योऽधीतविद्य: सकलः स सर्वेषां गुरुभवेत्
(जो व्यक्ति अच्छी तरह से विद्या प्राप्त कर लेता है, वह सभी का गुरु बन जाता है।)
प्राचीनभारतीयेषु अध्ययनविषयेषु नीतिशास्त्रस्य महत्त्वपूर्णं स्थानं विद्यते। नीतिशास्त्रं धर्मशास्त्रस्य एव अङ्गम्। नीतिशास्त्रवाङ्मये शुक्रनीतिग्रन्थस्य विशिष्टं स्थानमस्ति। अयं ग्रन्थः शुक्राचार्येण विरचितः। अस्मिन् शुक्रनीतिग्रन्थे राज्यव्यवस्था, दण्डनीतिः, अर्थनीतिः, प्रजापालनं, शिक्षाव्यवस्था, सामाजिकव्यवस्था इत्यादयः विषयाः विस्तरेण निरूपिताः सन्ति। लोककल्याणस्य, सुशासनस्य, आदर्शसमाजस्य च स्थापनायै अयं ग्रन्थः मार्गदर्शकः अस्ति। अयं पाठः शुक्रनीतेः चतुर्थस्य अध्यायस्य तृतीयप्रकरणतः संकलितः। अस्मिन् पाठे विद्यानां, शास्त्राणां, कलानां च लक्षणानि भेदाः च प्रतिपादिताः।
हिन्दी अनुवाद
प्राचीन भारत के अध्ययन-विषयों में नीतिशास्त्र का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र का ही एक अंग है। नीतिशास्त्र के साहित्य में शुक्रनीति ग्रन्थ का विशेष स्थान है। इस ग्रन्थ की रचना शुक्राचार्य ने की है। इस शुक्रनीति ग्रन्थ में राज्य-व्यवस्था, दण्डनीति, अर्थनीति, प्रजा का पालन, शिक्षा-व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था आदि विषयों का विस्तार से वर्णन किया गया है। लोककल्याण, सुशासन और आदर्श समाज की स्थापना के लिए यह ग्रन्थ मार्गदर्शक है। यह पाठ शुक्रनीति के चौथे अध्याय के तीसरे प्रकरण से संकलित है। इस पाठ में विद्याओं, शास्त्रों और कलाओं के लक्षण तथा उनके भेद बताए गए हैं।
श्लोक १
योऽधीतविद्यः सकलः स सर्वेषां गुरुर् भवेत्।
न च जात्याऽनधीतिः यो गुरुर् भवितुमर्हति॥१॥
हिन्दी अनुवाद
जिस व्यक्ति ने सभी विद्याओं का अध्ययन किया है, वही सबका गुरु हो सकता है। जिसने विद्या का अध्ययन नहीं किया है, वह केवल जाति या जन्म के आधार पर गुरु बनने योग्य नहीं होता।
भावार्थ
जिस व्यक्ति ने सभी विद्याओं और कलाओं का अच्छी प्रकार अध्ययन किया है, वही सबका गुरु बनने योग्य है। जो व्यक्ति विद्या का अध्ययन नहीं करता, वह केवल अपनी जाति के कारण गुरु बनने का अधिकारी नहीं हो सकता।
श्लोक २
विद्या ह्यनन्ताश्च कलाः संख्यातुं नैव शक्यते।
विद्या मुख्याश्च द्वात्रिंशच्चतुःषष्टिः कलाः स्मृताः॥२॥
हिन्दी अनुवाद
विद्याएँ और कलाएँ अनन्त हैं, इसलिए उनकी गणना नहीं की जा सकती। फिर भी मुख्य विद्याएँ बत्तीस और कलाएँ चौंसठ मानी गई हैं।
भावार्थ
विद्याएँ और कलाएँ अनन्त हैं। इसलिए उनकी संख्या गिनना संभव नहीं है। फिर भी सामान्य रूप से बत्तीस मुख्य विद्याएँ और चौंसठ कलाएँ प्रसिद्ध मानी गई हैं।
श्लोक ३
यद्यत्स्याद्वाचिकं सम्यक्कर्म विद्याभिसंज्ञकम्।
शक्ततो मूकॊऽपि यत्कर्तुं कलासंज्ञं तु तत्स्मृतम्॥३॥
हिन्दी अनुवाद
जो कार्य वाणी के द्वारा अच्छी तरह किया जाता है, उसे विद्या कहा जाता है। और जो कार्य मूक (जो बोल नहीं सकता) व्यक्ति भी कर सकता है, उसे कला कहा गया है।
