धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम्
1. पाठ का परिचय
इस पाठ में आचार्य कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र के विषय में चर्चा की गई है। पाठ में शासन-व्यवस्था, राज्य के अंग, न्याय-व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, कोष-व्यवस्था तथा कर-व्यवस्था आदि विषयों को संवाद के माध्यम से समझाया गया है।
2. अर्थशास्त्र
छात्र पुस्तकालय में जाकर अर्थशास्त्र नामक ग्रंथ देखते हैं और उसके विषय में अधिक जानना चाहते हैं।
अध्यापक बताते हैं कि अर्थशास्त्र आचार्य कौटिल्य द्वारा लिखा गया है। इसमें आचार, व्यवहार, नागरिकों के कर्तव्य आदि विषयों का विस्तार से वर्णन किया गया है। भूमि के लाभ और संरक्षण के लिए पूर्वाचार्यों द्वारा बताए गए अर्थशास्त्रीय विचारों को भी इसमें समाहित किया गया है।
3. राज्य की सात प्रकृतियाँ
अर्थशास्त्र में राज्य के सात प्रमुख अंग बताए गए हैं—
- स्वामी — राजा या शासनप्रमुख
- अमात्य — मंत्री
- जनपद — जनों के रहने योग्य भूभाग
- दुर्ग — सुरक्षा का स्थान
- कोष — सरकारी वित्त-संग्रह
- दण्ड — प्रजा के शासन की व्यवस्था
- मित्र — सहयोगी देश
इन सात प्रकृतियों को राज्य के आधार के रूप में बताया गया है। इनके सम्यक् पालन से राष्ट्र समृद्ध होता है।
4. न्याय के चार पाद
पाठ में न्याय के चार पाद बताए गए हैं—
- धर्म
- व्यवहार
- चरित्र
- राजशासन
इन्हीं के द्वारा विवादों का समाधान किया जाता था।
धर्म
धर्म सत्य पर आधारित है। पाठ में इसका आशय है कि न्याय धर्म के अनुसार होना चाहिए।
व्यवहार
संदेह या विवाद की स्थिति में साक्षियों के द्वारा समाधान करना व्यवहार कहलाता है।
चरित्र
सज्जनों का व्यवहार चरित्र कहलाता है।
राजशासन
राजा द्वारा दिया गया निर्णय राजशासन कहलाता है।
5. न्याय के चार पादों का श्लोक
धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम्।
विवादार्थश्चतुष्पादः पश्चिमः पूर्वबाधकः।।
इसमें धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन को विवाद के समाधान के चार पाद बताया गया है।
दूसरे श्लोक में इनके आधार बताए गए हैं—
अत्र सत्ये स्थितो धर्मो व्यवहारस्तु साक्षिषु।
चरित्रं सङ्ग्रहे पुंसां राज्ञामाज्ञा तु शासनम्।।
अर्थात् धर्म सत्य पर, व्यवहार साक्षियों पर, चरित्र लोगों के आचरण पर और शासन राजा की आज्ञा पर आधारित है।
6. पाठ में दिए गए ध्येयवाक्य
पाठ में निम्न ध्येयवाक्यों का उल्लेख है—
- “यतो धर्मस्ततो जयः”
- “सत्यमेव जयते”
- “धर्मचक्रप्रवर्तनाय”
इन ध्येयवाक्यों में धर्म और सत्य की प्रतिष्ठा दिखाई गई है।
7. राजा के कर्तव्य
अर्थशास्त्र में राजा के कर्तव्यों के विषय में बताया गया है कि राजा विद्या से विनीत हो और प्रजा के अनुशासन तथा हित में लगा रहे।
राजा का जीवन प्रजा की सेवा के लिए समर्पित होना चाहिए। उसका व्यक्तिगत प्रिय मुख्य नहीं है; प्रजा का हित उसके लिए अधिक महत्त्वपूर्ण है।
पाठ में यह भी कहा गया है—
“प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥”
अर्थात् राजा का सुख प्रजा के सुख में और उसका हित प्रजा के हित में होना चाहिए।
8. कोष का महत्त्व
पाठ में कहा गया है—
“कोषपूर्वाः सर्वारम्भाः।”
इससे कोष की महत्ता स्पष्ट होती है। सभी कार्यों के लिए कोष आवश्यक माना गया है।
कोष का प्रयोजन सभी मनुष्यों के भोजन आदि की व्यवस्था करना है। इसलिए कोष की व्यवस्था महत्त्वपूर्ण है।
9. कर-व्यवस्था
पाठ में प्राचीन समय की कर-व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।
कर के रूप में—
- धान्य का षड्भाग
- पण्य का दशभाग
- हिरण्य
देय बताया गया है।
10. अर्थशास्त्र और वर्तमान महत्त्व
अध्यापक बताते हैं कि अर्थशास्त्र में ऐसे अनेक विषय हैं जो आज भी महत्त्वपूर्ण हैं। पाठ में यह भी कहा गया है कि संविधान के निर्माताओं ने अनेक अंश वहाँ से स्वीकार किए हैं।
अध्यापक छात्रों को आगे पुस्तक पढ़ने और विषय को अधिक समझने के लिए प्रेरित करते हैं।


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