‘मैं और मेरा देश’ – सारांश
यह पाठ प्रसिद्ध निबंधकार कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा लिखा गया है। इस निबंध में लेखक ने व्यक्ति और देश के गहरे संबंध को बहुत सरल और प्रभावशाली ढंग से समझाया है। लेखक बताता है कि मनुष्य अपने घर, पड़ोस और नगर में रहकर बड़ा होता है। वहीं से उसे प्यार, ज्ञान, सहारा और सम्मान मिलता है। शुरू में लेखक को लगता था कि उसका घर, पड़ोस और नगर ही उसकी पूरी दुनिया है और अब उसे किसी चीज़ की कमी नहीं है। लेकिन बाद में उसे एहसास हुआ कि यदि देश सम्मानित और स्वतंत्र नहीं है, तो व्यक्ति का सम्मान भी अधूरा रह जाता है।
लेखक के विचारों में बदलाव तब आया जब उन्होंने लाला लाजपत राय के अनुभव के बारे में सुना। लाला लाजपत राय विदेशों में घूमकर आए थे और उन्होंने कहा था कि जहाँ भी वे गए, वहाँ उन्हें भारत की गुलामी का अपमान महसूस हुआ। इस बात ने लेखक को अंदर तक झकझोर दिया। तब लेखक को समझ आया कि यदि देश कमजोर या गुलाम है, तो व्यक्ति चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे पूरा सम्मान नहीं मिल सकता। इसलिए हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह ऐसा कोई काम न करे जिससे देश के सम्मान या शक्ति को नुकसान पहुँचे।
लेखक आगे समझाता है कि हर व्यक्ति अपने देश के लिए कुछ न कुछ कर सकता है। देश की सेवा केवल बड़े वैज्ञानिक, नेता या धनवान लोग ही नहीं करते, बल्कि साधारण नागरिक भी अपने छोटे-छोटे अच्छे कार्यों से देश का गौरव बढ़ा सकते हैं। लेखक कहता है कि युद्ध में केवल लड़ने वालों का ही महत्व नहीं होता, बल्कि जय-जयकार करने वालों का भी योगदान होता है। इसी तरह हर नागरिक देश की उन्नति में भागीदार होता है।
इस बात को स्पष्ट करने के लिए लेखक कई उदाहरण देता है। स्वामी रामतीर्थ जब जापान गए तो उन्हें अच्छे फल नहीं मिले। एक जापानी युवक ने यह सुनकर तुरंत फल लाकर दिए और कहा कि कृपया अपने देश जाकर यह मत कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते। उस युवक ने अपने छोटे से कार्य से अपने देश का सम्मान बढ़ाया। दूसरी ओर एक विदेशी विद्यार्थी ने जापान के पुस्तकालय से दुर्लभ चित्र चुरा लिए। उसके कारण पूरे देश के लोगों को पुस्तकालय में आने से रोक दिया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि एक व्यक्ति का अच्छा या बुरा व्यवहार पूरे देश की छवि को प्रभावित करता है।
लेखक यह भी बताता है कि किसी कार्य का महत्व उसके आकार में नहीं, बल्कि उसके पीछे की भावना में होता है। मुस्तफ़ा कमाल पाशा को एक बूढ़े किसान ने थोड़ा-सा शहद भेंट किया। वह उपहार बहुत महँगा नहीं था, लेकिन उसमें किसान का सच्चा प्रेम और सम्मान छिपा था, इसलिए राष्ट्रपति ने उसे सबसे श्रेष्ठ उपहार माना। इसी प्रकार एक किसान ने जवाहरलाल नेहरू को अपने हाथों से बनी खाट भेंट की। नेहरू जी ने उस साधारण उपहार को सम्मानपूर्वक स्वीकार किया क्योंकि उसके पीछे किसान की सच्ची भावना थी।
निबंध के अंत में लेखक बताता है कि देश को सबसे अधिक “शक्ति-बोध” और “सौंदर्य-बोध” की आवश्यकता है। नागरिकों को कभी भी अपने देश को कमजोर या हीन नहीं दिखाना चाहिए। गंदगी फैलाना, गलत बातें करना, दूसरों की बुराई करना और देश की तुलना में उसे नीचा दिखाना देश की छवि को नुकसान पहुँचाता है। इसके विपरीत स्वच्छता, अच्छे व्यवहार और सकारात्मक सोच से देश मजबूत बनता है। लेखक यह भी कहता है कि चुनाव में सही व्यक्ति को वोट देना हर नागरिक का महत्वपूर्ण कर्तव्य है, क्योंकि देश की उन्नति अच्छे नेतृत्व पर निर्भर करती है।
इस प्रकार यह निबंध हमें सिखाता है कि नागरिक और देश अलग नहीं हैं। देश का सम्मान ही नागरिक का सम्मान है। हर व्यक्ति अपने छोटे-छोटे अच्छे कार्यों, सकारात्मक सोच और जिम्मेदार व्यवहार से देश को महान बना सकता है।

Leave a Reply