समथेन कृषिः कार्या लोकानां हितकाम्यया
(लोगों के हित के लिए खेती करनी चाहिए।)
आचार्या: शुभमस्तु प्रियच्छात्राः! अपि कुशलिनः भवन्तः?
हिंदी अनुवाद: सभी प्रिय छात्रों का कल्याण हो! क्या आप सब कुशल हैं?
छात्राः नमो नमः, मान्ये! आम्, स्वयं कुशलिनः।
हिंदी अनुवाद: आदरणीया महोदया, नमस्कार! जी हाँ, हम सब कुशल हैं।
आचार्या: साधु! उपविशन्तु। दिनेश! एवं भाति, भवान् किञ्चित् प्रष्टुम् इच्छति।
हिंदी अनुवाद: उत्तम! बैठ जाइए। दिनेश! ऐसा प्रतीत होता है कि आप कुछ पूछना चाहते हैं।
दिनेशः सत्यम् महोदये! अस्माकं भारतवर्षं प्राचीनकालाद् एव कृषिप्रधानं राष्ट्रम् अस्ति इति वयं शृणुमः। अद्य वयं कृषेः महत्वविषये किमपि ज्ञातुम् इच्छामः।
हिंदी अनुवाद: महोदया, यह सत्य है! हम सुनते हैं कि हमारा भारतवर्ष प्राचीन काल से ही कृषि प्रधान राष्ट्र रहा है। आज हम कृषि के महत्त्व के विषय में कुछ जानना चाहते हैं।
रश्मि: आचार्ये! तस्मात् सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत् इति पद्यम् अहम् श्रुतवती, अस्य कः अभिप्रायः?
हिंदी अनुवाद: आचार्या जी! मैंने एक श्लोक सुना है — ‘तस्मात् सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत्’ (इसलिए सब कुछ छोड़कर प्रयत्नपूर्वक कृषि करनी चाहिए)। इसका क्या अभिप्राय है?
आचार्या: सुन्दरं पद्यम्! कृषिकर्मणा एव सर्वविधानाम् सस्यानाम् प्राप्तिर्भवति। कृष्या एव अन्नफलादीनां वनस्पतीनां दुग्धादीनां च उत्पत्तिर्भवति। एतस्मात् कारणात् अन्यानि सर्वाणि कर्माणि त्यक्त्वा वयं कृषिं कुर्मः इति अस्य पद्यांशस्य आशयः। वयं जानीमः एभिः बिना अस्माकं जीवनम् एव न सम्भवति। अस्माकं कृषकाः महता श्रमेण अन्नादीनि उत्पादयन्ति। अधुना भवन्तः वदन्तु ते तत्र कं कं श्रमं कुर्वन्ति?
हिंदी अनुवाद: बहुत सुंदर श्लोक! कृषि कार्य से ही सभी प्रकार के अनाजों की प्राप्ति होती है। कृषि से ही अन्न, फल आदि, वनस्पतियों तथा दूध आदि का उत्पादन होता है। इसी कारण से अन्य सभी कार्यों को छोड़कर हमें कृषि करनी चाहिए — यही इस श्लोकांश का आशय है। हम जानते हैं कि इनके बिना हमारा जीवन संभव ही नहीं है। हमारे किसान बड़े परिश्रम से अन्न आदि का उत्पादन करते हैं। अब आप बताइए कि वे वहाँ क्या-क्या परिश्रम करते हैं?
कविता: आचार्ये! ते आदौ भूमेः जलादीनां च सम्यक् परीक्षणं कुर्वन्ति।
हिंदी अनुवाद: आचार्या जी! वे सबसे पहले भूमि और जल आदि का सही तरीके से परीक्षण करते हैं।
प्रकाशः योग्यां भूमिं चित्वा भूमिकर्षणं बीजवपनादिकं च कुर्वन्ति।
हिंदी अनुवाद: योग्य भूमि को चुनकर वे खेत की जुताई और बीज बोने आदि का कार्य करते हैं।
आचार्या: सत्यम्, एतत् एव कृषिविज्ञानम्।
हिंदी अनुवाद: सत्य है, यही कृषि विज्ञान है।
विवेकः महोदये! अस्माकं शास्त्राणां कृषिकार्यविषये का दृष्टिः?
हिंदी अनुवाद: महोदया! कृषि कार्य के विषय में हमारे शास्त्रों का क्या दृष्टिकोण है?
