घर की याद — सम्पूर्ण नोट्स
कवि: भवानीप्रसाद मिश्र | पुस्तक: गंगा | कक्षा 9 हिंदी
कवि परिचय — भवानीप्रसाद मिश्र
परीक्षा में 5 अंक
🔥 बार-बार पूछा गया
गीत-फ़रोश, खुशबू के शिलालेख, चकित है दुख, अँधेरी कविताएँ, बुनी हुई रस्सी (साहित्य अकादमी पुरस्कार), कवितांतर, शतदल, गांधी-पंचशती, त्रिकाल संध्या।
भवानीप्रसाद मिश्र = सवाधीनता + साहित्य दोनों में समान योगदान। “बुनी हुई रस्सी” = साहित्य अकादमी पुरस्कार।
कविता परिचय एवं पृष्ठभूमि
अति महत्वपूर्ण
✅ निश्चित प्रश्न
यह कविता भवानीप्रसाद मिश्र ने सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान जेल में लिखी थी। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें तीन वर्ष के लिए कारावास का दंड दिया था। इसी कारावास काल में, सावन की बरसात की रात, घर और परिजनों को याद करते हुए कवि ने यह भावपूर्ण कविता रची।
- केंद्रीय संवेदना: परिवार की स्मृति एवं विरह-वेदना
- संदेश-वाहक: सावन के बादल (कवि परिवार तक संदेश भेजता है)
- विशेष बात: कवि चाहता है कि बादल परिजनों को उसकी कठिनाइयों के बारे में न बताएँ, बल्कि उन्हें सांत्वना दें
- भाव: देश-प्रेम और परिवार-प्रेम का अनूठा संगम
इस कविता में कवि देशभक्त भी है और पुत्र/भाई भी — दोनों भावनाएँ एक साथ चलती हैं। परीक्षा में यह द्वंद्व उत्तर में अवश्य लिखें।
कविता का सारांश (भाव-बोध)
5 अंक
🔥 बार-बार पूछा गया
भाग 1 — वर्षा और विरह: सावन की रात से पानी बरस रहा है। कवि जेल में है और बरसते पानी को देखकर घर की याद आती है। बादल की अँधेरी अभी भी घनी है, हवा सर-सर बह रही है और पत्ते हिल रहे हैं। इस वातावरण में कवि का मन थर-थर काँप रहा है और घर की तस्वीर आँखों के सामने तैरने लगती है।
भाग 2 — परिवार की याद: कवि को उसका घर याद आता है जहाँ चार भाई हैं, मायके से बहन आई है। आज का दिन बहुत भारी लग रहा है — एक-एक क्षण सौ वर्ष जैसा लगता है। माँ अनपढ़ है पर उसका स्नेह अपार है। माँ की गोद में सिर रख लेने से सारे दुख दूर हो जाते थे।
भाग 3 — पिता का चरित्र: पिताजी वज्र-भुजा (बलवान) और नवनीत-हृदय (कोमल) हैं। वे अभी भी दौड़ सकते हैं, खिलखिला सकते हैं। पिता का वर्णन — गीता-पाठ, दंड-बैठक, मुगदर भाँजना — बताता है कि वे अत्यंत अनुशासित और सक्रिय हैं। फिर भी पाँचवें बेटे (कवि) का नाम लेकर वे रो पड़े होंगे।
भाग 4 — माँ का साहस: माँ ने कहा होगा — “आँख में पानी किसलिए? वहाँ अच्छा है भवानी। वह तुम्हारा मन समझकर गया है, यह उसकी लीक है।” माँ ने परिवार को ढाढ़स बँधाया होगा।
भाग 5 — पिता का द्वंद्व: पिताजी ने कहा होगा कि मैं रोता कहाँ हूँ — पर उनकी आँखें भर आई होंगी। फिर बारिश याद दिलाती है कि भवानी को बरसात बहुत प्यारी थी, वह खुले सिर नंगे बदन घूमता था।
भाग 6 — परिवार की दशा और कवि का संदेश: भाई-बहन पागल (विव्हल) हो गए होंगे, अम्मा बादल जैसी (शांत पर भरी), भौजी और सरला रो भी नहीं पाईं। कवि बादल से आग्रह करता है — सावन तुम बरसो, उन्हें मत रुलाओ। उनसे कहना — मैं मस्त हूँ, लिख-पढ़ रहा हूँ, वजन सत्तर सेर है, खेल-कूद रहा हूँ। यह मत कहना कि मैं जागता रहता हूँ, आदमी से भागता हूँ।
