अन्नाद् आनन्दं प्रति
हिन्दी अनुवाद सहित
संस्कृतवाङ्मये उपनिषत्-साहित्यस्य विशिष्टं महत्त्वपूर्णं च स्थानम् अस्ति। उपनिषत्सु अनेके ज्ञानप्रदाः संवादाः सन्ति। तैत्तिरीयोपनिषदि समग्रजीवनविकासाय पञ्चकोषाणां महत्त्वं पितापुत्रसंवादरूपेण वर्णितम्। तादृशज्ञानप्रदसंवादानाम् अध्ययनेन बोधनेन च वयम् आत्मविकासं कर्तुं शक्नुमः। अस्मिन् पाठे वयम् पितापुत्रयोः भृगुवरुणयोः संवादं पठिष्यामः।
संस्कृत साहित्य में उपनिषदों का एक विशेष और महत्त्वपूर्ण स्थान है। उपनिषदों में अनेक ज्ञानदायक संवाद हैं। तैत्तिरीय उपनिषद में सम्पूर्ण जीवन के विकास के लिए पाँच कोषों का महत्त्व पिता-पुत्र के संवाद के रूप में वर्णित किया गया है। ऐसे ज्ञानप्रद संवादों के अध्ययन और समझ से हम आत्म-विकास कर सकते हैं। इस पाठ में हम पिता-पुत्र भृगु और वरुण का संवाद पढ़ेंगे।
(एकदा ब्रह्मज्ञानाय तत्परः वरुणस्य पुत्रः भृगुः सविनयं पितरं प्रति गत्वा निवेदयति)
(एक बार ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के लिए उत्सुक वरुण के पुत्र भृगु विनम्रतापूर्वक अपने पिता के पास जाकर निवेदन करते हैं।)
भृगुः — अयि भोः पितः! अभिवादयेऽहं सादरम्। भगवन्! ब्रह्मविषये मयि काचिद् जिज्ञासा वर्तते। किं तद् ब्रह्म येन सर्वं जगदिदं सञ्चाल्यते? कृपया उपदिशतु।
भृगु — हे पिताजी! मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ। भगवन्! मेरे मन में ब्रह्म के विषय में कुछ जिज्ञासा है। वह ब्रह्म क्या है, जिससे यह सारा संसार चलता है? कृपया उपदेश दीजिए।
वरुणः — पुत्र! शुभं भूयात्। ब्रह्मज्ञानाय त्वया स्वयमेव अन्वेषणं क्रियताम्। यत्नः अभ्यासश्च क्रियेताम्। तपस्तप्यताम्। तपसैव ज्ञायते।
वरुण — पुत्र! शुभ हो। ब्रह्मज्ञान के लिए तुम स्वयं ही खोज करो। प्रयत्न और अभ्यास करो। तप करो। तप से ही (ब्रह्म) जाना जाता है।
भृगुः — अस्तु तात!
(ततो भृगुः अनेकवर्षाणि तप आचरति। तपस्तप्त्वा पुनः पितरं निकषा गच्छति। पिता तं पृच्छति —)
भृगु — ठीक है, पिताजी!
(तब भृगु अनेक वर्षों तक तप करते हैं। तप करके फिर पिता के पास जाते हैं। पिता उनसे पूछते हैं —)
वरुणः — अयि पुत्र! त्वया किं ज्ञातम्?
भृगुः — भोः पितः! अन्नं वै ब्रह्म इति।
वरुणः — कथम् अन्नं ब्रह्मरूपेण ज्ञातम्?
भृगुः — हे पितः! अन्नाद् एव प्राणिनः जायन्ते। अन्नेन एव प्राणिनः जीवन्ति। अन्नेनैव शरीरं बलं च वर्धेते। अतोऽन्नं ब्रह्म इति। उच्यते हि —
वरुण — हे पुत्र! तुमने क्या जाना?
भृगु — हे पिताजी! अन्न (भोजन) ही ब्रह्म है।
वरुण — अन्न को ब्रह्म रूप में कैसे जाना?
