कक्षा ९ · हिंदी · गंगा पाठ्यपुस्तक · अध्याय ६
रीढ़ की हड्डी
लेखक: जगदीशचंद्र माथुर | विधा: एकांकी (One-Act Play) | NCERT पाठ्यक्रम
✍️ लेखक परिचय — जगदीशचंद्र माथुर
जन्म
सन् 1917
जन्मस्थान
शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश
शिक्षा
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
निधन
सन् 1978
सेवा
ICS (इंडियन सिविल सर्विस)
एकांकी रचना-वर्ष
सन् 1939
जगदीशचंद्र माथुर बिहार राज्य के शिक्षा सचिव, आकाशवाणी के महानिदेशक और सूचना-प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव रहे। प्रशासनिक पदों पर रहते हुए भी वे आजीवन साहित्य-सृजन में सक्रिय रहे।
प्रमुख कृतियाँ:
भोर का तारा
कोणार्क (सर्वाधिक चर्चित)
ओ मेरे सपने
शारदीया
पहला राजा
दस तस्वीरें
जिन्होंने जीना जाना
जगदीशचंद्र माथुर रचनावली (4 खंड)
पत्रिकाएँ जिनमें छपे:
चाँद
रूपाभ
🎭 एकांकी परिचय एवं पृष्ठभूमि
एकांकी क्या है? एकांकी एक एकल अंक का नाटक होता है जिसमें एक ही दृश्य/स्थान और एक केंद्रीय समस्या होती है। इसमें संवाद, रंग-निर्देश, पात्र-परिचय और मंच-निर्देश शामिल होते हैं।
रचना-काल: सन् 1939 — जब भारतीय समाज में स्त्री-शिक्षा और स्वतंत्रता पर अनेक बंधन थे।
मुख्य विषय: परंपरागत विवाह-व्यवस्था, स्त्री-शिक्षा के प्रति रूढ़िवादी सोच और दहेज जैसी कुरीतियों पर प्रहार।
शीर्षक का अर्थ: “रीढ़ की हड्डी” (Backbone) — आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक। एकांकी में यह शब्द दो अर्थों में आया है — एक शंकर की शारीरिक/चारित्रिक कमज़ोरी के लिए और दूसरा उमा की नैतिक दृढ़ता के लिए।
👥 पात्र परिचय (Characters)
उमा
लड़की (मुख्य पात्र)
B.A. पास, पढ़ी-लिखी, साहसी और आत्म-सम्मान से भरी युवती। सितार, हारमोनियम, चित्रकला और सिलाई में निपुण। एकांकी की नायिका — सशक्त स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है।
रामस्वरूप (बाबू)
लड़की का पिता
अधेड़ उम्र के व्यक्ति। बाहर से आधुनिक दिखावा करते हैं, पर भीतर से रूढ़िवादी। उमा की पढ़ाई छिपाते हैं — आंतर्द्वंद्व का पात्र।
प्रेमा
लड़की की माँ
गंदुमी रंग, छोटा कद। पुरानी सोच की महिला। लड़कियों की पढ़ाई को “जंजाल” मानती है। स्त्री-सुबोधिनी को श्रेष्ठ मानती है।
गोपालप्रसाद
लड़के का पिता (वकील)
चालाक और फितरती। पढ़े-लिखे होने के बावजूद स्त्री-शिक्षा के विरोधी। खुद B.A., M.A. लड़के चाहते हैं पर बहू मैट्रिक तक पढ़ी मांगते हैं — पाखंड का प्रतीक।
शंकर
लड़का (मेडिकल छात्र)
B.Sc. के बाद लखनऊ मेडिकल कॉलेज में पढ़ता है। झुकी कमर, पतली आवाज़, खीस निपोरने वाला — चारित्रिक दुर्बलता का प्रतीक। लड़कियों के हॉस्टल के पास घूमते हुए भगाया गया था।
रतन
घरेलू सहायक
रामस्वरूप का नौकर। हास्य-पात्र। एकांकी के अंत में “बाबूजी, मक्खन!” कहकर व्यंग्यात्मक समापन करता है।
