कक्षा ९ | शारदा | पाठः ११
वर्णोच्चारण-शिक्षा २
आभ्यन्तर-प्रयत्नः — पञ्च प्रकाराः — सम्पूर्णं प्रश्नोत्तराणि
📖 व्याकरणम्
🔤 वर्णमाला
🗣️ उच्चारणम्
✍️ अभ्यासः
📚 NCERT
🔤 वर्णमाला
🗣️ उच्चारणम्
✍️ अभ्यासः
📚 NCERT
📋 विषय-सूची
अभ्यासः १ — एकपदेन उत्तराणि लिखत (One-word Answers)
प्रश्न-निर्देशः
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत —
(नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर एक पद/शब्द में लिखिए —)
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत —
(नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर एक पद/शब्द में लिखिए —)
प्रश्नः (क) — वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं कति आवश्यकानि तत्त्वानि भवन्ति?
(हिन्दी: वर्णों की उत्पत्ति के लिए कितने आवश्यक तत्त्व होते हैं?)
उत्तरम् — त्रीणि (तीन)
हिन्दी अर्थ: वर्णों की उत्पत्ति के लिए तीन तत्त्व आवश्यक होते हैं — (क) स्थानम्, (ख) करणम्, (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः।
प्रश्नः (ख) — कति स्थानानि सन्ति?
(हिन्दी: कितने स्थान होते हैं?)
उत्तरम् — षट् (छः)
हिन्दी अर्थ: वर्णों के उच्चारण के लिए छः स्थान होते हैं।
प्रश्नः (ग) — आभ्यन्तर-प्रयत्नः कतिविधः?
(हिन्दी: आभ्यन्तर-प्रयत्न कितने प्रकार का होता है?)
उत्तरम् — पञ्चविधः (पाँच प्रकार का)
हिन्दी अर्थ: आभ्यन्तर-प्रयत्न पाँच प्रकार का होता है।
प्रश्नः (घ) — करणं यदा स्थानं स्पष्टरूपेण स्पृशति, तदा करणस्य कः प्रयत्नः भवति?
(हिन्दी: जब करण, स्थान को स्पष्ट रूप से स्पर्श करता है, तब करण का कौन-सा प्रयत्न होता है?)
उत्तरम् — स्पृष्ट-प्रयत्नः
हिन्दी अर्थ: जब करण, स्थान को स्पष्ट रूप से स्पर्श करता है, तब ‘स्पृष्ट-प्रयत्न’ होता है।
प्रश्नः (ङ) — अ-वर्णस्य कति उपभेदाः सन्ति?
(हिन्दी: अ-वर्ण के कितने उपभेद होते हैं?)
उत्तरम् — त्रयः (तीन) — अ-कारः (ह्रस्वः), आ-कारः (दीर्घः), अ३-कारः (प्लुतः)
हिन्दी अर्थ: अ-वर्ण के तीन उपभेद होते हैं — ह्रस्व अ, दीर्घ आ, और प्लुत अ३।
प्रश्नः (च) — संवृत-प्रयत्नः कुत्र भवति?
(हिन्दी: संवृत-प्रयत्न कहाँ होता है?)
उत्तरम् — कण्ठ-स्थाने (केवल कण्ठ-स्थान में), तदपि केवलम् अ-कारस्य (ह्रस्वस्य) उच्चारणार्थम् एव।
हिन्दी अर्थ: संवृत-प्रयत्न केवल कण्ठ-स्थान में होता है, और वह भी केवल ह्रस्व अ-कार के उच्चारण के लिए।
अभ्यासः २ — पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत (Full Sentence Answers)
प्रश्न-निर्देशः
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत —
(नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर पूर्ण वाक्य में लिखिए —)
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत —
(नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर पूर्ण वाक्य में लिखिए —)
प्रश्नः (क) — आभ्यन्तर-प्रयत्नः कः उच्यते?
(हिन्दी: ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’ किसे कहते हैं?)
उत्तरम् — आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति, सः प्रयत्नः ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ इति उच्यते। आभ्यन्तर-प्रयत्नः पञ्चविधः भवति।
हिन्दी अर्थ: मुख के अन्दर जिस प्रयत्न से करण, स्थान को छूता है या उसके पास जाता है, उस प्रयत्न को ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’ कहते हैं। आभ्यन्तर-प्रयत्न पाँच प्रकार का होता है।
प्रश्नः (ख) — ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः कदा भवति?
