उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्
हिन्दी अनुवाद सहित
मातः! पश्यतु, अद्य अहं मार्गे पतितं धनं प्राप्तवान्। एतेन धनेन बहूनि क्रीडनकानि क्रीणामि।
पुत्र — माँ! देखिए, आज मुझे रास्ते में गिरा हुआ धन मिला। इस धन से मैं बहुत सारे खिलौने खरीदूँगा।
न हि पुत्र! एतत् अन्यस्य श्रमार्जितं धनमस्ति, तस्मै एव प्रत्यर्पणीयम्। अन्यस्य धनं तृणम् इव गणनीयम्।
माता — नहीं बेटा! यह किसी दूसरे की मेहनत से कमाया हुआ धन है, इसे उसी को लौटाना चाहिए। दूसरे का धन तिनके [घास] के समान समझना चाहिए।
मातः! अन्यस्य धनं तृणम् इव कथं भवति?
पुत्र — माँ! दूसरे का धन तिनके के समान कैसे होता है?
एहि पुत्र! अहं तुभ्यं पञ्चतन्त्रस्य काञ्चन कथां श्रावयामि यया त्वं स्वप्रश्नस्य उत्तरं प्राप्तुं शक्नोषि।
माता — आओ बेटा! मैं तुम्हें पञ्चतन्त्र की एक कथा सुनाती हूँ जिससे तुम अपने प्रश्न का उत्तर पा सकोगे।
मातः! तर्हि कृपया सत्वरं श्रावयतु।
पुत्र — माँ! तो कृपया जल्दी सुनाइए।
कस्मिंश्चिद् देशे धर्मबुद्धिः पापबुद्धिश्च द्वे मित्रे प्रतिवसतः स्म। अथ कदाचित् पापबुद्धिना चिन्तितं यद् अहं तावान् मूर्खः दरिद्रतया पीडितश्च। अत एनं धर्मबुद्धिं स्वीकृत्य अन्यं देशं गच्छामि, तत्र अस्य आश्रयणेन धनं सम्पादयामि, अनन्तरम् एनमपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि इति।
किसी देश में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नाम के दो मित्र रहते थे। एक बार पापबुद्धि ने सोचा कि मैं बहुत मूर्ख हूँ और गरीबी से पीड़ित भी हूँ। इसलिए इस धर्मबुद्धि को साथ लेकर दूसरे देश जाता हूँ, वहाँ इसके सहारे धन कमाऊँगा, और उसके बाद इसे भी ठगकर सुखी हो जाऊँगा।
अथ अन्यस्मिन् अहनि धर्मबुद्धिम् उपेत्याह —
भो मित्र! यदा भवान् वृद्धः भवति तदा ‘बाल्ये यौवने वा मया एवं कृतम्’ इति वक्तुं योग्यं किं कार्यं स्मरति? भवता अन्यः देशः न दृष्टः एव चेत् भवतः शिशून् अन्यदेशसम्बन्धे कां कथां वदिष्यति? उक्तमेव —
फिर दूसरे दिन वह धर्मबुद्धि के पास जाकर बोला —
पापबुद्धि — हे मित्र! जब तुम बूढ़े हो जाओगे तब ‘बचपन में या जवानी में मैंने ऐसा किया था’ — यह कहने योग्य कौन-सा काम याद है? यदि तुमने कोई दूसरा देश देखा ही नहीं, तो अपने बच्चों को दूसरे देश के बारे में क्या बताओगे? कहा भी गया है —
देशान्तरेषु बहुविधभाषावेषादि येन न ज्ञातम्।
भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यर्थम्॥
जिसने पृथ्वी पर घूमते हुए भी अन्य देशों की अनेक प्रकार की भाषाएँ, वेश-भूषा आदि नहीं जाने — उसके जन्म का फल व्यर्थ है।
विद्यां वित्तं शिल्पं तावन्नाप्नोति मानवः सम्यक्।
यावद् व्रजति न भूमौ देशाद्देशान्तरं हृष्टः॥