देशभक्ति का मार्ग कठिन है, पर इस पर चलने वाला अपने परिजनों की चिंता भी करता है। कवि अपना दुख छिपाकर परिवार को सांत्वना देना चाहता है — यही कविता की मार्मिकता है।
काव्यांश-वार व्याख्या (भावार्थ)
5 काव्यांश
🔥 बार-बार पूछा गया
बहुत पानी गिर रहा है,
रात-भर गिरता रहा है,
प्राण मन घिरता रहा है,
…
गिर रहा पानी झरा-झर,
हिल रहे पत्ते हरा-हर,
बह रही है हवा सर-सर,
काँपते हैं प्राण थर-थर।
प्रसंग: यह कविता ‘घर की याद’ के आरंभिक काव्यांश से लिया गया है। कवि भवानीप्रसाद मिश्र 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल में बंद हैं।
व्याख्या: सावन की रात झरझर पानी बरस रहा है — रात-भर बरसता रहा। बाहर की प्राकृतिक घटना कवि के मन पर भी छा गई है — मन भारी हो गया है, घिर गया है। पत्ते हरा-हर (एक के बाद एक) हिल रहे हैं, हवा सर-सर बह रही है और कवि के प्राण थर-थर काँप रहे हैं। यह कँपकँपी केवल ठंड से नहीं, बल्कि अपनों की याद से है।
काव्य-सौंदर्य:
- अनुप्रास अलंकार: झरा-झर, हरा-हर, सर-सर, थर-थर — ध्वनि-सौंदर्य की अनूठी सृष्टि
- पुनरुक्तिप्रकाश: “बहुत पानी गिर रहा है” की पुनरावृत्ति
- बिंब (Image): प्राकृतिक दृश्य और मानवीय मनोदशा का एकसाथ चित्रण
- भाषा: सरल, बोलचाल की खड़ी बोली
✅ निश्चित प्रश्न
दुख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर,
माँ कि जिसकी स्नेह-धारा
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता।
प्रसंग: कवि माँ को याद कर रहा है और उनकी विशेषताएँ बता रहा है।
व्याख्या: माँ अनपढ़ है, किंतु दुख में ढली हुई (अनुभवी और सहनशील) है। माँ की गोद में सिर रख लो तो सारे दुख दूर हो जाते हैं — उनका स्नेह कितना असीमित है कि जेल तक पहुँचता है। माँ पत्र नहीं लिख सकती क्योंकि उन्हें लिखना नहीं आता — कवि इस बात का दुख व्यक्त करता है।
काव्य-सौंदर्य:
- विरोधाभास: बिन-पढ़ी माँ की स्नेह-धारा जेल तक पहुँचती है
- रूपक: “स्नेह-धारा” — माँ के प्रेम को नदी की धारा की तरह बताया
- “दुख में गढ़ी” — माँ दुखों में तपकर परिपक्व हुई है
🔥 बार-बार पूछा गया
वज्र-भुज नवनीत-सा उर,
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी भी दौड़ जाएँ,
जो अभी भी खिलखिलाएँ,
मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें।
प्रसंग: कवि पिता के बहुआयामी व्यक्तित्व का चित्रण कर रहा है।
व्याख्या: पिताजी सरल स्वभाव के हैं (भोले) किंतु वीर भी हैं (बहादुर)। उनकी भुजाएँ वज्र-सी कठोर हैं पर हृदय मक्खन (नवनीत) जैसा कोमल है। उन्हें बुढ़ापे ने अभी नहीं छुआ — अभी भी दौड़ते हैं, हँसते हैं। वे मृत्यु और शेर से भी नहीं डरते। गीता-पाठ करते हैं, दंड-बैठक लगाते हैं, मुगदर चलाते हैं — यानी शरीर और आत्मा दोनों से स्वस्थ हैं।
काव्य-सौंदर्य:
- विशेष उक्ति “वज्र-भुज नवनीत-सा उर”: विरोधाभास अलंकार — कठोरता और कोमलता का एकसाथ चित्रण
- उपमा: “नवनीत-सा उर” — हृदय की तुलना ताज़े मक्खन से
- अनाफोरा: “जो अभी भी…” की पुनरावृत्ति
