यादृशम् अनन् तादृशं मनः
1. पाठ का परिचय
यह पाठ छान्दोग्योपनिषद् के षष्ठ अध्याय के पाँचवें खण्ड से लिया गया है। पाठ में मन, प्राण और वाणी के विषय में बताया गया है। इन विषयों को आरुणि और उनके पुत्र श्वेतकेतु के संवाद के माध्यम से समझाया गया है।
ऋषिकुल परम्परा में ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रश्न करना भी एक महत्वपूर्ण साधन माना गया है। श्वेतकेतु प्रश्न करता है और आरुणि उसके प्रश्नों का समाधान करते हैं।
2. आरुणि और श्वेतकेतु
आरुणि (उद्दालक आरुणि) वैदिक काल के प्रसिद्ध ऋषि थे। उनके पुत्र श्वेतकेतु अत्यन्त मेधावी छात्र थे।
श्वेतकेतु ने बारह वर्षों तक गुरुकुल में वेदों का अध्ययन किया। घर लौटने पर उनके अहंकार को दूर करने के लिए आरुणि ने उन्हें विभिन्न उपमाओं के माध्यम से ब्रह्मविद्या का ज्ञान दिया। इसी संवाद में “तत्त्वमसि” महावाक्य का नौ बार उपदेश किया गया।
3. आरुणि से श्वेतकेतु के प्रश्न
श्वेतकेतु आरुणि को प्रणाम करके कुछ पूछने की अनुमति माँगता है। वह तीन मुख्य प्रश्न करता है—
प्रश्न 1 — मन क्या है?
आरुणि उत्तर देते हैं कि खाए हुए अन्न का सबसे सूक्ष्म भाग मन होता है।
प्रश्न 2 — प्राण क्या है?
आरुणि बताते हैं कि पीए हुए जल का सबसे सूक्ष्म भाग प्राण होता है।
प्रश्न 3 — वाणी क्या है?
आरुणि बताते हैं कि खाए हुए तेज का सबसे सूक्ष्म भाग वाणी होता है।
4. मन का स्वरूप
आरुणि कहते हैं—
“अशितस्यान्नस्य यदणिष्ठं तन्मनः।”
अर्थात् खाए हुए अन्न का जो सबसे सूक्ष्म भाग है, वही मन है।
इस बात को समझाने के लिए दही और घी का उदाहरण दिया गया है। जिस प्रकार दही को मथने पर उसका सूक्ष्म भाग ऊपर उठकर घी बनता है, उसी प्रकार खाए हुए अन्न का सूक्ष्म भाग ऊपर उठकर मन बनता है।
मुख्य बिन्दु:
अन्न → सूक्ष्म भाग → मन
5. प्राण का स्वरूप
आरुणि कहते हैं—
“पीतानामपां योऽणिष्ठं स प्राणः।”
अर्थात् पीए हुए जल का जो सबसे सूक्ष्म भाग है, वही प्राण है।
मुख्य बिन्दु:
जल → सूक्ष्म भाग → प्राण
6. वाणी का स्वरूप
आरुणि कहते हैं—
“अशितस्य तेजसो या अणिष्ठा सा वाक्।”
अर्थात् खाए हुए तेज का जो सबसे सूक्ष्म भाग है, वही वाणी है।
मुख्य बिन्दु:
तेज → सूक्ष्म भाग → वाणी
7. मन, प्राण और वाणी
पाठ में तीनों का सम्बन्ध इस प्रकार बताया गया है—
| तत्व | सम्बन्ध |
|---|---|
| मन | अन्नमय |
| प्राण | आपोमय |
| वाणी | तेजोमयी |
अर्थात्—
मन = अन्नमय
प्राण = जलमय
वाणी = तेजोमयी
8. दही और घी की उपमा
आरुणि पहले दही को मथने का उदाहरण देते हैं।
जब दही को मथा जाता है, तब उसका सूक्ष्म भाग ऊपर उठता है और घी बनता है।
इसी प्रकार—
- अन्न का सूक्ष्म भाग → मन
- जल का सूक्ष्म भाग → प्राण
- तेज का सूक्ष्म भाग → वाणी
इस उपमा के माध्यम से आरुणि श्वेतकेतु को विषय समझाते हैं।
9. पाठ का सार
आरुणि श्वेतकेतु को बताते हैं कि—
मन अन्नमय है, प्राण आपोमय है और वाणी तेजोमयी है।
पाठ का मुख्य सार यह है कि मनुष्य जैसा अन्न ग्रहण करता है, उसके चित्त आदि भी उसी प्रकार के होते हैं। इसलिए अन्न और मन के बीच सम्बन्ध बताया गया है।
10. छान्दोग्योपनिषद्
