संवादहीन – सारांश
‘संवादहीन’ कहानी में लेखक शेखर जोशी ने एक वृद्ध महिला ताई और उसके तोते मिट्ठू के माध्यम से अकेलेपन, ममता और बदलते सामाजिक जीवन की मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत की है। ताई कभी एक बड़े और खुशहाल परिवार की मालकिन थीं। उनके घर में बेटे-बहू, बेटियाँ, नौकर-चाकर और खेती-बाड़ी सब कुछ था, लेकिन समय के साथ उनके बेटे शहर चले गए, बेटियाँ अपने घरों में व्यस्त हो गईं और ताई अकेली रह गईं। सूना घर और अकेलापन उन्हें बहुत दुख देता था। तभी गणपत उनके लिए मिट्ठू नाम का एक तोता लाता है। धीरे-धीरे मिट्ठू ही ताई के जीवन का सहारा बन जाता है। ताई उसे अपने बेटे की तरह प्यार करती हैं, उसके लिए अच्छे भोजन की व्यवस्था करती हैं और उससे बातें करके अपना मन बहलाती हैं। मिट्ठू भी ताई की बातें दोहराकर उन्हें खुशी देता है। दोनों के बीच गहरा लगाव और अपनापन बन जाता है। कभी दोनों प्रेम से बातें करते हैं तो कभी हल्की नोक-झोंक भी होती है, जिससे उनका रिश्ता और जीवंत दिखाई देता है।
कहानी में यह भी दिखाया गया है कि बुढ़ापे में मनुष्य को केवल भोजन या धन नहीं, बल्कि साथ और संवाद की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। जब ताई कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जाने का निर्णय लेती हैं, तब उन्हें सबसे अधिक चिंता मिट्ठू की होती है। वे उसे जगन मास्टर के घर छोड़ जाती हैं। जगन मास्टर स्वतंत्र विचारों वाले व्यक्ति थे। उन्हें पिंजरे में बंद पक्षी को देखकर दुख होता था। इसलिए वे मिट्ठू को कुछ समय के लिए आज़ाद छोड़ने लगे। एक दिन मौका मिलते ही मिट्ठू उड़ जाता है। यह घटना सभी को चिंता में डाल देती है, क्योंकि सब जानते थे कि मिट्ठू ताई के जीवन का सबसे बड़ा सहारा है। ताई के लौटने से पहले दूसरा तोता लाकर मिट्ठू की जगह रखने की कोशिश की जाती है, लेकिन वह ताई के मिट्ठू जैसा व्यवहार नहीं कर पाता। जब ताई लौटती हैं, तो उन्हें अपने असली मिट्ठू की कमी तुरंत महसूस हो जाती है। कहानी का अंत बहुत भावुक है, क्योंकि ताई का अकेलापन फिर से लौट आता है। यह कहानी मनुष्य और पशु-पक्षियों के प्रेम, बुढ़ापे की पीड़ा, पलायन की समस्या और भावनात्मक सहारे की आवश्यकता को बहुत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है।

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