मनुष्य विद्या, धन और शिल्प [कला-कौशल] को तब तक ठीक से प्राप्त नहीं करता, जब तक वह प्रसन्न मन से पृथ्वी पर एक देश से दूसरे देश नहीं जाता।
अतः आवां देशान्तरं गत्वा धनम् अर्जयित्वा आगच्छाव इति। अथ तस्य तद्वचनम् आकर्ण्य प्रहृष्टमनाः धर्मबुद्धिः आह — अस्तु तावत् गुरुजनाज्ञया गच्छावः।
(ततस्तौ गुरुजनानाम् अनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ। पापबुद्धिः धर्मबुद्धेः प्रभावेण प्रभूतं धनं सम्पादितवान्।)
इसलिए हम दोनों दूसरे देश जाकर धन कमाकर आएँ। तब उसकी वह बात सुनकर प्रसन्न मन वाले धर्मबुद्धि ने कहा — ठीक है, तो बड़ों की आज्ञा से चलते हैं।
(तब वे दोनों बड़ों की अनुमति लेकर शुभ दिन पर दूसरे देश को रवाना हुए। पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि के प्रभाव से बहुत अधिक धन कमाया।)
मित्र! आवाभ्याम् इदानीं प्रचुरं धनम् उपार्जितम्। अत्रागत्य वर्षाणि व्यतीतानि, सर्वं धनं स्वीकृत्य स्वग्रामं गच्छावः।
पापबुद्धि — मित्र! हम दोनों ने अब बहुत धन कमाया है। यहाँ आए हुए वर्ष बीत गए, सारा धन लेकर अपने गाँव चलते हैं।
अथ किम्। तथैवास्तु।
(यदा तौ स्वनगरसमीपम् आगतवन्तौ तदा)
धर्मबुद्धि — और क्या, ऐसा ही हो।
(जब वे दोनों अपने नगर के पास पहुँचे, तब —)
भद्र! एतत् सर्वं धनं गृहं प्रति नेतुं न उचितम्। अतः एतद् धनम् अत्रैव गहनारण्ये कुत्रापि भूमौ निक्षिप्य किञ्चिन्मात्रम् आदाय गृहं प्रविशावः।
पापबुद्धि — भद्र [मित्र]! यह सारा धन घर ले जाना उचित नहीं है। इसलिए यह धन यहीं घने जंगल में कहीं भूमि में गाड़ देते हैं और थोड़ा-सा लेकर घर में प्रवेश करते हैं।
सत्यमेव अभिहितं भवता, तथैव कुर्वः। यथा द्वाभ्यां चिन्तितं तथैव भूमिं खनित्वा तत्रैव धनं निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ। अन्यस्मिन्नहनि पापबुद्धिः निशीथे अटव्यां गत्वा तत्सर्वं वित्तं समादाय गर्तं पूरयित्वा स्वभवनं गतवान्।
धर्मबुद्धि — तुमने सच ही कहा, ऐसा ही करते हैं। जैसा दोनों ने सोचा था, वैसे ही भूमि खोदकर वहीं धन गाड़कर अपने-अपने घर चले गए। दूसरे दिन पापबुद्धि आधी रात को जंगल में जाकर वह सारा धन निकालकर गड्ढे को भरकर अपने घर चला गया।
(अथ कतिचिद् दिनानन्तरम्)
सखे! मम कुटुम्बे बहवः जनाः सन्ति, धनाभावात् कष्टम् अनुभवामि। अतः तत्र गत्वा किञ्चिन्मात्रं धनम् आनयावः।
(इसके कुछ दिन बाद —)
पापबुद्धि — मित्र! मेरे परिवार में बहुत लोग हैं, धन के अभाव में कष्ट हो रहा है। इसलिए वहाँ जाकर थोड़ा-सा धन लाते हैं।
अस्तु मित्र! गच्छावः।
(अथ द्वावपि गत्वा तत्स्थानं यावत् खनतः तावद् रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ। अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् उक्तवान्।)
धर्मबुद्धि — ठीक है मित्र! चलते हैं।
(तब दोनों जाकर उस स्थान को खोदने लगे, तो खाली घड़ा देखा। इतने में पापबुद्धि ने सिर पीटते हुए कहा —)
