सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः
भारतीयधर्मशास्त्रेषु अनेकाः सूक्तयः विद्यन्ते, याः मानवजीवनस्य
यथार्थतत्त्वं प्रतिपादयन्ति। तेष्वेकं प्रसिद्धं सूत्ररूपं वाक्यं
कौटिल्यस्य अर्थशास्त्रे अस्ति —
“सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः।”
भारतीय धर्मशास्त्रों में अनेक सूक्तियाँ (सुभाषित वचन) मिलती हैं, जो मानव-जीवन के वास्तविक सत्य को प्रकट करती हैं। उनमें से एक प्रसिद्ध सूत्र-रूप वाक्य कौटिल्य के अर्थशास्त्र में है —
“सुख का मूल धर्म है और धर्म का मूल अर्थ (धन) है।”
इस पाठ की शुरुआत कौटिल्य के अर्थशास्त्र के एक प्रसिद्ध वचन से होती है। इसका अर्थ है कि सच्चे सुख की नींव धर्म है और धर्म की नींव अर्थ अर्थात् धन है — इसलिए ईमानदारी से धन कमाना अत्यन्त आवश्यक है।
अस्य आशयः अस्ति यत् वास्तविकसुखस्य आधारः धर्मः,
धर्मपालनस्य च आधारः अर्थः। अर्थः इत्युक्ते धनं, यत्
सर्वविधस्य आजीविकाव्यवहारस्य प्रमुखं साधनम्।
इसका आशय यह है कि वास्तविक सुख का आधार धर्म है और धर्म-पालन का आधार अर्थ (धन) है। अर्थ का मतलब है धन, जो सभी प्रकार के जीविका-व्यवहार (आजीविका के कार्यों) का प्रमुख साधन है।
यहाँ स्पष्ट किया गया है कि धन ही जीवन में धर्म और सुख दोनों का आधार है। बिना उचित धन के न धर्म का पालन हो सकता है, न सच्चा सुख मिल सकता है।
जीवने धर्मः, अर्थः, सुखम् इत्येतेषां त्रयाणां
परस्परसम्बन्धः अविच्छिन्नः अस्ति। यः जनः
न्यायपूर्वकम् अर्थोपार्जनं करोति, सः धर्मपालनं
कर्तुं समर्थः भवति, धर्मपालनेन च दीर्घकालिकं
सुखं लभते।
जीवन में धर्म, अर्थ और सुख — इन तीनों का आपसी सम्बन्ध अटूट है। जो व्यक्ति न्यायपूर्वक (ईमानदारी से) धन कमाता है, वह धर्म का पालन करने में समर्थ होता है और धर्म-पालन से वह दीर्घकालिक (स्थायी) सुख प्राप्त करता है।
धर्म, अर्थ और सुख — ये तीनों एक-दूसरे से जुड़े हैं। ईमानदारी से कमाया हुआ धन ही धर्मपालन और स्थायी सुख का आधार बनता है।
सामान्यजीवने अन्नं, वस्त्रम्, आवासः, शिक्षा,
स्वास्थ्यसेवा चेत्यादीनां मूलभूतानाम्
आवश्यकतानां पूर्तये धनम् आवश्यकम्।
पर्याप्तधनस्य अभावात् स्वकर्तव्यपालनं
कठिनं भवति। स्वास्थ्यं, शिक्षा, सेवा, दानम्
चेत्यादीनि कार्याणि बाधितानि भवन्ति।
दैनन्दिनजीवनं च असन्तुलितं भवति।
सामान्य जीवन में अन्न (भोजन), वस्त्र, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य-सेवा आदि मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन आवश्यक है। पर्याप्त धन के अभाव में अपने कर्तव्यों का पालन करना कठिन हो जाता है। स्वास्थ्य, शिक्षा, सेवा और दान आदि सभी कार्य बाधित हो जाते हैं और दैनन्दिन जीवन भी असन्तुलित हो जाता है।