“वज्र-भुज नवनीत-सा उर” — यह पंक्ति परीक्षा में बहुत पूछी जाती है। इसका अर्थ है: बाँहें वज्र जैसी कठोर + हृदय मक्खन जैसा कोमल = बहुमुखी व्यक्तित्व।
⭐ अति महत्वपूर्ण
दुख कितना बहा होगा —
आँख में किसलिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी,
वह तुम्हारा मन समझकर,
और अपनापन समझकर,
गया है सो ठीक ही है
यह तुम्हारी लीक ही है।
प्रसंग: कवि कल्पना करता है कि माँ परिवार को ढाढ़स दे रही होगी।
व्याख्या: माँ ने अपना दुख पीकर परिवार को कहा होगा — रोने की क्या जरूरत? भवानी वहाँ ठीक है। उसने अपने मन और देशप्रेम को समझकर जेल जाना स्वीकार किया है — यह उसका रास्ता है, उसकी पहचान है। जो पाँव पीछे हटाए, वह मेरी कोख को लजाए। इस तरह कमज़ोर मत पड़ो — नहीं तो दूसरे बच्चे भी रोने लगेंगे।
काव्य-सौंदर्य:
- माँ का दृढ़ चरित्र: अनपढ़ किंतु बेहद विवेकशील और साहसी
- “लीक”: पथ, परंपरा — माँ मानती है कि देशभक्ति उसके बेटे का धर्म है
- नाटकीयता: कवि माँ के संभावित संवाद की कल्पना करता है — इससे भाव और गहरा होता है
✅ निश्चित प्रश्न
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें,
मैं मजे में हूँ सही है,
घर नहीं हूँ बस यही है,
किंतु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है।
प्रसंग: यह कविता का केंद्रीय भाव-स्थल है। कवि सावन के बादलों से संदेश भेजता है।
व्याख्या: हे हरे-भरे सावन! हे मेरे पवित्र मित्र! तुम खूब बरसो ताकि मेरे परिजन न रोएँ — तुम्हारा बरसना उनके आँसुओं का विकल्प बने। मैं यहाँ ठीक हूँ — बस घर नहीं हूँ, यही एक कमी है। किंतु यह “बस” बहुत बड़ी “बस” है — इस एक कमी से सब कुछ नीरस हो गया है।
कवि आगे कहता है — उनसे कहना: लिख रहा हूँ, पढ़ रहा हूँ, काम-नाम कर रहा हूँ, मस्त हूँ, वजन सत्तर सेर है, भोजन ढेर है, कूदता-खेलता हूँ। यह मत कहना कि जागता हूँ, आदमी से भागता हूँ, मौन हूँ।
काव्य-सौंदर्य:
- संबोधन (Apostrophe): “हे सजीले हरे सावन” — निर्जीव को सजीव मानकर संबोधित करना
- श्लेष: “बस” शब्द का दोहरा प्रयोग — केवल/यही + रुकना
- व्यंजना: कवि जो कहता है (मस्त हूँ) और जो सच है (दुखी है) — इसके बीच का अंतर
- करुणा: कवि की अपनों के प्रति असीमित चिंता
शब्दार्थ — महत्वपूर्ण शब्द
परीक्षा उपयोगी
⭐ अति महत्वपूर्ण
| शब्द | अर्थ | उदाहरण / विशेष |
|---|---|---|
| घनेरा | बहुत घना, गाढ़ा | “बादल की अँधेरी है अभी तक भी घनेरी” |
| परिताप | अत्यधिक दुख, शोक, पीड़ा | “हाय रे परिताप के घर!” |
| चतुर्दिक् | चारों ओर | “घर चतुर्दिक् घिर रहा है” |
| वज्र | बहुत कठोर, जिस पर किसी का प्रभाव न पड़े | “वज्र-भुज” = वज्र जैसी भुजाएँ |
| नवनीत | ताज़ा मक्खन (अत्यंत कोमल) | “नवनीत-सा उर” = मक्खन-सा हृदय |
| उर | हृदय, मन | उर = ह्रदय |
| झंझा | तेज हवा, आँधी-पानी | “काम में झंझा लरजता” |
| लरजना | काँपना, दहल जाना | लरजता = काँपता |
| मूठ | मुट्ठी, कब्जा, दस्ता | “मूठ उनकी मिला लेकर” |
| अभागा | भाग्यहीन, बदकिस्मत | “पाँचवाँ मैं हूँ अभागा” |
| धीर | जिसका चित्त विचलित न हो, दृढ़, गंभीर | “हवा, उनको धीर देना” |
| निहायत | बहुत ज़्यादा, अत्यधिक | “मन निहायत नम गया है” |