भोः धर्मबुद्धे! त्वयैव अपहृतम् एतद् धनं, नान्येन। तत् प्रयच्छ मे तदर्धम्। अन्यथा अहं राजकुले निवेदयिष्यामि।
पापबुद्धि — अरे धर्मबुद्धि! यह धन तुमने ही चुराया है, किसी और ने नहीं। इसलिए मुझे उसका आधा हिस्सा दो। नहीं तो मैं राजदरबार में शिकायत करूँगा।
भोः दुरात्मन्! मा मैवं वद। धर्मबुद्धिः खल्वहम्। नैतत् चौरकर्म करोमि।
धर्मबुद्धि — अरे दुष्ट! ऐसा मत कहो। मैं धर्मबुद्धि हूँ। यह चोरी का काम नहीं करता।
मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्।
आत्मवत् सर्वभूतेषु वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः॥
दूसरे की स्त्रियों को माता के समान, दूसरे के धन को मिट्टी के ढेले [पत्थर] के समान, और सभी प्राणियों को अपने समान देखते हैं — ऐसे होते हैं धर्मबुद्धि वाले लोग।
(एवं द्वावपि विवदमानौ धर्माधिकारिणं निकषा गतौ।)
ननु न कोऽपि साक्षी युवाभ्याम् अन्यतरस्य चौरकर्मणः। अतः यत्र मानुषप्रमाणम् अनुपलब्धं तत्र वनदेवता एव न्यायनिर्णयं करिष्यति। अतः प्रातःकाले युवाम् अस्माभिः सह तत्र वनप्रदेशं गच्छतम्। तत्रैव निर्णयः भविष्यति।
(इस प्रकार दोनों झगड़ते हुए धर्माधिकारी [न्यायाधीश] के पास पहुँचे।)
धर्माधिकारी — तुम दोनों में से किसी के चोरी के कर्म का कोई साक्षी नहीं है। इसलिए जहाँ मनुष्य का प्रमाण न मिले, वहाँ वनदेवता ही न्याय का निर्णय करेगी। इसलिए सवेरे तुम दोनों हमारे साथ उस वन-प्रदेश में चलो। वहीं निर्णय होगा।
(अत्रान्तरे पापबुद्धिः गृहं गत्वा स्वजनकं प्रबोधितवान्।)
तात! मया धर्मबुद्धेः प्रभूतः अर्थः चोरितः। भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं मयि स्थिरं तिष्ठति, अन्यथा अस्माकं प्राणैः सह यास्यति।
(इसी बीच पापबुद्धि घर जाकर अपने पिता को समझाने लगा —)
पापबुद्धि — पिताजी! मैंने धर्मबुद्धि का बहुत सारा धन चुराया है। यदि आप मेरे कहे अनुसार बोलें तो वह धन मेरे पास टिका रहेगा, नहीं तो हमारे प्राणों के साथ चला जाएगा।
वत्स! द्रुतं वद, अहं किं करवाणि येन तद्द्रव्यं स्थिरं तिष्ठेत्।
पिता — बेटा! जल्दी बताओ, मैं क्या करूँ जिससे वह धन स्थिर बना रहे।
तात! अस्ति वनप्रदेशे महाशमी नाम वृक्षः। तस्मिन् महाकोटरम् अस्ति। तत्र भवान् साम्प्रतमेव प्रविशतु। ततः प्रभाते यदा अहं सत्यश्रावणाय निवेदयामि, तदा भवता वक्तव्यं यद् धर्मबुद्धिः चौरः इति।
पापबुद्धि — पिताजी! वन-प्रदेश में महाशमी [शमी वृक्ष] नाम का एक बड़ा वृक्ष है। उसमें एक बड़ा कोटर [खोखला भाग] है। आप अभी वहाँ प्रवेश कर जाइए। फिर सवेरे जब मैं सत्य सुनाने के लिए निवेदन करूँ, तब आप यह कहना कि धर्मबुद्धि ही चोर है।
(तथा कृते, प्रातःकाले स्नात्वा पापबुद्धिः धर्मबुद्धिना धर्माधिकारिणा च सह न्यायार्थं वनदेवतायाः समीपम् उपागतः। अन्येऽपि सामाजिकाः तद्द्रष्टुम् आगताः।)