(हिन्दी: ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न’ कब होता है?)
उत्तरम् — करणं यदा स्थानं ‘स्वल्पम् एव स्पृशति’, तदा करणस्य ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः’ भवति। करणस्य ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नेन स्थाने अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि जायन्ते।
हिन्दी अर्थ: जब करण, स्थान को थोड़ा-सा ही स्पर्श करता है, तब ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न’ होता है। इस प्रयत्न से अन्तःस्थ-व्यञ्जन उत्पन्न होते हैं।
प्रश्नः (ग) — करणस्य विवृत-प्रयत्नेन के स्वराः उच्चार्यन्ते?
(हिन्दी: करण के विवृत-प्रयत्न से कौन-से स्वर उच्चारित होते हैं?)
उत्तरम् — करणस्य विवृत-प्रयत्नेन (अ-कारं विहाय) अन्ये सर्वे स्वराः उच्चार्यन्ते।
हिन्दी अर्थ: करण के विवृत-प्रयत्न से अ-कार को छोड़कर अन्य सभी स्वर उच्चारित होते हैं।
प्रश्नः (घ) — आभ्यन्तर-प्रयत्नाः कुत्र दृश्यन्ते?
(हिन्दी: आभ्यन्तर-प्रयत्न कहाँ दिखाई देते हैं?)
उत्तरम् — कण्ठ्य-तालव्य-मूर्धन्य-दन्त्य-ओष्ठ्येषु पञ्च-प्रकारेषु वर्णेषु स्थान-करणयोः मध्ये उपर्युक्ताः चतुर्विधाः आभ्यन्तर-प्रयत्नाः दृश्यन्ते। (संवृत-प्रयत्नः केवलं कण्ठ-स्थाने एव।)
हिन्दी अर्थ: कण्ठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दन्त्य और ओष्ठ्य — इन पाँच प्रकार के वर्णों में स्थान और करण के बीच ये चार प्रकार के आभ्यन्तर-प्रयत्न दिखाई देते हैं।
प्रश्नः (ङ) — आभ्यन्तर-प्रयत्ने स्वरेषु विशिष्टः स्वरः कः अस्ति?
(हिन्दी: आभ्यन्तर-प्रयत्न में स्वरों में विशिष्ट स्वर कौन-सा है?)
उत्तरम् — स्वरेषु ‘अ-कारः’ (ह्रस्वः) कश्चिद् विशिष्टः स्वरः अस्ति। अस्य उच्चारणे ‘संवृत-प्रयत्नः’ भवति, अन्य-स्वराणाम् इव ‘विवृत-प्रयत्नः’ न भवति।
हिन्दी अर्थ: स्वरों में ह्रस्व ‘अ-कार’ एक विशेष स्वर है। इसके उच्चारण में ‘संवृत-प्रयत्न’ होता है, अन्य स्वरों की तरह ‘विवृत-प्रयत्न’ नहीं होता।
अभ्यासः ३ — क-स्तम्भेन सह मेलनम् (Matching)
प्रश्न-निर्देशः
अधोलिखितानां वर्णानां क-स्तम्भेन सह मेलनं कुरुत —
(नीचे दिए वर्णों का क-स्तम्भ से मिलान कीजिए —)
अधोलिखितानां वर्णानां क-स्तम्भेन सह मेलनं कुरुत —
(नीचे दिए वर्णों का क-स्तम्भ से मिलान कीजिए —)
क-स्तम्भः | ख-स्तम्भः
(क) विवृत-प्रयत्नः → (१) व् | (२) श् | (३) ॠ | (४) अ | (५) ध्
(क) विवृत-प्रयत्नः → (१) व् | (२) श् | (३) ॠ | (४) अ | (५) ध्
प्रश्नः (क) — विवृत-प्रयत्नः — किस वर्ण से मेल खाता है?
(हिन्दी: विवृत-प्रयत्न से कौन-सा वर्ण मेल खाता है?)
उत्तरम् — (क) विवृत-प्रयत्नः → ॠ (३)
कारण: ॠ एक स्वर है। अ-कार को छोड़कर सभी स्वर विवृत-प्रयत्न से उच्चारित होते हैं।
कारण: ॠ एक स्वर है। अ-कार को छोड़कर सभी स्वर विवृत-प्रयत्न से उच्चारित होते हैं।
हिन्दी अर्थ: ॠ एक स्वर है और अ-कार को छोड़कर सभी स्वर ‘विवृत-प्रयत्न’ से बोले जाते हैं।
प्रश्नः (ख) — स्पृष्ट-प्रयत्नः — किस वर्ण से मेल खाता है?
