आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः
हिन्दी अनुवाद सहित
भारतदेशः बहूनां ब्रह्मर्षीणां महात्मनां च भूमिः। तेषां चरित्राणि सकलस्य विश्वस्य कृते प्रेरणास्पदम्। तेषां चरित्रेषु प्रतिपदं भूतदया, समता, क्षमा, अहिंसा, करुणा, ऋजुता, बन्धुता चेत्यादीनि जीवनमूल्यानि प्राप्यन्ते। महाराष्ट्रस्य प्रसिद्धः महात्मा नामदेवमहाराजः स्वीयव्यवहारेण करुणायाः महान्तम् आदर्शम् उपस्थापितवान्। सः सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य न केवलं सङ्कीर्तनं कृतवान् अपि तु सर्वेषु जीवेषु सः भगवन्तं दृष्टवान्। नामदेवमहाराजस्य जीवनस्य काचित् शिक्षाप्रदा घटना अत्र प्रदर्शिता अस्ति यां पठित्वा अस्माकं जीवनं परिवर्तितं भवेत्।
भारत देश अनेक ब्रह्मर्षियों (ब्रह्म को जानने वाले ऋषियों) और महात्माओं की भूमि है। उनके चरित्र समस्त विश्व के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उनके चरित्रों में कदम-कदम पर प्राणियों के प्रति दया, समता, क्षमा, अहिंसा, करुणा, सरलता और बन्धुता आदि जीवन-मूल्य मिलते हैं। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध महात्मा नामदेव महाराज ने अपने व्यवहार से करुणा का महान आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने सर्वात्मक (सबमें व्याप्त) ईश्वर का न केवल संकीर्तन किया, बल्कि सभी जीवों में उन्होंने भगवान को देखा। नामदेव महाराज के जीवन की एक शिक्षाप्रद घटना यहाँ प्रस्तुत की गई है, जिसे पढ़कर हमारा जीवन बदल सकता है।
कपिलः माधवी च अवकाशकाले मातुलगृहं गतवन्तौ। तत्र क्रीडावेलायां कञ्चन शुनकं दृष्टवन्तौ। तं दृष्ट्वा पाषाणखण्डं हस्ते स्वीकृत्य तं मारयितुं धावितवन्तौ। शुनकः भयेन आक्रोशं कुर्वन् वेगेन धावितवान्। तत् दृष्ट्वा कपिलः माधवी च उच्चैः हसितवन्तौ। मातामही तं प्रसङ्गं दूरात् दृष्टवती, तौ आहूतवती च।
कपिल और माधवी छुट्टियों में मामा के घर गए। वहाँ खेलते समय उन्होंने एक कुत्ते को देखा। उसे देखकर हाथ में पत्थर का टुकड़ा उठाकर उसे मारने के लिए दौड़े। कुत्ता डर के कारण चिल्लाता हुआ तेज़ी से भाग गया। यह देखकर कपिल और माधवी ज़ोर-ज़ोर से हँसे। नानी ने उस घटना को दूर से देखा और उन दोनों को बुलाया।
मातामही —
भोः कपिल! माधवि! किं कुरुतः?
कपिलः —
मातामहि! पश्यतु किल। सः शुनकः आवयोः क्रीडायां मध्ये मध्ये प्रविश्य आवां पीडयति स्म। अतः आवां तं सम्यक् दण्डितवन्तौ।
(पुनः उच्चैः हसितवन्तौ)
मातामही —
वत्सौ, अधुना क्रीडया अलम्। कथां श्रोतुम् इच्छतः वा?
उभावपि —
मातामह्याः कथा! रोचते मे कथा… रोचते मे मातामही।
(मातामहीम् आलिङ्गितवन्तौ)
नानी —
अरे कपिल! माधवी! यह क्या कर रहे हो?
कपिल —
नानी! देखिए तो। वह कुत्ता हमारी खेल के बीच-बीच में आकर हमें परेशान करता था। इसलिए हम दोनों ने उसे अच्छी तरह से दण्डित किया।
(फिर से ज़ोर-ज़ोर से हँसे)
नानी —
बेटो, अब खेलना बंद करो। क्या कहानी सुनना चाहते हो?