| तृषा | तीव्र इच्छा, प्यास | “किसलिए इतनी तृषा रे” |
| क्षितिज | जहाँ धरती-आकाश मिलते दिखते हैं | “क्षितिज पर जैसे जड़े हैं” |
| विरस | नीरस, अप्रिय, कष्टकर | “इसी बस से सब विरस है” |
| बेला | एक सुगंधित फूल (मोगरा), कटोरा | “ने फलानी फूल झेला” |
| छिन | क्षण, पल | “एक छिन सौ बरस है रे” |
| लुनाई | सुंदरता, सलोनापन | “गगन-आँगन की लुनाई” |
| अस्त | डूबना, समाप्त होना | “यों न कहना अस्त हूँ मैं” |
| तिर/तिरना | तैरना, उतराना | “घर नजर में तिर रहा है” |
| सुहागा | सोने पर सुहागा = और बढ़िया, सर्वश्रेष्ठ | “जिसे सोने पर सुहागा, पिताजी कहते रहे हैं” |
वज्र-भुज + नवनीत-सा उर = कठोर भुजाएँ + कोमल हृदय — यह विरोधाभास पिता के चरित्र का सार है। परीक्षा में इसका अर्थ अवश्य आता है।
काव्य-सौंदर्य एवं शिल्प-सौंदर्य
5 अंक
🔥 बार-बार पूछा गया
| अलंकार | उदाहरण | स्पष्टीकरण |
|---|---|---|
| अनुप्रास | झरा-झर, हरा-हर, सर-सर, थर-थर | एक ही वर्ण की आवृत्ति से संगीतात्मकता |
| उपमा | “नवनीत-सा उर”, “देह एक पहाड़ जैसे”, “मन कि बड़ का झाड़ जैसे” | “सा/जैसे” से तुलना |
| विरोधाभास | “वज्र-भुज नवनीत-सा उर” | कठोरता और कोमलता एकसाथ |
| मानवीकरण | सावन को संबोधन, बादल को संदेशवाहक बनाना | निर्जीव प्रकृति में जीवन का आरोपण |
| पुनरुक्तिप्रकाश | “बहुत पानी गिर रहा है” — बार-बार | भाव की तीव्रता बढ़ाने के लिए पुनरावृत्ति |
| श्लेष | “बस” — केवल + रुकना | एक शब्द के दो अर्थ |
| संबोधन (Apostrophe) | “हे सजीले हरे सावन” | निर्जीव को सजीव मानकर संबोधित करना |
⭐ अति महत्वपूर्ण
- स्मृति और दृश्य-बिंब: “घर नजर में तिर रहा है” — कवि की आँखों के सामने घर तैरता है। “बड़े बाड़े में जाता, बीज लौकी का लगाता” — पिता की जीवंत स्मृति।
- ध्वन्यात्मकता (नाद-सौंदर्य): “झरा-झर, हरा-हर, सर-सर, थर-थर” — ध्वनि के माध्यम से वातावरण की सृष्टि।
- पंक्तियों का दोहराव: “बहुत पानी गिर रहा है”, “घर नजर में तिर रहा है” — बार-बार आकर भाव तीव्र करते हैं।
- लोकभाषा की सहजता: “छिन”, “बरस”, “चुआ”, “झारी”, “भौजी” जैसे लोकशब्दों का प्रयोग।
- प्राकृतिक दृश्यों और भावों का संयोजन: बरसात = विरह; सावन = संदेशवाहक; बादल = पत्र-वाहक।
- संबोधनात्मकता: सावन को सीधे संबोधित किया — “हे सजीले हरे सावन।”
- मात्रिक छंद: प्रत्येक पंक्ति में लय और तुक का अनुशासन।
साहित्यिक विशेषताएँ — पात्र-चरित्र चित्रण
5 अंक
✅ निश्चित प्रश्न
| पात्र | विशेषताएँ | संबंधित पंक्तियाँ |
|---|---|---|
| माँ | अनपढ़ किंतु अत्यंत स्नेहमयी; दुख में तपकर दृढ़; परिवार को ढाढ़स देने वाली; विवेकशील | “माँ कि जिसकी गोद में सिर / रख लिया तो दुख नहीं फिर” “पाँव जो पीछे हटाता, कोख को मेरी लजाता” |
| पिताजी | भोले + बहादुर; वज्र-भुज + नवनीत-उर (बहुआयामी); अनुशासित; वृद्ध होने पर भी सक्रिय; भावुक | “वज्र-भुज नवनीत-सा उर” “रो पड़े होंगे बराबर / पाँचवें का नाम लेकर” |
| भाई-बहन | प्रेमी; कवि की याद में व्याकुल; “भाई पागल, बहिन पागल” | “चार भाई चार बहिनें / भुजा भाई प्यार बहिनें” |