जीवन की बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के लिए धन अनिवार्य है। पैसे के बिना न केवल जीवन कठिन होता है, बल्कि धर्म-कार्य, दान और सेवा जैसे अच्छे काम भी रुक जाते हैं।
अतः धर्मशास्त्रे चतुर्वर्गेषु धर्मार्थकाममोक्षेषु अर्थः
अन्यतमः स्तम्भः इति गण्यते।
इसीलिए धर्मशास्त्र में चार पुरुषार्थों — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — में अर्थ को एक महत्त्वपूर्ण स्तम्भ (आधार-स्तम्भ) माना गया है।
भारतीय परम्परा में जीवन के चार लक्ष्य बताए गए हैं — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनमें अर्थ अर्थात् धन को भी उतना ही आवश्यक माना गया है जितना धर्म और मोक्ष को।
“ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्।”
ब्राह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले का समय) में उठकर धर्म और अर्थ दोनों के विषय में सोचना चाहिए।
गरुड़पुराण का यह वचन सिखाता है कि दिन का आरम्भ धर्म और अर्थ — दोनों के विचार से करना चाहिए। इससे हमारा जीवन सन्तुलित और सफल बनता है।
स्वस्थः आर्थिकव्यवहारः त्रिविधः भवति —
न्यायपूर्णम् अर्थोपार्जनम् — सन्मार्गेण एव धनार्जनं करणीयम् इति।
स्वस्थ आर्थिक व्यवहार तीन प्रकार का होता है —
पहला है न्यायपूर्ण अर्थोपार्जन (उचित तरीके से धन-कमाना) — अर्थात् सत्य मार्ग से ही धन कमाना चाहिए।
उचित आर्थिक जीवन के लिए पहली बात यह है कि धन हमेशा ईमानदारी और न्यायपूर्ण तरीके से ही कमाया जाए। गलत तरीके से कमाया धन न धर्म का पालन कर सकता है, न सुख दे सकता है।
सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्।
योऽर्थे शुचिर्हि सः शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः ॥
सभी प्रकार की शुद्धियों में अर्थ (धन) की शुद्धि सबसे श्रेष्ठ मानी गई है। जो व्यक्ति धन के विषय में शुद्ध (ईमानदार) है, वही वास्तव में शुद्ध है; मिट्टी और पानी से शरीर साफ करने वाला व्यक्ति सच्चे अर्थों में शुद्ध नहीं होता।
मनु महाराज का यह श्लोक सिखाता है कि बाहरी सफाई से बड़ी शुद्धि आर्थिक ईमानदारी की है। जो व्यक्ति धन के लेन-देन में पवित्र है, वही सच्चे अर्थों में पवित्र कहलाता है।
अस्य आशयः यत् अनैतिकः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः।
“मा गृधः कस्यस्विद्धनम्” इति उपनिषदः वाक्यं सततं मनसि निधाय
स्वकौशलेन विद्यया च धनम् उपार्जनीयम्।
इसका आशय यह है कि अनैतिक (गलत तरीके का) आर्थिक व्यवहार कभी नहीं करना चाहिए। “किसी के भी धन का लालच मत करो” — उपनिषद के इस वाक्य को हमेशा मन में रखकर अपने कौशल और विद्या से धन कमाना चाहिए।
उपनिषद की यह शिक्षा है कि दूसरों के धन का लालच न करें और अपनी योग्यता व परिश्रम से ही आजीविका कमाएँ। यही ईमानदारी का सच्चा मार्ग है।
औचित्यपूर्णः व्ययः — आवश्यकतानुसारं व्ययः करणीयः।
येन व्ययेन स्वास्थ्यलाभः विद्यार्जनम् आत्मसुरक्षा वा भवेत्,