दोनों —
नानी की कहानी! मुझे कहानी अच्छी लगती है… नानी मुझे बहुत अच्छी लगती हैं।
(नानी को गले लगा लिया)
मातामही —
उपविशताम्, सावधानेन शृणुतां च। अस्माकं भारतभूमिः अनेकेषां नररत्नानां ब्रह्मर्षीणां राजर्षीणां च प्रसवित्री। बहवः सत्पुरुषाः स्वीयकर्तृत्वेन जन्म सार्थकं कृतवन्तः। किं भवन्तौ महात्मानं नामदेवं जानीतः?
माधवी —
आम्। अहं श्रुतवती यत् तस्य कीर्तने स्वयं देवः पाण्डुरङ्गः नृत्यं कृतवान् इति। अपि सत्यम्?
मातामही —
आम्। तस्यैव पुण्यश्लोकस्य पाण्डुरङ्गमित्रस्य नामदेवमहाराजस्य एषा कथा। नामदेवः न केवलं पाण्डुरङ्गस्य प्रियभक्तः अपि तु प्रियमित्रमपि। देवः नामदेवं परितः भवति स्म।
माधवी —
किं सत्यमेव नामदेवस्य मित्रम् आसीत् पाण्डुरङ्गः?
कपिलः —
किं देवेन सह अपि मित्रता सम्भवति?
मातामही —
आम् वत्सौ। देवः पाण्डुरङ्गः नामदेवस्य प्रियसुहृद् आसीत्। नामदेवः प्रतिदिनं पाण्डुरङ्गाय नैवेद्यं समर्प्य, तं भोजयित्वा ततः परमेव अन्नं सेवते स्म। तस्य गुरुः आसीत् विसोबा। विसोबा तम् अध्यापितवान् यत् ‘ईश्वरः न केवलं मन्दिरे भवति, अपि तु सर्वेषु भूतेषु तस्य निवासो भवति। अतः तस्य सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य पूजनं कुरु’ इति।
नानी —
बैठो और ध्यान से सुनो। हमारी भारतभूमि अनेक नररत्नों (श्रेष्ठ पुरुषों), ब्रह्मर्षियों और राजर्षियों को जन्म देने वाली है। बहुत से सज्जन पुरुषों ने अपने कर्तृत्व (कार्यों) से जन्म को सार्थक किया है। क्या तुम दोनों महात्मा नामदेव को जानते हो?
माधवी —
हाँ। मैंने सुना है कि उनके कीर्तन में स्वयं भगवान पाण्डुरंग ने नृत्य किया था। क्या यह सच है?
नानी —
हाँ। यह कहानी उन्हीं पवित्र चरित्रवाले, पाण्डुरंग के मित्र नामदेव महाराज की है। नामदेव न केवल पाण्डुरंग के प्रिय भक्त थे, बल्कि प्रिय मित्र भी थे। भगवान नामदेव के आस-पास ही रहते थे।
माधवी —
क्या सच में पाण्डुरंग नामदेव के मित्र थे?
कपिल —
क्या भगवान के साथ भी मित्रता हो सकती है?
नानी —
हाँ बेटो। भगवान पाण्डुरंग नामदेव के प्रिय सखा (मित्र) थे। नामदेव प्रतिदिन पाण्डुरंग को नैवेद्य (भोग) अर्पित करके, उन्हें भोजन कराकर, उसके बाद ही स्वयं भोजन करते थे। उनके गुरु विसोबा थे। विसोबा ने उन्हें यह सिखाया था कि ‘ईश्वर केवल मन्दिर में नहीं रहते, बल्कि सभी प्राणियों में उनका निवास है। इसलिए उन सर्वात्मक (सबमें व्याप्त) ईश्वर की पूजा करो।’
कपिलः —
मातामहि! किं सत्यमेव ईश्वरः सर्वेषु भूतेषु निवसति?
मातामही —
आम्, शृणु वत्स! नामदेवः प्रतिदिनम् अतीव श्रद्धया निष्ठया भक्त्या च नैवेद्यस्थालिकाम् आदाय मन्दिरं गच्छति स्म। एकदा सः नैवेद्यस्थालिकां गृहीत्वा विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान्। नेत्रे निमील्य प्रार्थनां कृतवान् —
कपिल —
नानी! क्या सच में ईश्वर सभी प्राणियों में निवास करते हैं?