भृगु — हे पिताजी! अन्न से ही प्राणी उत्पन्न होते हैं। अन्न से ही प्राणी जीते हैं। अन्न से ही शरीर और बल बढ़ते हैं। इसलिए अन्न ही ब्रह्म है। कहा भी गया है —
आहारात् सर्वभूतानि सम्भवन्ति महीपते।
आहारेण विवर्धन्ते तेन जीवन्ति जन्तवः॥
हे राजन्! भोजन से सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं। भोजन से ही जीव-जन्तु बढ़ते हैं और उसी से जीते हैं।
वरुणः — पुत्र! त्वया सम्यग् अवबुद्धम्। अत उच्यते — अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात् (अन्नं) सर्वौषधम् इति उच्यते। अतः कदापि अन्नं न निन्द्यात्। अन्नं सदा ईश्वरबुद्ध्या सेवताम्। कदापि अन्नं न परिहर्तव्यम्। प्रयत्नेन अन्नं बहु कुर्वीत। सर्वदा सात्त्विकं हितकारकं च आहारं सेवताम्। परं च हे वत्स! ब्रह्म ज्ञातुम् इतोऽपि यतताम्। तपः कुरुताम्।
वरुण — पुत्र! तुमने सही समझा। इसीलिए कहा जाता है — अन्न सभी प्राणियों में सबसे ज्येष्ठ (श्रेष्ठ) है। इसलिए वह सभी औषधियों (दवाओं) में सर्वश्रेष्ठ कही जाती है। इसलिए कभी भी अन्न की निंदा नहीं करनी चाहिए। अन्न को सदा ईश्वर की बुद्धि से (ईश्वर का प्रसाद मानकर) ग्रहण करो। कभी भी अन्न का त्याग नहीं करना चाहिए। प्रयत्न से अन्न की बहुतायत (वृद्धि) करो। सदा सात्त्विक और हितकारी भोजन करो। और हे वत्स! ब्रह्म को जानने के लिए और अधिक प्रयत्न करो। तप करो।
भृगुः — अस्तु तात!
(पुनः भृगुः पर्वतं गत्वा बहूनि वर्षाणि तप आचरति। तपस्तप्त्वा पितुः समीपं गच्छति। आगतं पुत्रं दृष्ट्वा पिता पृच्छति।)
वरुणः — हे पुत्र! तपसा त्वया किं ज्ञातम्?
भृगु — ठीक है, पिताजी!
(फिर भृगु पर्वत पर जाकर अनेक वर्षों तक तप करते हैं। तप करके पिता के पास जाते हैं। आए हुए पुत्र को देखकर पिता पूछते हैं।)
वरुण — हे पुत्र! तप से तुमने क्या जाना?
भृगुः — हे पितः! प्राणो वै ब्रह्म इति।
वरुणः — हे भृगो! कथं प्राणो ब्रह्म इति ज्ञातम्?
भृगुः — हे भगवन्! प्राणो हि भूतानाम् आयुः। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। प्राण एव अस्माकं जीवनम्। प्राणेन विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति। अतः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च। तस्मात् प्राणो वै ब्रह्म इति विज्ञातम्।
भृगु — हे पिताजी! प्राण (जीवन-शक्ति) ही ब्रह्म है।
वरुण — हे भृगु! प्राण को ब्रह्म कैसे जाना?
भृगु — हे भगवन्! प्राण ही सभी प्राणियों की आयु (जीवन) है। प्राण में ही शरीर टिका हुआ है। प्राण ही हमारा जीवन है। प्राण के बिना शरीर क्रिया-शून्य (निष्क्रिय) हो जाता है। इसलिए प्राण ही सबसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। इसीलिए प्राण ही ब्रह्म है — यह जाना।
वरुणः — पुत्र! त्वया सत्यम् उदीरितम्। प्राणाद् एव इमानि भूतानि जायन्ते। प्राणेन जातानि जीवन्ति। प्राणशक्त्या एव शारीरिकक्रियाशक्तेर्विकासो भवति। अत एव प्राणः सर्वथा रक्षणीयः। तस्मात् प्राणविकासाय प्रतिदिनं प्राणायामः कर्तव्यः। उक्तं हि —
वरुण — पुत्र! तुमने सत्य कहा। प्राण से ही ये सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं। प्राण से उत्पन्न हुए (जीव) जीते हैं। प्राण-शक्ति से ही शरीर की क्रिया-शक्ति का विकास होता है। इसीलिए प्राण सर्वदा रक्षा करने योग्य है। इसलिए प्राण के विकास के लिए प्रतिदिन प्राणायाम करना चाहिए। कहा भी गया है —
यावद् वायुः स्थितो देहे तावज्जीवनमुच्यते।
मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायुं निरोधयेत्॥
जब तक शरीर में वायु (प्राण) स्थित रहती है, तब तक जीवन कहा जाता है। उसके (वायु के) शरीर से बाहर निकल जाने को ही मृत्यु कहते हैं — इसलिए वायु (प्राण) को रोककर रखना चाहिए।
वरुणः — पुत्र! भवान् तपसा प्राणतत्त्वस्य महत्त्वं ज्ञातवान्। किन्तु ब्रह्मज्ञानाय इतोऽपि कठोरं तपः कुरुताम्।
भृगुः — अस्तु पितः!