★ प्रमुख थीम / मुख्य विषय परीक्षा में महत्वपूर्ण
१. स्त्री-शिक्षा का समर्थन
उमा B.A. पास है — पर उसे छिपाना पड़ता है। एकांकी स्त्री-शिक्षा के अधिकार की पुरज़ोर वकालत करती है।
२. रूढ़िवाद पर व्यंग्य
गोपालप्रसाद खुद शिक्षित हैं, पर बहू कम पढ़ी चाहते हैं — यही पाखंड एकांकी का केंद्रीय व्यंग्य है।
३. विवाह की बाज़ारू प्रक्रिया
उमा इसे “कुर्सी-मेज की खरीद-बिक्री” कहती है — लड़की को वस्तु की तरह देखा जाता है।
४. नारी की आत्म-चेतना
उमा चुप नहीं रहती — वह अपने अधिकार के लिए खुलकर बोलती है। शिक्षित नारी की शक्ति का प्रतीक।
५. आंतर्द्वंद्व (रामस्वरूप)
बाहर से आधुनिक, भीतर से रूढ़िवादी — बेटी की शिक्षा छिपाना उनके इस द्वंद्व को उजागर करता है।
६. दिखावे की संस्कृति
हारमोनियम, सितार, तसवीरें — सब दिखावे के लिए। घर सजाना, “हँ-हँ-हँ” करना — पाखंड का चित्रण।
💬 महत्वपूर्ण संवाद और उनका अर्थ परीक्षा में महत्वपूर्ण
“जब कुर्सी-मेज बिकती है तब दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीदार को दिखला देता है।”
वक्ता: उमा | अर्थ: विवाह की प्रक्रिया में लड़की के साथ वस्तु जैसा व्यवहार होता है — उसकी भावनाओं, विचारों की परवाह नहीं की जाती। यह एकांकी का सबसे तीखा व्यंग्य है।
नारी-सम्मान सामाजिक व्यंग्य
“घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं — यानी बैकबोन, बैकबोन!”
वक्ता: उमा | अर्थ: शंकर की नैतिक कमज़ोरी और चारित्रिक दुर्बलता पर प्रत्यक्ष प्रहार। यही वाक्य एकांकी का शीर्षक बन गया है।
शीर्षक से जुड़ा चारित्रिक दुर्बलता
“मेरी समझ में तो ये पढ़ाई-लिखाई के जंजाल आते नहीं।”
वक्ता: प्रेमा | अर्थ: सन् 1939 की स्त्री-शिक्षा की दयनीय स्थिति का प्रतिबिंब। प्रेमा पुरानी मानसिकता की प्रतिनिधि है जो ‘स्त्री-सुबोधिनी’ को B.A. से श्रेष्ठ मानती है।
स्त्री-शिक्षा की स्थिति
“मर्दों का काम तो है ही पढ़ना और काबिल होना। अगर औरतें भी वही करने लगीं… तब तो हो चुकी गृहस्थी।”
वक्ता: गोपालप्रसाद | अर्थ: लैंगिक भेदभाव की सोच — “मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं” — पुरुषवादी मानसिकता का नग्न प्रदर्शन।
लैंगिक भेदभाव
“जी हाँ, मैंने B.A. पास किया है। कोई पाप नहीं किया, कोई चोरी नहीं की।”
वक्ता: उमा | अर्थ: उमा की दृष्टि में शिक्षा का सही अर्थ — आत्मबल और स्वतंत्र विचार। बड़ी डिग्री या नौकरी नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान के साथ जीना।
शिक्षा का सही अर्थ
“बाप सेर है तो लड़का सवा सेर।”
वक्ता: रामस्वरूप | अर्थ: यहाँ नकारात्मक अर्थ में प्रयुक्त — गोपालप्रसाद और शंकर दोनों की दकियानूसी/पाखंडी प्रवृत्ति एक जैसी है, बल्कि शंकर और अधिक है।
कहावत का प्रयोग
“बाबूजी, मक्खन!”
