अभ्यासकार्यम्
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प्र. 1. प्रत्ययं संयुज्य वियुज्य वा लिखत –
(प्रत्यय जोड़कर या अलग करके लिखिए -)
i) दृश् + क्त्वा = दृष्ट्वा (देखकर)
ii) प्रणम्य (प्रणाम करके) = प्र + नम् + ल्यप्
iii) उपविश्य (बैठकर) = उप + विश् + ल्यप्
iv) सोढुम् (सहने के लिए) = सह् + तुमुन्
v) सह् + क्त्वा = सहित्वा (सहकर / सहन करके)
vi) आ + नी + ल्यप् = आनीय (लाकर)
प्र. 2. अधोलिखितवाक्येषु कोष्ठके प्रदत्तधातुषु क्त्वा/ल्यप्/तुमुन् प्रत्यययो निष्पन्नपदैः रिक्तस्थानानि पूरयत –
यथा— स: पुस्तकम् आदाय (आ + दा + ल्यप्) गच्छति।
(वह पुस्तक लेकर जाता है।)
सः पुस्तकं दत्त्वा (दा + क्त्वा) क्रीडति ।
(वह पुस्तक देकर खेलता है।)
i) रामः कन्दुकम् आनीय (आ + नी + ल्यप्) क्रीडति।
(राम गेंद लाकर खेलता है।)
ii) श्यामः कन्दुकम् नीत्वा (नी + क्त्वा) गच्छति।
(श्याम गेंद लेकर जाता है।)
iii) रामः कन्दुकम् ग्रहीतुं (ग्रह् + तुमुन्) श्यामम् अनुसरति।
(राम गेंद पकड़ने के लिए श्याम के पीछे जाता है।)
iv) श्यामः विहस्य (वि + हस् + ल्यप्) कन्दुकं ददाति।
(श्याम हँसकर गेंद देता है।)
v) रामः कन्दुकम् प्राप्य (प्र + आप् + ल्यप्) पुनः प्रसन्नः भवति।
(राम गेंद पाकर फिर से प्रसन्न होता है।)
प्र. 3. उदाहरणमनुसृत्य स्थूलपदेषु धातून् प्रत्ययान् च वियुज्य लिखत –
(धातु और प्रत्यय अलग करके लिखिए -)
यथा— बालक: गुरुं नत्वा गच्छति। नम् + क्त्वा
(बालक गुरु को प्रणाम करके जाता है।)
i) सः अत्र आगत्य पठति → आ + गम् + ल्यप्
(वह यहाँ आकर पढ़ता है।)
ii) त्वं कुतः गत्वा क्रीडसि → गम् + क्त्वा
(तुम कहाँ जाकर खेलते हो?)
iii) बालकः विहस्य वदति → वि + हस् + ल्यप्
(बालक हँसकर बोलता है।)
iv) त्वं पुस्तकं क्रेतुम् गच्छसि → क्री (क्रीञ्) + क्त्वा
(तुम पुस्तक खरीदने के लिए जाते हो।)
v) छात्रः पठितुं विद्यालयं गच्छति → पठ् + तुमुन्
(छात्र पढ़ने के लिए विद्यालय जाता है।)
vi) नायकः निर्देशकं द्रष्टुं गच्छति → दृश् + क्त्वा
(नायक निर्देशक (Director) को देखने के लिए जाता है।)
प्र. 4. क्त्वाप्रत्ययस्य प्रयोगेण वाक्यानि संयोजयत –
(‘क्त्वा’ प्रत्यय के प्रयोग से वाक्यों को जोड़ना -)
i) अहं विद्यालयं गमिष्यामि। अहं पठिष्यामि। (मैं विद्यालय जाऊँगा। मैं पढूँगा।)
उत्तर: अहं विद्यालयं गत्वा पठिष्यामि। (मैं विद्यालय जाकर पढूँगा।)
ii) सीता पुस्तकं पठिष्यति। सा ज्ञानं प्राप्स्यति। (सीता पुस्तक पढ़ेगी। वह ज्ञान प्राप्त करेगी।)
उत्तर: सीता पुस्तकं पठित्वा ज्ञानं प्राप्स्यति। (सीता पुस्तक पढ़कर ज्ञान प्राप्त करेगी।)
iii) सः आपणं गमिष्यति। सः पुस्तकं क्रेष्यति। (वह बाज़ार जाएगा। वह पुस्तक खरीदेगा।)
उत्तर: सः आपणं गत्वा पुस्तकं क्रेष्यति। (वह बाज़ार जाकर पुस्तक खरीदेगा।)
iv) रमेशः पुस्तकालयं गच्छति। सः समाचारपत्रं पठति। (रमेश पुस्तकालय जाता है। वह समाचार पत्र पढ़ता है।)
उत्तर: रमेशः पुस्तकालयं गत्वा समाचारपत्रं पठति। (रमेश पुस्तकालय जाकर समाचार पत्र पढ़ता है।)
v) देवदत्तः पाकशालां गच्छति। सः भोजनं करोति। (देवदत्त रसोईघर जाता है। वह भोजन करता है।)
