर्गम रास्ते दिखाई देते हैं। जो व्यक्ति कठिनाइयों से दूर है, उसे दुनिया एक सुखद स्वप्न की तरह लगती है। यही ‘दूर के ढोल सुहावने’ का भाव है — दूरी भ्रम पैदा करती है, यथार्थ की कठोरता को छिपा देती है।
⭐ अति महत्वपूर्ण
“मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो।”
मानव-सभ्यता के पूरे इतिहास में हर युग में समाज में कुछ न कुछ कमियाँ और बुराइयाँ रही हैं। इसीलिए प्रत्येक युग में सुधारकों की आवश्यकता पड़ती रही है — चाहे वह बुद्ध का काल हो, कबीर का काल हो, या राजा राममोहन राय और गाँधी जी का आधुनिक काल। सुधार की प्रक्रिया कभी रुकती नहीं क्योंकि जब एक बुराई समाप्त होती है तो दूसरी नई बुराई जन्म लेती है। जीवन गतिशील है — उसी गतिशीलता के कारण सुधार भी निरंतर होते रहते हैं। यह जीवन की प्रगतिशीलता का प्रमाण है।
🔥 बार-बार पूछा गया
“आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे।”
जो आज की युवा पीढ़ी भविष्य के सुनहरे सपने देख रही है, क्रांति और परिवर्तन का समर्थन कर रही है — वही युवा जब बूढ़े हो जाएँगे, तब वे अपने आज के (जो उस समय अतीत होगा) दिनों को याद करके उन्हें स्वर्णिम काल मानेंगे। यह मानव-स्वभाव की विडंबना है कि जो वर्तमान है, वह कभी संतोषजनक नहीं लगता। जो बीत जाता है, वह सुंदर लगने लगता है। इस प्रकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही चक्र चलता रहता है और हर पीढ़ी ‘दूर के ढोल’ को सुहावना पाती है।
⭐ अति महत्वपूर्ण
“निबंध छोटा होना चाहिए। छोटा निबंध बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है।”
एक आदर्श निबंध की सबसे बड़ी विशेषता उसकी संक्षिप्तता और कसावट है। जब निबंध छोटा होता है, तो उसमें केवल आवश्यक और सारगर्भित विचार रहते हैं — व्यर्थ का विस्तार नहीं होता। बड़े निबंध में अनावश्यक विस्तार के कारण रचना की एकता और सुंदरता नष्ट हो जाती है, विचार बिखर जाते हैं और पाठक का ध्यान भटक जाता है। जबकि छोटा निबंध कसा हुआ, सुगठित और प्रभावशाली होता है। ठीक जैसे कोई छोटी-सी कविता अपने चंद शब्दों में एक बड़े ग्रंथ से अधिक प्रभाव डालती है।
विषयों से संवाद — अनुसंधान / मेरा अनुभव
4 प्रश्न
⭐ अति महत्वपूर्ण
निबंध में बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक आदि कई महान व्यक्तियों के नाम आए हैं। इनके विषय में जानकारी एकत्रित करके संक्षेप में बताइए कि इन्होंने अपने समय में समाज के लिए क्या-क्या कार्य किए।
| महान व्यक्तित्व | समाज के लिए कार्य |
|---|---|
| बुद्धदेव (गौतम बुद्ध) | हिंसा, जातिवाद और कर्मकांड का विरोध; अहिंसा, करुणा और मध्यम मार्ग का प्रचार। |
| महावीर स्वामी | जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर; अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और तपस्या पर बल। |
| नागार्जुन | बौद्ध दार्शनिक; शून्यवाद का प्रतिपादन; तार्किक चिंतन से धर्म को नई दिशा। |
| शंकराचार्य | अद्वैत वेदांत दर्शन का प्रचार; भारतीय संस्कृति को एकता का सूत्र प्रदान किया। |
| कबीर | हिंदू-मुस्लिम एकता; जाति-प्रथा और पाखंड का विरोध; भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभ। |
| नानक (गुरु नानक देव) | सिख धर्म के संस्थापक; ईश्वर की एकता, सेवा, सत्य और समानता का संदेश। |