(ऐसा करने के बाद, सवेरे स्नान करके पापबुद्धि धर्मबुद्धि और धर्माधिकारी के साथ न्याय के लिए वनदेवता के पास पहुँचा। और भी गाँव के लोग उसे देखने आए।)
आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च।
अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्ये धर्मो हि जानाति नरस्य वृत्तम्॥
सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय और यमराज; तथा दिन, रात और दोनों संध्याएँ — ये सब धर्म हैं जो मनुष्य के आचरण को जानते हैं।
हे भगवती वनदेवते! हम दोनों में से जो चोर है, वह तुम बताओ।
भोः! शृणुत, शृणुत! धर्मबुद्धिना हृतम् एतद् धनम्।
(तद् आकर्ण्य ते सर्वे जनाः विस्मयेन उत्फुल्ललोचनाः सञ्जाताः।)
पिता (शमी वृक्ष के कोटर से) — अरे! सुनो, सुनो! यह धन धर्मबुद्धि ने चुराया है।
(यह सुनकर वे सभी लोग आश्चर्य से फटी हुई आँखों वाले हो गए।)
धनापहरणदोषहेतोः शास्त्रविहितप्रकारेण धर्मबुद्धये दण्डः दातव्यः।
सभी लोग — धन चुराने के दोष के कारण शास्त्र के नियम के अनुसार धर्मबुद्धि को दण्ड दिया जाना चाहिए।
इदं मिथ्याभाषितम् अस्ति। नाहं चोरितवान्। अहम् एतत् शमीकोटरं वह्निभोज्यद्रव्यैः परिवेष्ट्य वह्निना प्रज्वालयामि।
(तथा करोति।)
(अथ ज्वलति तस्मिन् शमीकोटरे अर्धदग्धशरीरः स्फुटितेक्षणः करुणं विलपन् पापबुद्धिपिता बहिरागतः।)
धर्मबुद्धि — यह झूठ बोला गया है। मैंने नहीं चुराया। मैं इस शमी वृक्ष के कोटर को आग से जलने वाली सामग्री से घेरकर आग लगाता हूँ।
(वह ऐसा करता है।)
(जब वह शमी वृक्ष का कोटर जलने लगा, तो आधा जला हुआ शरीर और फटी हुई आँखों वाला पापबुद्धि का पिता करुण विलाप करता हुआ बाहर आया।)
भोः! किमिदम्? किमिदम्?
एतत् सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्।
(इत्युक्त्वा मृतः।)
लोग (आश्चर्य से) — अरे! यह क्या है? यह क्या है?
पापबुद्धि का पिता — यह सब पापबुद्धि की करतूत है।
(यह कहकर वह मर गया।)
एष पापबुद्धिः दण्डनीयः।
(राजपुरुषाः नियमानुसारं पापबुद्धिं दण्डितवन्तः धर्मबुद्धिं प्रशंसितवन्तः च।)
धर्माधिकारी — यह पापबुद्धि दण्ड के योग्य है।
(राजपुरुषों ने नियमानुसार पापबुद्धि को दण्डित किया और धर्मबुद्धि की प्रशंसा की।)
भो धर्मबुद्धे! त्वया सम्यक् कृतम्। पापबुद्धेः व्यर्थपाण्डित्यात् पिता वह्निना घातितः। अतः साधूक्तम् —
सभी लोग — हे धर्मबुद्धि! तुमने सही किया। पापबुद्धि की व्यर्थ चतुराई से उसका पिता आग में मारा गया। इसलिए ठीक ही कहा गया है —
उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्।
बुद्धिमान मनुष्य उपाय [समाधान/योजना] के बारे में सोचे, तथा उससे होने वाले संकट [अपाय] के बारे में भी सोचे।

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