उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्
एक बार एक लड़के ने रास्ते में पड़ा हुआ धन उठा लिया और अपनी माँ से बोला कि इससे वह कई खिलौने खरीदेगा। माँ ने उसे समझाया कि यह धन किसी और का है, इसलिए इसे उसी को लौटा देना चाहिए। दूसरे का धन तिनके के समान भी नहीं होना चाहिए। जब लड़के ने पूछा कि दूसरे का धन तिनके के समान क्यों है, तो माँ ने उसे पञ्चतन्त्र की एक कहानी सुनाई।
कहानी इस प्रकार है — किसी देश में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नाम के दो मित्र रहते थे। पापबुद्धि बहुत चालाक और लालची था, जबकि धर्मबुद्धि सच्चा और ईमानदार था। पापबुद्धि ने सोचा कि मैं धर्मबुद्धि का साथ लेकर विदेश जाऊँगा, वहाँ उसकी मदद से धन कमाऊँगा और बाद में उसे धोखा देकर सारा धन हड़प लूँगा।
दोनों विदेश गए। धर्मबुद्धि की सत्संगति से पापबुद्धि को भी बहुत धन मिल गया। वापस लौटते समय पापबुद्धि ने सुझाव दिया कि सारा धन जंगल में एक गड्ढे में छिपा दें और थोड़ा-सा लेकर घर जाएँ। धर्मबुद्धि मान गया। रात में पापबुद्धि चुपके से जाकर सारा धन उठा लाया और गड्ढा भर दिया।
कुछ दिनों बाद पापबुद्धि ने फिर धर्मबुद्धि को उसी जगह ले जाकर कहा कि धन गायब है। उसने धर्मबुद्धि पर ही चोरी का आरोप लगा दिया और राजा के दरबार में शिकायत कर दी। न्यायाधीश ने फैसला किया कि इस मामले का फैसला वनदेवता करेगी।
पापबुद्धि ने अपने पिता को कोटर वाले एक बड़े शमी वृक्ष में छिपा दिया। अगले दिन जब सब लोग वनदेवता से पूछ रहे थे, तो पापबुद्धि के पिता ने वृक्ष से बोलकर कहा कि चोर धर्मबुद्धि है। सब हैरान रह गए।
तब धर्मबुद्धि ने कहा कि वह वृक्ष को आग लगा देगा, क्योंकि सच्ची वनदेवता आग से नहीं डरती। जैसे ही आग लगाई गई, पापबुद्धि का पिता आधा जलकर बाहर निकला और मरते-मरते सारी सच्चाई बता दी कि यह सब पापबुद्धि की चाल थी।
अंत में पापबुद्धि को दंड मिला और धर्मबुद्धि की प्रशंसा हुई।
पाठ का मुख्य संदेश: “उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्” अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति को हर काम करने से पहले उसके उपाय (सफलता का तरीका) और अपाय (नुकसान या खतरा) दोनों को सोचना चाहिए। पापबुद्धि ने केवल उपाय सोचा, अपाय नहीं सोचा, इसलिए उसका सारा षड्यंत्र विफल हो गया और उसे भारी दंड मिला।
निष्कर्ष: ईमानदारी और सत्य हमेशा जीतता है। दूसरों को धोखा देने वाला अंत में खुद ही फंस जाता है।


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