उत्तर: देवदत्तः पाकशालां गत्वा भोजनं करोति। (देवदत्त रसोईघर जाकर भोजन करता है।)
प्र. 5. तुमुन् प्रत्ययस्य योगेन वाक्यानि संयोजयत—
यथा —
बालिका क्रीडिष्यति। सा उद्यानं गच्छति।
(बालिका खेलेगी। वह बगीचे में जाती है।)
बालिका क्रीडितुम् उद्यानं गच्छति।
(बालिका खेलने के लिए बगीचे में जाती है।)
i) अहं पठिष्यामि। अहं पुस्तकं क्रीणामि।
(मैं पढूँगा। मैं पुस्तक खरीदता हूँ।)
अहं पठितुम् पुस्तकं क्रीणामि।
(मैं पढ़ने के लिए पुस्तक खरीदता हूँ।)
ii) बालिका परीक्षायाम् उत्तमानि अङ्कानि प्राप्स्यति। सा परिश्रमेण पठति।
(बालिका परीक्षा में अच्छे अंक पाएगी। वह मेहनत से पढ़ती है।)
बालिका परीक्षायाम् उत्तमानि अङ्कानि प्राप्तुम् परिश्रमेण पठति।
(बालिका परीक्षा में अच्छे अंक पाने के लिए मेहनत से पढ़ती है।)
iii) निशा क्रीडिष्यति। सा आपणात् कन्दुकम् आनयति।
(निशा खेलेगी। वह बाज़ार से गेंद लाती है।)
निशा क्रीडितुम् आपणात् कन्दुकम् आनयति।
(निशा खेलने के लिए बाज़ार से गेंद लाती है।)
iv) माता भोजनं पचति। सा शाकम् आनयति।
(माता भोजन पकाती है। वह सब्जी लाती है।)
माता भोजनं पक्तुम् शाकम् आनयति।
(माता भोजन पकाने के लिए सब्जी लाती है।)
v) आचार्यः पाठयति। सः कक्षाम् अगच्छत्।
(आचार्य (शिक्षक) पढ़ाते हैं। वे कक्षा में गए।)
आचार्यः पाठयितुम् कक्षाम् अगच्छत्।
(आचार्य पढ़ाने के लिए कक्षा में गए।)
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प्र. १. प्रत्ययान् संयोज्य यथानिर्दिष्टं लिखत् –
(प्रत्ययों को जोड़कर निर्देशानुसार लिखिए —)
i) पठ् + शतृ (पुं.) = पठन् (पढ़ता हुआ – पुल्लिंग)
ii) लिख् + शतृ (स्त्री.) = लिखन्ती (लिखती हुई – स्त्रीलिंग)
iii) सेव् + शानच् (स्त्री.) = सेवमाना (सेवा करती हुई – स्त्रीलिंग)
iv) सह् + शानच् (पुं.) = सहमानः (सहन करता हुआ – पुल्लिंग)
v) वृत् + शानच् (पुं.) = वर्तमानः (विद्यमान / होता हुआ – पुल्लिंग)
vi) हस् + शतृ (स्त्री.) = हसन्ती (हँसती हुई – स्त्रीलिंग)
प्र. 2. यथानिर्दिष्टं परिवर्तनं कृत्वा वाक्याग्रे पुनः लिखत –
(निर्देशानुसार परिवर्तन कर वाक्यों को पुनः लिखिए)
यथा— लिखन बालकः पठति (स्त्रीलिङ्ग) (लिखता हुआ बालक पढ़ता है।)
लिखन्ती बालिका पठति। (लिखती हुई बालिका पढ़ती है।)
i) क्रीडन् बालकः पतति। (स्त्रीलिङ्गे) (खेलता हुआ बालक गिरता है।)
क्रीडन्ती बालिका पतति। (क्रीडन्ती बालिका पतति।)
ii) उपविशन् छात्रः हसति। (स्त्रीलिङ्गे) (बैठा हुआ छात्र हँसता है।)
उपविशन्ती छात्रा हसति। (बैठी हुई छात्रा हँसती है।)
iii) धावन्ती बालिका क्रन्दति। (पुंल्लिङ्गे) (दौड़ती हुई बालिका रोती है।)
धावन् बालकः क्रन्दति। (दौड़ती हुई बालिका रोती है।)
iv) सः चलन् खादति। (स्त्रीलिङ्गे) (दौड़ता हुआ बालक रोता है।)
सा चलन्ती खादति। (वह चलता हुआ खाता है।)
v) अहम् नृत्यन् न गायामि। (स्त्रीलिङ्गे) (वह चलती हुई खाती है।)
अहम् नृत्यन्ती न गायामि। (मैं नाचता हुआ नहीं गाता हूँ।)
vi) त्वं याचमान न शोभसे। (पुंल्लिङ्गे) (मैं नाचती हुई नहीं गाती हूँ।)
त्वं याचमानः न शोभसे। (तुम माँगते हुए शोभा नहीं देते।)
vii) ते गच्छन्तः वार्ता कुर्वन्ति। (स्त्रीलिङ्गे) (वे सब जाते हुए बातचीत करते हैं।)