वक्ता: रतन (अंतिम पंक्ति) | अर्थ: एकांकी का व्यंग्यात्मक अंत। इतने बड़े नाटक के बाद रतन मक्खन लेकर आता है — जीवन की छोटी-छोटी ज़रूरतें बड़े सामाजिक नाटक पर हावी हो जाती हैं। यह हास्य और व्यंग्य का मिश्रण है।
हास्य-व्यंग्य
🔑 “रीढ़ की हड्डी” — दो अर्थों में परीक्षा में महत्वपूर्ण
अर्थ १ — शंकर के लिए (नकारात्मक):
गोपालप्रसाद शंकर से कहते हैं — “झुककर क्यों बैठते हो? … तुम्हारे दोस्त ठीक कहते हैं कि शंकर की ‘बैकबोन’…” — शंकर की शारीरिक और चारित्रिक दुर्बलता का संकेत।
गोपालप्रसाद शंकर से कहते हैं — “झुककर क्यों बैठते हो? … तुम्हारे दोस्त ठीक कहते हैं कि शंकर की ‘बैकबोन’…” — शंकर की शारीरिक और चारित्रिक दुर्बलता का संकेत।
अर्थ २ — उमा के लिए (सकारात्मक):
उमा का अंतिम वाक्य — “रीढ़ की हड्डी” यानी आत्म-सम्मान, नैतिक साहस और दृढ़ता — जो उमा में है, शंकर में नहीं। यही एकांकी का केंद्रीय संदेश है।
उमा का अंतिम वाक्य — “रीढ़ की हड्डी” यानी आत्म-सम्मान, नैतिक साहस और दृढ़ता — जो उमा में है, शंकर में नहीं। यही एकांकी का केंद्रीय संदेश है।
📝 शब्दार्थ (Vocabulary) परीक्षा में महत्वपूर्ण
अधेड़आधी उम्र का, ढलती उम्र का
तख्तलकड़ी की बड़ी चौकी, सिंहासन
गंदुमीगेहुँए रंग का
डाटटेक, अटकाव
जंजालझंझट, झमेला, संसार का बखेड़ा
ठठोलीहँसी, परिहास
करीने/करीनाढंग, क्रम, मेल, समानता
दकियानूसीपुराने विचार का, रूढ़िवादी
तालीमशिक्षा
चौपटनष्ट, चारों ओर से खुला हुआ
दस्तकखटखटाना, हाथ का हल्का आघात
फितरतीचालबाज, प्रकृतिगत
खीस निपोरनादाँत दिखाते हुए बेढंगी हँसी हँसना
खासियतविशेषता, गुण, स्वभाव
तशरीफ़आदर, सम्मान, महत्व
मार्जिनसीमा, किनारा, गुंजाइश
बालाईऊपर का हिस्सा (मलाई)
तकल्लुफ़बनावट, शिष्टाचार, औपचारिकता
माफ़िकअनुकूल, अनुसार
मुखातिबसंबोधन करने वाला, बात करने वाला
निहायतअत्यधिक, अत्यंत, बहुत ज़्यादा
जायचाजन्मपत्री, कुंडली
अर्ज़निवेदन, प्रार्थना
अधीरधैर्यरहित, उतावला, आकुल
✦ मुहावरे और उनके अर्थ परीक्षा में महत्वपूर्ण
भीगी बिल्ली की तरह आना
अर्थ: डरकर या दबकर आना, बिना साहस के
वाक्य में: “उनके पीछे-पीछे भीगी बिल्ली की तरह रतन आ रहा है।”
मुँह फुलाना
अर्थ: नाराज़ होना, रुष्ट होना
वाक्य में: “वह तुम्हारी लाडली बेटी तो मुँह फुलाए पड़ी है।”
किस मर्ज़ की दवा होना
अर्थ: किसी काम का न होना, बेकार होना
वाक्य में: “और तुम उसकी माँ, किस मर्ज़ की दवा हो?”
