यह अध्याय संस्कृत के वर्णों (अक्षरों) के सही उच्चारण के बारे में सरल तरीके से समझाता है। इसमें बताया गया है कि किसी भी अक्षर को ठीक से बोलने के लिए तीन चीजें जरूरी होती हैं—स्थान, करण और आभ्यन्तर प्रयत्न। स्थान वह जगह है जहाँ से आवाज निकलती है, जैसे कण्ठ, तालु, दाँत आदि। करण वह अंग है जो आवाज बनाने में मदद करता है, जैसे जीभ, होंठ आदि। आभ्यन्तर प्रयत्न का मतलब है कि हम अंदर से कितनी ताकत या दबाव लगाकर आवाज निकालते हैं।
अध्याय में आभ्यन्तर प्रयत्न को सबसे ज्यादा समझाया गया है। यह पाँच प्रकार का होता है। जब जीभ या अन्य अंग स्थान को पूरी तरह छूते हैं, तो उसे स्पष्ट स्पर्श कहते हैं और इससे स्पर्श व्यंजन बनते हैं। जब हल्का स्पर्श होता है, तो उसे ईषत्स्पर्श कहते हैं और इससे अन्तःस्थ व्यंजन बनते हैं। जब अंग स्थान को नहीं छूते, लेकिन उसके पास रहते हैं, तो थोड़ा खुला (ईषद्विवृत) प्रयत्न होता है, जिससे ऊष्म व्यंजन और अनुस्वार-विसर्ग बनते हैं। जब स्थान और करण के बीच खुला स्थान होता है, तो उसे विवृत कहते हैं और इससे स्वर बनते हैं। जब कण्ठ थोड़ा संकुचित होता है, तो उसे संवृत कहते हैं, और इसी से ‘अ’ का उच्चारण होता है।
इस अध्याय में यह भी बताया गया है कि स्वर और व्यंजन में क्या अंतर है। स्वर वे अक्षर हैं जिन्हें हम बिना किसी सहारे के बोल सकते हैं, जैसे अ, आ, इ आदि। जबकि व्यंजन को बोलने के लिए स्वर की जरूरत होती है, जैसे क, ख, ग आदि। स्वरों के भी प्रकार होते हैं—ह्रस्व (छोटे), दीर्घ (लंबे) और प्लुत (बहुत लंबे)।
साथ ही, वर्णों को उनके उच्चारण स्थान के आधार पर भी बाँटा गया है, जैसे कण्ठ्य (कण्ठ से), तालव्य (तालु से), मूर्धन्य (मुँह के ऊपर के भाग से), दन्त्य (दाँतों से) और ओष्ठ्य (होंठों से)। इससे हमें यह समझ में आता है कि कौन-सा अक्षर कहाँ से बोला जाता है।
अंत में यह बताया गया है कि यदि हम इन सभी बातों को समझकर बार-बार अभ्यास करें, तो हम संस्कृत के शब्दों का सही और साफ उच्चारण कर सकते हैं। यह अध्याय हमें सही बोलने की आदत सिखाता है और संस्कृत भाषा को अच्छे से सीखने में बहुत मदद करता है।


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