क्या लिखूं? – सारांश
पदुमलाल पुनलाल बख्शी द्वारा लिखित ‘क्या लिखूँ?’ निबंध में लेखक ने निबंध लिखने की कठिनाइयों और उसकी रचना प्रक्रिया को बहुत रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है। लेखक को दो विषयों — ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ और ‘समाज-सुधार’ — पर आदर्श निबंध लिखना था, लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि इतने बड़े विषयों पर कैसे लिखा जाए। इसलिए वे विभिन्न विद्वानों और निबंधकारों के विचारों का सहारा लेते हैं। लेखक बताते हैं कि कुछ लोग मानते हैं कि निबंध लिखने के लिए विशेष मानसिक स्थिति और भावों की आवश्यकता होती है, जबकि लेखक स्वयं मानते हैं कि उन्हें लिखने के लिए बहुत सोच-विचार और परिश्रम करना पड़ता है। वे निबंध की सामग्री, रूपरेखा और शैली के बारे में भी चर्चा करते हैं। लेखक को यह भी लगता है कि बड़े-बड़े विद्वानों की बताई गई बातें व्यवहार में हमेशा आसान नहीं होतीं। अंत में वे अंग्रेज़ी निबंधकारों की उस पद्धति को अपनाने का विचार करते हैं जिसमें लेखक अपने अनुभवों और भावों को सरल रूप में व्यक्त करता है।
लेखक अमीर खुसरो की कहानी का उदाहरण देकर दोनों विषयों को एक साथ जोड़ते हैं। वे बताते हैं कि ‘दूर के ढोल सुहावने’ इसलिए लगते हैं क्योंकि दूर से हमें किसी वस्तु या स्थिति की वास्तविक कठिनाइयाँ दिखाई नहीं देतीं। दूर से ढोल की आवाज़ मधुर लगती है, जबकि पास रहने वाले उसकी कर्कशता से परेशान होते हैं। इसी प्रकार मनुष्य भी दूर की चीज़ों, भविष्य और अतीत को अधिक सुंदर मानता है। युवाओं को भविष्य आकर्षक लगता है और वृद्धों को अपना बीता हुआ समय अच्छा प्रतीत होता है। वर्तमान से दोनों असंतुष्ट रहते हैं। लेखक आगे समाज-सुधार की चर्चा करते हुए कहते हैं कि संसार में हमेशा सुधार की आवश्यकता रही है। समय के साथ नए दोष उत्पन्न होते हैं और नए सुधार किए जाते हैं। इतिहास में अनेक सुधारकों ने समाज को बेहतर बनाने का प्रयास किया, लेकिन सुधारों का कार्य कभी समाप्त नहीं हुआ। लेखक अंत में यह बताते हैं कि जीवन निरंतर आगे बढ़ता रहता है और हर पीढ़ी अपने भविष्य के सपने देखती है। इसलिए कहा जाता है कि “दूर के ढोल सुहावने होते हैं।”

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