(हिन्दी: स्पृष्ट-प्रयत्न से कौन-सा वर्ण मेल खाता है?)
उत्तरम् — (ख) स्पृष्ट-प्रयत्नः → ध् (५)
कारण: ध् एक स्पर्श-व्यञ्जन है। स्पर्श-व्यञ्जनों का उच्चारण स्पृष्ट-प्रयत्न से होता है।
कारण: ध् एक स्पर्श-व्यञ्जन है। स्पर्श-व्यञ्जनों का उच्चारण स्पृष्ट-प्रयत्न से होता है।
हिन्दी अर्थ: ध् एक स्पर्श-व्यञ्जन है और स्पर्श-व्यञ्जन ‘स्पृष्ट-प्रयत्न’ से बोले जाते हैं।
प्रश्नः (ग) — ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः — किस वर्ण से मेल खाता है?
(हिन्दी: ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न से कौन-सा वर्ण मेल खाता है?)
उत्तरम् — (ग) ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः → व् (१)
कारण: व् एक अन्तःस्थ-व्यञ्जन है। अन्तःस्थ-व्यञ्जनों का उच्चारण ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न से होता है।
कारण: व् एक अन्तःस्थ-व्यञ्जन है। अन्तःस्थ-व्यञ्जनों का उच्चारण ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न से होता है।
हिन्दी अर्थ: व् एक अन्तःस्थ-व्यञ्जन है और अन्तःस्थ-व्यञ्जन ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न’ से बोले जाते हैं।
प्रश्नः (घ) — ईषत्-विवृत-प्रयत्नः — किस वर्ण से मेल खाता है?
(हिन्दी: ईषत्-विवृत-प्रयत्न से कौन-सा वर्ण मेल खाता है?)
उत्तरम् — (घ) ईषत्-विवृत-प्रयत्नः → श् (२)
कारण: श् एक ऊष्म-व्यञ्जन है। ऊष्म-व्यञ्जनों का उच्चारण ईषद्-विवृत-प्रयत्न से होता है।
कारण: श् एक ऊष्म-व्यञ्जन है। ऊष्म-व्यञ्जनों का उच्चारण ईषद्-विवृत-प्रयत्न से होता है।
हिन्दी अर्थ: श् एक ऊष्म-व्यञ्जन है और ऊष्म-व्यञ्जन ‘ईषद्-विवृत-प्रयत्न’ से बोले जाते हैं।
प्रश्नः (ङ) — संवृत-प्रयत्नः — किस वर्ण से मेल खाता है?
(हिन्दी: संवृत-प्रयत्न से कौन-सा वर्ण मेल खाता है?)
उत्तरम् — (ङ) संवृत-प्रयत्नः → अ (४)
कारण: ह्रस्व अ-कार ही एकमात्र ऐसा स्वर है जिसके उच्चारण में संवृत-प्रयत्न होता है।
कारण: ह्रस्व अ-कार ही एकमात्र ऐसा स्वर है जिसके उच्चारण में संवृत-प्रयत्न होता है।
हिन्दी अर्थ: ह्रस्व अ-कार ही एकमात्र ऐसा स्वर है जिसका उच्चारण ‘संवृत-प्रयत्न’ से होता है।
मेलन-सारणी (Matching Table)
(क) विवृत → ॠ | (ख) स्पृष्ट → ध् | (ग) ईषत्-स्पृष्ट → व् | (घ) ईषत्-विवृत → श् | (ङ) संवृत → अ
(क) विवृत → ॠ | (ख) स्पृष्ट → ध् | (ग) ईषत्-स्पृष्ट → व् | (घ) ईषत्-विवृत → श् | (ङ) संवृत → अ
अभ्यासः ४ — आम् / न (True / False)
प्रश्न-निर्देशः
अधोलिखितानां वाक्यानाम् उत्तराणि आम् / न इति सन्दर्भानुसारं लिखत —
(नीचे दिए वाक्यों के उत्तर ‘आम्’ (हाँ/सत्य) या ‘न’ (नहीं/असत्य) लिखिए —)
अधोलिखितानां वाक्यानाम् उत्तराणि आम् / न इति सन्दर्भानुसारं लिखत —
(नीचे दिए वाक्यों के उत्तर ‘आम्’ (हाँ/सत्य) या ‘न’ (नहीं/असत्य) लिखिए —)
प्रश्नः (क) — ‘ई’ वर्णः सन्ध्यक्षरम् अस्ति। (आम् / न)
(हिन्दी: ‘ई’ वर्ण सन्ध्यक्षर है।)
उत्तरम् — न (नहीं)