सः व्ययः अवश्यं करणीयः। आडम्बरपूर्णः प्रदर्शनकारी व्ययः
अथवा विलासव्यसनाय व्ययः अपव्ययः भवति।
अपव्ययः वर्जनीयः, अतः प्रत्येकं व्ययस्य लेखः स्थापनीयः।
अन्ते च तेषां परिशीलनं करणीयम्।
दूसरा है — औचित्यपूर्ण व्यय (उचित खर्च) — आवश्यकता के अनुसार खर्च करना चाहिए। जिस खर्च से स्वास्थ्य-लाभ हो, विद्या प्राप्त हो या आत्मरक्षा हो — वह खर्च अवश्य करना चाहिए। दिखावे के लिए किया गया आडम्बरपूर्ण खर्च या विलास-व्यसन के लिए किया गया खर्च अपव्यय (फ़िजूलखर्ची) है। अपव्यय से बचना चाहिए; इसलिए प्रत्येक खर्च का हिसाब रखना चाहिए और अन्त में उसकी समीक्षा करनी चाहिए।
उचित खर्च वह है जो जीवन के लिए सचमुच आवश्यक हो — जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा। दिखावे और विलास पर किया गया खर्च फ़िजूलखर्ची है जिससे बचना चाहिए। खर्च का हिसाब रखना एक अच्छी आदत है।
भविष्यदृष्ट्या सञ्चयः — उपार्जितधनस्य कश्चन भागः
भविष्यसुरक्षायै सञ्चयनीयः। सञ्चयस्य अभ्यासेन जनः
स्वावलम्बी भवति। स्वावलम्बनं स्वाभिमानस्य मूलं वर्तते।
संकटकालेऽपि स्वाभिमानिजनः अन्यजनस्य
आर्थिकसहायतां नापेक्षते।
तीसरा है — भविष्य को देखते हुए संचय (बचत) — कमाए हुए धन का कुछ भाग भविष्य की सुरक्षा के लिए बचाना चाहिए। बचत की आदत से व्यक्ति स्वावलम्बी (आत्मनिर्भर) बन जाता है। स्वावलम्बन ही स्वाभिमान की नींव है। संकट के समय भी स्वाभिमानी व्यक्ति को दूसरों से आर्थिक सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ती।
बचत करना एक महत्त्वपूर्ण आदत है। जो व्यक्ति नियमित रूप से कुछ धन बचाता है, वह भविष्य में आत्मनिर्भर रहता है और कठिन समय में भी दूसरों पर निर्भर नहीं होता — यही सच्चा स्वाभिमान है।
अनेकदा छात्राः मातापितृभ्यां कष्टार्जितधनस्य
तुच्छकारणैः अपव्ययं कुर्वन्ति। जिह्वालालसापूर्त्यर्थं
त्वरिताहारः, शीतपेयं, पुटीकृतभोजनं, तथैव
व्यसनपदार्थानां सेवनं, प्रदर्शनकारिपरिधानं
विलासितापूर्णम् आचरणं चेत्यादि यत्र
प्रभूतः अपव्ययः भवति। एतैः न केवलं
धनहानिः, स्वास्थ्यहानिरपि जायते।
स्वास्थ्यहानिकारणात् पुनः धनव्ययो वर्धते।
अनेक बार छात्र माता-पिता के कष्ट से कमाए हुए धन को छोटी-छोटी, तुच्छ बातों पर बर्बाद कर देते हैं। जीभ के स्वाद की पूर्ति के लिए फास्ट-फूड, शीतल पेय (कोल्ड ड्रिंक), पैकेट-बन्द भोजन, व्यसन-पदार्थों का सेवन, दिखावे वाले कपड़े और विलासितापूर्ण आचरण — इन सबमें अत्यधिक फ़िजूलखर्ची होती है। इनसे न केवल धन की हानि होती है, बल्कि स्वास्थ्य की भी हानि होती है और स्वास्थ्य-हानि के कारण फिर से अधिक धन खर्च होता है।
छात्रों को समझना चाहिए कि माता-पिता कड़ी मेहनत से धन कमाते हैं। उसे फास्ट-फूड और दिखावे पर बर्बाद करना न केवल आर्थिक नुकसान है बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः।