ताः गच्छन्त्यः वार्ता कुर्वन्ति। (वे सब (स्त्रियाँ) जाती हुई बातचीत करती हैं।)
viii) ते धावन्त्यौ भ्रमतः। (पुंल्लिङ्गे) (वे दो (स्त्रियाँ) दौड़ती हुई घूमती हैं।)
तौ धावन्तौ भ्रमतः। (वे दो (पुरुष) दौड़ते हुए घूमते हैं।)
प्र. 3. शतृप्रत्ययान्तस्य गच्छत्, गच्छन्ती शब्दयोः रूपाणि दृष्ट्वा पठत्, लिखत्, पठन्ती, लिखन्ती च इत्यादीनां शब्दानां रूपलेखनस्य अभ्यासं कुरुत—
(शतृ प्रत्यय से बने ‘गच्छत्’ (पुल्लिंग/नपुंसकलिंग) और ‘गच्छन्ती’ (स्त्रीलिंग) शब्दों के रूपों को देखकर ‘पठत्’ (पढ़ता हुआ), ‘लिखत्’ (लिखता हुआ), ‘पठन्ती’ और ‘लिखन्ती’ आदि शब्दों के रूप लिखने का अभ्यास कीजिए।)
उदाहरण-
(क) गच्छत् (पुंल्लिङ्ग)
| विभक्ति | वचन | पठत् (पुँल्लिङ्ग) | लिखत् (पुँल्लिङ्ग) |
| प्रथमा | एकवचन | पठन् (पढ़ता हुआ) | लिखन् (लिखता हुआ) |
| द्विवचन | पठन्तौ (दो पढ़ते हुए) | लिखन्तौ (दो लिखते हुए ) | |
| बहुवचन | पठन्तः (सब पढ़ते हुए) | लिखन्तः (सब लिखते हुए) | |
| द्वितीया | एकवचन | पठन्तम् (पढ़ते हुए को) | लिखन्तम् (लिखते हुए को) |
| द्विवचन | पठन्तौ (पढ़ते हुए दो को) | लिखन्तौ (लिखते हुए दो को) | |
| बहुवचन | पठतः ( पढ़ते हुए सबको) | लिखतः (लिखते हुए सबको) |
(आ) ‘गच्छन्ती’ (स्त्रीलिङ्ग) के समान ‘पठन्ती’ और ‘लिखन्ती’ के रूप:
| विभक्ति | वचन | पठन्ती (स्त्रीलिङ्ग) | लिखन्ती (स्त्रीलिङ्ग) |
| प्रथमा | एकवचन | पठन्ती (पढ़ती हुई) | लिखन्ती (लिखती हुई) |
| द्विवचन | पठन्त्यौ (दो पढ़ती हुई) | लिखन्त्यौ (दो लिखती हुई) | |
| बहुवचन | पठन्त्यः (सब पढ़ती हुई) | लिखन्त्यः (सब लिखती हुई) | |
| द्वितीया | एकवचन | पठन्तीम् (पढ़ती हुई को) | लिखन्तीम् (लिखती हुई को) |
| द्विवचन | पठन्त्यौ (पढ़ती हुई दो को) | लिखन्त्यौ (लिखती हुई दो को) | |
| बहुवचन | पठन्तीः (पढ़ती हुई सबको) | लिखन्तीः (लिखती हुई सबको) |
प्र. 4. कोष्ठके प्रदत्तशब्दानाम् उचितप्रयोगेण रिक्तस्थानानि पूरयत-
कोष्ठक (brackets) में दिए गए शब्दों के उचित प्रयोग (सही विभक्ति और लिंग) द्वारा रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए।
i) बालिकायाः पुस्तकं कस्य अस्ति ? (पठन्ती) (बालिका की पुस्तक किसकी है?)
👉 पठन्त्याः बालिकायाः पुस्तकं कस्य अस्ति ? (पढ़ती हुई बालिका की पुस्तक किसकी है?)
ii) …… शिक्षकः आचार्यं किंचिद् वदति। (हसन्ती) (शिक्षक आचार्य से कुछ कहते हैं।)
👉 हसन्ती शिक्षिका आचार्यं किंचिद् वदति। (हँसती हुई शिक्षिका आचार्य से कुछ कहती है।)
iii) …… छात्रः हसति। (गच्छन्) (छात्र हँसता है।)
👉 गच्छन् छात्रः हसति। (जाता हुआ छात्र हँसता है।)
iv) …… कालिकानां सौन्दर्यं अपूर्वं वदति। (विकसन्ती) (कलियों का सौंदर्य अपूर्व (अद्भुत) बताता है।)
👉 विकसन्ती कालिकानां सौन्दर्यं अपूर्वं वदति। (खिलती हुई कलियों का सौंदर्य अद्भुत बताता है।)
v) …… बालकाय वस्त्रं ददाति। (याचत्) (बालक के लिए वस्त्र देता है।)
👉 याचमानः बालकाय वस्त्रं ददाति। (माँगता हुआ (याचक) बालक को वस्त्र देता है।)
प्र. 5. उदाहरणमनुसृत्य शतृशानच्प्रत्ययौ प्रयुज्य वाक्यानि संयोजयत-
