वैद्यवृत्तिचतुर्विधा (वैद्य का काम चार प्रकार का होता है)
(आचार्यः कक्षायां प्रविशति । सर्वे उत्थाय अभिवादनं कुर्वन्ति ।)
हिन्दी अनुवाद:
(आचार्य कक्षा में प्रवेश करते हैं। सभी खड़े होकर उनका अभिवादन करते हैं।)
आचार्यः – अनन्ये! अद्य त्वं किमर्थं निरुत्साहा दृश्यसे?
हिन्दी अनुवाद:
आचार्य – अनन्या! आज तुम उदास और उत्साहहीन क्यों दिखाई दे रही हो?
अनन्या – आचार्य! मम स्वास्थ्यं सम्यक् नास्ति।
हिन्दी अनुवाद:
अनन्या – आचार्य! मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं है।
आचार्यः – किमर्थम् अस्वस्थता? स्वास्थ्यस्य विषये विशेषतः अवधानं कर्तव्यम् खलु! महाकविकालिदासेन उक्तं वर्तते – ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ इति।
हिन्दी अनुवाद:
आचार्य – अस्वस्थ क्यों हो? स्वास्थ्य के विषय में विशेष ध्यान रखना चाहिए। महाकवि कालिदास ने कहा है— “शरीर ही धर्म के पालन का सबसे पहला साधन है।”
देवांशः – आचार्य! अस्य वाक्यस्य कोऽभिप्रायः?
हिन्दी अनुवाद:
देवांश – आचार्य! इस वाक्य का क्या अभिप्राय है?
आचार्यः – यदि धर्माचरणं कर्तुम् इच्छन्ति तर्हि शरीरं स्वस्थं भवेत् इति महाकवेः मतम्।
हिन्दी अनुवाद:
आचार्य – महाकवि का मत है कि यदि मनुष्य धर्म का आचरण करना चाहता है, तो उसका शरीर स्वस्थ होना चाहिए।
अनन्या – आचार्य! स्वास्थ्यस्य रक्षणाय के उपायाः सन्ति?
हिन्दी अनुवाद:
अनन्या – आचार्य! स्वास्थ्य की रक्षा के क्या उपाय हैं?
आचार्यः – वत्से! शरीरस्य स्वस्थतायाः विषये आयुर्वेदे यदुक्तं तद् वर्णयामि।
हिन्दी अनुवाद:
आचार्य – पुत्री! शरीर को स्वस्थ रखने के विषय में आयुर्वेद में जो कहा गया है, उसका वर्णन करता हूँ।
पूजा – आचार्य! आयुर्वेदः नाम किम्?
हिन्दी अनुवाद:
पूजा – आचार्य! आयुर्वेद क्या है?
आचार्यः – वदामि; सावधानं शृण्वन्तु भवन्तः।
हिन्दी अनुवाद:
आचार्य – बताता हूँ, आप सब ध्यानपूर्वक सुनिए।
हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्।
मानञ्च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते।।
हिन्दी अनुवाद:
जिस शास्त्र में जीवन के लिए हितकर और अहितकर वस्तुओं, सुख और दुःख, आयु तथा आयु के हित और अहित, तथा आयु के माप आदि का वर्णन किया गया है, उसे आयुर्वेद कहा जाता है।
मुदिता – आचार्य! एते विषयाः चिकित्सासम्बद्धाः खलु!
हिन्दी अनुवाद:
मुदिता – आचार्य! ये विषय चिकित्सा से संबंधित हैं, है न?
