योऽधीतविद्य: सकलः स सर्वेषां गुरुभवेत्
1. अध्याय का परिचय
इस पाठ में प्राचीन भारतीय शिक्षा-परंपरा, विद्याओं, कलाओं, वेदों, उपवेदों और वेदांगों के बारे में बताया गया है।
यह पाठ ‘शक्रनीति’ नामक ग्रंथ से लिया गया है। शक्रनीति के रचयिता शक्राचार्य माने गए हैं। इस ग्रंथ में राज्य-व्यवस्था, दंडनीति, अर्थनीति, प्रजापालन, शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था आदि विषयों का वर्णन मिलता है।
2. पाठ का मुख्य संदेश
पाठ का मुख्य विचार है कि—
जिस व्यक्ति ने अच्छी तरह से विद्या प्राप्त की है, वही सभी का गुरु बनने योग्य है।
केवल जन्म या जाति के आधार पर कोई व्यक्ति गुरु बनने योग्य नहीं हो जाता। गुरु बनने के लिए ज्ञान और विद्या की आवश्यकता है।
सरल शब्दों में:
ज्ञान > जन्म/जाति
अर्थात् किसी व्यक्ति की योग्यता का आधार उसका ज्ञान होना चाहिए।
3. विद्या और कला
पाठ में कहा गया है कि विद्याएँ और कलाएँ अनंत हैं, इसलिए उनकी पूरी संख्या बताना संभव नहीं है।
फिर भी प्रमुख रूप से—
- 32 प्रमुख विद्याएँ
- 64 कलाएँ
मानी गई हैं।
विद्या क्या है?
जिस कार्य को वाणी के माध्यम से सही ढंग से किया जाए, उसे विद्या से संबंधित माना गया है।
कला क्या है?
जिस कार्य को बोलने में असमर्थ व्यक्ति भी करने में सक्षम हो, उसे कला से संबंधित माना गया है।
4. चार वेद
पाठ में चार वेदों का उल्लेख है—
- ऋग्वेद
- यजुर्वेद
- सामवेद
- अथर्ववेद
इन चारों को भारतीय ज्ञान-परंपरा का महत्वपूर्ण आधार माना गया है।
5. चार उपवेद
पाठ में चार उपवेद बताए गए हैं—
| उपवेद | संबंधित विषय |
|---|---|
| आयुर्वेद | स्वास्थ्य और चिकित्सा |
| धनुर्वेद | युद्ध/धनुर्विद्या |
| गान्धर्ववेद | संगीत एवं कला |
| तन्त्रवेद | तन्त्र संबंधी ज्ञान |
पाठ में इन्हें क्रमशः उपवेदों के रूप में बताया गया है।
6. वेदों के छह अंग – षड्वेदांग
वेदों के छह अंग हैं—
- शिक्षा
- व्याकरण
- कल्प
- निरुक्त
- ज्योतिष
- छन्द
इन्हें वेदों के षडङ्ग कहा गया है।
इनके कार्य
1. शिक्षा
वर्णों के उच्चारण, उत्पत्ति, स्थान और प्रयत्न आदि का ज्ञान कराती है।
2. कल्प
यज्ञ आदि कर्मों की विधि बताता है।
3. व्याकरण
शब्दों के शुद्ध और अशुद्ध रूप का ज्ञान कराता है।
4. निरुक्त
शब्दों की व्युत्पत्ति और अर्थ स्पष्ट करता है।
5. छन्द
वैदिक छन्दों का ज्ञान देता है।
6. ज्योतिष
काल, ग्रह और नक्षत्र आदि का ज्ञान देता है।
7. अन्य विद्याएँ
पाठ में 32 विद्याओं के अंतर्गत अनेक विषयों का उल्लेख मिलता है, जैसे—
- मीमांसा
- तर्कशास्त्र
- सांख्यशास्त्र
- वेदान्त
- योग
- इतिहास
- पुराण
- स्मृतियाँ
- नास्तिक मत
- अर्थशास्त्र
- कामशास्त्र
- शिल्प
- अलंकारशास्त्र
- काव्य
- देशभाषा
- अवसर के अनुसार उचित बोलना
- यवनों की विद्या
- देश आदि के धर्म/रीति-रिवाज
इन सभी को ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
8. राजा और प्रजा के कर्तव्य
पाठ में आदर्श राज्य की कल्पना भी की गई है।
जिस राज्य में लोग अपने-अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करते हैं, वह राज्य श्रेष्ठ बनता है।
इसी प्रकार जो राजा धर्म और नीति का पालन करता है, वह लंबे समय तक यश प्राप्त करता है।
मुख्य संदेश:
कर्तव्यनिष्ठ प्रजा + धर्मनिष्ठ एवं नीतिमान राजा = श्रेष्ठ राज्य
9. वैदिक वाङ्मय
पाठ के अंत में वैदिक वाङ्मय की जानकारी दी गई है।
वाङ्मय दो प्रकार का बताया गया है—
- शास्त्र
- काव्य
शास्त्र भी दो प्रकार का बताया गया है—
- अपौरुषेय
- पौरुषेय
अपौरुषेय शास्त्र को श्रुति कहा जाता है और श्रुति के रूप में वेदों का उल्लेख किया गया है।
10. वेदों के चार भाग
वेदों के चार भाग बताए गए हैं—
- संहिता – मंत्रों का संग्रह।
- ब्राह्मण – मंत्रों की व्याख्या तथा यज्ञ आदि कर्मों का वर्णन।
- आरण्यक – मंत्रों का दार्शनिक विवेचन।
- उपनिषद् – गूढ़ एवं दार्शनिक तत्वों का निरूपण।
11. चार वेदों की विशेषता
ऋग्वेद
इसमें ऋचाओं का संग्रह है।
यजुर्वेद
इसमें यज्ञ-कर्म से संबंधित मंत्र हैं।
सामवेद
इसमें गाए जाने वाले मंत्र हैं।
अथर्ववेद
इसमें विभिन्न विषयों से संबंधित मंत्र हैं।


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