नानी —
हाँ, सुनो बेटे! नामदेव प्रतिदिन अत्यन्त श्रद्धा, निष्ठा और भक्ति के साथ नैवेद्य (भोग) की थाली लेकर मन्दिर जाते थे। एक बार उन्होंने नैवेद्य की थाली लेकर विग्रह (मूर्ति) के सामने रख दी। आँखें बन्द करके प्रार्थना की —
नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु।
ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परां गतिम् ॥
शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च।
आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥
हे देव! यह नैवेद्य (भोग) स्वीकार करें और मेरी भक्ति को अचल (अटूट) बनाएँ। मेरी मनचाही इच्छा (वर) दें और परलोक में भी उत्तम गति (मुक्ति) दें।
चीनी, मिठाइयाँ, दही, दूध, घी तथा खाने-पीने का सभी आहार — यह नैवेद्य स्वीकार करें।
मातामही —
मन्त्रम् उच्चार्य श्रद्धया प्रणम्य सः नेत्रे उद्घाटितवान्। अहो आश्चर्यम्! पुरतः स्थितायां स्थालिकायां रोटिका नासीत्।
माधवी —
पाण्डुरङ्गः आगत्य भक्षितवान् किल?
मातामही —
न हि। कश्चन बुभुक्षितः शुनकः आगत्य रोटिकां मुखे गृहीत्वा धावितवान्।
कपिलः —
धिक् शुनकम्! मातामहि! पश्यतु, शुनकाः दुष्टाः एव भवन्ति।
माधवी —
सत्यं भ्रातः! नामदेवस्य कियत् दुःखं जातं स्यात् खलु।
मातामही —
पुत्रकौ, शृणुताम्। नामदेवः शुनकस्य पृष्ठे अनुधावितवान्। जानीतः किमर्थं कथं च?
नानी —
मन्त्र उच्चारण करके श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके उन्होंने आँखें खोलीं। अरे आश्चर्य! सामने रखी थाली में रोटी नहीं थी।
माधवी —
तो पाण्डुरंग आकर खा गए क्या?
नानी —
नहीं। कोई भूखा कुत्ता आकर रोटी मुँह में लेकर भाग गया।
कपिल —
धिक्कार है कुत्ते को! नानी! देखिए, कुत्ते तो दुष्ट ही होते हैं।
माधवी —
सच में भाई! नामदेव को कितना दुःख हुआ होगा।
नानी —
बेटो, सुनो। नामदेव कुत्ते के पीछे दौड़े। क्या जानते हो — क्यों और कैसे?
कपिलः —
क्रोधेन लगुडम् आदाय शुनकं ताडयितुं धावितवान् स्यात्!
माधवी —
दण्डयितुं पाषाणखण्डम् आदाय धावितवान् स्यात्! सत्यं किल मातामहि!
मातामही —
न हि बालौ! नामदेवः कोपेन न धावितवान्, प्रत्युत सः करुणया धावितवान्। न लगुडं, न पाषाणखण्डम्, अपि तु घृतपात्रं धृत्वा।
उभावपि —
(साश्चर्यम् उच्चैः) किं घृतपात्रम् आधृत्य?
मातामही —
आम्, घृतपात्रम् आधृत्य एव।
उभौ —
किन्तु किमर्थम्?
मातामही —
जातौ, शुनकः शुष्करोटिकाम् अपहृत्य पलायितवान् खलु। महात्मनः नामदेवस्य चिन्ता आसीत् यत् यदि शुनकः शुष्करोटिकां खादेत् तर्हि तस्य उदरवेदना भवेत् इति। अतः तस्य पीडा मा भवतु इति चिन्तयन् घृतपात्रम् आदाय ‘हे देव! शुष्कां रोटिकां मा खादतु, घृतम् अपि स्वीकरोतु’ इति वदन् अनुधावितवान् सः।
(उभौ परस्परं पश्यतः। अपराधभावनया तयोः मुखे म्लाने आस्ताम्।)
कपिल —
वे क्रोध में लाठी लेकर कुत्ते को मारने के लिए दौड़े होंगे!
