जब ऋषभदेव राजा बने, उस समय राज्य में अनेक समस्याएँ थीं, जैसे अकाल, आपसी द्वेष और अशांति। उन्होंने इन समस्याओं के मूल कारणों पर गहराई से विचार किया और पाया कि लोगों में आलस्य है, वे काम नहीं करते और उत्पादन की क्षमता कम है। इसलिए उन्होंने लोगों को परिश्रम करने के लिए प्रेरित किया और उन्हें जीवन से जुड़ी आवश्यक कलाएँ सिखाईं, जैसे खेती करना, भोजन बनाना, वस्त्र तैयार करना, पशुपालन करना, घर और नगर का निर्माण करना आदि। उनके प्रयासों से लोग सक्रिय और आत्मनिर्भर बन गए, उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई और राज्य में फिर से सुख-शांति स्थापित हो गई।
ऋषभदेव ने न केवल लोगों की आर्थिक स्थिति सुधारी, बल्कि न्याय और सुरक्षा की व्यवस्था भी मजबूत की। उन्होंने ऐसा शासन चलाया जिसमें प्रजा का हित सबसे महत्वपूर्ण था। इसी कारण लोग उन्हें बहुत प्रेम करते थे और उनका सम्मान करते थे। उनके पुत्र भरत और बाहुबली भी बहुत वीर और प्रसिद्ध थे, जबकि उनकी पुत्रियाँ ब्राह्मी और सुन्दरी भी विद्या और ज्ञान में निपुण थीं।
एक दिन एक महत्वपूर्ण घटना घटी जिसने ऋषभदेव के जीवन को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने एक नर्तकी को नृत्य करते हुए अचानक मरते देखा। इस घटना ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया कि जीवन अनिश्चित और अस्थायी है। उन्होंने समझ लिया कि संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है, इसलिए उन्होंने अपना राज्य त्याग दिया और सत्य की खोज के लिए संन्यास ले लिया। उन्होंने अपना राज्य अपने पुत्रों में बाँट दिया और स्वयं तपस्या के मार्ग पर चल पड़े।
संन्यास लेने के बाद ऋषभदेव ने कठोर तप और ध्यान किया। वे लंबे समय तक मौन रहकर ध्यान में लीन रहते थे और कई बार भोजन भी भूल जाते थे। उनके अनुयायी भी उनके साथ रहते और कठिन जीवन बिताते थे। धीरे-धीरे उन्होंने भिक्षा लेकर जीवनयापन करना शुरू किया और सादगीपूर्ण जीवन का आदर्श प्रस्तुत किया।
काफी समय तक कठोर तपस्या और उपवास करने के बाद अंततः उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ, जो पूर्ण ज्ञान की अवस्था होती है। इसके बाद वे जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ‘आदिनाथ’ के रूप में प्रसिद्ध हुए। उन्होंने लोगों को सही मार्ग दिखाने के लिए संघ की स्थापना की, जिसमें साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका शामिल थे।
उन्होंने अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अस्तेय और ब्रह्मचर्य जैसे महान सिद्धांतों का उपदेश दिया। उनका मुख्य संदेश यह था कि हमें किसी भी जीव को हानि नहीं पहुँचानी चाहिए, सत्य का पालन करना चाहिए और आवश्यक से अधिक वस्तुओं का संग्रह नहीं करना चाहिए।
इस प्रकार यह अध्याय हमें सिखाता है कि एक अच्छा शासक वही होता है जो अपनी प्रजा के हित को सर्वोपरि रखता है। साथ ही, यह भी सिखाता है कि जीवन में परिश्रम, आत्मनिर्भरता, त्याग और आध्यात्मिक ज्ञान का बहुत महत्व है।


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