पञ्च शीलानि आचरेम, आदर्शसमाजं रचयेम
(हम पाँच अच्छे नियमों का पालन करें और एक अच्छा समाज बनाएँ।)
वसुधारा: अयि मैत्रेय ! साञ्चीस्तूपः किमर्थं प्रसिद्धः ?
अनुवाद: हे मैत्रेय! साँची का स्तूप किस लिए प्रसिद्ध है?
मैत्रेयः: ननु बौद्धधर्मस्य प्रसिद्धः स्मारकः भवति साञ्चीस्तूपः । सम्राट् अशोकः अस्य निर्माणं कारितवान्।
अनुवाद: साँची का स्तूप निश्चित रूप से बौद्ध धर्म का प्रसिद्ध स्मारक है। सम्राट अशोक ने इसका निर्माण करवाया था।
अध्यापिका: सौम्य मैत्रेय ! यूनेस्कोद्वारापि साञ्चीस्तूपः वैश्विकसम्पद्-रूपेण उद्घोषितः। बौद्धधर्मस्य सिद्धान्तानां भगवतः गौतमबुद्धस्य उपदेशानाञ्च प्रचाराय एषः स्तूपः निर्मितः।
अनुवाद: प्रिय मैत्रेय! यूनेस्को द्वारा भी साँची स्तूप को वैश्विक धरोहर (विश्व संपत्ति) के रूप में घोषित किया गया है। बौद्ध धर्म के सिद्धांतों और भगवान गौतम बुद्ध के उपदेशों के प्रचार के लिए यह स्तूप निर्मित किया गया था।
तेञ्जिनः: महोदये ! किं गौतमबुद्धस्य उपदेशाः आधुनिककालेऽपि उपयोगिनः सन्ति ?
अनुवाद: महोदया! क्या गौतम बुद्ध के उपदेश आधुनिक काल में भी उपयोगी हैं?
अध्यापिका: पुत्र तेञ्जिन ! गौतमबुद्धस्य उपदेशाः सार्वकालिकाः सार्वभौमिकाश्च सन्ति। सांसारिकं मोहमायादिकम् अविगणय्य घोरतपसा समुदितबोधः गौतमः भगवान् बुद्धः अभवत्। असौ करुणायाः प्रतिमा आसीत् ।
अनुवाद: पुत्र तेञ्जिन! गौतम बुद्ध के उपदेश सर्वकालिक (हर समय उपयोगी) और सार्वभौमिक (सब जगह मान्य) हैं। सांसारिक मोह-माया आदि की परवाह न करके घोर तपस्या से जिन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ, वे गौतम ही भगवान बुद्ध हुए। वे करुणा की मूर्ति थे।
अरुणा: मान्ये ! वयं भगवतः बुद्धस्य कथाम् उपदेशान् च ज्ञातुम् उत्सुकाः स्मः। कृपया श्रावयतु।
अनुवाद: आदरणीया! हम भगवान बुद्ध की कथा और उपदेशों को जानने के लिए उत्सुक हैं। कृपया सुनाइए।
अध्यापिका: अरुणे ! जातकमालायां बुद्धस्य कथाः विलसन्ति। प्रथमम् अहं जातकमालायाः व्याघ्री-जातकतः बुद्धस्य करुणापूर्णां कथामेकां श्रावयामि। अनन्तरं तस्य जीवनोन्नयकरान् उपदेशान् श्रावयामि।
अनुवाद: अरुणा! ‘जातकमाला’ में बुद्ध की कथाएँ सुशोभित हैं। पहले मैं जातकमाला के ‘व्याघ्री-जातक’ से बुद्ध की एक करुणापूर्ण कथा सुनाती हूँ। उसके बाद उनके जीवन को उन्नत बनाने वाले उपदेशों को सुनाऊँगी।
लावण्या: एवं तर्हि वयम् अत्रैव तरुतले उपविश्य सादरं शृण्मः।
अनुवाद: यदि ऐसा है तो हम यहीं पेड़ के नीचे बैठकर आदरपूर्वक सुनते हैं।
अध्यापिका: अवश्यम् !
अनुवाद: अवश्य!