स क्रमः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥
जल की बूँदें गिरने से धीरे-धीरे घड़ा भर जाता है। यही क्रम सभी विद्याओं के, धर्म के और धन के (संचय के लिए भी) होता है।
चाणक्य का यह श्लोक सिखाता है कि जैसे एक-एक बूँद से घड़ा भरता है, वैसे ही थोड़ी-थोड़ी बचत धीरे-धीरे बड़ी सम्पत्ति बन जाती है। धैर्यपूर्वक नियमित बचत करना ही सफलता का मार्ग है।
लघु-लघुः सञ्चयोऽपि कालान्तरे महत्सम्पत्तिरूपेण वर्धते।
यदि छात्राः प्रतिदिनम् अल्पधनस्यापि सञ्चयं कुर्वन्ति,
तस्य उचितनिवेशं च कुर्वन्ति तर्हि तेषां भविष्यं
सुरक्षितं भवेत्।
छोटी-छोटी बचत भी समय बीतने के साथ बड़ी सम्पत्ति के रूप में बढ़ जाती है। यदि छात्र प्रतिदिन थोड़ी-सी भी बचत करें और उसे उचित स्थान पर निवेश करें, तो उनका भविष्य सुरक्षित हो सकता है।
रोज़ थोड़ी-थोड़ी बचत करना और उसे सही जगह निवेश करना — यही आर्थिक सुरक्षा का सरल उपाय है। विद्यार्थी काल से ही यह आदत अपनानी चाहिए।
भारतदेशे धनसञ्चयस्य सुरक्षितनिवेशस्य च कृते
बहुविधाः मार्गाः सन्ति। तेषु प्रधानमन्त्री-जनधनयोजना,
सुकन्या-समृद्धि-योजना, सार्वजनिक-भविष्य-निधिः,
वरिष्ठ-नागरिक-संचय-योजना, किसान-विकास-पत्रं,
राष्ट्रिय-संचयप्रमाणपत्रं, राष्ट्रिय-पेंशन-योजना,
नियतनिक्षेपः, आवृत्तिनिक्षेपः चेत्याद्याः प्रमुखाः सन्ति।
भारत देश में धन-संचय (बचत) और सुरक्षित निवेश के लिए अनेक प्रकार के मार्ग उपलब्ध हैं। उनमें प्रमुख हैं — प्रधानमन्त्री जनधन योजना (PMJDY), सुकन्या समृद्धि योजना (SSY), सार्वजनिक भविष्य निधि (PPF), वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (SCSS), किसान विकास पत्र (KVP), राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र (NSC), राष्ट्रीय पेंशन योजना (NPS), सावधि जमा / फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और आवर्ती जमा / रिकरिंग डिपॉजिट (RD)।
भारत सरकार ने सभी नागरिकों के लिए बचत और निवेश की कई सुरक्षित योजनाएँ बनाई हैं। इन योजनाओं में पैसा लगाने से धन सुरक्षित भी रहता है और चक्रवृद्धि ब्याज से बढ़ता भी है।
एतासां सर्वकारीययोजनानां विषये सूचनाः
लब्धुं लाभमवाप्तुं च समीपस्थवित्तागाराः
पत्रालयाः वा गन्तव्याः, तत्सम्बद्धाः
अधिकारिणः च प्रष्टव्याः। एतासु योजनासु
न केवलं कष्टार्जितधनस्य सुरक्षा भवति
अपि तु चक्रवृद्ध्यंशेन सह तद्धनं
सततं वर्धमानं भवति।
इन सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करने और उनका लाभ उठाने के लिए निकट के बैंक (वित्तागार) या डाकघर (पत्रालय) जाना चाहिए और उससे सम्बन्धित अधिकारियों से पूछना चाहिए। इन योजनाओं में न केवल कठिनाई से कमाए हुए धन की सुरक्षा होती है, बल्कि चक्रवृद्धि ब्याज (Compound Interest) के साथ वह धन निरन्तर बढ़ता भी रहता है।
