वैद्यवृत्तिचतुर्विधा
1. पाठ का विषय
इस पाठ में आयुर्वेद, चिकित्सा के चार पाद, स्वास्थ्य की रक्षा के उपाय, स्वस्थ व्यक्ति के गुण तथा वैद्य की चतुर्विध वृत्ति का वर्णन किया गया है। पाठ के अंत में आत्रेय और उनके शिष्य जीवितराम की कथा भी दी गई है।
2. शरीर और स्वास्थ्य
आचार्य कक्षा में प्रवेश करते हैं और अनन्या को निरुत्साहित देखते हैं। अनन्या बताती है कि उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं है।
आचार्य स्वास्थ्य के महत्व को बताते हुए महाकवि कालिदास का कथन प्रस्तुत करते हैं—
“शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।”
इसका आशय है कि यदि धर्म का आचरण करना है, तो शरीर का स्वस्थ होना आवश्यक है। इसलिए शरीर के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
3. आयुर्वेद की परिभाषा
पाठ में आयुर्वेद की परिभाषा इस श्लोक द्वारा दी गई है—
हिताहितं सुखं दुःखमायुस् तस्य हिताहितम्।
मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते।।
सरल भावार्थ
जिसमें हित-अहित, सुख-दुःख, आयु, आयु के हित-अहित तथा आयु के मान का वर्णन किया गया है, उसे आयुर्वेद कहा जाता है।
मुख्य बिंदु
आयुर्वेद में निम्न विषयों का विचार किया जाता है—
- हित
- अहित
- सुख
- दुःख
- आयु
- आयु का हित-अहित
- आयु का मान
4. चिकित्सा के चार पाद
आयुर्वेद में चिकित्सा के चार अवयव बताए गए हैं।
चार पाद
- वैद्यः — चिकित्सक
- व्याध्युपसृष्टः — रोगी
- भेषजम् — औषधि
- परिचारकः — सहायक/सेवक
श्लोक—
वैद्यो व्याध्युपसृष्टश्च भेषजं परिचारकः।
एते पादाश्चिकित्सायाः कर्मसाधनहेतवः।।
भावार्थ
वैद्य, रोगी, औषधि और परिचारक—ये चिकित्सा के चार पाद हैं और चिकित्सा के कार्य को पूरा करने के साधन हैं।
5. गुणवान् वैद्य
पाठ में कहा गया है—
गुणवद्भिस्त्रिभिः पादैश्चतुर्थो गुणवान् भिषक्।
व्याधिमल्पेन कालेन महान्तमपि साधयेत्।।
भावार्थ
यदि चिकित्सा के तीन पाद गुणवान् हों और चौथा पाद भी गुणवान् वैद्य हो, तो वह बड़े से बड़े रोग को भी कम समय में ठीक कर सकता है।
6. स्वास्थ्य की रक्षा
रोग न होने पर मनुष्य सुखी रहता है। पाठ में स्वास्थ्य की रक्षा के लिए अनेक उत्तम उपाय बताए गए हैं।
7. जल पीने की उचित मात्रा
श्लोक—
अत्यम्बुपानान्न विपच्यतेऽन्नं
निरम्बुपानाच्च स एव दोषः।
तस्मान्नरो वह्निविवर्धनाय
मुहुर्मुहुवारि पिबेदभूरि।।
भावार्थ
अधिक मात्रा में जल पीने से भोजन ठीक प्रकार से नहीं पचता और जल बिल्कुल न पीने से भी वही दोष उत्पन्न होता है। इसलिए पाचन-अग्नि की वृद्धि के लिए मनुष्य को बार-बार थोड़ी मात्रा में जल पीना चाहिए।
8. स्वस्थ व्यक्ति के गुण
पाठ में स्वस्थ रहने वाले व्यक्ति के कई गुण बताए गए हैं।
श्लोक—
नित्यं हिताहार-विहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्तः।
दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः।।
भावार्थ
जो व्यक्ति—
- प्रतिदिन हितकारी आहार लेता है।
- उचित विहार का पालन करता है।
- सोच-समझकर कार्य करता है।
- विषयों में आसक्त नहीं रहता।
- दान करता है।
- समान भाव रखता है।
- सत्य का पालन करता है।
- क्षमाशील है।
- आप्तजनों की सेवा करता है।
वह अरोग अर्थात् रोगरहित रहता है।


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