बोधिसत्त्वः कारुणिकः स्वसत्कर्मणां बलेन एकस्मिन् कुलीनपरिवारे जन्म अलभत। जातकर्मादिभिः कृतसंस्कारक्रमः अभिवर्धमानोऽसौ प्रकृतिमेधावित्वात् ज्ञानकौतूहलात् अकौसीद्याच्च अचिरेण अष्टादशविद्यास्थानेषु सकलासु स्वकुलक्रमाविरुद्धासु कलासु च पारङ्गतिं लब्धवान्। अयं धर्माभ्यासभावितमतिः कृतप्रव्रज्यापरिचयः बोधिसत्त्वः कदाचिदरण्ये अटन्नासीत्। तस्य स्नेहकरुणादिभावनाभिः हिंस्रका अपि जन्तवः कलहेन विना स्नेहेन चरन्ति स्म।
अनुवाद:
दयालु बोधिसत्त्व ने अपने सत्कर्मों के बल से एक उच्च (कुलीन) परिवार में जन्म लिया। जातकर्म आदि संस्कारों से युक्त होकर बढ़ते हुए उन्होंने अपनी स्वाभाविक बुद्धिमत्ता, ज्ञान की जिज्ञासा और आलस्य न होने के कारण शीघ्र ही १८ विद्याओं में तथा अपने कुल की परंपरा के अनुकूल सभी कलाओं में दक्षता प्राप्त कर ली। धर्म के अभ्यास से पवित्र बुद्धि वाले तथा संन्यास से परिचित बोधिसत्त्व एक बार जंगल में भ्रमण कर रहे थे। उनकी स्नेह और करुणा आदि भावनाओं के कारण हिंसक पशु भी बिना झगड़े के प्रेमपूर्वक रहते थे।
अथैकदा स्वशिष्येण अजितेन सह वनप्रान्ते भ्रमता बोधिसत्त्वेन काचिद् व्याघ्री अवलोकिता, या पर्वतगुहायां प्रसवपीड्या क्लान्ता बुभुक्षया कृशोदरा दुर्बलनेत्रा च आसीत्। अनन्यगतिका सा क्षुत्पीडां निवारयितुं स्वपुत्रानपि हन्तुमुद्यमते स्म।
अनुवाद:
इसके बाद एक बार अपने शिष्य अजित के साथ वन के किनारे घूमते हुए बोधिसत्त्व ने एक बाघिन को देखा, जो पर्वत की गुफा में प्रसव पीड़ा से थकी हुई, भूख के कारण सूखे पेट वाली और कमजोर आँखों वाली थी। कोई अन्य उपाय न देखकर वह भूख की पीड़ा को शांत करने के लिए अपने ही बच्चों को मारने के लिए उद्यत (तैयार) हो रही थी।
करुणासागरः बोधिसत्त्वः इमां घटनां वीक्ष्य ससम्भ्रमं शिष्यमवोचत् – तच्छीघ्रमन्विष्यतां तावत्कुतश्चिदस्याः क्षुद्दुःखप्रतीकारहेतुः यावन्न तनयानात्मानं चोपहन्ति। अजितस्य गमनानन्तरं बोधिसत्त्वः अचिन्तयत् – मम सम्पूर्ण शरीरे विद्यमाने सति कथमहमन्यस्य प्राणिनः मांसमानयामि? अन्यस्य प्राणिनः मांसस्य प्राप्तिः भविष्यति इति निश्चितिरपि नास्ति। कदाचित् तावता कालेन सा पुत्रान्न खादेत् मरणं वा न प्राप्नुयात्। मम आत्मा अमरः। शरीरमनित्यं जडञ्च। परोपकारार्थमिदं शरीरम् इति तर्कयन् सः अहं स्वप्राणरहितेन गात्रेण पुत्रवधरूपात् पापाद् व्याघ्याः संरक्षणं करोमि इति निश्चित्य योगबलेन प्राणान् अत्यजत्। ततः बोधिसत्त्वस्य तनुः गुहायाः भूमौ सशब्दं पतिता।
अनुवाद:
दया के सागर बोधिसत्त्व ने इस घटना को देखकर व्याकुलतापूर्वक शिष्य से कहा – “तब तक शीघ्र ही कहीं से इसकी भूख के कष्ट को दूर करने का साधन ढूँढो, जब तक यह अपने बच्चों को और स्वयं को नुकसान न पहुँचा ले।” अजित के जाने के बाद बोधिसत्त्व ने सोचा – “मेरा पूरा शरीर विद्यमान होते हुए मैं किसी अन्य प्राणी का मांस कैसे ला सकता हूँ? किसी अन्य प्राणी का मांस मिलेगा ही, इसकी भी कोई निश्चितता नहीं है। संभव है तब तक वह अपने बच्चों को खा जाए या मृत्यु को प्राप्त हो जाए।” “मेरी आत्मा अमर है। शरीर अनित्य और जड़ है। यह शरीर परोपकार के लिए ही है” — ऐसा विचार करते हुए उन्होंने निश्चय किया कि “मैं अपने प्राणरहित शरीर (मांस) से बाघिन को पुत्र-हत्या रूपी पाप से बचाता हूँ”, और योगबल से प्राण त्याग दिए। इसके बाद बोधिसत्त्व का शरीर गुफा की भूमि पर शब्द के साथ गिर पड़ा।
स्वपुत्रहिंसायाः उद्यमाद् विरता व्याघ्री बोधिसत्त्वस्य जडं शरीरमभक्षयत्। एतादृशः जीवमात्रे दयालुः बोधिसत्त्वः एव परस्मिन् जन्मनि कारुण्यमूर्तिः भगवान् बुद्धः इति रूपेण जगत्कल्याणं तनुते स्म। भगवान् बुद्धः एव बौद्धधर्मस्य प्रवर्तकः। सः जनानां दुःखनिवारणाय चत्वारि आर्यसत्यानि अष्टाङ्गमार्गं च उपदिष्टवान्।
अनुवाद:
अपने बच्चों की हिंसा के प्रयास से रुकी हुई बाघिन ने बोधिसत्त्व के निर्जीव शरीर को खा लिया। जीवमात्र पर दया करने वाले ऐसे बोधिसत्त्व ही अगले जन्म में करुणा की मूर्ति भगवान बुद्ध के रूप में प्रकट होकर जगत का कल्याण करते रहे। भगवान बुद्ध ही बौद्ध धर्म के प्रवर्तक हैं। उन्होंने लोगों के दुःखों के निवारण के लिए चार आर्य सत्य और अष्टांग मार्ग का उपदेश दिया।
स बुद्धः गृहस्थानां नैतिकजीवनस्य निर्वाहणाय पञ्चशीलानि अपि उपदिष्टवान्। तानि –
अनुवाद: उन बुद्ध ने गृहस्थों के नैतिक जीवन के निर्वाह के लिए पाँच शीलों (नियमों) का भी उपदेश दिया। वे हैं –
पाणातिपाता वेरमणिसिक्खापदं समादियामि।
अनुवाद: मैं किसी भी जीव की हत्या नहीं करूँगा/करूँगी, ऐसा संकल्प लेता/लेती हूँ।
अदिन्नादाना वेरमणिसिक्खापदं समादियामि।
अनुवाद: मैं चोरी नहीं करूँगा/करूँगी, ऐसा संकल्प लेता/लेती हूँ।
कामेसु मिच्छाचारा वेरमणिसिक्खापदं समादियामि।
अनुवाद: मैं व्यभिचार (दुराचार) का आचरण नहीं करूँगा/करूँगी, ऐसा संकल्प लेता/लेती हूँ।
मुसावादा वेरमणिसिक्खापदं समादियामि।
अनुवाद: मैं झूठ नहीं बोलूँगा/बोलूँगी, ऐसा संकल्प लेता/लेती हूँ।
सुरामेरय-मज्ज-पमादट्ठाना वेरमणिसिक्खापदं समादियामि।
अनुवाद: मैं शराब, नशीले पदार्थों और आलस्य/प्रमाद बढ़ाने वाले साधनों का सेवन नहीं करूँगा/करूँगी, ऐसा संकल्प लेता/लेती हूँ।
संसारे शान्तिमयं जीवनं यापयितुं वयं बौद्धधर्मस्य पञ्चशीलानि आचरेम तेन च आदर्शसमाजं रचयेम।
अनुवाद: संसार में शांतिपूर्ण जीवन बिताने के लिए हमें बौद्ध धर्म के पाँच शीलों का आचरण करना चाहिए और उससे एक आदर्श समाज की रचना करनी चाहिए।


Leave a Reply