‘ई’ वर्णः समानाक्षर-स्वरः अस्ति, न सन्ध्यक्षरः। ‘ई’ एक-स्थानी वर्णः। सन्ध्यक्षराणि द्वि-स्थानी भवन्ति (यथा ए, ऐ, ओ, औ)।
‘ई’ वर्णः समानाक्षर-स्वरः अस्ति, न सन्ध्यक्षरः। ‘ई’ एक-स्थानी वर्णः। सन्ध्यक्षराणि द्वि-स्थानी भवन्ति (यथा ए, ऐ, ओ, औ)।
हिन्दी अर्थ: ‘ई’ समानाक्षर स्वर है, सन्ध्यक्षर नहीं। सन्ध्यक्षर द्वि-स्थानी होते हैं जैसे ए, ऐ, ओ, औ।
प्रश्नः (ख) — ‘ऐ’ वर्णः सन्ध्यक्षरम् अस्ति। (आम् / न)
(हिन्दी: ‘ऐ’ वर्ण सन्ध्यक्षर है।)
उत्तरम् — आम् (हाँ)
‘ऐ’ वर्णः सन्ध्यक्षरम् अस्ति। सन्ध्यक्षराः द्वि-स्थानी भवन्ति। ‘ऐ’ — कण्ठ-तालु उभयोः स्थानयोः उत्पद्यते।
‘ऐ’ वर्णः सन्ध्यक्षरम् अस्ति। सन्ध्यक्षराः द्वि-स्थानी भवन्ति। ‘ऐ’ — कण्ठ-तालु उभयोः स्थानयोः उत्पद्यते।
हिन्दी अर्थ: हाँ, ‘ऐ’ एक सन्ध्यक्षर है। यह दो स्थानों (कण्ठ और तालु) से उत्पन्न होता है।
प्रश्नः (ग) — ‘झ’ वर्णः स्पर्शः अस्ति। (आम् / न)
(हिन्दी: ‘झ’ वर्ण स्पर्श-व्यञ्जन है।)
उत्तरम् — आम् (हाँ)
‘झ’ वर्णः स्पर्श-व्यञ्जनम् (स्पर्शः) अस्ति। स्पर्शाः पञ्च-वर्गेषु (क-वर्गः, च-वर्गः, ट-वर्गः, त-वर्गः, प-वर्गः) विद्यन्ते। ‘झ’ — च-वर्गस्य सदस्यः अस्ति।
‘झ’ वर्णः स्पर्श-व्यञ्जनम् (स्पर्शः) अस्ति। स्पर्शाः पञ्च-वर्गेषु (क-वर्गः, च-वर्गः, ट-वर्गः, त-वर्गः, प-वर्गः) विद्यन्ते। ‘झ’ — च-वर्गस्य सदस्यः अस्ति।
हिन्दी अर्थ: हाँ, ‘झ’ स्पर्श-व्यञ्जन है। यह च-वर्ग का सदस्य है।
प्रश्नः (घ) — ‘र’ वर्णः स्पर्शेषु परिगण्यते। (आम् / न)
(हिन्दी: ‘र’ वर्ण स्पर्श-व्यञ्जनों में गिना जाता है।)
उत्तरम् — न (नहीं)
‘र’ वर्णः अन्तःस्थ-व्यञ्जनेषु परिगण्यते, न स्पर्शेषु। अन्तःस्थाः चत्वारः — य, र, ल, व।
‘र’ वर्णः अन्तःस्थ-व्यञ्जनेषु परिगण्यते, न स्पर्शेषु। अन्तःस्थाः चत्वारः — य, र, ल, व।
हिन्दी अर्थ: नहीं, ‘र’ अन्तःस्थ-व्यञ्जन है, स्पर्श नहीं। य, र, ल, व — ये चार अन्तःस्थ-व्यञ्जन हैं।
प्रश्नः (ङ) — ‘य, र, ल, व’ वर्णाः ऊष्माणः सन्ति। (आम् / न)
(हिन्दी: ‘य, र, ल, व’ वर्ण ऊष्म-व्यञ्जन हैं।)
उत्तरम् — न (नहीं)
‘य, र, ल, व’ वर्णाः अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि सन्ति, न ऊष्माणः। ऊष्माणः चत्वारः — श, ष, स, ह।
‘य, र, ल, व’ वर्णाः अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि सन्ति, न ऊष्माणः। ऊष्माणः चत्वारः — श, ष, स, ह।
हिन्दी अर्थ: नहीं, य, र, ल, व ‘अन्तःस्थ-व्यञ्जन’ हैं, ऊष्म नहीं। ऊष्म-व्यञ्जन हैं — श, ष, स, ह।
अभ्यासः ५ — रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणम् (Question Formation)
प्रश्न-निर्देशः
रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —
(रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्न बनाइए —)
रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —
(रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्न बनाइए —)
प्रश्नः (क) — स्वराः स्वतन्त्रवर्णाः सन्ति।
(हिन्दी: स्वर स्वतन्त्र वर्ण होते हैं।)
उत्तरम् (प्रश्नः) — के स्वतन्त्रवर्णाः सन्ति?