आचार्यः – सत्यम् वत्से! चिकित्सासम्बद्धाः सर्वेऽपि विषयाः आयुर्वेदे विचार्यन्ते। तत्र चिकित्सायाः चत्वारः अवयवाः उक्ताः सन्ति। तान् शृणुत –
हिन्दी अनुवाद:
आचार्य – हाँ पुत्री, यह सत्य है। चिकित्सा से संबंधित सभी विषयों पर आयुर्वेद में विचार किया जाता है। उसमें चिकित्सा के चार अंग बताए गए हैं। उन्हें सुनो—
वैद्यो व्याध्युपसृष्टश्च भेषजं परिचारकः।
एते पादाश्चिकित्सायाः कर्मसाधनहेतवः।।
हिन्दी अनुवाद:
वैद्य, रोगी, औषधि और परिचारक—ये चिकित्सा के चार अंग हैं और चिकित्सा कार्य को सफल बनाने के साधन हैं।
गुणवद्भिस्त्रिभिः पादैश्चतुर्थो गुणवान्भिषक्।
व्याधिमल्पेन कालेन महान्तमपि साधयेत्।।
हिन्दी अनुवाद:
यदि चिकित्सा के तीन अंग गुणयुक्त हों और चौथा अंग अर्थात् वैद्य भी गुणवान हो, तो वह बड़े से बड़े रोग को भी कम समय में ठीक कर सकता है।
मोहितः – आचार्य! यदि रोगः एव न भवेत् तदा तु अस्माकं सुखमेव खलु!
हिन्दी अनुवाद:
मोहित – आचार्य! यदि रोग ही न हो, तो हमारे लिए तो सुख ही सुख होगा।
आचार्यः – सत्यम् वत्स! स्वास्थ्यस्य संरक्षणाय आयुर्वेदे बहवः उत्तमाः उपायाः उक्ताः। यथा –
हिन्दी अनुवाद:
आचार्य – हाँ पुत्र! यह सत्य है। स्वास्थ्य की रक्षा के लिए आयुर्वेद में बहुत से उत्तम उपाय बताए गए हैं, जैसे—
अत्यम्बुपानान्न विपच्यतेऽन्नं
निरम्बुपानाच्च स एव दोषः।
तस्मान्नरो वह्निविवर्धनाय
मुहुर्मुहुर्वारि पिबेदभूरि।।
हिन्दी अनुवाद:
अधिक जल पीने से भोजन नहीं पचता और बिल्कुल जल न पीने से भी वही दोष उत्पन्न होता है। इसलिए मनुष्य को पाचन-अग्नि को बढ़ाने के लिए बार-बार थोड़ा-थोड़ा जल पीना चाहिए।
नित्यं हिताहार-विहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्तः।
दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः ॥
हिन्दी अनुवाद:
जो व्यक्ति प्रतिदिन शरीर के लिए हितकारी भोजन करता है, उचित दिनचर्या का पालन करता है, सोच-समझकर कार्य करता है और इन्द्रियों के विषयों में आसक्त नहीं होता; जो दानशील, सबके प्रति समान भाव रखने वाला, सत्यनिष्ठ, क्षमाशील तथा श्रेष्ठ और विश्वसनीय लोगों की संगति करने वाला होता है, वह रोगरहित रहता है।
सुधीरः – आचार्य! अहमपि जीवने वैद्यः भवितुम् इच्छामि। कृपया वैद्यस्य कर्तव्यानि बोधयतु।
हिन्दी अनुवाद:
सुधीर – आचार्य! मैं भी जीवन में वैद्य बनना चाहता हूँ। कृपया मुझे वैद्य के कर्तव्यों के बारे में बताइए।
आचार्यः – साधु वत्स! आयुर्वेदे वैद्यस्य अनेकानि कर्तव्यानि उक्तानि। यथा –
हिन्दी अनुवाद:
आचार्य – बहुत अच्छा पुत्र! आयुर्वेद में वैद्य के अनेक कर्तव्य बताए गए हैं।
मैत्री कारुण्यमार्त्तेषु शक्ये प्रीतिरुपेक्षणम्।
प्रकृतिस्थेषु भूतेषु वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा।।
हिन्दी अनुवाद:
रोगियों और दुःखी व्यक्तियों के प्रति मित्रता और करुणा रखनी चाहिए। जिन रोगियों के ठीक होने की संभावना हो, उनके प्रति विशेष रुचि रखनी चाहिए तथा स्वस्थ लोगों के प्रति उदासीन भाव रखना चाहिए। इस प्रकार वैद्य की वृत्ति चार प्रकार की होती है।


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