अहमस्मि भारतस्य संविधानम् (मैं भारत का संविधान हूँ।)
(स्थानम् – विधान-सदनस्य (पुरातन-संसद्-भवनस्य) केन्द्रीयकक्षः। छात्राः गौरवपूर्णं वातावरणं पश्यन्ति वार्तालापं च कुर्वन्ति।)
हिंदी अनुवाद:
(स्थान — विधान-सदन अर्थात् पुराने संसद भवन का केंद्रीय कक्ष। छात्र गौरवपूर्ण वातावरण को देखते हैं और आपस में बातचीत करते हैं।)
गार्गी — (आश्चर्येण) सखि यशिके! पश्य, एतदेव तत्पावनं ‘संविधान-सदनम्’। अत्रैव अस्माकं राष्ट्रस्य भाग्यविधात्री सभा अभवत्, यत्र भारतस्य ‘आत्मा’ संविधानरूपेण आकारं प्राप्तवान्।
हिंदी अनुवाद:
गार्गी — (आश्चर्य से) सखी यशिका! देखो, यही वह पवित्र ‘संविधान-सदन’ है। यहीं हमारे राष्ट्र के भाग्य का निर्माण करने वाली सभा हुई थी, जहाँ भारत की ‘आत्मा’ ने संविधान के रूप में आकार प्राप्त किया।
यशिका — सत्यं वदसि गार्गि! पश्य पुरतः स्थापितं ‘संविधान-ग्रन्थम्’।
हिंदी अनुवाद:
यशिका — गार्गी! तुम सही कह रही हो। देखो, सामने ‘संविधान-ग्रंथ’ रखा हुआ है।
अथर्वः — अहो! एषः ग्रन्थः स्वस्य विषये वक्तुम् इच्छति इव।
हिंदी अनुवाद:
अथर्व — अरे! ऐसा लगता है जैसे यह ग्रंथ अपने बारे में कुछ कहना चाहता है।
श्रेया — अहो आश्चर्यम्, अहमपि शृणोमि ग्रन्थस्य वाणीम्।
हिंदी अनुवाद:
श्रेया — अरे, आश्चर्य है! मैं भी ग्रंथ की आवाज सुन रही हूँ।
पावनी — सर्वे तूष्णीं स्थित्वा शृण्वन्तु!
हिंदी अनुवाद:
पावनी — सभी लोग शांत होकर इसकी बात सुनें।
अयि भोः बालाः! अहमस्मि संविधानम्, भारतस्य आत्मा, अस्य राष्ट्रस्य नियमसंहिता जीवनमार्गदर्शकः च। न्यायः स्वतन्त्रता समता बन्धुत्वं च इति चतुर्भिः आधारस्तम्भैः अहं राष्ट्रस्य लोकतन्त्रं सुदृढं करोमि। राष्ट्रस्य एकतायाः अखण्डतायाः न्यायस्य शान्तेः च स्थापना एव मम मूलं लक्ष्यम्। अतः अहमस्मि राष्ट्रचेतनायाः प्रतिरूपम्। प्राचीनभारतीयग्रन्थेषु प्रतिपादिताः उदात्ताः विचाराः प्रतिपदं मयि समाहिताः।
यथा —
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।
हिंदी अनुवाद:
हे बच्चों! मैं संविधान हूँ। मैं भारत की आत्मा हूँ। मैं इस राष्ट्र की नियम-संहिता और जीवन का मार्गदर्शन करने वाला हूँ। न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व — इन चार आधार-स्तंभों के द्वारा मैं राष्ट्र के लोकतंत्र को मजबूत करता हूँ। राष्ट्र की एकता, अखंडता, न्याय और शांति की स्थापना ही मेरा मूल उद्देश्य है। इसलिए मैं राष्ट्र की चेतना का प्रतीक हूँ। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में बताए गए महान विचार मेरे प्रत्येक शब्द में समाहित हैं।
जैसे
पहले देवता एकमत होकर अपने-अपने भाग की उपासना करते थे,
उसी प्रकार तुम सब मिलकर चलो, मिलकर बोलो और तुम्हारे मन एक समान विचार वाले हों।
अहमस्मि आधारः लोकतन्त्रात्मकस्य अस्य भारतस्य। विधायिका कार्यपालिका न्यायपालिका चेति मम त्रीणि अङ्गानि। अहं विधायिकया नीतिनां निर्माणं कारयामि। अहं कार्यपालिकया नीतिनां क्रियान्वयनं कारयामि। अथ च अहं न्यायपालिकया प्रजान्यायस्य प्रजाधिकाराणां रक्षां कारयामि। जनपदन्यायालयाः उच्चन्यायालयाः उच्चतमन्यायालयः इति न्यायपालिकायाः रचना। सर्वजनहितं सर्वजनसुखं च मम परमं ध्येयम्। अहं कालानुगुणं सन्दर्भानुगुणम् आवश्यकतानुगुणं च संशोधनैः नित्यनूतनः भवामि। अहं विश्वस्य सुदृढं बृहत्तमं च लिखितसंविधानम् अस्मि। “सर्वमतसमभावः” इत्येव मम परमो भावः। सर्वेऽपि भारतीयाः मम दृष्टौ समानाः। सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक-न्यायः मम मन्त्रः।
हिंदी अनुवाद:
मैं इस लोकतांत्रिक भारत का आधार हूँ। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका मेरे तीन अंग हैं। मैं विधायिका के द्वारा नीतियों का निर्माण करवाता हूँ। मैं कार्यपालिका के द्वारा नीतियों का क्रियान्वयन करवाता हूँ। और मैं न्यायपालिका के द्वारा जनता को न्याय तथा जनता के अधिकारों की रक्षा करवाता हूँ। जिला न्यायालय, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय — ये न्यायपालिका की रचना करते हैं। सभी लोगों का हित और सभी लोगों का सुख ही मेरा परम उद्देश्य है। मैं समय के अनुसार, परिस्थितियों के अनुसार और आवश्यकताओं के अनुसार संशोधनों द्वारा निरंतर नया बनता रहता हूँ। मैं विश्व का एक मजबूत और विस्तृत लिखित संविधान हूँ। “सभी मतों के प्रति समान भाव” ही मेरा सर्वोच्च विचार है। मेरी दृष्टि में सभी भारतीय समान हैं। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय मेरा मंत्र है।
