सा देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेणा संस्थिता
(जो देवी सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं।)
महिलादिवसकार्यक्रमप्रसङ्गः, अधिमञ्चं विशिष्टाः अतिथयः पुरतः श्रोतारः च दृश्यन्ते —
(महिला दिवस कार्यक्रम का प्रसंग; मंच पर विशिष्ट अतिथि और सामने श्रोता दिखाई दे रहे हैं।)
मेधा – नमस्ते। स्वयंप्रभा-महिला-स्वयंसेविका-संस्थापक्षतः अहम् उपस्थितानां सर्वेषां हार्दं स्वागतं करोमि। अद्य वयम् अत्र अन्तर्राष्ट्रीयमहिलादिवसकार्यक्रमस्य निमित्तेन समुपस्थिताः स्मः। अस्माकं मध्ये अस्य कार्यक्रमस्य प्रमुखातिथिरूपेण विराजमाना अस्ति अस्य जनपदस्य मान्या जनपदप्रशासनाधिकारिणी युगन्धरामहोदया। कार्यक्रमस्य अध्यक्षरूपेण मञ्चम् अलङ्कुर्वाणा वर्तते उच्चन्यायालयस्य भूतपूर्वन्यायाधीशा अन्वीक्षा महोदया। स्वीयकर्तृत्वेन स्वनाम अन्वर्थं कुर्वत्याः युगन्धरामहोदयायाः अन्वीक्षायाः महोदयायाः च वयं तुलसीतरुप्रदानेन पुस्तकप्रदानेन च स्वागतं कुर्मः।
हिंदी अनुवाद:
मेधा – नमस्कार। स्वयंप्रभा महिला स्वयंसेविका संस्था की ओर से मैं यहाँ उपस्थित सभी लोगों का हृदय से स्वागत करती हूँ। आज हम यहाँ अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के कार्यक्रम के अवसर पर एकत्र हुए हैं। हमारे बीच इस कार्यक्रम की मुख्य अतिथि के रूप में इस जिले की माननीय जिला प्रशासन अधिकारी युगन्धरा जी उपस्थित हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश अन्वीक्षा जी कर रही हैं। हम युगन्धरा जी और अन्वीक्षा जी का तुलसी का पौधा और पुस्तक भेंट करके स्वागत करते हैं।
श्रोतारः करतलध्वनिना स्वागतं कुर्वन्ति –
(श्रोता तालियों की ध्वनि से स्वागत करते हैं।)
मेधा – अहं मान्यां जनपदप्रशासनाधिकारिणीं सविनयं प्रार्थये सा महोदया महिलादिवसविषये स्वविचारान् उपस्थापयतु इति।
युगन्धरा – मम पुरतः शक्तिरूपेण उपस्थितां नारीशक्तिम् अहं प्रणमामि। मार्चमासस्य एषः अष्टमः दिनाङ्कः विश्वस्मिन् सर्वत्र महिलादिवसरूपेण आचर्यते। अस्मिन् प्रसङ्गे नारीणां भूषणानि कानि इति मम मनसि कश्चन प्रश्नः उदेति। किं महार्घाणि स्वर्णमयानि रजतमयानि वा हारकुण्डलादीनि नारीणां वास्तविकानि आभूषणानि? न। किञ्चित् सुभाषितम् अस्मिन् प्रसङ्गे स्मरामि—
बुद्धिरुत्साहस्मृतिप्रज्ञाकलाधृतिसहिष्णुताः।
नारीणां भूषणान्येवं न मात्रं रूपचारुता।।
हिंदी अनुवाद:
बुद्धि, उत्साह, स्मरण-शक्ति, विवेक, विभिन्न कलाएँ, धैर्य और सहनशीलता—
ये ही महिलाओं के आभूषण हैं; केवल रूप-सौन्दर्य ही उनका आभूषण नहीं है।
बुद्धिः उत्साहः स्मृतिः प्रज्ञा विविधकलाः धैर्यं सहिष्णुता च इत्येतानि खलु नारीणां भूषणानि। एतैः आभूषणैः शोभमानाः महिलाः अद्य अवश्यं स्मर्यन्ते। यथा वेदेषु वर्णिता वीराङ्गना विश्पला अस्माभिः स्मर्यते। तथैव कारगिलयुद्धवीराङ्गना गुञ्जनसक्सेना अपि अस्माकं स्मृतिपटले अवतरति। अस्माकं मनसि जिज्ञासा भवति— का एषा विश्पला का वा एषा गुञ्जनसक्सेना इति। शृण्वन्तु तर्हि—
हिंदी अनुवाद:
वास्तव में बुद्धि, उत्साह, स्मृति, प्रज्ञा, विभिन्न कलाएँ, धैर्य और सहिष्णुता ही महिलाओं के सच्चे आभूषण हैं। इन आभूषणों से सुशोभित महिलाओं को आज अवश्य याद किया जाता है। जैसे वेदों में वर्णित वीरांगना विश्पला को हम याद करते हैं, उसी प्रकार कारगिल युद्ध की वीरांगना गुञ्जन सक्सेना भी हमारी स्मृतियों में आती हैं। हमारे मन में जिज्ञासा होती है कि यह विश्पला कौन थीं और यह गुञ्जन सक्सेना कौन हैं? तो सुनिए—
वैदिके युगे कश्चन राजा आसीत्। सः क्रीडासु अतीव पटुः आसीत्। अत एव खलेः इति तस्य नाम प्रसिद्धम् अभवत्। खलराजस्य पत्नी विश्पला युद्धनिपुणा वीराङ्गना च आसीत् कदाचित् देशे युद्धम् आरब्धम्। राज्ञी विश्पला अपि युद्धरङ्गं प्रविश्य देशरक्षायै अयुध्यत। पराक्रमेण युद्धं कुर्वती सा शत्रुभिः परिवेष्टिता जाता। तस्याः पादः शत्रूणां शस्त्रैः छिन्नः अभवत्। महतीं वेदनां सहमानापि सा हतोत्साहा न जाता। यद्यपि तस्याः पादः भग्नः तथापि तस्याः निर्धारः अभङ्गः आसीत्। सा युद्धम् अनुवर्तयितुं शत्रून् जेतुं च ऐच्छत्। तस्याः एवंविधं मनोबलं धैर्यं वैर्यं वीरोचितभावं च दृष्ट्वा राज्ञः मार्गनिर्देशकः देवर्षिः अगस्त्यः विस्मितः जातः। सः तस्यामेव रात्रौ देवचिकित्सकौ अश्विनीकुमारौ समाह्वयत्। अश्विनीकुमारौ च समागत्य विश्पलायाः पादोपचारं कृतवन्तौ। तस्याः अक्षय्यं निर्धारं विज्ञाय तौ तस्यै लोहनिर्मितपादम् अकल्पयताम्। ततः सर्वेषाम् अनुज्ञां प्राप्य अभिनवेन उत्साहेन झञ्झावातवत् रणाङ्गणं प्रविश्य सा विजयश्रियं प्राप्नोत्। कृत्रिमपादयुता अपि विश्पला रणे अपूर्वं पराक्रमं प्रदर्शितवती। भारतीयमहिलासु राज्ञी विश्पला इच्छाशक्तेः प्रतिरूपमिव सर्वान् प्रेरयति। वेदकालीनानां महिलानाम् उज्ज्वलश्रेण्यां यत्र गार्गी मैत्रेयी लोपामुद्रा अपाला इत्यादीनि महिलारत्नानि राजन्ते, तन्मध्ये माणिक्यमिव शोभमानं स्त्रीरत्नम् अस्ति विश्पला।
हिंदी अनुवाद:
वैदिक युग में एक राजा था। वह खेलों में बहुत निपुण था। इसी कारण उसका नाम ‘खेल’ प्रसिद्ध हुआ। खलराज की पत्नी विश्पला युद्ध-कला में निपुण और वीरांगना थीं। एक बार देश में युद्ध आरम्भ हुआ। रानी विश्पला भी युद्धभूमि में प्रवेश करके देश की रक्षा के लिए युद्ध करने लगीं। बहुत वीरता से युद्ध करते हुए वे शत्रुओं से घिर गईं। शत्रुओं के हथियारों से उनका पैर कट गया। बहुत अधिक पीड़ा सहने के बाद भी उनका उत्साह समाप्त नहीं हुआ। यद्यपि उनका पैर टूट गया था, फिर भी उनका निश्चय अटल था। वे युद्ध जारी रखना और शत्रुओं को पराजित करना चाहती थीं। उनके ऐसे मनोबल, धैर्य, साहस और वीरतापूर्ण भावना को देखकर राजा के मार्गदर्शक देवर्षि अगस्त्य आश्चर्यचकित हो गए। उसी रात उन्होंने देव-चिकित्सक अश्विनी कुमारों को बुलाया। अश्विनी कुमार आए और उन्होंने विश्पला के पैर का उपचार किया। उनके अटूट निश्चय को देखकर उन्होंने उनके लिए लोहे का पैर बनाया। इसके बाद सभी की अनुमति प्राप्त करके वे नए उत्साह के साथ तूफान की तरह युद्धभूमि में पहुँचीं और विजय प्राप्त की। कृत्रिम पैर होने पर भी विश्पला ने युद्ध में अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया। भारतीय महिलाओं में रानी विश्पला इच्छाशक्ति की प्रतिमूर्ति के समान सभी को प्रेरित करती हैं। वैदिक काल की जिन महान महिलाओं की उज्ज्वल श्रेणी में गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा, अपाला आदि महिलाएँ रत्नों के समान सुशोभित थीं, उनमें विश्पला माणिक्य के समान चमकने वाला स्त्री-रत्न थीं।