सरकारी योजनाओं की जानकारी बैंक या डाकघर से मिलती है। इनमें निवेश करने से धन सुरक्षित रहता है और चक्रवृद्धि ब्याज के कारण समय के साथ बढ़ता जाता है — जो भविष्य को आर्थिक रूप से मज़बूत बनाता है।
भौतिकतावादियुगस्य आकर्षणेन युनामपव्ययः अधिको भवति
येन कारणेन अस्माकम् आर्थिकस्थितिः विपन्ना भवति।
किन्तु अर्थविषयकसचेतनता अस्मान् अभावात् उद्धृत्य
आर्थिकसम्पन्नतां प्रति नयति। अतः बुद्धिमतां छात्राणां
ध्येयं स्यात् — धनस्य उचितोपार्जनम्, व्ययस्य मर्यादा,
आपत्कालीननिधिसञ्चयः, दीर्घकालीननिवेशश्च।
भौतिकतावादी युग (आधुनिक उपभोक्ता युग) के आकर्षण से युवाओं में फ़िजूलखर्ची अधिक होती है, जिसके कारण हमारी आर्थिक स्थिति दुर्बल (कमज़ोर) हो जाती है। किन्तु अर्थ-विषयक जागरूकता (वित्तीय साक्षरता) हमें अभाव से निकालकर आर्थिक समृद्धि की ओर ले जाती है। इसलिए बुद्धिमान छात्रों का लक्ष्य होना चाहिए — धन का उचित अर्जन, व्यय में संयम, आपातकाल के लिए निधि-संचय और दीर्घकालिक निवेश।
आधुनिक युग में विज्ञापनों और भौतिक सुखों के कारण युवा अधिक खर्च करते हैं। लेकिन वित्तीय साक्षरता — यानी पैसे की सही समझ — हमें गरीबी से उठाकर समृद्धि तक पहुँचाती है। ईमानदारी से कमाना, संयम से खर्चना, बचत करना और निवेश करना — यही समझदार छात्र का लक्ष्य होना चाहिए।
यः एतेषाम् अनुशासनेन पालनं करोति, स एव यथार्थतः
धनस्य धर्मस्य च सन्तोलनं स्थापयितुं शक्नोति।
यः विद्यार्थी अद्य अर्थविषये जागरूकोऽस्ति,
सः भविष्ये उत्तरदायी नागरिको भवति।
धर्मः, अर्थः, सुखम् चेत्येतेषां सन्तोलनम् एव
यथार्थजीवनस्य लक्षणम्।
जो व्यक्ति इन सिद्धान्तों का अनुशासन के साथ पालन करता है, वही वास्तव में धन और धर्म में सन्तुलन स्थापित करने में समर्थ होता है। जो विद्यार्थी आज अर्थ-विषय में जागरूक है, वह भविष्य में एक उत्तरदायी नागरिक (जिम्मेदार नागरिक) बनता है। धर्म, अर्थ और सुख — इन तीनों का सन्तुलन ही वास्तविक जीवन का लक्षण (पहचान) है।
धन और धर्म में सन्तुलन बनाने वाला व्यक्ति ही एक आदर्श नागरिक बनता है। जो छात्र आज से ही आर्थिक विषयों में सजग हो जाता है, वह भविष्य में एक जिम्मेदार और समृद्ध नागरिक के रूप में जीवन जीता है।
क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥
एक-एक क्षण और एक-एक कण (अनाज के दाने के समान) का उपयोग करते हुए विद्या और धन दोनों को प्राप्त करना चाहिए। यदि एक-एक क्षण (समय) नष्ट हो जाए तो विद्या कहाँ से मिलेगी? और यदि एक-एक कण नष्ट हो जाए तो धन कहाँ से प्राप्त होगा?
यह श्लोक समय और धन दोनों के महत्त्व को एक साथ समझाता है। जैसे एक-एक पल से जीवन बनता है और एक-एक दाने से अन्न भंडार भरता है, वैसे ही समय का सदुपयोग करने से विद्या मिलती है और धन का सदुपयोग करने से सम्पत्ति बनती है। इसलिए न समय बर्बाद करो, न धन।

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