वरुण — पुत्र! तुमने तप से प्राण-तत्त्व का महत्त्व जाना। किन्तु ब्रह्मज्ञान के लिए और अधिक कठोर तप करो।
भृगु — ठीक है, पिताजी!
(सः पुनः बहुकालं यावद् वनं गत्वा तपश्चर्यां कुरुते। तपस्तप्त्वा प्रसन्नवदनो वरुणं निकषा प्राप्नोति, वरुणः भृगुं पृच्छति —)
(वह फिर लम्बे समय तक वन में जाकर तपश्चर्या करते हैं। तप करके प्रसन्न मुख से वरुण के पास आते हैं, वरुण भृगु से पूछते हैं —)
वरुणः — हे पुत्र! त्वया तपसा किं ज्ञातम्?
भृगुः — हे तात! मया तपसा मनो वै ब्रह्म इति ज्ञातम्।
वरुणः — पुत्र! कथं मनो वै ब्रह्म इति?
भृगुः — हे पितः! मया तपसा एवम् अनुभूतं यद् अस्माकं मन एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्। समस्तानि इन्द्रियाणि अपि मनसा सञ्चाल्यन्ते। मानवः मनसा एव सर्वं कार्यं सम्पादयति। मनसः सङ्कल्पाः, भावाः, विचाराश्च जायन्ते। अतो मनो वै ब्रह्म इति।
वरुण — हे पुत्र! तुमने तप से क्या जाना?
भृगु — हे पिताजी! मैंने तप से यह जाना कि मन ही ब्रह्म है।
वरुण — पुत्र! मन को ब्रह्म कैसे जाना?
भृगु — हे पिताजी! मुझे तप से ऐसा अनुभव हुआ कि हमारा मन ही सभी कर्मों का प्रेरक है। सभी इन्द्रियाँ भी मन द्वारा ही चलाई जाती हैं। मनुष्य मन से ही सभी कार्य सम्पन्न करता है। मन से ही संकल्प, भाव और विचार उत्पन्न होते हैं। इसलिए मन ही ब्रह्म है।
वरुणः — हे वत्स! त्वया सम्यग् अनुभूतं यद् मन एव सर्वमिति। अत उपनिषदि उच्यते —
वरुण — हे वत्स! तुमने सही अनुभव किया कि मन ही सब कुछ है। इसीलिए उपनिषद में कहा गया है —
कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा
धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत् सर्वं मन एव।
काम (इच्छा), संकल्प (निर्णय), विचिकित्सा (सन्देह), श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति (धैर्य), अधृति (अधैर्य), लज्जा (ह्री), बुद्धि (धी) और भय (भी) — यह सब कुछ मन ही है।
वरुणः — वत्स! मानवः चिन्तनशक्त्या मननशक्त्या दृढसङ्कल्पशक्त्या च सर्वं लब्धुं शक्नोति। अतो मनसः शक्तिप्राप्तये मनः सदा सत्कर्मणा साधनीयम्। शोकादिरहितम् उत्साहयुक्तं शान्तं च करणीयम्। आहारशुद्धिश्च करणीया। किञ्च हे पुत्र! ब्रह्मज्ञानाय इतोऽपि प्रयतस्व।
भृगुः — अस्तु श्रीमन्!