| राजा राममोहन राय | सती प्रथा का उन्मूलन; ब्रह्म समाज की स्थापना; आधुनिक भारत के पिता। |
| स्वामी दयानंद | आर्य समाज की स्थापना; वेदों की ओर लौटो का आह्वान; अंधविश्वास और जातिवाद का विरोध। |
| महात्मा गाँधी | सत्य, अहिंसा, स्वदेशी; अस्पृश्यता उन्मूलन; राष्ट्रीय आंदोलन के महान नेता। |
⭐ अति महत्वपूर्ण
निबंध में उल्लिखित महान व्यक्तियों ने अपने द्वारा किए गए कार्यों से समाज को एक नई दिशा दिखाई। हमारे आस-पास और भी ऐसे व्यक्ति और संस्थाएँ हैं जो स्त्री-शिक्षा, पर्यावरण, असमानता, विशेष आवश्यकता समूह (दिव्यांगजन) आदि के लिए कार्य करते हैं। ऐसे व्यक्तियों, संस्थाओं के विषय में पता लगाइए और लिखिए।
(यह प्रश्न अनुसंधान आधारित है। छात्र अपने परिवेश के अनुसार उत्तर दें। कुछ प्रसिद्ध उदाहरण नीचे दिए गए हैं:)
- स्त्री-शिक्षा: प्रथम (NGO) — लड़कियों की शिक्षा और अधिकारों के लिए कार्यरत। सरला देवी, जो ग्रामीण क्षेत्रों में महिला-शिक्षा केंद्र चलाती हैं।
- पर्यावरण: चिपको आंदोलन की सुंदरलाल बहुगुणा; ग्रीनपीस जैसी संस्थाएँ; स्कूलों में वृक्षारोपण अभियान।
- दिव्यांगजन: नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड (NAB); अली यावर जंग नेशनल इंस्टीट्यूट; स्थानीय दिव्यांग सहायता केंद्र।
- असमानता के विरुद्ध: डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर द्वारा स्थापित आंदोलन की परंपरा को जारी रखने वाली संस्थाएँ।
⭐ अति महत्वपूर्ण
आपको ‘समाज-सुधार’ करने का अवसर मिले तो आप क्या-क्या सुधार करना चाहेंगे और कैसे करना चाहेंगे? लिखिए।
यदि मुझे समाज-सुधार का अवसर मिले तो मैं निम्नलिखित सुधार करना चाहूँगा/चाहूँगी:
- शिक्षा का प्रसार: हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, विशेषकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में — जागरूकता शिविर और मोबाइल स्कूल के माध्यम से।
- लिंग-भेद समाप्त करना: बेटे-बेटी को समान अवसर और सम्मान मिले — घर से ही समानता की शुरुआत।
- पर्यावरण-सुरक्षा: कूड़े का उचित निपटान, पेड़-पौधे लगाना और प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने के लिए अभियान।
- अंधविश्वास उन्मूलन: वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना — नाटक, कार्यशाला और सोशल मीडिया के माध्यम से।
परीक्षा में यह उत्तर व्यक्तिगत और मौलिक होना चाहिए। अपने अनुभव और परिवेश के उदाहरण जोड़ें।
⭐ अति महत्वपूर्ण
भारतीय ज्ञान साहित्य में अनेक स्थानों पर नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन में संतुलन की बात की गई है। इस विषय पर अपने शिक्षक के साथ मिलकर चर्चा कीजिए।
भारतीय ज्ञान-परंपरा में ‘पुरुषार्थ चतुष्टय’ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के माध्यम से जीवन के संतुलन की अवधारणा दी गई है। कुछ प्रमुख संदर्भ:
- गीता का संदेश: कर्म करो, फल की चिंता मत करो — यह नैतिक और व्यावहारिक जीवन का आदर्श संतुलन है।
- उपनिषद: ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः’ — त्याग के साथ भोग करो।
- कबीर की साखियाँ: सांसारिक जीवन और आध्यात्मिकता का संतुलन।
- गाँधी जी का सर्वोदय: भौतिक विकास और नैतिक उत्थान साथ-साथ।
सृजन — रचनात्मक लेखन
2 प्रश्न
⭐ अति महत्वपूर्ण
‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ एक लोकोक्ति है। लोक में प्रचलित लोकप्रिय वाक्य या वाक्यांश को लोकोक्ति कहते हैं, जो किसी विशेष अर्थ या सीख को व्यक्त करता है। लोकोक्ति भाषा को समृद्ध करती है तथा विचारों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने में सहायता करती है। यह लोगों के अनुभव, विश्वास और मूल्यों को दर्शाती है। आपने यह लोकोक्ति भी सुनी होगी — ‘आम के आम गुठलियों के दाम’। अब आप इस लोकोक्ति और ‘जैविक खाद की निर्मिति में हमारा प्रयास’ विषय को मिलाकर एक संक्षिप्त लेख तैयार कीजिए।
अर्थ: एक साथ दोहरा लाभ प्राप्त करना।
जैविक खाद की निर्मिति में हमारा प्रयास
हमारे घरों में प्रतिदिन रसोई से सब्जी के छिलके, फलों के अवशेष और खाद्य-पदार्थों की बर्बादी होती है। आम तौर पर इसे कूड़े में फेंक दिया जाता है। पर यदि हम थोड़ी सूझ-बूझ से काम लें, तो यही ‘कचरा’ जैविक खाद (कम्पोस्ट) में बदल सकता है।
इस प्रक्रिया में ‘आम के आम गुठलियों के दाम’ का भाव साकार होता है — एक ओर घर का कचरा भी साफ होता है और दूसरी ओर बगीचे और खेतों के लिए पोषक जैविक खाद तैयार हो जाती है। रासायनिक खाद पर खर्च बचता है और भूमि की उर्वरता भी बनी रहती है। इस प्रकार एक छोटे प्रयास से पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक लाभ — दोनों एक साथ प्राप्त होते हैं।
लोकोक्ति आधारित लेख में: (1) लोकोक्ति का अर्थ, (2) विषय से जोड़ना, (3) उदाहरण, (4) निष्कर्ष — इस क्रम से लिखें।
⭐ अति महत्वपूर्ण
“जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर संध्या समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं।” आपने पढ़ा कि ढोल के पास बैठे व्यक्ति की अपेक्षा दूर बैठे व्यक्ति के लिए ढोल की आवाज़ का अनुभव भिन्न है। अपने अनुभव के आधार पर किसी ऐसी घटना का उल्लेख अपनी डायरी में कीजिए, जब किसी वस्तु, व्यक्ति या संस्था के विषय में दूर से आपका अनुमान कुछ और रहा हो, पर निकट से आपका अनुभव बिल्कुल अलग रहा हो।
प्रिय डायरी,
आज मुझे ‘दूर के ढोल सुहावने’ का अनुभव हुआ। हमारे शहर में एक नया मॉल खुला था। दूर से उसकी चमकती रोशनी और ऊँची इमारत देखकर मन में बड़ी उत्सुकता जागती थी — लगता था अंदर एक अलग ही दुनिया होगी। पर जब पहली बार अंदर गया/गई, तो देखा कि वही भीड़, वही शोर, वही चीज़ें जो बाज़ार में मिलती हैं — बस ज़्यादा दाम पर। वह जादुई अनुभव जो दूर से कल्पना में था, पास जाने पर नहीं मिला।
यही तो ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ का सच्चा अर्थ है — दूरी एक रहस्यमय आकर्षण पैदा करती है जो पास जाने पर टूट जाता है। यह अनुभव हमेशा याद रहेगा।
— तुम्हारा/तुम्हारी ____
व्याकरण की बात — समास (भाषा से संवाद)
6 भेद + अभ्यास
🔥 परीक्षा में अवश्य आता है
निबंध में ऐसे अनेक सामासिक शब्द आए हैं। उन शब्दों को ढूँढकर उनका समास विग्रह कीजिए और समास का नाम लिखिए। (पाठ्यपुस्तक के निर्देश के अनुसार)
| सामासिक पद | समास विग्रह | समास का नाम |
|---|---|---|
| निबंधशास्त्र | निबंध का शास्त्र | तत्पुरुष समास |
| निबंध-रचना | निबंध की रचना | तत्पुरुष समास |
| समाज-सुधार | समाज का सुधार | तत्पुरुष समास |
| पुस्तकालय | पुस्तकों का आलय (स्थान) | तत्पुरुष समास |