आचार्या: कृषिविषये पराशरप्रभृतयः प्राचीनाः महर्षयः सूक्ष्मं विशदं च विचारितवन्तः। आचार्यकौटिल्यः कृषिविद्यां वार्ताविद्यायां समावेशयति। वयम् अद्य कृषिविद्यायाः विषये एव अध्ययनं कुर्मः।
हिंदी अनुवाद: कृषि के विषय में पराशर आदि प्राचीन महर्षियों ने सूक्ष्म और विस्तृत विचार किया है। आचार्य कौटिल्य कृषि विद्या को ‘वार्ता’ विद्या में समाविष्ट करते हैं। आज हम कृषि विद्या के विषय में ही अध्ययन करते हैं।
छात्राः अस्तु महोदये! वयं पठनाय उत्सुकः स्मः।
हिंदी अनुवाद: ठीक है महोदया! हम सब पढ़ने के लिए उत्सुक हैं।
श्लोक १:
अन्नाद् भवन्ति भूतानि जन्यादन्नस्य सम्भवः।
देवाः असुराः मनुष्याश्च सर्वे च अन्नोपजीविनः॥ १ ॥
अनुवाद:
अन्न ही जीवन (प्राण) है, अन्न ही बल है और अन्न ही सभी पुरुषार्थों/उद्देश्यों को सिद्ध करने का साधन है। देवता, असुर और मनुष्य — ये सभी अन्न पर ही आश्रित होकर जीवन बिताते हैं।
श्लोक २:
अन्नं हि धान्यसञ्जातम् धान्यं कृष्या विना न च।
तस्मात् सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत्॥ २ ॥
अनुवाद:
अन्न निश्चित रूप से अनाज/फसल से उत्पन्न होता है और अनाज कृषि के बिना संभव नहीं है। इसलिए अन्य सब कार्यों को छोड़कर प्रयत्नपूर्वक कृषि करनी चाहिए।
श्लोक ३:
समर्थेन कृषिः कार्या लोकानां हितकाम्यया।
असमर्थो हि कृषको भिक्षां प्राप्नोति मानवः॥ ३ ॥
अनुवाद:
लोगों के कल्याण की भावना से योग्य/समर्थ व्यक्ति द्वारा कृषि की जानी चाहिए। क्योंकि असमर्थ किसान (कृषि में अक्षम होने पर) भिक्षा प्राप्त करने वाला मानव बन जाता है (दूसरों पर आश्रित हो जाता है)।
श्लोक ४:
एकया च पुनः कृष्या प्रार्थना नैव जायते।
कृष्यन्वितो हि लोकेऽस्मिन् भूयाद् एकश्च भूपतिः॥ ४ ॥
अनुवाद:
केवल कृषि कार्य से मनुष्य कभी याचक (माँगने वाला) नहीं बनता। इस संसार में कृषि कर्म से युक्त व्यक्ति अकेला ही राजा (सम्राट) के समान समृद्ध हो सकता है।
श्लोक ५:
सुवर्णरौप्यमाणिक्यवसनैरपि पूरिताः।
तथापि प्रार्थयन्त्येव कृषकान् भक्ततृष्णया॥ ५ ॥
अनुवाद:
लोग सोने, चाँदी, मणियों और वस्त्रों से परिपूर्ण क्यों न हों, फिर भी भोजन की इच्छा (भूख) के कारण वे किसानों से ही (अन्न की) प्रार्थना करते हैं।
श्लोक ६:
गोभूमिदेवभक्ताश्च नितरां सत्यवादिनः।
परानुकूल्यनिरताः सन्ततं तुष्टचेतसः॥ ६ ॥
अनुवाद:
(सच्चे किसान) गाय, भूमि और देवों के भक्त होते हैं, सदा सत्य बोलने वाले होते हैं, दूसरों का भला (परोपकार) करने में लगे रहते हैं और निरंतर संतुष्ट मन वाले होते हैं।
श्लोक ७:
तन्द्रालस्यादिहीनाश्च कामक्रोधादिवर्जिताः।
परस्परं स्नेहभाजं साह्यकर्मरताश्च ये॥ ७ ॥
अनुवाद:
जो आलस्य और सुस्ती से रहित हैं, काम-क्रोध आदि विकारों से मुक्त हैं, आपस में प्रेमभाव रखते हैं और परस्पर सहयोग के कार्य में लीन रहते हैं।
श्लोक ८:
आघ्राय पीत्वा च मृदं तोलयित्वाऽपि वा क्वचित्।
क्षिप्त्वा पात्रस्थसलिले घटिकावधिकोविदः॥ ८ ॥
अनुवाद:
मिट्टी को सूँघकर, जल को पीकर, मिट्टी का तोल (वजन) करके या फिर बर्तन में रखे जल में मिट्टी डालकर (उर्वरता जाँचने वाला) समय व विधि का ज्ञाता विद्वान किसान भूमि का परीक्षण करता है।


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