वरुण — वत्स! मनुष्य चिन्तन-शक्ति, मनन-शक्ति और दृढ संकल्प-शक्ति से सब कुछ पा सकता है। इसलिए मन की शक्ति प्राप्त करने के लिए मन को सदा सत्कर्म (अच्छे कार्यों) से साधना चाहिए। उसे शोक आदि से रहित, उत्साहयुक्त और शान्त बनाना चाहिए। आहार की शुद्धि भी करनी चाहिए। और हे पुत्र! ब्रह्मज्ञान के लिए और अधिक प्रयत्न करो।
भृगु — ठीक है, श्रीमन्!
(पुनः भृगुः बहुकालं यावत् कठोरं तपः कुरुते, तपः कृत्वा पितुः समीपं प्राप्नोति, पिता तं पृच्छति)
(फिर भृगु लम्बे समय तक कठोर तप करते हैं, तप करके पिता के पास पहुँचते हैं, पिता उनसे पूछते हैं।)
वरुणः — हे भृगो! तपसा किम् अनुभूतम्?
भृगुः — हे पितः! मया तपसा सूक्ष्मज्ञानेन च इदं ज्ञातं यद् विज्ञानं वै ब्रह्म इति।
वरुणः — पुत्र! किं नाम विज्ञानम्?
भृगुः — हे भगवन्! बुद्धितत्त्वमेव विज्ञानम्।
वरुणः — पुत्र! कथं विज्ञानं (बुद्धितत्त्वम्) ब्रह्म इति विज्ञातम्?
भृगुः — हे पितः! बुद्धितत्त्वं विना अस्माकं बोधशक्तेः, तर्कशक्तेः, विवेकशक्तेः, निर्णयशक्तेः, स्मृतिशक्तेश्च विकासो न भवति। बुद्धिरेव सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति। समग्रज्ञानं बुद्धौ एव विद्यते। अत एव विज्ञानं वै ब्रह्म इति।
वरुण — हे भृगु! तप से क्या अनुभव हुआ?
भृगु — हे पिताजी! मैंने तप और सूक्ष्म ज्ञान से यह जाना कि विज्ञान (बुद्धि-तत्त्व) ही ब्रह्म है।
वरुण — पुत्र! विज्ञान किसे कहते हैं?
भृगु — हे भगवन्! बुद्धि-तत्त्व ही विज्ञान है।
वरुण — पुत्र! विज्ञान (बुद्धि-तत्त्व) को ब्रह्म कैसे जाना?
भृगु — हे पिताजी! बुद्धि-तत्त्व के बिना हमारी बोध-शक्ति, तर्क-शक्ति, विवेक-शक्ति, निर्णय-शक्ति और स्मृति-शक्ति का विकास नहीं होता। बुद्धि ही सारथी के रूप में हमें कर्म में प्रवृत्त करती है। समस्त ज्ञान बुद्धि में ही विद्यमान है। इसीलिए विज्ञान (बुद्धि) ही ब्रह्म है।
वरुणः — पुत्र! सत्यं भाषसे। अतः बौद्धिकविकासाय विज्ञानमयकोषस्य विकासः कर्तव्यः। तदर्थं प्रतिदिनं ध्यानं योगासनं च कर्तव्यम्। किञ्च यदि ब्रह्मणः स्वरूपं वेत्तुम् इच्छति तर्हि इतोऽपि प्रयतताम्, अन्विष्यतां च।
भृगुः — अस्तु श्रीमन्!
वरुण — पुत्र! तुम सत्य कह रहे हो। इसलिए बौद्धिक विकास के लिए विज्ञानमय कोष का विकास करना चाहिए। उसके लिए प्रतिदिन ध्यान और योगासन करने चाहिए। और यदि ब्रह्म के स्वरूप को जानना चाहते हो, तो और भी प्रयत्न करो और खोजते रहो।
भृगु — ठीक है, श्रीमन्!
(भृगुः पुनः बहुकालं यावत् तपश्चर्यां करोति। तपस्तप्त्वा प्रसन्नमुखेन पितुः निकटे समुपस्थितो भवति।)
(भृगु फिर लम्बे समय तक तपश्चर्या करते हैं। तप करके प्रसन्न मुख से पिता के पास उपस्थित होते हैं।)
वरुणः — भोः वत्स! तपसा त्वया किं विज्ञातम्?