| विश्वकोश | विश्व का कोश | तत्पुरुष समास |
| मनोभाव | मन के भाव | तत्पुरुष समास |
| नव-वधू | नई वधू (नव है जो वधू) | कर्मधारय समास |
| दर्बोधता / दुर्बोध | दुर् + बोध (कठिन बोध) | तत्पुरुष / अव्ययीभाव |
| विवाहोत्सव | विवाह का उत्सव | तत्पुरुष समास |
| छोटे-छोटे | छोटे और छोटे | अव्ययीभाव (पुनरुक्त) |
| नगर-नगर | हर नगर में | अव्ययीभाव समास |
| गाँव-गाँव | हर गाँव में | अव्ययीभाव समास |
| जीवन-संग्राम | जीवन का संग्राम | तत्पुरुष समास |
| भाषा-शैली | भाषा और शैली | द्वंद्व समास |
| बड़े-बड़े | बड़े और बड़े | अव्ययीभाव (पुनरुक्त) |
तत्पुरुष (उत्तरपद प्रधान), कर्मधारय (विशेषण-विशेष्य), द्विगु (संख्यावाची), बहुव्रीहि (दोनों गौण, तीसरा प्रधान), द्वंद्व (दोनों प्रधान), अव्ययीभाव (पूर्वपद अव्यय)।
व्याकरण — उपसर्ग एवं प्रत्यय
3 अभ्यास
उपसर्ग: शब्दों के आरंभ में लगकर नए शब्द बनाने वाले लघुतम सार्थक खंड। जैसे — दुर् + बोध = दुर्बोध; अन् + आदि = अनादि।
प्रत्यय: शब्दों के अंत में लगकर नए शब्द बनाने वाले लघुतम सार्थक खंड। जैसे — सुधार + क = सुधारक; कठिन + आई = कठिनाई।
⭐ अति महत्वपूर्ण
निबंध से उपसर्ग और प्रत्यय वाले शब्द ढूँढकर अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए।
उपसर्ग वाले शब्द (पाठ से)
- दुर्बोध — दुर् + बोध
- अनादि — अन् + आदि
- अस्पष्ट — अ + स्पष्ट
- असंतोष — अ + संतोष
- अनुसंधान — अनु + संधान
- अनुसरण — अनु + सरण
- समावेश — सम् + आवेश
- प्रदर्शन — प्र + दर्शन
प्रत्यय वाले शब्द (पाठ से)
- सुधारक — सुधार + क
- कठिनाई — कठिन + आई
- यथार्थता — यथार्थ + ता
- मधुरता — मधुर + ता
- प्रसिद्ध — प्र + सिद्ध
- प्रतिभावान — प्रतिभा + वान
- सुहावने — सुहाव + ने
- लेखन — लेख + न
🔥 परीक्षा में आता है
नीचे दिए गए वाक्यों को उचित उपसर्ग या प्रत्यय लगाकर पूरा कीजिए —
• निबंध लिखना बड़ी _____________ (कठिन…) की बात है।
• वर्तमान से दोनों को _____________ (…संतोष) होता है।
• वाक्यों में कुछ _____________ (…स्पष्ट…) भी चाहिए, क्योंकि यह _____________ (…स्पष्ट…) या _____________ (…बोध…) गांभीर्य ला देती है।
- निबंध लिखना बड़ी कठिनाई (कठिन + आई) की बात है।
- वर्तमान से दोनों को असंतोष (अ + संतोष) होता है।
- वाक्यों में कुछ अस्पष्टता (अ + स्पष्ट + ता) भी चाहिए, क्योंकि यह अस्पष्टता या दुर्बोधता (दुर् + बोध + ता) गांभीर्य ला देती है।
⭐ अति महत्वपूर्ण
नीचे दिए गए शब्दों में उपसर्ग या प्रत्यय लगाकर नए शब्द बनाकर लिखिए। आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है।
मधुर, सुधार, सुंदर, गति, समाज
उदाहरण — मधुर → मधुरता, मधुरमय, समधुर
| मूल शब्द | उपसर्ग/प्रत्यय से नए शब्द |
|---|---|
| मधुर | मधुरता (मधुर + ता), मधुरमय (मधुर + मय), समधुर (सम् + मधुर) |
| सुधार | सुधारक (सुधार + क), सुधारना (सुधार + ना), असुधार (अ + सुधार), सुधारवादी |
| सुंदर | सुंदरता (सुंदर + ता), सुंदरतम (सुंदर + तम), असुंदर (अ + सुंदर) |
| गति | गतिशील (गति + शील), गतिविधि (गति + विधि), प्रगति (प्र + गति), दुर्गति (दुर् + गति) |
| समाज | सामाजिक (समाज + इक), असामाजिक (अ + सामाज + इक), समाज-सुधार |
📖 पाठ-सारांश एवं मुख्य जानकारी

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