वीराङ्गनानाम् इयं परम्परा अस्मिन् देशे निरन्तरं प्राचलत्। आधुनिके कालेऽपि वीराङ्गनानां सा परम्परा अनुवर्तते वर्तते। अत्र विश्पलासदृशी क्षात्रतेजोयुता गुञ्जन-सक्सेना अपि स्मर्यते। उत्तरप्रदेशस्य लखनऊनिवासिनी इयं महिला चिरकालीनं स्वप्नं साक्षात्कर्तुं भारतीयवायुसेनायाः वैमानिकप्रशिक्षणं यशस्वितया समाप्य प्रथमा महिला युद्धवैमानिकी अभवत्। कारगिल-युद्धकाले युद्धविमानम् उड्डाययन्ती सा उपसहस्रं व्रणितान् आपद्ग्रस्तान् च सैनिकान् युद्धभूमितः सुरक्षितं स्थानं प्रति आनयत्। सा युध्यद्भ्यः सैनिकेभ्यः विमानेन अपेक्षितवस्तूनाम् आपूर्तिमपि कृतवती। युद्धक्षेत्रे सङ्कटपरिस्थितौ तया प्रदर्शितं शौर्यं धैर्यं च उपलक्ष्य भारतसर्वकारेण शौर्यचक्रपुरस्कारं दत्त्वा तस्याः सम्माननं कृतम्। किन्तु भारतीयवायुसेनायां तस्याः प्रवेशः प्रशिक्षणं च तथा सुलभं सुगमं च नासीत्। सर्वान् विघ्नान् अविगण्य निर्भयेन मनसा युद्धक्षेत्रं प्रविश्य सर्वेषु विस्मयं जनयन्ती सा देशसेवां निरवहत्।
हिंदी अनुवाद:
वीरांगनाओं की यह परम्परा हमारे देश में निरन्तर चलती रही है। आधुनिक काल में भी वीरांगनाओं की यह परम्परा जारी है। इसी क्रम में विश्पला के समान वीरता और क्षात्र-तेज से युक्त गुञ्जन सक्सेना को भी याद किया जाता है। उत्तर प्रदेश की निवासी इस महिला ने अपने पुराने सपने को साकार करने के लिए भारतीय वायुसेना का विमान चालक प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया और पहली महिला युद्ध-विमान चालक बनीं। कारगिल युद्ध के समय युद्ध-विमान उड़ाते हुए उन्होंने लगभग एक हजार घायल और संकटग्रस्त सैनिकों को युद्धभूमि से सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया। उन्होंने युद्धरत सैनिकों के लिए विमान द्वारा आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति भी की। युद्धक्षेत्र की संकटपूर्ण परिस्थितियों में उनके द्वारा प्रदर्शित साहस और धैर्य को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें शौर्य चक्र पुरस्कार देकर सम्मानित किया। किन्तु भारतीय वायुसेना में उनका प्रवेश और प्रशिक्षण इतना सरल और सुगम नहीं था। सभी बाधाओं की परवाह न करते हुए वे निर्भय मन से युद्धक्षेत्र में पहुँचीं और सभी को आश्चर्यचकित करते हुए देश-सेवा करती रहीं।
अनयोः द्वयोः महिलयोः इच्छाशक्तिः महती आसीत्। तयोः वर्धने ये सहकारिणः तेऽपि खलु श्लाघनीयाः। तेषां प्रेरणया इमे महिले ध्येयशिखरं प्राप्तवत्यौ। यदि वयम् अस्मान् परितः विद्यमानाः महिलाः प्रेरयामः तथा तासां यथाशक्ति सहयोगं कुर्मः च तर्हि ताः अपि अवश्यं यशस्विन्यः भवेयुः। यदि महिलादिवसाचरणवेलासु समाजस्य एवंविधं चिन्तनपरिवर्तनं भवेत् तर्हि अद्यतनं दिनं सफलम् इति चिन्तयामि। तेन कुटुम्बेषु समरसता समाजे एकता च वर्धेत। अथ च तेन देशस्य विकासः त्वरितः भवेत्। एतेन वचनेन विरमामि—