यह पाठ सामवेद के छान्दोग्य ब्राह्मण के अन्तर्गत आने वाली छान्दोग्योपनिषद् के षष्ठ अध्याय से लिया गया है।
छान्दोग्योपनिषद् प्रमुख दस उपनिषदों में से एक है। इसमें—
- ब्रह्मविद्या
- आत्मविद्या
- सृष्टितत्त्व
- गुरु-शिष्य संवाद
- नैतिक मूल्य
का वर्णन किया गया है।
11. “यादृशम् अन्नं तादृशं मनः” का भाव
यादृशम् अन्नं तादृशं मनः का सरल अर्थ है—
“जैसा अन्न, वैसा मन।”
पाठ में बताया गया है कि भोजन के गुण मनुष्य की मनोवृत्ति को प्रभावित करते हैं।
12. आयुर्वेद में अन्न का महत्व
पाठ में आयुर्वेद का कथन दिया गया है—
“आहारसम्भवं वस्तु रोगाश्चाहारसम्भवाः।”
पाठ के अनुसार शरीर का पोषण आहार से होता है और अनुचित आहार रोगों का प्रमुख कारण हो सकता है।
इसलिए हितकर, मित और शुद्ध आहार को स्वास्थ्य का आधार माना गया है।
13. आहार के तीन प्रकार
पाठ में आहार को तीन प्रकार का बताया गया है।
(क) सात्त्विक आहार
पाठ में सात्त्विक आहार के अन्तर्गत—
- फल
- दूध
- शाक
- अनाज
बताए गए हैं।
इनसे मन की शुद्धि, शान्ति और एकाग्रता उत्पन्न होती है।
(ख) राजसिक आहार
राजसिक आहार में—
- बहुत तीखा भोजन
- खट्टा भोजन
- अधिक नमक वाला भोजन
बताया गया है।
यह चंचलता, उद्वेग और क्रोध को बढ़ाता है।
(ग) तामसिक आहार
तामसिक आहार में—
- मांसाहार
- बासी भोजन
- दूषित भोजन
- बहुत भारी भोजन
बताया गया है।
यह आलस्य, प्रमाद और जड़ता को उत्पन्न करता है।
14. उपमा का महत्व
ऋषि ने घी बनने की प्रक्रिया का उदाहरण देकर पाठ के गूढ़ विचार को सरल बनाया है।
जिस प्रकार दही का सूक्ष्मतम भाग घी के रूप में प्रकट होता है, उसी प्रकार अन्न का सूक्ष्मतम सार मन बनता है।
इस प्रकार पाठ में सरल उपमा के द्वारा कठिन विषय को समझाया गया है।
15. गुरु-शिष्य परम्परा
पाठ में भारतीय शिक्षा-पद्धति की विशेषता भी दिखाई देती है।
इस परम्परा में केवल पाठ याद करना ही ज्ञान का आधार नहीं है। इसके साथ—
- प्रश्न
- जिज्ञासा
- मनन
- अनुभूति
को भी ज्ञान का आधार माना गया है।
श्वेतकेतु बार-बार प्रश्न करता है और आरुणि धैर्यपूर्वक उसके प्रश्नों का समाधान करते हैं। यह आदर्श गुरु-शिष्य सम्बन्ध का उदाहरण है।
16. आधुनिक जीवन में पाठ का संदेश
पाठ में बताया गया है कि आधुनिक जीवन में जंक-फूड, अत्यधिक प्रक्रियायुक्त भोजन और अनियमित आहार सामान्य हो गए हैं।
पाठ विद्यार्थियों को स्वस्थ शरीर, निर्मल मन और संयमित जीवनशैली के लिए अच्छे आहार के महत्व की याद दिलाता है।
इसलिए पौष्टिक आहार, शुद्ध जल और संतुलित जीवन के महत्व को समझना चाहिए।
17. पाठ से मिलने वाली मुख्य बातें
- मन का सम्बन्ध अन्न के सूक्ष्म भाग से बताया गया है।
- प्राण का सम्बन्ध जल के सूक्ष्म भाग से बताया गया है।
- वाणी का सम्बन्ध तेज के सूक्ष्म भाग से बताया गया है।
- मन अन्नमय है।
- प्राण आपोमय है।
- वाणी तेजोमयी है।
- भोजन का प्रभाव मन पर पड़ता है।
- हितकर, मित और शुद्ध आहार को स्वास्थ्य का आधार माना गया है।
- आहार तीन प्रकार का बताया गया है—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक।
- श्वेतकेतु और आरुणि का संवाद गुरु-शिष्य परम्परा का उदाहरण है।


Leave a Reply