सिर चढ़ाना
अर्थ: ज़रूरत से ज़्यादा लाड-प्यार करना, शह देना
वाक्य में: “तुम्हीं ने उसे पढ़ा-लिखाकर इतना सिर चढ़ा रखा है।”
सब-कुछ उगल देना
अर्थ: सारी बातें बता देना, राज़ न रखना
वाक्य में: “मगर तुम तो अभी से सब-कुछ उगले देती हो।”
काँटों में घसीटना
अर्थ: मुश्किल में डालना, परेशानी में फँसाना
वाक्य में: “यह लीजिए, आप तो मुझे काँटों में घसीटने लगे।”
इज़्ज़त उतारना
अर्थ: अपमान करना, बेइज़्ज़त करना
वाक्य में: “बाबू रामस्वरूप, आपने मेरी इज़्ज़त उतारने के लिए मुझे यहाँ बुलाया था?”
मुँह छिपाकर भागना
अर्थ: शर्म से, बेइज़्ज़त होकर भागना
वाक्य में: “इनसे पूछिए कि ये किस तरह अपना मुँह छिपाकर भागे थे।”
🎨 एकांकी की साहित्यिक विशेषताएँ (Literary Devices)
- व्यंग्य (Satire): पूरी एकांकी व्यंग्यपूर्ण है — रूढ़िवाद, लैंगिक भेदभाव और विवाह की बाज़ारू प्रक्रिया पर तीखा प्रहार।
- हास्य (Humour): रामस्वरूप का “हँ-हँ-हँ”, गोपालप्रसाद की “खूबसूरती पर टैक्स” वाली बात, रतन का “बाबूजी, मक्खन!” — हास्य के माध्यम से व्यंग्य।
- प्रतीक (Symbol): “रीढ़ की हड्डी” — आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक। “चश्मा” — उमा की पढ़ाई का प्रतीक जिसे छिपाने की कोशिश हुई।
- स्वाभाविक संवाद-शैली: पात्रों की भाषा उनके चरित्र को उजागर करती है — गोपालप्रसाद की रूखी-साफ भाषा, रामस्वरूप की चापलूसी भरी “हँ-हँ”, उमा की दृढ़ आवाज़।
- रंग-निर्देश (Stage Directions): एकांकी में विस्तृत रंग-निर्देश हैं जो पात्रों की शारीरिक भाषा और मंच-सज्जा का वर्णन करते हैं — उदा. “भीगी बिल्ली की तरह रतन”, “झुकी कमर इनकी खासियत है।”
- कहावत का प्रयोग: “बाप सेर है तो लड़का सवा सेर” — नकारात्मक संदर्भ में प्रयुक्त।
- मीरा-भजन का प्रतीकात्मक प्रयोग: “मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई” — उमा के स्वाभिमान और समर्पण का प्रतीक।
- अंत में व्यंग्यात्मक समापन: “बाबूजी, मक्खन!” — इतने बड़े सामाजिक नाटक के बाद एक नौकर का यह वाक्य जीवन की विडंबना को उजागर करता है।
📐 व्याकरण — मुहावरे की पहचान परीक्षा में महत्वपूर्ण
मुहावरा क्या है? वह विशेष अभिव्यक्ति जो अपने सामान्य अर्थ से अलग एक विशेष भावार्थ देती है, मुहावरा कहलाती है। मुहावरे से भाषा में चमक और प्रभाव बढ़ता है।
| मुहावरा | अर्थ | वाक्य-प्रयोग |
|---|---|---|
| भीगी बिल्ली | डरा हुआ, दबा हुआ | परीक्षा में फेल होने पर वह भीगी बिल्ली-सा घर आया। |
| मुँह फुलाना | नाराज़ होना | बच्चा खिलौना न मिलने पर मुँह फुलाए बैठ गया। |
| सिर चढ़ाना | अत्यधिक लाड़ करना | बच्चे को इतना सिर न चढ़ाओ, बिगड़ जाएगा। |
| काँटों में घसीटना | मुश्किल में डालना | उसने झूठी बात कहकर मुझे काँटों में घसीट दिया। |
| इज़्ज़त उतारना | अपमान करना | सबके सामने उसकी इज़्ज़त उतार दी गई। |
