पञ्च शीलानि आचरेम, आदर्शसमाजं रचयेम
1. पाठ का परिचय
इस पाठ में भगवान् गौतम बुद्ध, उनके करुणामय जीवन, उनके उपदेश तथा बौद्ध धर्म के पञ्चशील, चार आर्यसत्य, अष्टाङ्गिक मार्ग और शरणत्रय का वर्णन किया गया है। पाठ में व्याघ्री जातक के माध्यम से जीवों के प्रति करुणा और परोपकार की भावना को समझाया गया है।
2. साञ्ची स्तूप
- साञ्ची स्तूप बौद्ध धर्म का प्रसिद्ध स्मारक है।
- इसका निर्माण सम्राट अशोक ने करवाया था।
- यूनेस्को द्वारा साञ्ची स्तूप को वैश्विक सम्पदा के रूप में घोषित किया गया है।
- इसका निर्माण बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों तथा भगवान् गौतम बुद्ध के उपदेशों के प्रचार के लिए किया गया था।
3. भगवान् गौतम बुद्ध
- गौतम बुद्ध के उपदेश सार्वकालिक और सार्वभौमिक हैं।
- उन्होंने सांसारिक मोह-माया आदि की उपेक्षा करके घोर तपस्या से ज्ञान प्राप्त किया।
- ज्ञान प्राप्त करने के बाद वे भगवान् बुद्ध कहलाए।
- बुद्ध करुणा की प्रतिमा थे।
- उन्होंने लोगों के दुःखों के निवारण के लिए चार आर्यसत्य और अष्टाङ्गिक मार्ग का उपदेश दिया।
4. व्याघ्री जातक की कथा
बोधिसत्त्व का जन्म और शिक्षा
- बोधिसत्त्व कारुणिक अपने सत्कर्मों के बल पर एक कुलीन परिवार में जन्मे।
- जातकर्म आदि संस्कारों से संस्कारित होकर वे बड़े हुए।
- अपनी स्वाभाविक बुद्धिमत्ता, ज्ञान की जिज्ञासा और आलस्य न होने के कारण उन्होंने शीघ्र ही अनेक विद्याओं में पारंगतता प्राप्त कर ली।
- वे धर्म के अभ्यास से प्रभावित बुद्धि वाले तथा संन्यास से परिचित थे।
- वे वन में घूमते रहते थे।
- उनकी स्नेह और करुणा की भावनाओं के कारण हिंसक जीव भी बिना कलह के स्नेहपूर्वक रहते थे।
व्याघ्री को देखना
एक दिन बोधिसत्त्व अपने शिष्य अजित के साथ वन के निकट घूम रहे थे। उन्होंने एक व्याघ्री को देखा।
- वह पर्वत की गुफा में प्रसव-पीड़ा से पीड़ित थी।
- वह बहुत भूखी थी।
- उसका पेट कृश था और आँखें दुर्बल थीं।
- अपनी भूख को शांत करने के लिए वह अपने बच्चों को भी मारकर खाने का प्रयास करने वाली थी।
बोधिसत्त्व का त्याग
बोधिसत्त्व ने व्याघ्री की स्थिति देखकर अपने शिष्य अजित को उसके दुःख का उपाय खोजने के लिए भेजा।
अजित के चले जाने के बाद बोधिसत्त्व ने विचार किया कि:
- जब उनका पूरा शरीर उपस्थित है तो वे दूसरे प्राणी की रक्षा क्यों न करें?
- दूसरे प्राणी के लिए भोजन प्राप्त होगा या नहीं, यह निश्चित नहीं था।
- व्याघ्री अपने बच्चों को खा सकती थी अथवा मर सकती थी।
- आत्मा अमर है, जबकि शरीर अनित्य और जड़ है।
- यह शरीर परोपकार के लिए है।
इस विचार से उन्होंने योगबल द्वारा अपने प्राण त्याग दिए। उनका शरीर गुफा की भूमि पर गिर पड़ा। व्याघ्री ने उनके शरीर को खा लिया और अपने बच्चों की रक्षा की।
5. पंचशील
भगवान् बुद्ध ने गृहस्थों के नैतिक जीवन के निर्वाह के लिए पञ्चशील का उपदेश दिया।
1. जीवहत्या से विरति
पाणातिपाता वेरमणिसिक्खापदं समादियामि।
अर्थ — मैं किसी भी जीव की हत्या नहीं करूँगा।
2. चोरी से विरति
अदिन्नादाना वेरमणिसिक्खापदं समादियामि।
अर्थ — मैं चोरी नहीं करूँगा।
3. व्यभिचार से विरति
कामेसु मिच्छाचारा वेरमणिसिक्खापदं समादियामि।
अर्थ — मैं व्यभिचार का आचरण नहीं करूँगा।
4. झूठ बोलने से विरति
मुसावादा वेरमणिसिक्खापदं समादियामि।
अर्थ — मैं मिथ्या नहीं बोलूँगा।
5. मद्य-मादक द्रव्यों से विरति
सुरामेरय-मज्ज-पमादट्ठाना वेरमणिसिक्खापदं समादियामि।
अर्थ — मैं मद्य, मादक द्रव्यों और प्रमाद उत्पन्न करने वाले पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा।
उद्देश्य: संसार में शान्तिमय जीवन जीने के लिए पञ्चशील का आचरण करना और आदर्श समाज का निर्माण करना।


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