स्वाध्यायाय्ना प्रमदः (पढ़ाई करने में लापरवाही मत करो।)
(छात्राः विद्यालयाद् बहिः भित्तौ लग्नं विशालं पत्रं पश्यन्ति)
छात्र विद्यालय के बाहर दीवार पर लगे विशाल पोस्टर को देखते हैं।
वेदप्रकाशः – राजेश! किमर्थमत्र भित्तिपत्रं संलग्नम्?
हिन्दी: वेदप्रकाश – राजेश! यहाँ दीवार पर पोस्टर क्यों लगा है?
राजेशः – विश्वविद्यालये समावर्तनोत्सवः भविष्यति, तदर्थमेतत् विशालं रमणीयं भित्तिपत्रम्।
हिन्दी: राजेश – विश्वविद्यालय में दीक्षान्त समारोह (समारोह) होगा, उसी के लिए यह विशाल और सुंदर पोस्टर है।
कात्यायनी – समावर्तनोत्सुवे किं भविष्यति?
हिन्दी: कात्यायनी – दीक्षान्त समारोह में क्या होगा?
सुजाता – अरे, न जानासि? सभा भविष्यति, प्रमाणपत्रवितरणं च भविष्यति।
हिन्दी: सुजाता – अरे, नहीं जानती? सभा होगी और प्रमाण-पत्रों का वितरण होगा।
राजेशः – कश्चित् विशिष्टः विद्वान् पदाधिकारी वा आगत्य दीक्षान्तभाषणं करिष्यति।
हिन्दी: राजेश – कोई विशिष्ट विद्वान् या अधिकारी आकर दीक्षान्त भाषण करेंगे।
कात्यायनी – दीक्षान्तः नाम किम्?
हिन्दी: कात्यायनी – दीक्षान्त का क्या अर्थ है?
वेदप्रकाशः – अहमपि न जानामि, अस्मिन् विषये अध्यापकमेव प्रक्ष्यामः।
हिन्दी: वेदप्रकाश – मैं भी नहीं जानता, इस विषय में अध्यापक से ही पूछेंगे।
(अध्यापकः पृष्ठतः छात्राणां वार्तालापं श्रुत्वा)
अध्यापक पीछे से छात्रों की बातचीत सुनकर
अध्यापकः – अयि छात्राः! चिन्ता मास्तु, सर्वं बोधयिष्यामि। प्राचीनकालीना शिक्षाव्यवस्था अतीव स्पृहणीया आसीत्। बालाः गुरुकुलेषु स्थित्वा गुरुभ्यः विद्याध्ययनं कुर्वन्ति स्म।
हिन्दी: अध्यापक – अरे छात्रो! चिंता मत करो, सब समझाऊँगा। प्राचीन काल की शिक्षा व्यवस्था अत्यधिक प्रशंसनीय (आदरयोग्य) थी। बालक गुरुकुलों में रहकर गुरुओं से विद्या अध्ययन करते थे।
वेदप्रकाशः – महोदय! तत्र छात्राः किं किं पठन्ति स्म?
हिन्दी: वेदप्रकाश – महोदय! वहाँ छात्र क्या-क्या पढ़ते थे?
अध्यापकः – तत्र विशेषतः धर्म-दर्शन-विज्ञान-वेदवेदाङ्गानाम् अध्ययनम् अध्यापनं च भवतः स्म। विद्यार्थिनः प्रायेण तत्र द्वादशवर्षाणि यावत् पठन्ति स्म। अध्ययनसमाप्तौ गुरुकुलात् स्वगृहं गच्छन्ति स्म। शिक्षान्ते समावर्तनोत्सवः भवतः स्म। आचार्यः समावर्तनकाले अन्तेवासिभ्यः उपदिशति स्म। तादृशः उपदेशमूलकः सारस्वतकार्यक्रमः अधुनापि आचर्यते। स एव दीक्षान्तः।
हिन्दी: अध्यापक – वहाँ विशेष रूप से धर्म, दर्शन, विज्ञान और वेद-वेदांगों का अध्ययन एवं अध्यापन होता था। विद्यार्थी प्रायः वहाँ बारह वर्षों तक पढ़ते थे। अध्ययन समाप्त होने पर गुरुकुल से अपने घर जाते थे। शिक्षा के अंत में समावर्तन (दीक्षान्त) समारोह होता था। आचार्य समावर्तन के समय शिष्यों (अन्तेवासियों) को उपदेश देते थे। वैसा उपदेशात्मक सारस्वत (ज्ञान संबंधी) कार्यक्रम आज भी आयोजित किया जाता है। वही दीक्षान्त है।
छात्राः – आचार्य! तदानीं दीक्षान्ते किं किम् उपदिशति स्म?