भृगुः — हे भगवन्! अत्यन्तं सूक्ष्मचिन्तनेन तपसा च मया एवम् अवबुद्धम् आनन्दो वै ब्रह्म इति।
वरुणः — हे पुत्र! कथम् आनन्दो वै ब्रह्म इति?
भृगुः — हे पितः! अस्माकं सर्वकर्माणि आनन्दाय भवन्ति। अस्माकं कर्मणो लक्ष्यम् आनन्दप्राप्तिरेव। आनन्देन एव प्राणिनो जीवन्ति। आनन्देन रहितं जीवनं मृत्युरूपमिति। तस्मात् आनन्दो वै ब्रह्म इति।
वरुण — हे वत्स! तप से तुमने क्या जाना?
भृगु — हे भगवन्! अत्यन्त सूक्ष्म चिन्तन और तप से मैंने यह समझा — आनन्द ही ब्रह्म है।
वरुण — हे पुत्र! आनन्द को ब्रह्म कैसे जाना?
भृगु — हे पिताजी! हमारे सभी कर्म आनन्द के लिए होते हैं। हमारे कर्म का लक्ष्य आनन्द की प्राप्ति ही है। आनन्द से ही प्राणी जीते हैं। आनन्द से रहित जीवन मृत्यु के समान है। इसलिए आनन्द ही ब्रह्म है।
वरुणः — हे वत्स! त्वया सत्यं प्रकटितम्। अतः आनन्दप्राप्तये प्रतिदिनं ध्यानं योगासनं च कर्तव्यम्। प्राणिषु दया कर्तव्या। परोपकारः कर्तव्यः। रागः, द्वेषः, ईर्ष्या, क्रोधः, लोभः, मोहश्च हातव्याः। सर्वदा ईश्वरं सेवतां मोदतां च।
भृगुः — अस्तु श्रीमन्! तथैव आचरामि।
वरुण — हे वत्स! तुमने सत्य प्रकट किया। इसलिए आनन्द प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन ध्यान और योगासन करने चाहिए। प्राणियों पर दया करनी चाहिए। परोपकार करना चाहिए। राग, द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ और मोह — इन्हें छोड़ देना चाहिए। सदा ईश्वर की सेवा करो और आनन्दित रहो।
भृगु — ठीक है, श्रीमन्! वैसा ही आचरण करूँगा।
वरुणः — हे पुत्र! त्वं तपसा सूक्ष्मविज्ञानेन च अन्नस्य, प्राणस्य, मनसः, विज्ञानस्य, आनन्दस्य च महत्त्वं ज्ञातवान्। एतैः पञ्चभिरेव अस्माकं पूर्णविकासो भवति, अतः एते ब्रह्मपदेन व्यवह्रियन्ते। ब्रह्मणः स्वरूपं तु ततोऽपि परे अस्ति। एतानि ब्रह्मज्ञानाय द्वाराणि सन्ति। यदि एतेषां क्रमशो विकासं करिष्यसि तर्हि ब्रह्मणः स्वरूपबोधो भविष्यति। उक्तञ्च —
वरुण — हे पुत्र! तुमने तप और सूक्ष्म विज्ञान से अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द — इनका महत्त्व जाना। इन पाँचों से ही हमारा पूर्ण विकास होता है, इसलिए इन्हें ब्रह्म के नाम से जाना जाता है। ब्रह्म का स्वरूप तो इससे भी परे है। ये ब्रह्मज्ञान के द्वार (मार्ग) हैं। यदि इनका क्रमशः विकास करोगे, तो ब्रह्म के स्वरूप का बोध होगा। कहा भी गया है —
आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।
स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः इति
आहार की शुद्धि होने पर सत्त्व (मन/स्वभाव) की शुद्धि होती है। सत्त्व की शुद्धि होने पर ध्रुव (स्थायी) स्मृति (आत्मज्ञान) प्राप्त होती है। स्मृति (आत्मज्ञान) की प्राप्ति होने पर सभी गाँठों (सन्देहों) से पूर्ण मुक्ति (विप्रमोक्ष) होती है।
भृगुः — अस्तु श्रीमन्! अनुगृहीतोऽस्मि।
भृगु — ठीक है, श्रीमन्! मैं अनुगृहीत (कृतज्ञ) हूँ।

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