उदाहरण का अनुसरण करते हुए शतृ और शानच् प्रत्ययों का प्रयोग करके वाक्यों को जोड़िए।
यथा— बालिका गच्छति/सा क्रीडति । (बालिका जाती है। वह खेलती है।)
गच्छन्ती बालिका क्रीडति । (जाती हुई बालिका खेलती है।)
i) बालकः पठति। सः पाठं स्मरति। (बालक पढ़ता है। वह पाठ याद करता है।)
👉 पठन् बालकः पाठं स्मरति। (पढ़ता हुआ बालक पाठ याद करता है।)
ii) शिशुः चलति। सः हसति। (शिशु चलता है। वह हँसता है।)
👉 चलन् शिशुः हसति। (चलता हुआ शिशु हँसता है।)
iii) रमा पठति। सा लिखति। (रमा पढ़ती है। वह लिखती है।)
👉 पठन्ती रमा लिखति। (पढ़ती हुई रमा लिखती है।)
iv) साधुः उपदिशति। सः ज्ञानवर्धनं करोति। (साधु उपदेश देते हैं। वह ज्ञान बढ़ाते हैं।)
👉 उपदिशन् साधुः ज्ञानवर्धनं करोति। (उपदेश देते हुए साधु ज्ञानवर्धन करते हैं।)
v) याचकः याचते। सः मार्गे चलति। (भिखारी माँगता है। वह मार्ग पर चलता है।)
👉 याचमानः याचकः मार्गे चलति। (माँगता हुआ भिखारी मार्ग पर चलता है।)
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प्र. 1. क्त-क्तवतुप्रत्ययसंयोजनेन पदानि रचयित्वा वाक्यपूर्तिं कुरुत-
(क्त-क्तवतु प्रत्यय जोड़कर वाक्यों की पूर्ति कीजिए-)
i) बालकेन हसितम्। (हस् + क्त) – (बालक के द्वारा हँसा गया।)
ii) बालकः हसितवान्। (हस् + क्तवतु) – (बालक हँसा।)
iii) शिक्षकेण छात्रः पठनाय कथितः। (कथ् + क्त) – (शिक्षक द्वारा छात्र को पढ़ने के लिए कहा गया।)
iv) शिक्षकाः छात्रान् पठनाय कथितवन्तः। (कथ् + क्तवतु) – (शिक्षकों ने छात्रों को पढ़ने के लिए कहा।)
v) पुत्री पितरम् पुस्तकम् याचितवती। (याच् + क्तवतु) – (पुत्री ने पिता से पुस्तक माँगी।)
vi) माता सुतायै भोजनं दत्तवती। (दा + क्तवतु) – (माता ने पुत्री को भोजन दिया।)
vii) मम जनकेन भिक्षुकाय रूप्यकाणि दत्तानि। (दा + क्त) – (मेरे पिता द्वारा भिखारी को रुपये दिए गए।)
viii) छात्रेण ऋषेः ज्ञानोपदेशः श्रुतः। (श्रु + क्त) – (छात्र द्वारा ऋषि का ज्ञानोपदेश सुना गया।)
प्र. 2. स्तम्भयोः यथोचितं योजयत—
अ — ब
अहम् जलम् — पीतवान् / पीतवती
(मैंने जल – पिया।)
सा पुस्तकम् — पठितवती
(उसने पुस्तक – पढ़ी।)
त्वम् पाठम् — लिखितवान्
(तुमने पाठ – लिखा।)
मया पुस्तकानि — पठितानि
(मेरे द्वारा पुस्तकें – पढ़ी गईं।)
यूयम् भोजनं — पचितवन्तः
(तुम सबने भोजन – पकाया।)
प्र. 3. उदाहरणमनुसृत्य भूतकालिकक्रियाणां स्थाने क्तवतुप्रत्ययप्रयोगेन वाक्यपरिवर्तनं कुरुत –
(भूतकालिक क्रिया के स्थान पर क्तवतु का प्रयोग)
यथा— अध्यापक: उद्दण्डं छात्रम् अदण्डयत्।
अध्यापक: उद्दण्डं छात्रं दण्डितवान् ।
(अध्यापक ने उद्दण्ड छात्र को दण्ड दिया।)
i) छात्रः कक्षायाम् उच्चैः अवदन्
→ छात्रः कक्षायाम् उच्चैः उक्तवान्।
(छात्र कक्षा में ज़ोर से बोला।)
ii) माता भोजनम् अपचत्
→ माता भोजनम् पक्ववती।
(माता ने भोजन पकाया।)
iii) काकः घटे पाषाणखण्डानि अक्षिपत्
→ काकः घटे पाषाणखण्डानि क्षिप्तवान्।
(कौए ने घड़े में पत्थर के टुकड़े डाले।)
iv) छात्राः बसयानस्य प्रतीक्षायाम् अतिष्ठन्
→ छात्राः बसयानस्य प्रतीक्षायाम् स्थितवन्तः।
(बहुत से छात्र बस की प्रतीक्षा में खड़े हुए।)
