मनःपूतं समाचरेत्
हिन्दी अनुवाद सहित
प्रियच्छात्राः! वदन्तु, किमपि कार्यं करणीयम् अस्ति चेत् आदौ किम् आवश्यकम्?
प्रिय छात्रों! बताओ, यदि कोई भी काम करना हो तो पहले क्या आवश्यक है?
आचार्ये! विचिन्त्य कार्यकरणम्। उचितविधिना कार्यकरणम्। पूर्णमनसा कार्यकरणम्।
हे आचार्य! सोच-समझकर काम करना। उचित तरीके से काम करना। पूरे मन से काम करना।
सर्वे उचितमेव वदन्ति। अधुना विचारयन्तु, यदि मनः एव मलिनं स्यात्, उद्देश्यम् एव अनुचितं स्यात् तर्हि किमपि कार्यं सम्यक् कथं भवेत्? एवं चेत् तस्य कार्यस्य फलम् अपि दूषितम् एव स्यात्।
सभी ठीक ही कह रहे हैं। अब सोचो, यदि मन ही मैला (अशुद्ध) हो, उद्देश्य ही अनुचित हो, तो कोई भी काम अच्छी तरह कैसे होगा? यदि ऐसा हो तो उस काम का फल भी दूषित (खराब) ही होगा।
अत एव अस्माभिः सर्वाणि कार्याणि पवित्रेण मनसा करणीयानि। एतदेव शिक्षयति प्रस्तुतः पाठः ‘मनःपूतं समाचरेत्’ इति।
इसीलिए हमें सभी काम पवित्र मन से करने चाहिए। यही सिखाता है यह प्रस्तुत पाठ — ‘मनःपूतं समाचरेत्’ अर्थात् मन से शुद्ध (पवित्र) होकर आचरण करो।
आचार्ये! अस्मिन् पाठे विविधेभ्यः ग्रन्थेभ्यः सुभाषितानि सङ्कलितानि दृश्यन्ते। किम् एतानि सुभाषितानि वर्तमानसमये अपि उपयोगीनि सन्ति?
हे आचार्य! इस पाठ में विभिन्न ग्रन्थों से सुभाषित (सुन्दर वचन) संकलित दिखाई देते हैं। क्या ये सुभाषित वर्तमान समय में भी उपयोगी हैं?
भवन्तः स्वयमेव चिन्तयन्तु।
आप लोग स्वयं ही विचार करें।
अहं वदामि आचार्ये! एतानि सुभाषितानि न केवलं पठनाय अपितु जीवने आचरणाय सन्ति।
मैं कहता/कहती हूँ — हे आचार्य! ये सुभाषित केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में आचरण (व्यवहार) करने के लिए भी हैं।
सम्यक् उक्तम्। आयान्तु, वयं सुभाषितानि पठामः जीवने च आचरामः।
बिल्कुल सही कहा। आओ, हम सुभाषितों को पढ़ें और जीवन में उनका आचरण करें।
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेत् वाचं मनःपूतं समाचरेत्॥
आँखों से देखकर (जाँचकर) पैर रखना चाहिए। वस्त्र [कपड़े] से छानकर जल पीना चाहिए।
सत्य से शुद्ध [सच्ची] वाणी बोलनी चाहिए। मन से पवित्र होकर आचरण करना चाहिए।
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
धैर्य [धृति], क्षमा, मन-इन्द्रियों का नियंत्रण [दम], चोरी न करना [अस्तेय], पवित्रता [शौच],
इन्द्रियों पर संयम [इन्द्रियनिग्रह], बुद्धि [धी], विद्या, सत्य और अक्रोध [क्रोध न करना]
— ये दस धर्म के लक्षण हैं।
यद्यदाचरति श्रेष्ठः तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, वही-वही दूसरे लोग भी करते हैं।
वह जो प्रमाण [मानदण्ड] स्थापित करता है, संसार उसी का अनुसरण करता है।
अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः।
अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किमभ्यासस्य दुष्करम्॥
अभ्यास से सभी क्रियाएँ सिद्ध होती हैं। अभ्यास से सभी कलाएँ सिद्ध होती हैं।
अभ्यास से ध्यान, मौन आदि [भी सिद्ध होते हैं]। अभ्यास के लिए क्या कठिन है?
[अर्थात् अभ्यास से कुछ भी कठिन नहीं।]
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति॥
नीच [अधम] लोग विघ्नों [बाधाओं] के डर से काम आरम्भ ही नहीं करते।
मध्यम [साधारण] लोग काम आरम्भ करके बाधाएँ आने पर छोड़ देते हैं।
उत्तम [श्रेष्ठ] लोग बार-बार बाधाएँ आने पर भी काम आरम्भ करके उसे नहीं छोड़ते।
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः॥
लक्ष्मी [सम्पत्ति/सफलता] परिश्रमी पुरुष-सिंह [पराक्रमी पुरुष] के पास स्वयं आती है।
‘भाग्य से ही मिलता है’ — ऐसा कायर [कापुरुष] लोग कहते हैं।
भाग्य को परे करके अपनी शक्ति से पुरुषार्थ [प्रयत्न] करो।
यत्न [प्रयास] करने पर भी यदि [काम] सिद्ध न हो, तो उसमें क्या दोष है?
पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः॥
पुराना है इसलिए सब कुछ अच्छा ही है — ऐसा नहीं है। और काव्य नया है इसलिए निम्न [बुरा] है — यह भी नहीं है।
सज्जन [विद्वान् लोग] परीक्षा करके [जाँचकर] किसी एक को स्वीकार करते हैं।
मूर्ख [व्यक्ति] दूसरों के विचारों से प्रभावित बुद्धि वाला होता है।
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥
जल्दबाजी में कोई काम नहीं करना चाहिए। अविवेक [बिना सोचे-समझे काम करना] सबसे बड़ी विपत्तियों का स्थान [कारण] है।
गुणों की अभिलाषी [गुणों को चाहने वाली] सम्पत्तियाँ [सम्पदाएँ] सोच-समझकर काम करने वाले व्यक्ति का स्वयं ही वरण [चुनाव] करती हैं।

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