आखिरी चट्टान तक – सारांश
मोहन राकेश द्वारा लिखित ‘आखिरी चट्टान तक’ एक सुंदर यात्रा-वृत्तांत है, जिसमें लेखक ने कन्याकुमारी की यात्रा के अनुभवों को बहुत ही भावपूर्ण और चित्रात्मक शैली में प्रस्तुत किया है। लेखक भारत के अंतिम छोर पर स्थित उस चट्टान को देखता है जहाँ अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी का संगम होता है। समुद्र की ऊँची-ऊँची लहरें, विशाल जलराशि और दूर तक फैला क्षितिज लेखक को प्रकृति की अद्भुत शक्ति का अनुभव कराते हैं। लेखक स्वयं को उस दृश्य का एक छोटा-सा हिस्सा महसूस करने लगता है। इसके बाद वह सूर्यास्त देखने के लिए रेत के टीलों को पार करता हुआ आगे बढ़ता है। कठिन रास्ते और थकान के बावजूद उसका मन प्रकृति के सौंदर्य को देखने के लिए उत्साहित रहता है। सूर्यास्त का दृश्य अत्यंत मनोहारी दिखाई देता है, जहाँ डूबते सूर्य के रंग बदलते हुए समुद्र और रेत को सुनहरा, लाल और फिर बैंगनी रंगों से भर देते हैं। यह दृश्य लेखक के मन में आनंद के साथ हल्की उदासी भी उत्पन्न करता है। लौटते समय बढ़ता अंधेरा और समुद्र की लहरें लेखक के मन में डर पैदा करती हैं, लेकिन अंत में वह सुरक्षित स्थान पर पहुँच जाता है। अगले दिन लेखक विवेकानंद चट्टान पर सूर्योदय देखने जाता है। वहाँ वह स्थानीय युवकों और मल्लाहों से मिलता है, जो बेरोजगारी और कठिन जीवन की बातें बताते हैं। सूर्योदय का सुंदर दृश्य, समुद्र में चमकती किरणें, मंदिर की घंटियाँ और लोगों की गतिविधियाँ कन्याकुमारी के वातावरण को जीवंत बना देती हैं। इस यात्रा-वृत्तांत में लेखक ने प्रकृति की भव्यता, समुद्र की शक्ति, मानव मन की भावनाओं, भय, रोमांच, शांति और जीवन की वास्तविकताओं को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है।

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