(अथवा: स्वराः कीदृशाः वर्णाः सन्ति?)
(अथवा: स्वराः कीदृशाः वर्णाः सन्ति?)
हिन्दी: कौन स्वतन्त्र वर्ण हैं? / स्वर कैसे वर्ण होते हैं?
प्रश्नः (ख) — व्यञ्जनानि अर्धमात्रिकाणि भवन्ति।
(हिन्दी: व्यञ्जन अर्धमात्रा वाले होते हैं।)
उत्तरम् (प्रश्नः) — व्यञ्जनानि कीदृशानि / कियन्मात्राणि भवन्ति?
हिन्दी: व्यञ्जन कितनी मात्रा वाले होते हैं?
प्रश्नः (ग) — स्वराणां द्वौ भेदौ भवतः।
(हिन्दी: स्वरों के दो भेद होते हैं।)
उत्तरम् (प्रश्नः) — स्वराणां कति भेदौ/भेदाः भवन्ति?
हिन्दी: स्वरों के कितने भेद होते हैं?
प्रश्नः (घ) — ह्रस्वस्य उपभेदाः न भवन्ति।
(हिन्दी: ह्रस्व के उपभेद नहीं होते।) (यहाँ सन्ध्यक्षर-ह्रस्व के सन्दर्भ में)
उत्तरम् (प्रश्नः) — कस्य उपभेदाः न भवन्ति?
हिन्दी: किसके उपभेद नहीं होते?
प्रश्नः (ङ) — व्यञ्जनानां चत्वारः भेदाः भवन्ति।
(हिन्दी: व्यञ्जनों के चार भेद होते हैं।)
उत्तरम् (प्रश्नः) — व्यञ्जनानां कति भेदाः भवन्ति?
हिन्दी: व्यञ्जनों के कितने भेद होते हैं?
अभ्यासः ६ — वर्णसमुच्चयं पाठात् चित्वा लिखत (Collect Varnas)
प्रश्न-निर्देशः
वर्णसमुच्चयं पाठात् चित्वा लिखत —
(पाठ से वर्णों का समूह चुनकर लिखिए —)
वर्णसमुच्चयं पाठात् चित्वा लिखत —
(पाठ से वर्णों का समूह चुनकर लिखिए —)
प्रश्नः (क) — एकस्थानि-वर्णाः (वर्णाः जे केवलम् एकस्थाने उत्पद्यन्ते)
(हिन्दी: एक स्थान से उत्पन्न होने वाले वर्ण कौन-से हैं?)
उत्तरम् — समानाक्षर-स्वराः एकस्थानी भवन्ति —
अ, आ, अ३, इ, ई, इ३, उ, ऊ, उ३, ऋ, ॠ, ऋ३, ऌ, ऌ३
तथा सर्वाणि व्यञ्जनानि अपि एकस्थानीनि एव।
अ, आ, अ३, इ, ई, इ३, उ, ऊ, उ३, ऋ, ॠ, ऋ३, ऌ, ऌ३
तथा सर्वाणि व्यञ्जनानि अपि एकस्थानीनि एव।
हिन्दी अर्थ: समानाक्षर स्वर एक स्थान से उत्पन्न होते हैं — जैसे अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ। सभी व्यञ्जन भी एक स्थान के होते हैं।
प्रश्नः (ख) — स्पर्श-व्यञ्जनानि (स्पर्श-व्यञ्जनों के वर्ण)
(हिन्दी: स्पर्श-व्यञ्जन कौन-से हैं?)