v) कन्याः उद्याने अक्रिडन्
→ कन्याः उद्याने क्रीडितवन्त्यः।
(लड़कियाँ बगीचे में खेलीं।)
प्र. 4. उदाहरणमनुसृत्य भूतकालिकक्रियाणां स्थाने वाक्यपरिवर्तनं कुरुत—
(वाक्यों का कर्मवाच्य (Passive) या क्तवतु में परिवर्तन-)
यथा— अध्यापकः छात्रम् पठनाय अकथयत् । (अध्यापक ने छात्र को पढ़ने के लिए कहा।)
अध्यापकेन छात्रः पठनाय कथितः । (अध्यापक के द्वारा छात्र पढ़ने के लिए कहा गया।)
i) वानरः मकराय जम्बुफलानि अददात् → (बन्दर ने मगरमच्छ को जामुन के फल दिए।)
👉 वानरेण मकराय जम्बुफलानि दत्तानि। (बन्दर के द्वारा मगरमच्छ को जामुन के फल दिए गए।)
ii) मकरः वानरं गृहं चलितुम् अकथयत् → (मगरमच्छ ने बन्दर को घर चलने के लिए कहा।)
👉 मकरः वानरं गृहं चलितुम् कथितवान्। (मगरमच्छ द्वारा बन्दर को घर चलने के लिए कहा गया।)
iii) नकुलः सर्पम् अमारयत् → (नेवले ने साँप को मार दिया।)
👉 नकुलः सर्पम् मारितवान्। (नेवले द्वारा साँप को मार दिया गया।)
iv) श्यामः लेखम् अलिखत् → (श्याम ने लेख लिखा।)
👉 श्यामः लेखम् लिखितवान्। (श्याम द्वारा लेख लिखा गया।)
v) रमा कथाम् अपठत् → (रमा ने कहानी पढ़ी।)
👉 रमा कथाम् पठितवती। (रमा द्वारा कहानी पढ़ी गई।)
प्र. 5. उदाहरणमनुसृत्य अशुद्धवाक्यानि शुद्धीकृत्य लिखत-
(अशुद्ध वाक्यों को शुद्ध करके लिखना-)
यथा— बालकेन जलं पीतवान्
i) बालक: जलं पीतवान् । (बालक ने पानी पिया।)
ii) बालकेन जलं पीतवान् (बालक के द्वारा पानी पिया गया।)
i) मोहनः पुस्तकं नीतवान्
👉 i) मोहनः पुस्तकं नीतवान् (मोहन पुस्तक ले गया।)
👉 ii) मोहेन पुस्तकं नीतम् (मोहन के द्वारा पुस्तक ले जाई गई।)
ii) गीता पाठं पठितुम्
👉 i) गीता पाठं पठितवती (गीता ने पाठ पढ़ा।)
👉 ii) गीतया पाठः पठितः (गीता के द्वारा पाठ पढ़ा गया।)
iii) आचार्येण शिष्यः उपदिष्टवान्
👉 i) आचार्यः शिष्यं उपदिष्टवान् (आचार्य ने शिष्य को उपदेश दिया।)
👉 ii) आचार्येण शिष्यः उपदिष्टः (आचार्य के द्वारा शिष्य उपदिष्ट किया गया/उपदेश दिया गया।)
iv) कन्या गृहे क्रीडितुम्
👉 i) कन्या गृहे क्रीडितवती (कन्या घर में खेली।)
👉 ii) कन्यया गृहे क्रीडितम् (कन्या के द्वारा घर में खेला गया।)
v) सः भोजनं कृतुम्
👉 i) सः भोजनं कृतवान् (उसने भोजन किया।)
👉 ii) तेन भोजनं कृतम् (उसके द्वारा भोजन किया गया।)
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प्र. 1. कोष्ठके दत्तान् प्रकृतिप्रत्ययान् संयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत-
(कोष्ठक में दिए गए प्रकृति (मूल धातु) और प्रत्ययों को जोड़कर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए।)
i) रामस्य चरित्रं सर्वैः अनुकरणीयम्। (अनु + कृ + अनीयर्)
(राम का चरित्र सभी के द्वारा अनुकरण करने योग्य है।)
ii) बालैः कन्दुकम् क्रीडितव्यम्। (क्रीड् + तव्यत्)
(बालकों को गेंद से खेलना चाहिए।)
iii) अस्माभिः गुरूपदेशः श्रोतव्यः। (श्रु + तव्यत्)
(हमें गुरु का उपदेश सुनना चाहिए।)
iv) मया नौका आरोहणीया। (आ + रुह् + अनीयर्)
(मुझे नाव पर चढ़ना चाहिए।)
v) कः अत्र आगत्य लेखितव्यम् लेखं लेखिष्यति? (लिख् + तव्यत्)
(कौन यहाँ आकर लिखने योग्य लेख को लिखेगा?)