भावार्थ
जो कार्य वाणी और ज्ञान के द्वारा किया जाता है, वह विद्या कहलाता है। जो कार्य बिना बोलने के भी किया जा सकता है, वह कला कहलाता है।
श्लोक ४
उक्तं संक्षेपतो लक्ष्म विशिष्टं पृथगुच्यते।
विद्यानां च कलानां च नामानि तु पृथक् पृथक्॥४॥
हिन्दी अनुवाद
विद्याओं और कलाओं के लक्षण संक्षेप में बताए गए हैं। अब उनके विशेष लक्षण और उनके नाम अलग-अलग बताए जाते हैं।
श्लोक ५
ऋग्यजुःसाम चाथर्ववेदाः आयुर्धनुः क्रमात्।
गान्धर्वश्चैव तन्त्राणि उपवेदाः प्रकीर्तिताः॥५॥
हिन्दी अनुवाद
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये चार वेद हैं। क्रमशः आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और तन्त्र आदि उपवेद कहे गए हैं।
भावार्थ
चार वेद हैं—
ऋग्वेद
यजुर्वेद
सामवेद
अथर्ववेद
और चार उपवेद माने गए हैं—
आयुर्वेद
धनुर्वेद
गान्धर्ववेद
तन्त्रवेद / अर्थवेद
श्लोक ६
शिक्षा व्याकरणं कल्पो निरुक्तं ज्योतिषं तथा।
छन्दः षडङ्गानीमानि वेदानां कीर्तितानि हि॥६॥
हिन्दी अनुवाद
शिक्षा, व्याकरण, कल्प, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द—ये वेदों के छह अंग कहे गए हैं।
वेदाङ्ग
वेदों के छः अंग हैं—
शिक्षा
व्याकरण
कल्प
निरुक्त
ज्योतिष
छन्द
श्लोक ७
मीमांसातर्कसांख्यानि वेदान्तो योग एव च।
इतिहासाः पुराणानि स्मृतयो नास्तिकं मतम्॥७॥
हिन्दी अनुवाद
मीमांसा, तर्क, सांख्य, वेदान्त और योग; इतिहास, पुराण, स्मृतियाँ तथा नास्तिक मत—ये भी विद्याओं के प्रकार हैं।
श्लोक ८
अर्थशास्त्रं कामशास्त्रं तथा शिल्पमलङ्कृतिः।
काव्यानि देशभाषाऽवसरोक्तिर्यावनं मतम्॥८॥
हिन्दी अनुवाद
अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, शिल्प, अलंकार, काव्य, देशभाषा, अवसर के अनुसार उचित वचन बोलने की कला तथा यवनों की विद्या—ये भी विद्याएँ हैं।
श्लोक ९
देशादिधर्मा द्वात्रिंशदेताः विद्याभिसंज्ञिताः।
स्वस्वधर्मपरो लोको यस्य राष्ट्रे प्रवर्तते॥९॥
हिन्दी अनुवाद
देश आदि के धर्मों सहित ये बत्तीस विद्याएँ कही गई हैं। जिस राष्ट्र में लोग अपने-अपने धर्म और कर्तव्य के पालन में लगे रहते हैं, वह राष्ट्र श्रेष्ठ होता है।
श्लोक १०
धर्मनीतिपरो राजा चिरं कीर्तिं स चाश्नुते।
भूमौ यावद्यस्य कीर्तिस्तावत्स्वर्गे स तिष्ठति॥१०॥
हिन्दी अनुवाद
धर्म और नीति का पालन करने वाला राजा लंबे समय तक कीर्ति प्राप्त करता है। जब तक पृथ्वी पर उसकी कीर्ति रहती है, तब तक वह स्वर्ग में प्रतिष्ठित रहता है।
भावार्थ
जिस राष्ट्र के लोग अपने-अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करते हैं, वह राष्ट्र श्रेष्ठ बनता है। जो राजा धर्मपरायण और नीतिमान होता है, वह लंबे समय तक प्रसिद्धि प्राप्त करता है। जब तक पृथ्वी पर उसकी कीर्ति रहती है, तब तक उसे स्वर्ग में भी स्थान प्राप्त होता है।


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