अभ्यासकार्यम्
प्र. 1. अधोलिखितेषु पदेषु उपसर्गान् धातून् च पृथक् कृत्वा लिखत-
(निम्नलिखित पदों में से उपसर्ग और धातु अलग करके लिखिए-)
| क्र.सं. | क्रियापद | उपसर्ग | धातु |
| i) | उत्तिष्ठतु (उठो / उठिए) | उत् | स्था |
| ii) | निरगच्छन् (निकल गए) | निर् | गम् |
| iii) | निस्सरतु (निकले / बाहर आए) | निस् | सृ |
| iv) | संवदन्ति (बातचीत करते हैं) | सम् | वद् |
| v) | प्रत्यवदत् (उत्तर दिया) | प्रति | वद् |
| vi) | सुशोभते (सुंदर लगता है) | सु | शोभ् |
| vii) | विशिष्यते (विशिष्ट है) | वि | शिष् |
| viii) | अन्वकरोत् (अनुकरण किया) | अनु | कृ |
| ix) | प्रसीदामि (मैं प्रसन्न होता हूँ) | प्र | सद् |
| x) | अवागच्छत् (जाना) | अव | गम् |
| xi) | उपविशामः (हम बैठते हैं) | उप | विश् |
| xii) | उत्थास्यामः (हम उठेंगे) | उत् | स्था |
| xiii) | उन्नयनम् (ऊपर उठाना) | उत् | नी |
| xiv) | अपाकुर्वन् (दूर किया) | अप | कृ |
| xv) | विजयते (जीतता है) | वि | जि |
| xvi) | परितुष्यति (संतुष्ट होता है) | परि | तुष् |
प्र. 2. कोष्ठकात् शुद्धपदं चित्वा रिक्तस्थाने लिखत-
(कोष्ठक से शुद्ध शब्द चुनकर रिक्त स्थान में लिखिए-)
i) हे प्रभो ! मयि प्रसीदतु। (प्रासीदतु/प्रसीदतु)
(हे प्रभु! मुझ पर प्रसन्न होइए।)
ii) गुरुः शिष्यस्य अज्ञानं अपहरति। (उपहरति/अपहरति)
(गुरु शिष्य के अज्ञान को दूर करते हैं।)
iii) वानराः जनान् अनुकुर्वन्ति। (अनुकुर्वन्ति / अन्वकुर्वन्ति)
(बन्दर लोगों की नकल करते हैं।)
iv) अहं संस्कृतं अवजानामि। (अवजानामि/अवाजानामि )
(मैं संस्कृत समझता हूँ।)
v) आजीवनम् सत्यम् एव वदनीयम्। (आजीवनम् /आजीवनः)
(जीवन भर सत्य ही बोलना चाहिए।)
vi) अध्यापकः प्रश्नान् पृच्छति। छात्राः प्रतिवदन्ति। (प्रतिवदन्ति/संवदन्ति)
(अध्यापक प्रश्न पूछते हैं। छात्र उत्तर देते हैं।)
vii) कामात् क्रोधः उद्भवति। (पराभवति / उद्भवति)
(काम/इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है।)
viii) सभायाम् विद्वांसः एव सुशोभन्ते। (सुशोभन्ते/सुशोभन्ति)
(सभा में विद्वान ही सुशोभित होते हैं।)
ix) चौरः रात्रौ धनम् अहरत्। (व्यहरत्/अहरत्)
(चोर ने रात में धन हर लिया/चुरा लिया।)
x) माता पुत्रः च परस्परम् संवदतः। (प्रतिवदतः संवदतः)
(माता और पुत्र आपस में बातचीत करते हैं।)
xi) गुरुः आश्रमात् निर्गच्छति। (प्रविशति/निर्गच्छति)
(गुरु आश्रम से बाहर निकलते हैं।)
xii) नागरिकाः एव स्वदेशम् उन्नयन्ति। (उद्द्रयन्ति / उन्नयन्ति)
(नागरिक ही अपने देश को उन्नति पर ले जाते हैं।)
xiii) वयं चलचित्रं द्रष्टुम् अत्र आगच्छाम। (अवागच्छाम/आगच्छाम)
(हम सब फिल्म देखने यहाँ आए हैं।)
xiv) माता पुत्रम् संस्करोति। (संस्करोति/समकरोति)
(माता पुत्र को संस्कारित करती है।)
xv) नदी पर्वतात् प्रवहति। (प्रवहति / उद्भवति)
(नदी पर्वत से बहती है।)
प्र. 3. (संक्षिप्त निर्देशानुसार पद-निर्माण एवं वाक्य) –
(संक्षिप्त निर्देशानुसार पद-निर्माण एवं वाक्य)
i) हार:, योग: इति शब्दाभ्यां सह अधोलिखितान् उपसर्गान् संयुज्य प्रत्येकं पदद्वयस्य निर्माणं कुरुत । निर्मितैः पदैः च सार्थकवाक्यानि रचयत—
उपसर्गा:- आ, वि., प्र., सु, सम्
आ + हार = आहार: स्वस्थाय सन्तुलितः आहारः आवश्यकः।
(आ + हार = आहार: (भोजन) स्वास्थ्य के लिए संतुलित आहार आवश्यक है।)
वि + हार = विहार: सः उद्याने विहारं करोति।
(वि + हार = विहार: (घूमना) वह बगीचे में विहार (सैर) करता है।)
प्र + हार = प्रहार: शत्रुः सैनिकानां उपरि प्रहारं करोति।
(प्र + हार = प्रहार: (चोट करना) शत्रु सैनिकों के ऊपर प्रहार करता है।)
सम् + योग = संयोग: अस्माकं मिलापः केवलं संयोगः अस्ति।
(सम् + योग = संयोग: (इत्तेफाक) हमारा मिलना केवल एक संयोग है।)
वि + योग = वियोग: सीतायाः वियोगे रामः दुःखी अभवत्।
(वि + योग = वियोग: (बिछड़ना) सीता के वियोग में राम दुखी हुए।)
ii) ‘भू’ हृ, इति एताभ्याम् धातुभ्यां प्राक् अधोलिखितान् उपसर्गान् संयुज्य प्रत्येकं पदद्वयस्य निर्माणं कुरुत। निर्मितैः पदैः च सार्थक वाक्यानि रचयत-
उपसर्गा:– प्र, अनु, सम्, अप, दुर्
प्र + भू = प्रभवति: गङ्गा हिमालयात् प्रभवति।
प्र + भू = प्रभवति: (निकलना/उत्पन्न होना) — गंगा हिमालय से निकलती है।
अनु + भू = अनुभवति: सः सुखम् अनुभवति।
अनु + भू = अनुभवति: (महसूस करना) — वह सुख का अनुभव करता है।
सम् + कृ = संस्करोति: अध्यापकः छात्रं संस्करोति।
सम् + कृ = संस्करोति: (सुधारना/संस्कार देना) — अध्यापक छात्र को संस्कारित करते हैं।
अप + कृ = अपकरोति: दुष्टः सदा अन्यों अपकरोति।
अप + कृ = अपकरोति: (बुराई करना/नुकसान करना) — दुष्ट हमेशा दूसरों का अपकार (अहित) करता है।
दुर् + भू = दुर्भवति: तस्य स्वभावः दुर्भवति।
दुर् + भू = दुर्भवति: (बुरा होना/कठिन होना) — उसका स्वभाव बुरा हो जाता है।

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