प्र. 2. ‘कृ — कर्तव्यम्, करणीयम्’ इति उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखितैः धातुभिः द्वे द्वे पदे रचयत—
(‘कृ — कर्तव्यम्, करणीयम्’ इस उदाहरण का अनुसरण करते हुए नीचे दी गई धातुओं से दो-दो शब्द बनाइए।)
| धातु | तव्यत् | अनीयर् |
| i) गम् | गन्तव्यम् (जाना चाहिए) | गमनीयम् (जाने योग्य) |
| ii) स्मृ | स्मर्तव्यम् (याद करना चाहिए) | स्मरणीयम् (याद रखने लायक) |
| iii) नी | नेतव्यम् (ले जाना चाहिए) | नयनीयम् (ले जाना चाहिए) |
| iv) दृश् | द्रष्टव्यम् (देखना चाहिए) | दर्शनीयम् (दर्शन के लायक) |
| v) दा | दातव्यम् (देना चाहिए) | दानीयम् (दान के लायक) |
प्र. 3. स्तम्भौ यथोचितं योजयत-
(दोनों स्तम्भों (Columns) का उचित मिलान कीजिए।)
अ — ब
दुग्धम् — पातव्यम्
(दूध — पीना चाहिए)
पुस्तकानि — पठितव्यानि
(पुस्तकें — पढ़नी चाहिए।)
ईश्वरः — स्मरणीयः
(ईश्वर — याद करने योग्य हैं (स्मरण करना चाहिए))
नौका — आरोहणीया
(नाव — चढ़ने योग्य है (नाव पर चढ़ना चाहिए))
वृक्षाः — रक्षणीयाः
(वृक्ष — रक्षा करने योग्य हैं (पेड़ों की रक्षा करनी चाहिए))
कथा — श्रवणीया
(कथा — सुनने योग्य है (कथा सुननी चाहिए))
ग्रन्थाः — अध्येतव्याः
(ग्रन्थ — पढ़ने (अध्ययन करने) चाहिए)
लेखाः — लेखितव्याः
(लेख — लिखने चाहिए)
प्र. 4. यथास्थानं प्रकृतिप्रत्यययोगं विभागं वा कुरुत-
(यथास्थान प्रकृति-प्रत्यय को जोड़िए अथवा अलग कीजिए—)
i) पेयम् (पीने योग्य) — पा + यत्
ii) दा + यत् — देयम् (देने योग्य)
iii) सेव्यम् (सेवा करने योग्य) — सेव् + यत्
iv) कृ + ण्यत् — कार्यम् (करने योग्य कार्य)
v) कर्त्तव्यः (करने योग्य (फर्ज)) — कृ + तव्यत्
vi) प्र + आप् + तव्यत् — प्राप्तव्यम् (प्राप्त करने योग्य)
vii) स्मरणीयः (याद करने योग्य) — स्मृ + अनीयर्
viii) हस् + अनीयर् — हसनीयम् (हँसने योग्य)
ix) लेखनीयम् (लिखने योग्य) — लिख् + अनीयर्
x) प्रच्छ् + तव्यत् — प्रष्टव्यम् (पूछने योग्य)
प्र. 5. शुद्धपदेन वाक्यपूर्तिं कुरुत-
(शुद्ध पद द्वारा वाक्य की पूर्ति कीजिए—)
i) जलम् पातव्यम् (पातव्यम् / पीतव्यम्)
जल पीना चाहिए।
ii) पाठः पठितव्यः (पठितव्यः / पठितव्यम्)
पाठ पढ़ना चाहिए।
iii) शत्रुः जेतव्यः (जेतव्य: /जितव्य:)
शत्रु को जीतना चाहिए।
iv) असत्यवचनम् त्याज्यम् (त्याज्यम् / त्याज्यः)
असत्य वचन (झूठ) छोड़ने योग्य है।
v) अपेयम् जलम् त्याज्यम् (त्याग्यम्/ त्याज्यम्)
न पीने योग्य जल त्यागने योग्य है।
vi) धनम् लभ्यम् (लभ्यम्/लभियम्)
धन प्राप्त करने योग्य है।
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प्र. 1. उदाहरणमनुसृत्य पदेषु प्रयुक्तान् प्रकृतिप्रत्ययान् लिखत-
(उदाहरण के अनुसार पदों में प्रयुक्त प्रकृति (धातु) और प्रत्यय लिखिए)
| पदम् (Word) | प्रकृतिः (Root) | प्रत्ययः (Suffix) |
| i) हसनम् (हँसना) | हस् | ल्युट् |
| ii) पाठकः (पढ़ने वाला) | पठ् | ण्वुल् |
| iii) खाद्यः (खाने योग्य) | खाद् | यत् |
| iv) दृश्यः (देखने योग्य) | दृश् | यत् |
| v) भक्तिः (भक्ति / सेवा) | भज् | क्तिन् |
| vi) सौभाग्यशालिन् (सौभाग्य वाला) | सौभाग्य + शाल् | इनि |
| vii) नेता (नेता) | नी | तृच् |
| viii) गायकः (गाने वाला) | गै | ण्वुल् |
प्र. 2. अधोलिखितप्रत्ययानां प्रयोगेण पञ्च, पञ्च पदानि रचयित्वा स्वपुस्तिकासु लिखत—
तृच् (कर्ता अर्थ में): कर्ता (करने वाला), हन्ता (मारने वाला), दाता (देने वाला), योद्धा (युद्ध करने वाला), भर्ता (पालन करने वाला)।
क्तिन् (भाव अर्थ में – स्त्रीलिंग): मतिः (बुद्धि), श्रुतिः (सुनना/वेद), स्तुतिः (प्रशंसा), गतिः (चाल), नीतिः (नियम)।