उपासनापद्धतेः स्वीकरणे च स्वातन्त्र्यस्य अहं पोषकः। प्रतिष्ठायाः अवसरस्य च समता मम दृष्टिः। व्यक्तिगरिमा राष्ट्र्रीयैकता च मम हृदयस्य अन्तर्भूतौ भावौ।
हिंदी अनुवाद:
मैं विचारों को व्यक्त करने और उपासना की पद्धति को स्वीकार करने की स्वतंत्रता का समर्थक हूँ। प्रतिष्ठा और अवसर की समानता मेरी दृष्टि है। व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्रीय एकता मेरे हृदय में समाए हुए भाव हैं।
मित्राणि! अहं मौलिकाधिकारान् अपि बोधयामि येन सर्वे सगौरवं स्वस्वं जीवनं यापयन्ति। अहं वैधानिक-उपचाराधिकारेण (अनु. ३२) प्रजाः रक्षामि। “उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्” इति भावनया सर्वेषां नागरिकाणाम् उन्नतिः मम अभीष्टा। अहमेव केन्द्रसर्वकाराय राज्यसर्वकारेभ्यश्च अधिकारान् प्रयच्छामि। अहं संसदीय-शासनपद्धतिं प्रवर्तयामि। जनाः स्वप्रतिनिधीन् चित्वा संसदि प्रेषयन्ति। अस्यां व्यवस्थायां प्रजाः एव प्रमुखाः भवन्ति। श्रेष्ठानां नेतॄणां चयनेन उत्तमसमाजस्य निर्माणं भवितुम् अर्हति, अतः जनमतस्य महत्त्वम् अत्यधिकं वर्तते।
हिंदी अनुवाद:
मित्रों! मैं मौलिक अधिकारों का भी ज्ञान कराता हूँ, जिससे सभी लोग सम्मानपूर्वक अपना जीवन जी सकें। मैं वैधानिक उपचार के अधिकार (अनुच्छेद 32) के द्वारा नागरिकों की रक्षा करता हूँ। “उदार चरित्र वाले लोगों के लिए पूरी पृथ्वी ही परिवार है” — इस भावना के द्वारा मैं सभी नागरिकों की उन्नति चाहता हूँ। मैं केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को अधिकार प्रदान करता हूँ। मैं संसदीय शासन-पद्धति को लागू करता हूँ। जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनकर संसद में भेजती है। इस व्यवस्था में जनता ही प्रमुख होती है। श्रेष्ठ नेताओं के चुनाव से उत्तम समाज का निर्माण हो सकता है, इसलिए जनमत का बहुत अधिक महत्व है।
मम एकपञ्चाशत्तमे (क) अनुच्छेदेन नागरिकाणाम् एकादश कर्तव्यानि उक्तानि सन्ति। राष्ट्रभक्तिः सामाजिकसमरसता पर्यावरणसंरक्षणं वैज्ञानिकदृष्टिः चेत्यादीनि कर्तव्यानि मम हृदयम्। उत्तमसमाजस्य निर्माणाय राष्ट्रस्य प्रगतये च सर्वाः प्रजाः स्वकर्तव्यानि पालयेयुः। सत्यमेव उच्यते — “धर्मो रक्षति रक्षितः”। विचारस्वातन्त्र्यस्य लोकतान्त्रिकमूल्यानां च अहं प्रतीकभूतम्। “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” इति वेदोक्तिम् अहम् अनुसरामि। सर्वे निर्भीकाः स्युः, सर्वत्र सुशासनं स्यादिति मम कामनाः।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।।
हिंदी अनुवाद:
मेरे अनुच्छेद 51(क) में नागरिकों के ग्यारह कर्तव्य बताए गए हैं। राष्ट्रभक्ति, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि कर्तव्य मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। उत्तम समाज के निर्माण और राष्ट्र की प्रगति के लिए सभी नागरिकों को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। सत्य ही कहा गया है — “धर्म की रक्षा करने वाले की धर्म रक्षा करता है।” मैं विचारों की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक हूँ। “हमारे पास सभी दिशाओं से कल्याणकारी विचार आएँ” — मैं इस वेद-वचन का अनुसरण करता हूँ। सभी लोग निर्भय हों और हर जगह सुशासन हो — यही मेरी कामना है।
सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त हों।
सभी को शुभ दिखाई दे और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।
छात्राः — जयतु भारतम्! जयतु संविधानम्!
हिंदी अनुवाद:
छात्र — भारत की जय हो! संविधान की जय हो!


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