पुरुषाणामिव स्त्रीणां सर्वाङ्गीणा समुन्नतिः।
यत्र स्यात् तत्र राष्ट्रे हि स्वर्गः प्रावतरिष्यति॥
हिंदी अनुवाद:
इन दोनों महिलाओं—विश्पला और गुञ्जन सक्सेना—में बहुत महान इच्छाशक्ति थी। उनके विकास में जिन्होंने सहयोग दिया, वे भी प्रशंसा के योग्य हैं। उनके प्रोत्साहन से इन दोनों महिलाओं ने अपने लक्ष्य को प्राप्त किया। यदि हम अपने आसपास रहने वाली महिलाओं को प्रेरित करें और अपनी शक्ति के अनुसार उनका सहयोग करें, तो वे भी निश्चित रूप से सफल हो सकती हैं। यदि महिला दिवस मनाने के अवसर पर समाज की सोच में इस प्रकार का परिवर्तन हो जाए, तो मैं मानती हूँ कि आज का दिन सफल हुआ। इससे परिवारों में समरसता और समाज में एकता बढ़ेगी। इसके साथ ही देश का विकास भी तेजी से होगा। मैं अपनी बात इन शब्दों के साथ समाप्त करती हूँ—
“जिस प्रकार पुरुषों की सर्वांगीण उन्नति हो, उसी प्रकार महिलाओं की भी सर्वांगीण उन्नति हो।
जिस राष्ट्र में ऐसा होगा, वहाँ निश्चय ही स्वर्ग का आगमन होगा।”
मेधा – धन्यवादाः महोदये! भवत्याः प्रेरकवचनैः सर्वे महतीम् ऊर्जां प्राप्तवन्तः। सम्प्रति कार्यक्रमस्य अध्यक्षवर्यां न्यायमूर्तिम् अन्वीक्षामहोदयां प्रार्थये सा आध्यक्षीयभाषणेन कार्यक्रमस्य समापनं करोतु इति।
हिंदी अनुवाद:
मेधा — धन्यवाद, महोदया! आपके प्रेरणादायक शब्दों से हम सभी को बहुत ऊर्जा मिली है। अब मैं कार्यक्रम की अध्यक्ष माननीय न्यायमूर्ति अन्वीक्षा जी से निवेदन करती हूँ कि वे अपने अध्यक्षीय भाषण द्वारा कार्यक्रम का समापन करें।
अन्वीक्षा – स्वयंप्रभा इति भवतीनां संस्थायाः नाम। मया अद्य काश्चन वन्दनीयाः नार्यः स्मर्यन्ते यथा राज्ञी लक्ष्मीबाई, जिजाबाई, अहल्यादेवी, चेन्नमा, रुद्रमाम्बा, भगिनी निवेदिता, शारदादेवी, सावित्री च। मया स्मृताः एताः सर्वाः अपि नार्यः पुण्यश्लोकाः जगद्विख्याताः नार्यः आसन्। ननु भवत्यः सर्वाः अपि स्वकर्तृत्वेन खलु स्वयंप्रकाशिन्यः सन्ति।
हिंदी अनुवाद:
अन्वीक्षा जी कहती हैं— ‘स्वयंप्रभा’ आप लोगों की संस्था का नाम है। आज मैं कुछ सम्माननीय महिलाओं को याद कर रही हूँ, जैसे रानी लक्ष्मीबाई, जीजाबाई, अहल्यादेवी, चेन्नम्मा, रुद्रमाम्बा, भगिनी निवेदिता, शारदादेवी और सावित्री। जिन महिलाओं को मैंने याद किया है, वे सभी पुण्यश्लोक और विश्वप्रसिद्ध महिलाएँ थीं। निश्चय ही आप सभी भी अपने कार्यों और कर्तृत्व के कारण स्वयं प्रकाशमान हैं।
अद्य वयमपि सङ्कल्पं कुर्मः अस्माकम् अस्याः गौरवशालिन्याः परम्परायाः वयं समर्थं निर्वहणं करिष्यामः इति।
महिलागुणशक्तीनां प्राकृतानां विकासनम्।
सशिक्षणैः सुसंस्कारैः भूयो भवतु भारते॥
हिंदी अनुवाद:
आज हम भी संकल्प करें कि हम अपनी इस गौरवशाली परम्परा का उचित रूप से निर्वहन करेंगे।
“भारत में महिलाओं में विद्यमान प्राकृतिक गुणों और शक्तियों का विकास हो तथा अच्छी शिक्षा और अच्छे संस्कारों से भारत और अधिक समृद्ध हो।”


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