| मुँह छिपाकर भागना | शर्मिंदा होकर भागना | चोरी पकड़े जाने पर वह मुँह छिपाकर भाग गया। |
🎭 एकांकी विधा की विशेषताएँ (Ekanki ke Tatv)
- एकांकी का नाम: रीढ़ की हड्डी
- लेखक का नाम: जगदीशचंद्र माथुर
- पात्र: उमा, रामस्वरूप, प्रेमा, गोपालप्रसाद, शंकर, रतन
- परिवेश/देश-काल: सन् 1939, भारतीय मध्यमवर्गीय घर
- रंग-निर्देश: “मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा…”
- संवाद-निर्देश: (ज़रा तेज़ आवाज़ में), (चौंककर) आदि
- समस्या: स्त्री-शिक्षा का विरोध और विवाह में लड़की का वस्तुकरण
- मुख्य विचार: शिक्षित नारी ही समाज बदल सकती है
- समाधान/परिणाम: उमा का साहसी विद्रोह — रीढ़ की हड्डी की जीत
- संवाद-शैली: स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण
रंग-निर्देश: एकांकी में इटैलिक में लिखे वे निर्देश जो स्थान, पात्र की शारीरिक भाषा और मंच-सज्जा बताते हैं — जैसे “भीगी बिल्ली की तरह रतन आ रहा है”, “झुकी कमर इनकी खासियत है।”
👩 उमा का चरित्र-चित्रण (Character Analysis)
उमा इस एकांकी की मुख्य नायिका है — शिक्षित, साहसी और आत्म-सम्मान से भरी।
- शैक्षिक योग्यता: B.A. पास — उस ज़माने में एक लड़की के लिए बड़ी उपलब्धि।
- बहुमुखी प्रतिभा: सितार, हारमोनियम, चित्रकला, सिलाई — सब में निपुण।
- आत्म-सम्मान: पाउडर-पफ लगाने से इनकार — बनावट से उसे घृणा है।
- साहस: बड़ों के सामने भी अपनी बात कहने से नहीं डरती।
- सामाजिक चेतना: विवाह-प्रक्रिया की बाज़ारू प्रकृति को उजागर करती है।
- न्यायप्रिय: शंकर का भंडाफोड़ करके समाज को आईना दिखाती है।
- भावुकता भी है: अंत में सिसकती है — वह पत्थर नहीं, एक संवेदनशील मानव है।
⭐ परीक्षा के लिए Quick Revision — ज़रूर याद करें
- एकांकी की रचना सन् 1939 में हुई — जब भारत में स्त्री-शिक्षा का विरोध था।
- गोपालप्रसाद वकील हैं — शिक्षित हैं, पर स्त्री-शिक्षा के विरोधी।
- शंकर लखनऊ मेडिकल कॉलेज में B.Sc. के बाद पढ़ता है — एक साल बीमार रहा।
- उमा ने मीरा का भजन “मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई” गाया।
- उमा के चश्मे को देखकर बाप-बेटे दोनों चौंके — “चश्मा!!!”
- रामस्वरूप ने उमा का B.A. छिपाया — कहा मैट्रिक पास है।
- शंकर लड़कियों के हॉस्टल के पास घूमते हुए पकड़ा गया था।
- एकांकी की संवाद-शैली स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण है।
- प्रेमा ‘स्त्री-सुबोधिनी’ को B.A. से श्रेष्ठ मानती है।
- रतन का अंतिम वाक्य “बाबूजी, मक्खन!” — व्यंग्यात्मक और हास्यपूर्ण समापन।
- गोपालप्रसाद का उक्ति — “मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं” — लैंगिक भेदभाव का प्रतीक।
- MCQ शीर्षक: (ग) आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक।

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