भारति, जय, विजयकरे! – सारांश
इस अध्याय में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के जीवन और उनकी देशभक्ति से भरी कविता “भारति, जय, विजय करे!” का वर्णन किया गया है। निराला जी का जन्म सन् 1899 में बंगाल के मिहिरादल में हुआ था। उन्होंने नौवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की और बाद में स्वाध्याय से संस्कृत, बांग्ला तथा अंग्रेजी का ज्ञान हासिल किया। वे महान कवि, उपन्यासकार और निबंधकार थे। उनकी रचनाओं में प्रेम, प्रकृति, क्रांति, दर्शन और समाज के पीड़ित लोगों के प्रति गहरी संवेदना दिखाई देती है। इस कविता में कवि ने भारत माता की सुंदरता और महानता का बहुत सुंदर चित्र प्रस्तुत किया है। कवि भारत को ऐसी देवी के रूप में देखता है जिसके चरणों को समुद्र का जल धोता है। खेतों की सुनहरी फसलें, कमल, वन, लताएँ, फूल, गंगा और हिमालय को भारत के आभूषणों की तरह बताया गया है। कवि के अनुसार भारत की चारों दिशाओं में “ओंकार” की पवित्र ध्वनि गूंज रही है और पूरा देश शक्ति, पवित्रता तथा गौरव से भरा हुआ है। इस कविता के माध्यम से कवि ने भारत की प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक महानता और देशप्रेम की भावना को प्रेरणादायक ढंग से व्यक्त किया है।

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