माधवी —
दण्ड देने के लिए पत्थर का टुकड़ा लेकर दौड़े होंगे! सच है ना नानी!
नानी —
नहीं बच्चो! नामदेव क्रोध में नहीं दौड़े, बल्कि वे करुणा से दौड़े। न लाठी लेकर, न पत्थर लेकर — बल्कि घी का पात्र (बर्तन) लेकर।
दोनों —
(आश्चर्य से ज़ोर से) क्या, घी का बर्तन लेकर?
नानी —
हाँ, घी का बर्तन लेकर ही।
दोनों —
लेकिन क्यों?
नानी —
बच्चो, कुत्ता सूखी रोटी चुराकर भाग गया था। महात्मा नामदेव को चिन्ता हुई कि यदि कुत्ता सूखी रोटी खाएगा तो उसके पेट में दर्द होगा। इसलिए उसे तकलीफ न हो — यह सोचते हुए घी का पात्र लेकर ‘हे देव! सूखी रोटी मत खाओ, घी भी ले लो’ — यह कहते हुए नामदेव उसके पीछे दौड़े।
(दोनों एक-दूसरे को देखते हैं। अपराध-भावना (शर्म) से दोनों के चेहरे मुरझा गए।)
मातामही —
धावन् शुनकः अदृश्यः जातः। तस्य स्थाने पाण्डुरङ्गः आविर्भूतः। सः नामदेवम् उक्तवान् — ‘वत्स नामदेव! उत्तीर्णः भवान् परीक्षाम्। ‘ईश्वरः सर्वेषु भूतेषु निवसति’ इति गुरूपदेशं न केवलं भवान् श्रुतवान् अपि तु अनुपालितवान्। सुतरां धन्यो भवान्।’
नानी —
दौड़ता हुआ कुत्ता अदृश्य हो गया। उसके स्थान पर पाण्डुरंग प्रकट हो गए। उन्होंने नामदेव से कहा — ‘वत्स नामदेव! तुम परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए। ‘ईश्वर सभी प्राणियों में निवास करते हैं’ — यह गुरु का उपदेश न केवल तुमने सुना, बल्कि उसका पालन भी किया। इसलिए तुम धन्य हो।’
कपिलः —
मातामहि! अहं प्रमादं कृतवान्। अकारणं हि शुनकं ताडितवान्। इतः पूर्वमपि बहुवारं जीवान् पीडितवान्। अद्य अहं ज्ञातवान् यत् सर्वेषु जीवेषु ईश्वरः निवसति, अतः कमपि न पीडयिष्यामि इति।
माधवी —
मातामहि! क्षाम्यतु माम्। अहमपि कदापि कस्यापि पीडां न जनयिष्यामि।
मातामही —
चिरञ्जीविनौ! मां निकषा आगच्छताम्।
(आलिङ्गनं कृत्वा)
अस्माकं कायेन वाचा मनसा वा कस्यापि पीडा न भवेत्। तथैव कस्यापि या कापि पीडा स्यात् तां निवारयितुं प्रयतामहे इति सङ्कल्पं कुर्मः। इदमस्तु अस्माकं ध्येयम् —
कपिल —
नानी! मैंने गलती की। बिना कारण ही कुत्ते को मारा। इससे पहले भी कई बार जीवों को पीड़ित किया। आज मैंने जान लिया कि सभी जीवों में ईश्वर निवास करते हैं, इसलिए मैं किसी को भी कष्ट नहीं दूँगा।
माधवी —
नानी! मुझे क्षमा कीजिए। मैं भी कभी किसी को पीड़ा नहीं दूँगी।
नानी —
चिरंजीवी रहो! मेरे पास आओ।
(गले लगाकर)
हमारे शरीर से, वाणी से या मन से किसी को भी पीड़ा न हो। और यदि किसी को कोई भी पीड़ा हो तो उसे दूर करने का प्रयास करें — यह संकल्प करते हैं। यही हमारा ध्येय (लक्ष्य) हो —
‘आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः।’
‘जो सभी प्राणियों को अपने समान देखता है, वही सच्चा पण्डित (विद्वान) है।’

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