हिन्दी: छात्र – आचार्य! उस समय दीक्षान्त में क्या-क्या उपदेश दिया जाता था?
अध्यापकः – अस्तु, अवहिताः शृणुत।
हिन्दी: अध्यापक – ठीक है, ध्यानपूर्वक सुनो।
कृष्णयजुर्वेदान्तर्गता काचित् उपनिषद् वर्तते, तैत्तिरीयोपनिषद् इति। तत्र शिक्षावल्ली आनन्दवल्ली भृगुवल्लीति भागत्रयमस्ति। विशेषतः नैतिक-शैक्षिकोपदेशनिमित्तं शिक्षावल्ली प्रसिद्धा। तत्र शिष्यः स्वाधीतविद्यायाः जीवने सदुपयोगं कथं कुर्यात् इति सुष्ठु प्रकाशितम्। तदेव अनुसरणीयम् अस्माभिः। शृण्वन्तु ततः कानिचन उपदेशवाक्यानि।
कृष्ण यजुर्वेद के अंतर्गत ‘तैत्तिरीयोपनिषद्’ नामक एक उपनिषद् है। उसमें शिक्षावल्ली, आनंदवल्ली और भृगुवल्ली – ये तीन भाग हैं। विशेष रूप से नैतिक और शैक्षणिक उपदेश के लिए शिक्षावल्ली प्रसिद्ध है। उसमें शिष्य अपनी पढ़ी हुई विद्या का जीवन में सदुपयोग कैसे करे, यह भली-भाँति प्रकाशित किया गया है। हमें भी उसी का अनुसरण करना चाहिए। अब वहाँ से कुछ उपदेश-वाक्यों को सुनो:
हिन्दी:
कृष्ण यजुर्वेद के अंतर्गत ‘तैत्तिरीयोपनिषद्’ नामक एक उपनिषद् है। उसमें शिक्षावल्ली, आनंदवल्ली और भृगुवल्ली – ये तीन भाग हैं। विशेष रूप से नैतिक और शैक्षणिक उपदेश के लिए शिक्षावल्ली प्रसिद्ध है। उसमें शिष्य अपनी पढ़ी हुई विद्या का जीवन में सदुपयोग कैसे करे, यह भली-भाँति प्रकाशित किया गया है। हमें भी उसी का अनुसरण करना चाहिए। अब वहाँ से कुछ उपदेश-वाक्यों को सुनो:
“वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति। सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम्। स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्। देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्। मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि। नो इतराणि। यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि। नो इतराणि। श्रद्धया देयम्। अश्रद्धयाऽदेयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्। एष आदेशः। एष उपदेशः। एषा वेदोपनिषत्। एतदनुशासनम्। एवमुपासितव्यम्।”
हिन्दी:
वेद पढ़ाकर आचार्य शिष्य को उपदेश देता है| सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। स्वाध्याय से आलस्य मत करो। सत्य से विमुख (प्रमाद) नहीं होना चाहिए। धर्म से विमुख नहीं होना चाहिए। अपने कल्याणकारी कार्यों से विमुख नहीं होना चाहिए। उन्नति और ऐश्वर्य देने वाले कार्यों से विमुख नहीं होना चाहिए। स्वाध्याय और प्रवचन (पढ़ाने) से आलस्य नहीं करना चाहिए। देवकार्य और पितृकार्य से विमुख नहीं होना चाहिए। माता को देवता मानने वाले बनो। पिता को देवता मानने वाले बनो। आचार्य को देवता मानने वाले बनो। अतिथि को देवता मानने वाले बनो। जो निंदारहित (श्रेष्ठ) कर्म हैं, उन्हीं का सेवन करना चाहिए, दूसरों का नहीं। जो हमारे अच्छे आचरण हैं, उन्हीं की तुम्हें उपासना (अनुकरण) करनी चाहिए, दूसरों की नहीं। श्रद्धा से दान देना चाहिए। अश्रद्धा से नहीं देना चाहिए। अपनी संपत्ति के अनुसार देना चाहिए। लज्जापूर्वक देना चाहिए। भय से (नम्रता से) देना चाहिए। विवेकपूर्वक तथा मैत्री भाव से देना चाहिए। यही आज्ञा है। यही उपदेश है। यही वेदों का रहस्य (सार) है। यही अनुशासन है। ऐसा ही आचरण करना चाहिए।


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