समथेन कृषिः कार्या लोकानां हितकाम्यया
1. पाठ का मुख्य विषय
इस पाठ में कृषि के महत्त्व, कृषक के परिश्रम, कृषि-विज्ञान तथा कृषि के लिए भूमि की जाँच के विषय में बताया गया है। पाठ में बताया गया है कि अन्न, प्राण और बल के लिए कृषि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
2. भारत और कृषि
- भारतवर्ष प्राचीनकाल से ही कृषिप्रधान राष्ट्र रहा है।
- कृषि के महत्त्व को समझना आवश्यक है।
- कृषि-कर्म से अनेक प्रकार की आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।
- कृषि से अन्न, फल, वनस्पतियाँ और दुग्ध आदि की उत्पत्ति होती है।
- इन वस्तुओं के बिना हमारा जीवन सम्भव नहीं है।
- कृषक बहुत परिश्रम करके अन्न आदि का उत्पादन करते हैं।
3. कृषि-कर्म में कृषक का परिश्रम
कृषक कृषि करने से पहले कई प्रकार के कार्य करता है।
भूमि की जाँच
- सबसे पहले भूमि और जल आदि का ठीक प्रकार से परीक्षण किया जाता है।
- योग्य भूमि का विचार किया जाता है।
- भूमि की जाँच के बाद बीज बोने आदि का कार्य किया जाता है।
- इसे कृषिविज्ञान कहा गया है।
4. कृषि के विषय में प्राचीन विचार
- कृषि के विषय में पराशर आदि प्राचीन महर्षियों ने सूक्ष्म और विस्तृत विचार किया।
- आचार्य कौटिल्य ने कृषिविद्या को वार्ताविद्या में सम्मिलित किया।
- भारतीय ज्ञानपरम्परा में कृषि-विज्ञान को आधार बनाकर कई ग्रन्थों की रचना की गई।
- पाठ में काश्यपीयकृषिपद्धति, कृषिपाराशर और वृक्षायुर्वेद आदि ग्रन्थों का उल्लेख किया गया है।
5. अन्न का महत्त्व
पाठ के अनुसार—
- अन्न ही प्राण है।
- अन्न ही बल प्रदान करता है।
- अन्न सभी उद्देश्यों और पदार्थों की प्राप्ति का साधन है।
- देव, असुर और मनुष्य सभी अन्न पर निर्भर हैं।
कृषि और अन्न का सम्बन्ध
- अन्न धान्य से उत्पन्न होता है।
- धान्य कृषि के बिना प्राप्त नहीं हो सकता।
- इसलिए सभी कार्यों को छोड़कर भी प्रयत्नपूर्वक कृषि करनी चाहिए।
6. समर्थ व्यक्ति द्वारा कृषि
पाठ में कहा गया है कि—
- लोगों के हित की इच्छा से समर्थ व्यक्ति द्वारा कृषि की जानी चाहिए।
- जो कृषक कृषि करने में असमर्थ होता है, उसके कारण मनुष्य को भिक्षा प्राप्त करने की स्थिति आ सकती है।
7. कृषि और आत्मनिर्भरता
- जो व्यक्ति कृषि-कर्म से जुड़ा रहता है, वह याचक नहीं बनता।
- कृषि से जुड़ा व्यक्ति इस संसार में भूपति अर्थात् स्वामी बनने में भी समर्थ हो सकता है।
8. कृषक का महत्त्व
पाठ में बताया गया है कि—
- कोई व्यक्ति सोने, चाँदी, मणि, रत्न और वस्त्रों से कितना भी सम्पन्न क्यों न हो,
- भोजन की इच्छा होने पर उसे कृषक की आवश्यकता होती है।
- लोग भोजन की इच्छा से कृषकों पर निर्भर रहते हैं।
- इसलिए कृषक का महत्त्व बहुत अधिक है।
9. कृषक के गुण
पाठ में कृषि-कर्म में लगे लोगों के कई गुण बताए गए हैं।
कृषक—
- गो-भक्त होते हैं।
- भूमि-भक्त होते हैं।
- देव-भक्त होते हैं।
- सत्य बोलने वाले होते हैं।
- परोपकार में लगे रहते हैं।
- प्रसन्नचित्त रहते हैं।
- तन्द्रा और आलस्य से रहित होते हैं।
- काम और क्रोध आदि से रहित होते हैं।
- एक-दूसरे के प्रति स्नेह रखते हैं।
- सहयोग के कार्यों में लगे रहते हैं।
10. कृषि योग्य भूमि की जाँच
पाठ में कृषि के लिए भूमि की उपयुक्तता जाँचने के कुछ उपाय बताए गए हैं।
भूमि की जाँच के उपाय
- भूमि की मिट्टी को सूँघकर उसकी जाँच करना।
- वहाँ उपस्थित जल को पीकर जाँच करना।
- कहीं-कहीं मिट्टी को तौलकर उसकी जाँच करना।
- मिट्टी को पात्र में रखे जल में डालकर उसकी जाँच करना।
- लगभग एक घटिका के बाद पात्र में स्थित जल का निरीक्षण करना।
पाठ में ऐसे व्यक्ति को घटिकावधिक-कोविदः कहा गया है जो घटिका के समय को जानता हो।
11. कौटिल्य और कृषि-विज्ञान
- कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में चार विद्याओं का वर्णन किया है।
- इनमें वार्ता नामक विद्या में कृषिविद्या को सम्मिलित किया गया है।
- भारतीय ज्ञानपरम्परा में कृषि-विज्ञान को आधार बनाकर कृषि से सम्बन्धित ग्रन्थों की रचना हुई।


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