ण्वुल् (वाला अर्थ में): लेखकः (लिखने वाला), वाचकः (बोलने वाला), रक्षकः (रक्षा करने वाला), मारकः (मारने वाला), सेवकः (सेवा करने वाला)।
ल्युट् (क्रिया का नाम): पठनम् (पढ़ना), गमनम् (जाना), लेखनम् (लिखना), दर्शनम् (देखना), दानम् (देना)।
यत् (योग्य अर्थ में): पेयम् (पीने योग्य), जेयम् (जीतने योग्य), गेयम् (गाने योग्य), चयम् (चुनने योग्य), नेयम् (ले जाने योग्य)।
प्र. 3. अधोलिखितवाक्येषु स्थूलपदेषु कः प्रत्ययः प्रयुक्तः इति कोष्ठकेभ्यः चित्वा लिखत-
(नीचे लिखे वाक्यों में मोटे (स्थूल) पदों में कौन सा प्रत्यय प्रयुक्त है, कोष्ठक से चुनकर लिखिए—)
i) सज्जनानाम् उक्तिः पालनीया। (सज्जनों के वचन पालनीय हैं।)
उत्तरम्: क्तिन्
ii) सेचकः क्षेत्रं सिञ्चति। (सींचने वाला खेत को सींचता है।)
उत्तरम्: ण्वुल् (Root: सिच्)
iii) श्रावकः कथां श्रावयति। (सुनने वाला कथा सुनता है।)
उत्तरम्: ण्वुल् (Root: श्रु)
iv) भक्तः भक्तिं करोति। (भक्त भक्ति करता है।)
उत्तरम्: क्तिन्
प्र. 4. शुद्धरूपं चित्वा लिखत—
(शुद्ध रूप चुनकर लिखिए—)
i) गम् + क्तिन् — गतिः (चाल/शरण)
ii) दा + तृच् — दातृ (देने वाला)
iii) नी + ण्वुल् — नायकः (नायक)
iv) नृत् + ल्युट् — नर्तनम् (नाचना)
v) दृश् + ल्युट् — दर्शनम् (देखना)
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प्र. 1. निम्नलिखितप्रयोगान् ध्यानेन पठित्वा स्थूलपदेषु प्रकृति-प्रत्ययानां विभागं कुरुत—
| क्र.सं. | वाक्य (संस्कृत) | प्रकृति + प्रत्यय | हिन्दी अनुवाद |
| i) | कालिदासः कीर्तिमान् आसीत्। | कीर्ति + मतुप् | कालिदास यशस्वी (कीर्ति वाले) थे। |
| ii) | एतौ बालकौ बलवन्तौ स्तः। | बल + वतुप् | ये दोनों बालक बलवान हैं। |
| iii) | एते जनाः गुणवन्तः सन्ति। | गुण + वतुप् | ये लोग गुणवान हैं। |
| iv) | धनी सर्वत्र समादरं प्राप्नोति। | धन + इन् | धनी (धन वाला) सब जगह सम्मान पाता है। |
| v) | बलिनौ अन्यायं न सहतः। | बल + इन् | दो बलवान (व्यक्ति) अन्याय नहीं सहते। |
| vi) | गुणिनः आत्मश्लाघां न कुर्वन्ति। | गुण + इन् | गुणी लोग अपनी प्रशंसा (आत्म-श्लाघा) नहीं करते। |
| vii) | पिता आकाशात् श्रेष्ठतरः। | श्रेष्ठ + तरप् | पिता आकाश से भी अधिक महान (श्रेष्ठ) हैं। |
| viii) | धरित्री मातुः अपि गम्भीरतरा। | गम्भीर + तरप् | धरती माता से भी अधिक गंभीर है। |
| ix) | कदलीफलम् आम्रात् मधुरतमम्। | मधुर + तमप् | केला आम से भी सबसे अधिक मीठा है। |
| x) | हिमालयः भारतस्य उच्चतमः पर्वतः अस्ति। | उच्च + तमप् | हिमालय भारत का सबसे ऊँचा पर्वत है। |
प्र. 2. प्रत्ययं संयुज्य पदनिर्माणं कुरुत—
| क्र.सं. | पद-निर्माण (संस्कृत) | हिन्दी अर्थ |
| i) | श्री + मतुप् — श्रीमान् | आदरणीय |
| ii) | शक्ति + वतुप् — शक्तिवान् | शक्ति वाला / शक्तिशाली |
| iii) | धन + वतुप् — धनवान् | धन वाला / अमीर |
| iv) | बल + वतुप् — बलवान् | बल वाला / ताकतवर |
| v) | गुरु + तल् — गुरुता | भारीपन / बड़ा होना (बड़प्पन) |
| vi) | सुन्दर + मयट् — सुन्दरमयम् | सुंदरता से युक्त / सुंदर |
| vii) | पटु + तमप् — पटुतमः | सबसे अधिक चतुर (Cleverest) |
| viii) | मृत् + मयट् — मृन्मयम् | मिट्टी से बना हुआ |
| ix) | वसुदेव + अण् — वासुदेवः | वसुदेव (कृष्ण) |
| x) | धर्म + ठक् — धार्मिकः | धर्म को जानने वाला / धर्म संबंधी |
| xi) | मित्र + तल् — मित्रता | दोस्ती (Friendship) |
| xii) | विद्वस् + त्व — विद्वत्त्वम् | विद्वत्ता / ज्ञान |
प्र. 3. कोष्ठके दत्तैः पदैः रिक्तस्थानानि पूरयत—
(कोष्ठक में दिए गए शब्दों से रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए—)
i) धर्मेन्द्रः बालाभ्याम् प्रशस्यतरः। (प्रशस्यतरः / प्रशस्यतमः)
(धर्मेन्द्र (उन) दो बालकों से अधिक प्रशंसनीय है।)