उत्तरम् — स्पर्श-व्यञ्जनानि (वर्गीयाः) — पञ्चविंशतिः (२५) —
क ख ग घ ङ (कण्ठ्याः)
च छ ज झ ञ (तालव्याः)
ट ठ ड ढ ण (मूर्धन्याः)
त थ द ध न (दन्त्याः)
प फ ब भ म (ओष्ठ्याः)
क ख ग घ ङ (कण्ठ्याः)
च छ ज झ ञ (तालव्याः)
ट ठ ड ढ ण (मूर्धन्याः)
त थ द ध न (दन्त्याः)
प फ ब भ म (ओष्ठ्याः)
हिन्दी अर्थ: स्पर्श-व्यञ्जन कुल 25 हैं — क से म तक पाँच वर्गों में।
प्रश्नः (ग) — अयोगवाह-व्यञ्जनानि
(हिन्दी: अयोगवाह-व्यञ्जन कौन-से हैं?)
उत्तरम् — अयोगवाहौ द्वौ —
अनुस्वारः (अं) च विसर्गः (अः) च।
अनुस्वारः (अं) च विसर्गः (अः) च।
हिन्दी अर्थ: अयोगवाह दो हैं — अनुस्वार (अं) और विसर्ग (अः)।
प्रश्नः (घ) — ऊष्म-व्यञ्जनानि
(हिन्दी: ऊष्म-व्यञ्जन कौन-से हैं?)
उत्तरम् — ऊष्माणः चत्वारः —
श, ष, स, ह
श, ष, स, ह
हिन्दी अर्थ: ऊष्म-व्यञ्जन चार हैं — श, ष, स, ह।
प्रश्नः (ङ) — द्विस्थानि-वर्णाः (दो स्थानों से उत्पन्न वर्ण)
(हिन्दी: दो स्थानों से उत्पन्न होने वाले वर्ण कौन-से हैं?)
उत्तरम् — सन्ध्यक्षर-स्वराः द्विस्थानी भवन्ति —
ए, ए३, ऐ, ऐ३ (कण्ठ-तालु — द्विस्थानी)
ओ, ओ३, औ, औ३ (कण्ठ-ओष्ठ — द्विस्थानी)
ए, ए३, ऐ, ऐ३ (कण्ठ-तालु — द्विस्थानी)
ओ, ओ३, औ, औ३ (कण्ठ-ओष्ठ — द्विस्थानी)
हिन्दी अर्थ: सन्ध्यक्षर स्वर दो स्थानों से बोले जाते हैं — ए, ऐ (कण्ठ + तालु) और ओ, औ (कण्ठ + ओष्ठ)।
शब्दार्थाः — Word Meanings (सर्वं शब्देन भासते)
| संस्कृत शब्दः | संस्कृत अर्थः | हिन्दी अर्थः | English |
|---|---|---|---|
| प्रयत्नः | उच्चारणे प्रयुज्यमानं बलम् | उच्चारण में प्रयुक्त ‘बल’ या ‘दबाव’ | Effort in Speech |
| अभ्यन्तरे | अन्तः | अन्दर | Inside |
| आभ्यन्तरम् | अन्तःस्थितम् | अन्दर स्थित | Internal |
| आभ्यन्तर-प्रयत्नः | आस्यस्य अभ्यन्तरे करणस्य स्थानं प्रति प्रयुक्तं बलम् | मस्तक के अन्दर करण का स्थान के प्रति बल | Internal Effort in Articulation |
| स्पृष्टः | स्पर्शं कृतः | स्पर्श किया हुआ | Touched |
| ईषत् | अल्पम् | थोड़ा | Slightly / Little |
| ईषत्-स्पृष्टः | अल्पं स्पर्शं कृतः | थोड़ा स्पर्श किया हुआ | Slightly Touched |
| विवृतः | उद्घाटितः | खुला हुआ | Opened |
| विवरः | छिद्रः / अन्तरालः | अन्तराल | Opening / Gap |
| ईषद्-विवृतः | अल्पम् उद्घाटितः | थोड़ा खुला हुआ | Slightly Opened |
| संवृतः | अविस्तृतः | सिकुड़ा हुआ | Constrained / Contracted |
| संकोचः | संकोचनम् | सिकुड़ना | Compress |
| संकुचितः | संकीर्णः / संकोचं कृतः | सिकुड़ा गया | Constricted / Narrow |

Leave a Reply