| कवि (भवानी) | देशभक्त; परिवार-प्रेमी; दुख छिपाने वाला; धैर्यशील; पाँचवाँ पुत्र | “दुख डटकर ठेलता हूँ” “मैं मजे में हूँ सही है” |
“पाँचवाँ मैं हूँ अभागा / जिसे सोने पर सुहागा, पिताजी कहते रहे हैं” — कवि परिवार का पाँचवाँ और प्रिय संतान है, इसीलिए उसकी जेल जाना परिवार के लिए और भी दर्दनाक है।
व्याकरण की बातें
भाषा-अध्ययन
⭐ अति महत्वपूर्ण
संज्ञा = नाम (पानी, पिताजी, बुढ़ापा, पत्ता, सावन)
सर्वनाम = संज्ञा के स्थान पर (वह, जिनको, मेरे)
विशेषण = संज्ञा की विशेषता (बहुत, सजीले, हरे, एक)
क्रिया = काम (गिर रहा है, व्यापा, फूट जाए, फिरता)
| पंक्ति | शब्द | शब्द-भेद |
|---|---|---|
| “बहुत पानी गिर रहा है” | पानी | संज्ञा |
| बहुत | विशेषण | |
| गिर रहा है | क्रिया | |
| “पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा” | बुढ़ापा | भाववाचक संज्ञा |
| व्यापा | क्रिया (सकर्मक) | |
| जिनको | सर्वनाम (संबंधवाचक) | |
| “खुले सिर नंगे बदन वह, घूमता फिरता मगन वह” | खुले | विशेषण |
| वह | सर्वनाम | |
| बदन | संज्ञा | |
| फिरता | क्रिया | |
| “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए” | एक | संख्यावाचक विशेषण |
| फूट जाए | क्रिया (संयुक्त) | |
| पत्ता | संज्ञा | |
| “हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन” | सजीले | विशेषण |
| मेरे | सर्वनाम (संबंधवाचक) | |
| सावन | संज्ञा (व्यक्तिवाचक) |
“एक” को हमेशा संख्यावाचक विशेषण लिखें — इसे अनिश्चयवाचक सर्वनाम से भ्रमित न करें। यहाँ “एक पत्ता” में “एक” विशेषण है क्योंकि यह “पत्ता” की संख्या बता रहा है।
⭐ अति महत्वपूर्ण
| शब्द (पंक्ति) | अर्थ | नया वाक्य |
|---|---|---|
| छिन (एक छिन सौ बरस है रे) | क्षण, पल | परीक्षा में एक-एक छिन भारी लगता है। |
| फलानी (फलानी फूल झेला) | अमुक, कोई विशेष (अनिश्चित) | फलानी बात मुझे याद नहीं। |
| तरला (सहज तरला) | जल्दी भावुक हो जाने वाली, तरल-हृदया | वह बहुत तरला स्वभाव की है। |
| बड़ (मन कि बड़ का झाड़ जैसे) | बरगद, वट-वृक्ष | गाँव के चौराहे पर एक विशाल बड़ का पेड़ है। |
| चुआ (आज सबका मन चुआ होगा) | पिघलना, भावुक होना, आर्द्र होना | उसकी बात सुनकर सबका मन चुआ गया। |
परीक्षा में याद रखने योग्य मुख्य बिंदु
रिवीजन
✅ निश्चित प्रश्न
⭐ अति महत्वपूर्ण
🔥 परीक्षा में पूछी जाती हैं
1. “घर नजर में तिर रहा है” — कवि की आँखों में घर तैरता है (विरह-बिंब)
2. “वज्र-भुज नवनीत-सा उर” — पिता का दोहरा व्यक्तित्व (विरोधाभास)
3. “माँ कि जिसकी गोद में सिर / रख लिया तो दुख नहीं फिर” — माँ की ममता
4. “एक छिन सौ बरस है रे” — जेल में समय का भारीपन
5. “दुख डटकर ठेलता हूँ” — कवि का साहस और संघर्षशील स्वभाव
6. “हे सजीले हरे सावन” — बादलों को संदेशवाहक बनाना (संबोधन)
7. “मैं मजे में हूँ सही है / घर नहीं हूँ बस यही है” — सच्चाई और अपनों की चिंता
8. “किंतु यह बस बड़ा बस है / इसी बस से सब विरस है” — श्लेष + विरह की तीव्रता

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