ii) वाशिष्ठः राज्ञः दशरथस्य राजगुरूः आसीत्। (वाशिष्ठः / वशिष्ठः)
(वशिष्ठ के पुत्र (वाशिष्ठ) राजा दशरथ के राजगुरु थे।)
iii) बालिकासु माया चतुरतमा। (चतुरतरा / चतुरतमा)
(लड़कियों में माया सबसे अधिक चतुर है।)
iv) पाण्डवानाम् युद्धकौशलम् दर्शनीयम् आसीत्। (युद्धकौशलम् / युद्ध कुशलम्)
(पाण्डवों का युद्ध-कौशल देखने योग्य था।)
v) स्वर्णमयम् आभूषणम् बहुमूल्यं भवति। (स्वर्णमयः / स्वर्णमयम्)
(सोने से बना (स्वर्णमय) आभूषण बहुत कीमती होता है।)
vi) रावणः दानवः आसीत्। (दानवः / दनुजः)
(रावण दानव (दुनु की संतान) था।)
vii) व्याधितः जनः औषधिं सेवते। (व्याधितः / व्याधिः)
(बीमार (व्याधित) व्यक्ति औषधि का सेवन करता है।)
viii) बालिकासु चन्द्रकला मधुरतमम् वदति। (मधुरतरम् / मधुरतमम्)
(लड़कियों में चन्द्रकला सबसे अधिक मीठा बोलती है।)
ix) बालकेषु विजयस्य टङ्कणगतिः तीव्रतमा। (तीव्रतरा / तीव्रतमा)
(बालकों में विजय की टाइपिंग स्पीड (टङ्कणगति) सबसे तेज है।)
प्र. 4. विशेष्यविशेषणे परस्परं योजयत-
(विशेष्य और विशेषण को परस्पर जोड़िए—)
i) कीर्तिमान् — पुरुषः
(यशस्वी – पुरुष)
ii) उत्तमम् — कार्यम्
(श्रेष्ठ – कार्य)
iii) उच्चतमः — पर्वतः
(सबसे ऊँचा – पर्वत)
iv) लोहमयी — मञ्जूषा
(लोहे की बनी हुई – संदूक)
प्र. 5. उदाहरणमनुसृत्य प्रकृतिप्रत्ययविभागं कुरुत—
(उदाहरण के अनुसार प्रकृति-प्रत्यय का विभाग कीजिए—)
यथा— धीमान् (बुद्धि वाला) = धी + मतुप्
i) मधुरतमः (सबसे अधिक मीठा) = मधुर + तमप्
ii) तीव्रतरः (दो में) अधिक तेज) = तीव्र + तरप्
iii) वासुदेवः (वसुदेव श्रीकृष्ण) = वसुदेव + अण्
iv) धार्मिकः (धर्म को मानने वाला) = धर्म + ठक्
v) दन्त्यम् (दाँतों से संबंधित) = दन्त + यत्
vi) मृण्मयः (मिट्टी से बना हुआ) = मृद् + मयट्
vii) पिपासितः (प्यासा) = पिपासा + इतच्
viii) लघुता (हल्कापन) = लघु + तल्
ix) वीरतमः (सबसे अधिक वीर) = वीर + तमप्
x) नदीतः (नदी से) = नदी + तसिल्
प्र. 6. अधोलिखितेषु शब्देषु तसिल्प्रत्ययम् संयुज्य वाक्यरचनां कुरुत-
(निम्नलिखित शब्दों में ‘तसिल्’ प्रत्यय जोड़कर वाक्य रचना कीजिए—)
पर्वतः (पर्वततः) – गङ्गा पर्वततः प्रवहति।
(पहाड़ से — गंगा पहाड़ से बहती है।)
नगरम् (नगरतः) – पिता नगरतः आगच्छति।
(नगर से — पिता जी नगर (शहर) से आ रहे हैं।)
भूमिः (भूमितः) – वयं भूमितः अन्नं लभामहे।
(भूमि से — हम भूमि (जमीन) से अन्न प्राप्त करते हैं।)
भानुः (भानुतः) – वयं भानुतः प्रकाशं विन्दामः।
(सूर्य से — हम सूर्य से प्रकाश प्राप्त करते हैं।)
नदी (नदीतः) – सा नदीतः जलम् आनयति।
(नदी से — वह नदी से जल लाती है।)
प्र. 7. कोष्ठकेषु प्रदत्तेषु शब्देषु तसिल्प्रत्ययं संयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत—
i) छात्रः विद्यालयतः आगच्छति। (विद्यालय)
(छात्र विद्यालय से आता है।)
ii) देवदत्तः मथुरातः काशीं गच्छति। (मथुरा)
(देवदत्त मथुरा से काशी जाता है।)
iii) वयं नदीतः जलम् आहरामः। (नदी)
(हम नदी से जल लाते हैं।)
iv) सः देवालयतः गतः। (देवालय)
(वह मन्दिर (देवालय) से गया।)
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प्र. 1. निर्देशानुसारं लिङ्गपरिवर्तनं कुरुत—
| पुल्लिंग शब्द (Masculine) | स्त्रीलिंग शब्द (Feminine) | हिन्दी अर्थ |
| बालकः | बालिका | लड़का — लड़की |
| आराध्यः | आराध्या | पूजनीय (देव) — पूजनीय (देवी) |
| प्रथमः | प्रथमा | पहला — पहली |
| साधकः | साधिका | साधना करने वाला — साधना करने वाली |
| आचार्यः | आचार्या | गुरु/शिक्षक — गुरुमाता/शिक्षिका |
| धाता (मूल: धातृ) | धात्री | धारण करने वाला — धारण करने वाली (नर्स/धाय) |

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